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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

एकोनविंशोऽध्यायः ९७

एकोनविंशोऽध्यायः ९७

ततस्त्वण्डकपालं तु तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशं ततो भूतादिरुच्यते ॥८॥
ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥९॥

तदनन्तर अण्डकपाल उसके बाद अन्धकार है। उसके आगे अग्नि, वायु, आकाश, तदनन्तर भूतादि हैं। तदनन्तर महान्, प्रधान एवं प्रकृति है। उसके पश्चात् पुरुष है और उस पुरुष से आगे ईश्वर अवस्थित है। उसी ईश्वर के द्वारा यह जगत् आवृत है॥८-९॥

ऊर्ध्वं मध्यमथश्चैते प्राङ्‌मया ये प्रकीर्त्तिता।
भूयस्तान् सम्प्रवक्ष्यामि ह्यण्डावरणकारणात् ॥१०॥

ऊर्ध्व, मध्य एवं अधः—यह मैंने पहले कह दिया है। अण्ड के आवरण का कारण कहकर पुनः उसकी बात कहूँगा॥१०॥

भूर्लोकश्च भुवश्चैव तृतीयः स्वः प्रकीर्त्तितः।
महर्जनस्तपः सत्यं सप्तलोकाः प्रकीर्त्तिताः ॥११॥

भूलोक, भुवर्लोक तथा तृतीय स्वर्गलोक कहा गया है। मह, जन, तप, सत्य—ये सात लोक प्रसिद्ध हैं॥११॥

ततस्त्वण्डकपाले च तस्माच्च परतस्तमः।
ततोऽग्निर्वायुराकाशः ततो भूतादिरुच्यते ॥१२॥

तदनन्तर अण्डकपाल एवं तत्पश्चात् अन्धकार की स्थिति है, तत्पश्चात् अग्नि, वायु, आकाश एवं तदनन्तर भूतादि की स्थिति कही जाती है॥१२॥

ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१३॥

तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष। पुरुष के पश्चात् ईश्वर, ईश्वर के द्वारा जगत् आवृत है॥१३॥

भूमेरधस्तात् सप्तैव लोकांस्तान्नामभिः शृणु।
ततः सुतलपातालौ तमस्तालस्ततः परः ॥१४॥
सुशालश्च विशालश्च सप्तमश्च रसातलः ॥१५॥

भूमि के निम्न भाग के सात लोकों के नाम सुनो। भूमि के नीचे सुतल, पाताल, तम, ताल, सुशाल, विशाल एवं सप्तम है—रसातल॥१४-१५॥

ततो महान् प्रधानं च प्रकृतिः पुरुषस्ततः।
पुरुषादीश्वरो ज्ञेय ईश्वरेणावृतं जगत् ॥१६॥

९८
श्रीसाम्बपुराणम्

एवं मेरोः समन्तात्तु सर्वमेतत् प्रकीर्त्तितम्।
उत्पन्नं स चतुःशृङ्गः सुमेरुः शुद्धकाञ्चनः ॥११७॥
पृथिव्यां संस्थितो मध्ये सिद्धगन्धर्वसेवितः।
चतुर्भिः काञ्चनैः शृङ्गैर्दिव्यैर्देवमिवोल्लिखत् ॥११८॥

तदनन्तर महान्, प्रधान तथा प्रकृति; तदनन्तर पुरुष, पुरुष के परे ईश्वर, ईश्वर द्वारा समस्त जगत् आवृत रहता है। मेरु के चारो ओर यह सब है। चतुःशृङ्ग-विशिष्ट शुद्ध स्वर्णमय सुमेरु उत्पन्न है। यह पृथिवी के मध्य में है। यह सिद्ध तथा गन्धर्व द्वारा सेवित है। यह चार स्वर्णमय दिव्य शिखरों से युक्त है तथा इसे देवता के समान कहा गया है॥११६-१८॥

योजनानां सहस्राणि चतुराशीतिरुच्छ्रितः।
प्रवृष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः ॥११९॥
विस्तरात् त्रिगुणश्चास्य परीणाहः समन्ततः।
तस्य सौमनसं नाम शृङ्गमेकं तु काञ्चनम् ॥१२०॥

इसका एक शृङ्ग चौरासी हजार योजन उन्नत, सोलह सहस्त्र योजन वर्षणयोग्य स्थान एवं निम्न देश में अट्ठारह हजार योजन विस्तृत एवं विस्तार का तीन गुना चारो ओर फैला है। वह सौमनस नामक सुवर्णमय शृङ्ग है॥११९-२०॥

द्वितीयं पद्मरागाभं ज्योतिष्कं नामनामतः।
तृतीयं नामतश्चित्रं सर्वधातुमयं शुभम् ॥१२१॥

द्वितीय शृङ्ग पर पद्मराग की प्रभातुल्य ज्योतिष्क नामक लोक विराजमान है। तृतीय शृङ्ग पर चित्रनामक सर्वधातुमय शुभ लोक है॥१२१॥

चतुर्थं राजतं शुक्लं चान्द्रमासमिति स्मृतम्।
तस्य सौमनसं यत्तत् शृङ्गं जाम्बूनदं श्रुतम् ॥१२२॥
तदेव चोदयन्नाम्ना यत्रोद्यन् दृश्यते रविः।
उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपे दिवाकरः ॥१२३॥
दृश्यो भवति भूतानां शिखरं तत्समाश्रितः।
काञ्चनस्य च शृङ्गस्य तेजसार्कस्य चावृते ॥१२४॥

चतुर्थ चाँदी के समान शृङ्ग पर शुक्ल चन्द्र लोक ख्यात है। उसका जो सौमनस्य शृङ्ग है, वह जाम्बूनद नाम से प्रसिद्ध है। जो उदयाचल कहा गया है, वहाँ रवि दृष्ट होते हैं। उत्तर दिक् में परिक्रमा करके जम्बूद्वीप में उस शिखर का आश्रय लेकर दिवाकर प्राणियों को दृष्ट होते हैं। वह स्वर्णशृङ्ग सूर्यतेज से ढका है॥१२३-२४॥