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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 10
निश्चय प्रतिक्रमण का स्वरूप -
कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं।
तत्तो णियत्तदे अप्पयं तु जो सो पडिक्कमणं॥
(10-76-383)
पूर्व में किये हुए (मूलोत्तर प्रकृति रूप से) अनेक विस्तार वाले जो शुभ और अशुभ
कर्म हैं, उनसे जो जीव अपने को दूर कर लेता है, वह जीव ही प्रतिक्रमण है।
The Self who drives himself away from the multitude of karmas,
virtuous or wicked, done in the past, is certainly the real
repentance.
निश्चय प्रत्याख्यान का स्वरूप -
कम्मं जं सुहमसुहं जम्हि य भावम्हि बज्झदि भविस्सं।
तत्तो णियत्तदे जो सो पच्चक्खाणं हवदि चेदा॥
(10-77-384)
और भविष्यकाल में जो शुभाशुभ कर्म जिस भाव के होने पर बँधता है, उस भाव से
जो आत्मा निवृत्त होता है, वह आत्मा प्रत्याख्यान होता है।
And the Self who drives himself away from the future thought-
activities that may cause bondage of karmas, virtuous or wicked,
is certainly the real renunciation.
181

अध्याय - 10
निश्चय आलोचना का स्वरूप -
जं सुहमसुहमुदिण्णं संपडि य अणेयवित्थरविसेसं।
तं दोसं जो चेददि सो खलु आलोयणं चेदा॥
(10-78-385)
वर्तमान काल में उदय में आये हुए (मूलोत्तर प्रकृति के रूप में) अनेक विस्तार वाले
जो कर्म हैं, उस दोष को जो जीव (भेदरूप) अनुभव करता है, वह जीव वास्तव में
आलोचना है।
The Self who realizes as evil the multitude of karmas, virtuous
or wicked, which come to fruition in the present, is certainly the
real confession.
निश्चय चारित्र का स्वरूप -
णिच्चं पच्चक्खाणं कुव्वदि णिच्चं पि जो पडिक्कमदि।
णिच्चं आलोचेयदि सो हु चरित्तं हवदि चेदा॥
(10-79-386)
जो आत्मा नित्य प्रत्याख्यान करता है, नित्य ही जो प्रतिक्रमण करता है, जो नित्य
आलोचना करता है, वह आत्मा निश्चय से चारित्र है।
The Self who is always engaged in renunciation, who is always
engaged in repentance, and who is always engaged in confession,
is certainly the right conduct.
182

अध्याय - 10
अज्ञानचेतना ही कर्म-बंध का कारण है -
वेदंतो कम्मफलं अप्पाणं जो दु कुणदि कम्मफलं।
सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥
(10-80-387)
वेदंतो कम्मफलं मये कदं जो दु मुणदि कम्मफलं।
सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥
(10-81-388)
वेदंतो कम्मफलं सुहिदो दुहिदो य हवदि जो चेदा।
सो तं पुणो वि बंधदि बीयं दुक्खस्स अट्ठविहं॥
(10-82-389)
कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा कर्म के फल को निजरूप करता है
(मानता है) वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है।
कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा ‘कर्म का फल मैंने किया' ऐसा मानता
है, वह दुःख के बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है।
कर्म के फल का वेदन करता हुआ जो आत्मा सुखी और दुखी होता है, वह दुःख के
बीज आठ प्रकार के कर्म को फिर भी बाँधता है।
Experiencing the fruits of karmas, the Self who identifies
himself with those fruits of karmas, bonds himself again with
the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas.
Experiencing the fruits of karmas, the Self who believes that he
is the creator of those fruits of karmas, bonds himself again with
••••••••••••••••••••
183

अध्याय - 10
the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas.
Experiencing the fruits of karmas, the Self who gets happy or
miserable with those fruits of karmas, bonds himself again with
the seeds of misery in the form of eight kinds of karmas.
शास्त्र ज्ञान से भिन्न है -
सत्थं णाणं ण हवदि जम्हा सत्थं ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं सत्थं जिणा विंति॥
(10-83-390)
शास्त्र ज्ञान नहीं है क्योंकि शास्त्र कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, शास्त्र अन्य
है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Scripture is not knowledge because scripture does not
comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and
scripture another; this has been proclaimed by the Omniscient
Lord.
शब्द ज्ञान से भिन्न है -
सद्दो णाणं ण हवदि जम्हा सद्दो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं सद्दं जिणा विंति।
(10-84-391)
184

अध्याय - 10
शब्द ज्ञान नहीं है क्योंकि शब्द कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, शब्द अन्य
है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
रूप ज्ञान से भिन्न है -
रूवं णाणं ण हवदि जम्हा रूवं ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं रूवं जिणा विंति॥
(10-85-392)
रूप ज्ञान नहीं है क्योंकि रूप कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, रूप अन्य है,
ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
वर्ण ज्ञान से भिन्न है -
वण्णो णाणं ण हवदि जम्हा वण्णो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं वण्णं जिणा विंति॥
(10-86-393)
185

अध्याय - 10
वर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि वर्ण कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, वर्ण अन्य है,
ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Colour (sight) is not knowledge because colour does not
comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and
colour another; this has been proclaimed by the Omniscient
Lord.
गन्ध ज्ञान से भिन्न है -
गंधो णाणं ण हवदि जम्हा गंधो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं गंधं जिणा विंति॥
(10-87-394)
गन्ध ज्ञान नहीं है, क्योंकि गन्ध कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, गन्ध अन्य
है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Smell (odour) is not knowledge because smell does not
comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and
smell another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord.
रस ज्ञान से भिन्न है -
ण रसो दु होदि णाणं जम्हा दु रसो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं रसं च अण्णं जिणा विंति॥
(10-88-395)
186

अध्याय - 10
रस ज्ञान नहीं है, क्योंकि रस तो कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है और रस
अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Taste (flavour) is not knowledge because taste does not
comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing and
taste another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord.
स्पर्श ज्ञान से भिन्न है -
फासो णाणं ण हवदि जम्हा फासो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं फासं जिणा विंति॥
(10-89-396)
स्पर्श ज्ञान नहीं है, क्योंकि स्पर्श कुछ नहीं जानता; इसलिए ज्ञान अन्य है, स्पर्श अन्य
है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Touch (physical contact) is not knowledge because touch does
not comprehend anything. Therefore, knowledge is one thing
and touch another; this has been proclaimed by the Omniscient
Lord.
कर्म ज्ञान से भिन्न है -
कम्मं णाणं ण हवदि जम्हा कम्मं ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं कम्मं जिणा विंति॥
(10-90-397)
187

अध्याय - 10
कर्म ज्ञान नहीं है, क्योंकि कर्म कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है, कर्म अन्य
है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Karma is not knowledge because karma does not comprehend
anything. Therefore, knowledge is one thing and karma
another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord.
धर्मद्रव्य ज्ञान से भिन्न है -
धम्मो णाणं ण हवदि जम्हा धम्मो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं धम्मं जिणा विंति॥
(10-91-398)
धर्मद्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि धर्मद्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य है,
धर्मद्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Medium of motion (dharma – the non-soul substance) is not
knowledge because medium of motion does not comprehend
anything. Therefore, knowledge is one thing and medium of
motion another; this has been proclaimed by the Omniscient
Lord.
अधर्मद्रव्य ज्ञान से भिन्न है -
णाणमधम्मो ण हवदि जम्हाधम्मो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णमधम्मं जिणा विंति॥
(10-92-399)
........................
188

अध्याय – 10
अधर्म द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि अधर्म द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य
है, अधर्म द्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Medium of rest (adharma – the non-soul substance) is not
knowledge because medium of rest does not comprehend
anything. Therefore, knowledge is one thing and medium of rest
another; this has been proclaimed by the Omniscient Lord.
काल द्रव्य ज्ञान से भिन्न है –
कालो णाणं ण हवदि जम्हा कालो ण याणदे किंचि।
तम्हा अण्णं णाणं अण्णं कालं जिणा विंति॥
(10-93-400)
काल द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि काल द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए ज्ञान अन्य
है, काल द्रव्य अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Time (kāla – the non-soul substance) is not knowledge because
time does not comprehend anything. Therefore, knowledge is
one thing and time another; this has been proclaimed by the
Omniscient Lord.
आकाश द्रव्य ज्ञान से भिन्न है –
आयासं पि ण णाणं जम्हायासं ण याणदे किंचि।
तम्हायासं अण्णं अण्णं णाणं जिणा विंति॥
(10-94-401)
189

अध्याय - 10
आकाश द्रव्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि आकाश द्रव्य कुछ नहीं जानता है; इसलिए
आकाश द्रव्य अन्य है, ज्ञान अन्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं।
Space (ākāṣ – the non-soul substance) is not knowledge because
space does not comprehend anything. Therefore, knowledge is
one thing and space another; this has been proclaimed by the
Omniscient Lord.
अध्यवसान ज्ञान नहीं है -
णाज्झवसाणं णाणं अज्झवसाणं अचेदणं जम्हा।
तम्हा अण्णं णाणं अज्झवसाणं तहा अण्णं॥
(10-95-402)
अध्यवसान ज्ञान नहीं है, क्योंकि अध्यवसान अचेतन है; इसलिए ज्ञान अन्य है तथा
अध्यवसान अन्य है।
Thought-activity is not knowledge because thought-activity is
non-conscious. Therefore, knowledge is one thing and thought-
activity another.
ज्ञान ही दीक्षा है -
जम्हा जाणदि णिच्चं तम्हा जीवो दु जाणगो णाणी।
णाणं च जाणयादो अव्वदिरित्तं मुणेदव्वं॥
(10-96-403)
190

अध्याय - 10
णाणं सम्मादिट्ठिं दु संजमं सुत्तमंगपुव्वगदं।
धम्माधम्मं च तहा पव्वज्जं अब्भुवेत्ति बुहा॥
(10-97-404)
क्योंकि जीव सदा जानता है, इसलिए ज्ञायक जीव ज्ञानी है और ज्ञान ज्ञायक से
अभिन्न है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञानीजन (गणधरदेव) ज्ञान को ही सम्यग्दृष्टि,
संयम, अंगपूर्वगत सूत्र, धर्म और अधर्म तथा दीक्षा मानते हैं।
आत्मा अनाहारक है -
अत्ता जस्स अमुत्तो ण हु सो आहारगो हवदि एवं।
आहारो खलु मुत्तो जम्हा सो पोग्गलमओ दु॥
(10-98-405)
ण वि सक्कदि घेंत्तुं जं ण वि मोत्तुं चेव जं परं दव्वं।
सो को वि य तस्स गुणो पाओग्गिय विस्ससो वा वि॥
(10-99-406)
191

अध्याय - 10
तम्हा दु जो विसुद्धो चेदा सो णैव गिण्हदे किंचि।
णैव विमुंचदि किंचि वि जीवाजीवाण दव्वाणं॥
(10-100-407)
इस प्रकार जिसकी आत्मा आमूर्तिक है, वह निश्चय ही आहारक नहीं है। वास्तव में
आहार मूर्तिक है, क्योंकि आहार पुद्गलमय है। उस आत्मा का वह कोई प्रायोगिक
अथवा वैस्रसिक गुण है कि वह परद्रव्य को न ग्रहण कर सकता है, न छोड़ सकता
है, अतः (अनाहारक होने के कारण) जो विशुद्ध आत्मा है, वह जीव-अजीव
परद्रव्यों में न तो कुछ ग्रहण ही करता है और न कुछ छोड़ता ही है।
Since the soul is incorporeal, it is certainly non-assimilative (of
food). In reality food is corporeal, comprising physical matter.
There is no attribute, acquired or natural, in the soul that it can
either assimilate or discard any alien substance. Therefore
(being non-assimilative) the pure soul neither assimilates nor
discards any alien substances – animate or inanimate.
बाह्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है -
पासंडियलिंगाणि य गिहिलिंगाणि य बहुप्पयाराणि।
घेत्तं वंदति मूढा लिंगमिणं मॉक्खमग्गो त्ति॥
(10-101-408)
ण दु होदि मॉक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा।
लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंते॥
(10-102-409)
192

अध्याय - 10
अनेक प्रकार के साधु-वेष और गृहस्थ-वेष धारण करके अज्ञानी जन यह कहते हैं
कि वेष ही मोक्ष का मार्ग है; किन्तु द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है; क्योंकि
अर्हन्तदेव देह से ममत्वहीन हुए (बाह्य) लिंग को छोड़कर दर्शन, ज्ञान, चारित्र का
सेवन करते हैं।
Ignorant persons adopt various kinds of alleged external
insignia of monks and householders and claim that adoption of
these insignia leads to liberation. But external insignia cannot
lead to liberation as the Omniscient Lords, discarding all
external symbols, and giving up attachment to body itself, only
get immersed in right faith, knowledge, and conduct.

दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग है -
ण वि एस मॉक्खमग्गो पासंडियगिहिमयाणि लिंगाणि।
दंसणणाणचरित्ताणि मॉक्खमग्गं जिणा विंति॥
(10-103-410)
तम्हा जहित्तु लिंगे सागारणगारिये हि वा गहिदे।
दंसणणाणचरित्ते अप्पाणं जुंज मॉक्खपहे॥
(10-104-411)
साधु और गृहस्थ के लिंग - यह भी मोक्ष-मार्ग नहीं हैं। दर्शन, ज्ञान और चारित्र
मोक्ष-मार्ग हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं; इसलिए गृहस्थ और साधुओं द्वारा ग्रहण
किये हुए लिंगो को छोड़कर अपनी आत्मा को दर्शन, ज्ञान और चारित्रस्वरूप
मोक्ष-मार्ग में लगाओ।
•••••••••••••••••••••••••••••
193

अध्याय - 10
Insignia of monks and householders do not constitute the path
to liberation. The Omniscient Lords declare that right faith,
knowledge, and conduct (together) constitute the path to
liberation. Therefore, discarding all alleged external insignia of
monks and householders, lead your soul to the path to liberation
by immersing it in right faith, knowledge, and conduct.
मोक्षमार्ग में विहार कर -
मॉक्खपहे अप्पाणं ठवेहि चेदयहि झायहि तं चेव।
तत्थेव विहर णिच्चं मा विहरसु अण्णदव्वेसु॥
(10-105-412)
(हे भव्य !) मोक्ष-पथ में अपनी आत्मा को तू स्थापित कर, उसी का अनुभव कर
और उसी का ध्यान कर, वहीं पर सदा विहार कर; अन्य द्रव्यों में विहार मत कर।
(O bhavya – potential aspirant to liberation!) Establish your soul
on to the path to liberation. That only ought to be experienced,
meditated upon, and always trod; do not tread in other objects.
लिंग के मोही समय-सार को नहीं जानते -
पासंडिलिंगेसु व गिहिलिंगेसु व बहुप्पयारेसु।
कुव्वंति जे ममत्तं तेहि ण णादं समयसारं।
(10-106-413)
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194

अध्याय - 10
जो लोग बहुत प्रकार के साधु-लिंगों में अथवा गृहस्थ-लिंगों में ममत्व करते हैं,
उन्होंने समय-सार को (शुद्धात्म स्वरूप को) नहीं जाना।
Those who exhibit attachment to insignia of various kinds of
monks and householders have not understood the samayasāra
(pure and absolute consciousness).
लिंग के सम्बन्ध में दोनों नयों का मत -
ववहारिओ पुण णओ दोण्णि वि लिंगाणि भणदि मॉक्खपहे।
णिच्छयणओ दु णेच्छदि मॉक्खपहे सव्वलिंगाणि॥
(10-107-414)
व्यवहार नय दोनों ही लिंगों को मोक्ष का मार्ग कहता है और निश्चय नय तो समस्त
लिंगों को मोक्ष-मार्ग में इष्ट नहीं मानता।
Although the empirical point of view claims both kinds of
insignia to be the path to liberation, the transcendental point of
view does not consider any insignia whatsoever to be desirable
for the path to liberation.
उपसंहार -
जो समयपाहुडमिणं पढिदूण य अत्थतच्चदो णादुं।
अत्थे ठाहिदि चेदा सो होहिदि उत्तमं सॉक्खं॥
(10-108-415)
195

अध्याय - 10
अन्त में आचार्य कुन्दकुन्द उपसंहार करते हुए समयपाहुडं ग्रन्थ का माहात्म्य
बतलाते हैं -
जो भव्यात्मा इस समयप्राभृत को पढ़कर और इसे अर्थ और तत्त्व से जानकर अर्थभूत
शुद्धात्मा में ठहरेगा, वह उत्तम सौख्यस्वरूप हो जाएगा।
Āchārya Kundkund concludes this scripture with a
mention of its significance –
The bhavya (potential aspirant to liberation) who, after reading
this Samayaprābhrita and understanding its meaning and
essence, would establish himself in pure and absolute conscious-
ness shall attain supreme bliss.
इदि दहमो सव्वविसुद्धणाणाधियारो समत्तो
इदि सिरिकुन्दकुन्दाइरियपणीदं समयपाहुडं
196

शब्दानुक्रमणिका
अकारक 136, 161
अगर्हा 146
अचेतन 14, 34, 56, 79, 93, 137, 157,
173, 190
अचित्त 107, 115, 117
अजीव 10, 32, 44, 57, 98, 101, 128,
148, 192
अजीवमिथ्यात्व 44
अधःकर्म 137
अधर्म 4, 102, 188, 189, 191
अधारणा 146
अधोलोक 159
अध्यवसान 23, 24, 25, 26, 92, 105,
125, 126, 127, 128, 129, 130,
190
अध्यात्मस्थान 28
अनन्य 11, 57, 79, 91, 148, 168, 175
अनाहारक 192
अनिन्दा 146
अनिवृत्ति 146
अनुभागस्थान 28
अन्तरात्मा 14
अन्यत्व 11
अपरिग्रह 102, 103, 126
अपरिहार 146
अप्रतिसरण 146
अप्रतिक्रमण 136, 146
अप्रत्याख्यान 136
अप्रमत्त 6, 9
अबद्ध 11, 15, 67
अमूढ़दृष्टि 111
अमृतकुम्भ 146
अरहन्त 3
अलोक 128
अवधिज्ञान 99
अविरति 44, 45, 47, 48, 55, 79, 82,
92, 110
अविशेष 11
अशुद्धि 146
असंयत 150
असत्य 126
असुर 154
अस्पृष्ट 11, 67
अज्ञान, अज्ञानी 13, 14, 15, 16, 23, 35,
44, 45, 46, 47, 48, 51, 61, 62,
63, 64, 65, 66, 73, 74, 76, 78,
81, 89, 92, 95, 98, 105, 107,
118, 120, 121, 131, 134, 150,
151, 155, 159, 176, 183, 193
आकाश 4, 189, 190
आयु कर्म 84, 119, 120, 121
आराधित 146
आलोचना 182
197

शब्दानुक्रमणिका
आस्रव 10, 28, 35, 36, 37, 55, 79, 80,
85, 92,
औद्देशिक 137
इन्द्रिय 5, 18, 27, 33, 49, 93, 177, 178,
179
उदयस्थान 28
उपगूहन 112
उपघात 115, 116, 117, 160
उपयोग 15, 30, 44, 45, 47, 48, 50, 57,
60, 64, 84, 88, 116, 117, 146
ऊर्ध्वलोक 159
एकत्व 4, 5, 57, 91
कर्मप्रदेश 3
कर्म-रज 116, 117
कषाय 44, 55, 64, 76, 78, 79, 82, 110,
134, 135
कांक्षा 104, 105, 110, 136
काम 5
काल 4, 189
काल द्रव्य 189
कुन्दकुन्द, आचार्य 1, 5, 196
केवलज्ञान 99
केवली (भगवान) 8, 17, 18, 25, 55, 73
क्रोध 35, 37, 44, 47, 49, 57, 60, 64,
88
गन्ध 22, 27, 28, 31, 178, 180, 186
गर्हा 146
गुणस्थान 3, 28, 29, 34, 56
गुप्ति 131
घ्राण 5, 178
चारित्र 3, 5, 7, 12, 75, 76, 78, 82, 83,
113, 130, 132, 168, 170, 172,
173, 174, 182, 193
चित्त 130
चेतना 14, 18, 19, 27, 127, 183
चूलिका 153
चोरी 126, 145
जीव 3, 4, 8, 9, 10, 13, 14, 15, 16, 17,
23, 24, 25, 26, 27, 28, 29, 30,
31, 32, 33, 34, 35, 36, 37, 40,
41, 42, 44, 45, 46, 47, 50, 53,
54, 56. 57, 58, 60, 64, 65, 66,
67, 68, 70, 72, 75, 78, 79, 80,
81, 83, 84, 85, 86, 88, 90, 93,
97, 98, 108, 109, 117, 118, 119,
120, 121, 122, 123, 124, 125,
127, 128, 130, 131, 132, 138,
139, 140, 141, 148, 152, 154,
157, 158, 159, 160, 162, 164,
165, 166, 167, 168, 171, 172,
174, 175, 180, 181, 182, 191,
192
जीवत्व 15, 32
जीवद्रव्य 15
जीवनिकाय 132
जीवमिथ्यात्व 44
जीवस्थान 28, 33
198

शब्दानुक्रमणिका
जुगुप्सा 111
तप 73, 74, 131
तिर्यग्लोक 159
तिर्यञ्च 128, 154
दर्शन 3, 5, 7, 11, 12, 21, 22, 37, 57,
69, 75, 82, 83, 90, 91, 113, 132,
168, 169, 170, 172, 173, 174,
193
दर्शनोपयोग 21, 57
दीक्षा 191
देव 128, 154
द्रव्यकर्म 13, 24, 58, 65, 66, 135
द्रव्यलिंग 193
द्रव्यश्रुत 8
द्रव्यास्रव 81, 82, 84, 86
द्वेष 28, 79, 80, 85, 134, 135, 175
धर्म 4, 21, 102, 128, 132, 188, 191
धारणा 146
निःशंक 109, 110, 145, 146
निर्जरा 10, 81, 93, 153
निर्भय 109
निर्वाण 32, 73, 74, 99, 130
निर्विचिकित्सा 111
निश्चय नय 7, 9, 10, 12, 16, 17, 18,
26, 29, 41, 45, 56, 67, 76, 125,
130, 132, 155, 167, 170, 195
नामकर्म 33, 160
नोकर्म 13, 23, 28, 38, 57, 88, 91, 92
परमार्थ 7, 14, 17, 19, 24, 27, 73, 74,
76, 99
परसमय 3
पर्याप्त 33, 34
परिग्रह 91, 100, 101, 102, 103, 104,
126, 169
परिणाम 24, 26, 38, 39, 40, 41, 42, 43,
45, 51, 66, 79, 130, 135, 148,
175
पुद्गल 4, 15, 17, 24, 25, 28, 30, 32,
40, 41, 42, 43, 44, 46, 51, 52,
53, 54, 56, 58, 60, 65, 66, 79,
81, 83, 94, 96, 97, 137, 157,
158, 165, 174, 176, 192
पुण्य 10, 74, 90, 102, 125, 126, 128,
153
प्रतिक्रमण 136, 146, 181, 182
प्रतिसरण 146
प्रत्यय 55, 56, 57, 79, 81, 84, 85
प्रत्याख्यान 20, 132, 136, 181, 182
प्रभावना 114
प्रमत्त 6, 9
प्रज्ञा 141, 142, 143
पान 103
पाप 10, 90, 102, 125, 126, 128, 152,
153
पौद्गालिक 3
बंधस्थान 28
बन्ध 4, 5, 10, 11, 35, 36, 53, 55, 64,
199

शब्दानुक्रमणिका
70, 77, 80, 81, 82, 83, 84, 85,
86, 94, 105, 115, 116, 117, 124,
125, 126, 127, 129, 135, 136,
138, 139, 140, 141, 145, 150,
153
बहिरात्मा 14
बालतप 73
बालव्रत 73
ब्रह्मचर्य 126
बुद्धि 13, 15, 48, 104, 124, 127, 130,
146, 179, 180
भावकर्म 13, 61, 65, 133, 168
भावास्रव 84, 85, 86, 92
भोग 5, 95, 104, 105, 108, 109, 132
भोजन 103
मतिज्ञान 99
मान 60
माया 60
मार्गणास्थान 28
मिथ्यात्व 15, 44, 45, 47, 48, 55, 56,
64, 65, 76, 78, 79, 81, 82, 85,
92, 110, 157, 158, 159, 162
मिथ्याचारित्र 5
मिथ्यादर्शन 5
मिथ्यादृष्टि 43, 55, 78, 95, 131, 150,
156, 157, 164
मिथ्याज्ञान 5
मुनि 17, 73, 129, 130, 136, 150
मोह, मोहनीय, मोही 19, 21, 28, 34, 40,
44, 45, 85, 118, 120, 121, 134,
156, 157, 175
मोक्ष 10, 74, 75, 99, 104, 113, 128,
138, 139, 140, 153, 154, 192,
193, 194, 195
यथाख्यात चारित्र 82
योग 44, 50, 55, 64, 79, 82, 92, 110,
117, 132
योगस्थान 28 रत्नत्रय 5, 9, 12, 76, 78, 83
रस 22, 27, 28, 31, 178, 180, 186,
187
राग 5, 15, 23, 25, 26, 28, 40, 66, 71,
72, 75, 79, 80, 84, 85, 86, 89,
90, 92, 95, 96, 97, 98, 105, 106,
112, 115, 116, 117, 125, 127,
133, 134, 135, 136, 138, 168,
174, 175
राध 145
रूप 22, 27, 28, 31, 32, 177, 180, 185
लिंग 193, 194, 195
लोक 128, 159, 162
लोभ 60
लोहा 63, 70, 106
वर्ग 28
वर्गणा 28, 58, 65
व्रत 73, 74, 131
व्यवसाय 130, 156
व्यवहार नय 7, 9, 12, 16, 17, 25, 26,
29, 30, 34, 54, 67, 155, 167,
170, 172, 195
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