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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 226 में से

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पृष्ठ 210

अध्याय - 10
अनेक प्रकार के साधु-वेष और गृहस्थ-वेष धारण करके अज्ञानी जन यह कहते हैं
कि वेष ही मोक्ष का मार्ग है; किन्तु द्रव्यलिंग मोक्ष का मार्ग नहीं है; क्योंकि
अर्हन्तदेव देह से ममत्वहीन हुए (बाह्य) लिंग को छोड़कर दर्शन, ज्ञान, चारित्र का
सेवन करते हैं।
Ignorant persons adopt various kinds of alleged external
insignia of monks and householders and claim that adoption of
these insignia leads to liberation. But external insignia cannot
lead to liberation as the Omniscient Lords, discarding all
external symbols, and giving up attachment to body itself, only
get immersed in right faith, knowledge, and conduct.

दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग है -
ण वि एस मॉक्खमग्गो पासंडियगिहिमयाणि लिंगाणि।
दंसणणाणचरित्ताणि मॉक्खमग्गं जिणा विंति॥
(10-103-410)
तम्हा जहित्तु लिंगे सागारणगारिये हि वा गहिदे।
दंसणणाणचरित्ते अप्पाणं जुंज मॉक्खपहे॥
(10-104-411)
साधु और गृहस्थ के लिंग - यह भी मोक्ष-मार्ग नहीं हैं। दर्शन, ज्ञान और चारित्र
मोक्ष-मार्ग हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं; इसलिए गृहस्थ और साधुओं द्वारा ग्रहण
किये हुए लिंगो को छोड़कर अपनी आत्मा को दर्शन, ज्ञान और चारित्रस्वरूप
मोक्ष-मार्ग में लगाओ।
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