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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

अध्याय - 10
निश्चय आलोचना का स्वरूप -
जं सुहमसुहमुदिण्णं संपडि य अणेयवित्थरविसेसं।
तं दोसं जो चेददि सो खलु आलोयणं चेदा॥
(10-78-385)
वर्तमान काल में उदय में आये हुए (मूलोत्तर प्रकृति के रूप में) अनेक विस्तार वाले
जो कर्म हैं, उस दोष को जो जीव (भेदरूप) अनुभव करता है, वह जीव वास्तव में
आलोचना है।
The Self who realizes as evil the multitude of karmas, virtuous
or wicked, which come to fruition in the present, is certainly the
real confession.
निश्चय चारित्र का स्वरूप -
णिच्चं पच्चक्खाणं कुव्वदि णिच्चं पि जो पडिक्कमदि।
णिच्चं आलोचेयदि सो हु चरित्तं हवदि चेदा॥
(10-79-386)
जो आत्मा नित्य प्रत्याख्यान करता है, नित्य ही जो प्रतिक्रमण करता है, जो नित्य
आलोचना करता है, वह आत्मा निश्चय से चारित्र है।
The Self who is always engaged in renunciation, who is always
engaged in repentance, and who is always engaged in confession,
is certainly the right conduct.
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