रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
हिन्दीटीकासहितम्
मंत्र । ॐ जले स्वाहा । हस्तर्क्षे कोविदारस्य
त्र्यंगुलं कीलमुद्धरेत् ॥ कुलालभांडेनि-
खनेत् भाडं नृयाति पक्वताम् ॥ भोजनस्य
च पात्राणि यांति भग्नानि सर्वतः ॥ ५१ ॥
मूलमें लिखा हुआ मंत्रपढकरहस्तनक्षत्रमें कदपलकी लकड़ी तीन अंगुलकी
कुम्हारके आवेमें गाडे तो बर्त्तन न पकें और रसोईके पात्रसबफूट जाँय ॥ ५१ ।
गोक्षुरं च ह्यजाशृंगं तालबुखारं तथैव च ॥ ५२ ॥
शूकरस्य च विट्चैव श्वेतगुंजकमूलकम् ॥
पाकग्रहे निक्षिपेच्च भग्नभांडानि जायते ॥ ५३ ॥
गोखुरू छेरीके शृंग तालबुखारा और शूकरविष्ठा और सफेद गुंजाकी
जड रसोईके मकानमें छोड देय तो बर्तन फूट जाँय ॥ ५२ ॥ ५३ ॥
स्निग्धभांडेषु मंत्रेण मंत्रितेषु शुभेषु च ॥
तदा भांडानि सर्वाणि भग्नं यांति न संशयः ॥ ५४ ॥
चिकने बर्तनोंमें मंत्र पढे तो सब बर्तन फूट जाँय इसमें संशय नहीं है ॥५४॥
मंत्रः ॐ मदमदस्वाहा ।
चित्रर्क्षे मधूकवृक्षस्य चतुरंगुलकीलकम् ॥
तैलयंत्रसमीपे तु निखनात्तैलबंधनम् ॥ ५५ ॥
मूलका लिखा मंत्र पढ चित्रानक्षत्रमें महुएकी कील चार अंगुलकी
तेलीके कोल्हूके नीचे गाडे तो तेल न बहे ॥ ५५ ॥
मंत्रः । ॐ दहदहस्वाहा ।
रजकश्लिष्टवस्त्रस्य मृदमानीय यत्नतः ॥
तेन त्रिकोणप्रतिमां कारयेदंगणेऽथवा ॥ ५६ ॥
३६ रुद्रयामलतन्त्रम्
मूल मंत्र पढे और धोबीकी लादीकी माटी ले उसकी तीन कोनकी
पुतली बनावे और अंगनमें ? ।। ५६ ।।
गृहे वा स्थापयेच्चैव तदा वस्त्राणि चैवहि ॥
निर्मलानि न भवन्त्येव सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ५७ ॥
वा गृहमें स्थापित कर उसके गृहमें छोडे तो वस्त्र उजले न होंय, यह
मैने सत्य सत्य कहा है ॥ ५७ ॥
मंत्रः । ॐ नमोवज्रनेपातयवज्रशुरपतिआग्याहंफट्स्वाहा ॥
गंधकस्य च चूर्णं च क्षेपयेद्भोजनालये ॥
तदा सर्वाणि नश्यंति भोजनानि च सर्वशः ॥ ५८ ॥
यह मंत्र पढकर गंधकका चूर्ण रसोईमें छोड़े तो सब भोजन नष्ट
होय ॥ ५८ ॥
श्वेतसर्षपमंत्रेण क्षेपयेत्क्षेत्रकेषु च ॥
ततो कीटा न जायंते निर्विघ्ना सस्यसंपदः ॥ ५९ ॥
सफेद सरसों मंत्र पढकर खेतों में छोड़दे तो कीडे न लगे नाज निर्विघ्न
होय ॥ ५९ ॥
मंत्रः । ॐ नमः शुरभ्यौबलाछनपरिपतिसिलि स्वाहा ।
देवेभ्यो दंडवत्कृत्वा नमोच्चार्य्य पुनः पुनः ॥
सिद्धिमंत्रो ततो जातो नात्र कार्या विचारणा ॥ ६० ॥
मूलस्थमंत्रपढकर देवताओं को वारंवार नमस्कार दंडवत् करे तो मंत्र
सिद्धहोय इसमें विचार न करना ॥ ६० ॥
हिन्दीटीकासहितम् ३७
श्वेतसर्षपवालू च सप्तवारेण मंत्रितौ ॥
क्षिपेत्क्षेत्रे तदा चैव सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ ६१ ॥
सफेद सरसों और वालू ले सात वार मंत्रपढकर खेतमें छोडे तो सब
उपद्रव नष्ट होंय ॥ ६१ ॥
सैंजनस्य च काष्ठस्य सप्तांगुलकं कीलकम् ॥
क्षेत्रे तं निखनेच्चापि न क्षेत्रं बर्द्धते तदा ॥ ६२ ॥
सहिजनेकी कील सात अंगुलकी मंत्रपढकर खेतमें गाडे तो खेत न
बढे ॥ ६२ ॥
मंत्रः । ॐ नमोमंजनाथपतदविद्याहरहर-
सिलिसिलिसर्वासनानांतुंड बंधकुरु कुरु
हंफट्स्वाहा । ॐ उज्जैननगरीमेंहोवालेमहा-
देवभंडारफलफलहोहनुमंतसाखी । अस्ति
ह्यस्तिकरोत्युच्चैचौषधींश्चापि निक्षिपेत् , ॥
तदाक्षेत्रे फलं पुष्पं भवेत्तत्र न संशयः ॥ ६३ ॥
लस्थ मंत्र पढकर अस्तिर उच्चस्वरसे कह क्षेत्रमें औषधी लगावे तो
फूले फले इसमें संदेह नहीं है ॥ ६३ ॥
षंढकरणम् ।
नरो यत्राकरोन्मूत्रं निखनेत्कृष्णवृश्चिकम् ॥
नपुंसको तदा यातोचोद्धृतेन पुनः पुमान् ॥ ६४ ॥
मनुष्य जहाँ पर मूत्र करे वहाँ कृष्ण विच्छू गाडे तो नपुंसक होय और
उखाडे तो फिर पुरुष होय ॥ ६४ ॥
३८ रुद्रयामलतन्त्रम्
छपखुदियाकीटकमजामूत्रेण पिष्टितम् ॥
ताम्बूलेनखादयेद्यंनपुंसकत्वमाप्नुयात् ॥ ६५ ॥
छपुखुदियाकिरवा छेरीके मूत्रमें पीसकर ताम्बूलके संग पिलावे तो
नपुंसक होय ॥ ६५ ॥
कृष्णतिलं गोक्षुरं च ह्यजादुग्धेन क्वाथितम् ॥
शीतं कृत्वा च खादेच्च तदा शुद्धो पुनः पुमान् ॥ ६६ ॥
कृष्ण तिल और गोखरूका छेरीके दूधमें क्वाथ कर जब शीतल होय
तब खाय तौ फिर पुरुष होय ॥ ६६ ॥
गोरोचनंनवनीतंखादयेच्चापि मिश्रितम् ॥
नपुंसको भवेच्चैव यावज्जीवो न शुद्ध्यति ॥ ६७ ॥
गोरोचनमें नैनू मिलाकर खावे तौ जबतक जीवे तबतक नपुंसक
होय ॥ ६७ ॥
धत्तूरफलं शर्करां क्षभयेद्याति शुद्धताम् ॥ ६८ ॥
धतूरेका फल और शर्करा खाय तो शुद्ध होय ॥ ६८ ॥
भगबंधनम् ।
श्वेतगौदरिधूलिं च प्रमदापादतलस्य च ॥
वामस्य च समादाय लेपाद्याति च गाढताम् ॥ ६९ ॥
सफेद गौदरि और स्त्रीके वाम पादकी धूलि ले लेपन करे तो भग गाढा
होय ॥ ६९ ॥
मंत्रः । ॐ अमुकभगबंधनं विस्फुरनं ध्रुव श्रोनितम् ।
नागवल्लीदलं मंत्रैः सप्तवारं च मंत्रितम् ॥
तद्रसे मर्दयेद्योनि दृढीभूता न संशयः ॥ ७० ॥
हिन्दीटीकासहितम् ३९
मूल मंत्रको सात वार पढकर ताम्बूलदलोंका रस काढकर योनिपर
लेपकर मर्दन करे तो योनि दृढ होय ॥ ७० ॥
मंत्रः । ॐ चिटोचिटीसाचिटोस्वाचिटीठः ठः ।
स्मशानवस्त्रं धावयेद्गोदुग्धचंदनेन वा ।।
मंत्रेण च समालेपान्न लिंगं जायतेदृढम् ॥ ७१ ॥
चिताका कपडा गौके दूधसे धोवे और चंदनसे लपेटकर मंत्र
पढकर लिंगमें लपेटे तो लिंग दृढ न होय ॥ ७१ ॥
सप्तवारं च मंत्रेण पानीयं चापियोपिबेत् ॥
प्रातःकाले तदा चैव न भवेद्दोषतत्कृतम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकालमें सात वार मंत्र पढकर पानी पीवे तो शुद्ध होय ॥ ७२ ॥
मंत्रः । ॐ वज्र कष्टीवज्रकीवार वज्रमें बाँधौ
दसमे धार वज्र पानीमै पियौतौ डाइनि
डाकिनी ना छिवै जाघचापोकालीसी
अन्यत्र ब्रह्माकी धीयासिसुडाकिनीमाकरवो
मोरै जीव भाति करै चलै पानी करै
ग्रहज करै पानी करै सुनैकैरहासी करै न-
यन कटाक्ष करै अपनी हथेरी बडै सवारै
किलनि पोतली आनि पतिया मोहै न लागै
मइ करै ताकौ मरन्न कपरैहूँ मोसिद्धिगुरुगुह
पाइश्रीमहादेवकी आज्ञा । क्लेशनिवारणम् ।
४० रुद्रयामलतन्त्रम्
हरतालं खरलं कृत्वा लेपयेत्काष्ठपुत्रिकाम् ॥
द्वारेनिवेशयेत्तां च धूपयेद्यांति मक्षिकाः ॥ ७३ ॥
हरताल लेकर खरल कर काष्ठकी पुतली बनवाकर हरताल लगा
द्वारपर टांगे और धूप दे तो गृहकी मक्षिका भागे ॥ ७३ ॥
अर्कदुग्धं च माषं च तिलं गुणसमन्वितम् ॥
कारयेद्गुटिकां तां च कोष्ठे चैवाभि धारयेत् ॥
अर्कपत्रविधानेन चौसरा च पलायते ॥ ७४ ॥
अर्कदुग्ध माष तिल गुड़ इनकी वटी बनाके कोठेमें अर्कपत्रके ऊपर घरे
तो चौसरा भागे ॥ ७४ ॥
बिडालविड्र्हरतालं मूषकं गृह्ययत्नतः ॥ ७५ ॥
तस्य देहे लिपेच्चैव प्रमुञ्चेच्चमूषकम् ॥
तदासर्वेपलायंते ये गृहेमूषकाःस्थिताः ॥ ७६ ॥
बिडालकी विष्ठा तथा हरताल ले यत्नसे मूसा पकड़े और उस मूसेकी
देहमें लगावे और छोड़ दे तौ सब गृहके मूसे भागे ॥ ७५ ॥ ॥ ७६ ॥
मघार्क्षे चैव गृह्णाति मधूकस्थ च बांदकम् ॥
क्षेत्रे चैव निखनेत्तं न खादेत मूषकः ॥ ७७ ॥
मघानक्षत्रमें महुवेका बांदा ले खेतमें गाडे तो मूषकादिक न खाय ॥ ७७ ॥
कुंभीमूलं समादाय खट्वापांचैवबंधयेत् ॥
मत्कुणा नाशमायांतितदासर्वेनसंशयः ॥ ७८ ॥
कुंभीकी जड लेकर खटियामें बाँधे तो सब खटमल कीडे नष्ट हो जाँय
॥ ७८ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ४१
राईसमायाः पुष्पं च तूलेनैवचवर्तिकाम् ॥
तैलेप्रज्वालयेद्दीपंदर्शनाद्यांति मत्कुणाः ॥ ७९ ॥
राई समाके फूल और रुईकी बत्ती बनाके राईके तेलमें भिगोय दीपक
बारे तो देखकर खटमल भाग जाँय ॥ ७९ ॥
अर्जुनस्य च पुष्पं च फलं लाक्षा च वारिजम् ॥
गुग्गुलुः शुक्लसर्पंखामूलं भल्लातकं तथा ॥ ८० ॥
अर्जुनके पुष्प और फल तथा लाख, कमल, गूगल सफेद सरफोकाकी
जड और भिलावा ले ॥ ८० ॥
विडंगं त्रिफला लाक्षा चार्कदुग्धेन धूपयेत् ॥
तदा गेहे न तिष्ठंति मूषका वृश्चिकास्तथा ॥ ८१ ॥
वायविडंग त्रिफला लाख और अर्कदूधका धूप दे तो गृहमें मूसे विच्छू
न रहें ॥ ८१ ॥
मुस्तासर्षपभल्लातकेवाक्षस्य च पुष्पकम् ॥
गुडार्को चैव निर्यासो धूपयेच्चैव मंदिरे ॥ ८२ ॥
मुस्ता सर्षप भिलावा केवाचके फूल गुड अकउड और रार इनकी धूप
गृहमें देवे तो सब मसे विषकीट भाग जांय ॥ ८२ ॥
तदा सर्वे पलायंते मूषका विषकीटकाः ॥
अमिल्ताशं च पर्य्यंके बंधयेद्यांति मृत्कुणाः ॥ ८३ ॥
अमिलतासको पलंगमें लगावे तो खटमल भाग जाँय ॥ ८३ ॥
लाक्षानिर्यासमाषं च सर्षपां चैव रंडकम् ॥
भल्लातकं विडंगं च ह्यर्कबीजंच पुष्करम् ॥ ८४ ॥
४२ रुद्रयामलतन्त्रम्
कौहापुष्पं समं सर्वं धूपयेच्च गृहे तथा ॥
भूता कीटाश्चडाकिन्योपलायन्तेनसंशयः ॥ ८५ ॥
लाख रार उर्द सरसों रंड भिलावा विडंग अर्कबीज कमल और अर्जु-
नके फूल सब लेकर गृहमें धूप देय तो भूत प्रेत डाकिनी भाग जाँय इसमें संशय
नहीं ॥ ८४ ॥ ।।८५ ॥
बबूलपत्रधूपेन पिशुकीटो पलायते ॥ ८६ ॥
बबूल के पत्रीकी धूप देवे तो पिशुवा भागे ॥ ८६ ॥
अंकोलबीजं चूर्णयित्वासप्ताहेनपुटंन्यसेत् ॥ ८७ ॥
तैले तस्य च यत्नेन कांस्यपात्रे समान्यसेत् ॥
प्रचंडधर्मस्पर्शाच्च तैलं निस्सरति यत्नतः ॥ ८८ ॥
अंकोलके बीज चूर्ण कर सात दिन तेलमें पुट दे यत्नसे कांसेके पात्रमें
धर तेज घाममें रखे और तेल चुवावे ।। ८७ ।। ८८ ।।
मुंडयेन्मनुजं चैव तस्य मुंडे च लेपयेत् ॥
यदा केशाः प्ररोहंति तदातैलंप्रसिद्धयति ॥ ८९ ॥
एक आदमीका मूंड मुडाके उस मूंडमें तेल लगावे जो केश तुरंत जमें
और बढ जाँय तो जाने तेल सिद्ध भया ॥ ८९ ॥
आम्रशाखां तदा गृह्य निखनेच्च तदा भुवि ॥
तैलेन स्पर्शायेच्छाखां फलं पुष्पं च दृश्यते ॥ ९० ॥
आम्रकी डार ले भूमिमें गाडे और ऊपरसे तेल लगावे तो उसमें फल
फूल जरूर करके देख पडें ॥ ९० ॥
प्रक्षिप्य तैले बीजं च कमलस्यचमर्दयेत् ॥
तत्तैलं च जले क्षिप्त्वा जलेपुष्पंचदृश्यते ॥ ९१ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ४३
अंकोलके तेल में कमलबीज छोड मर्दन कर वह तेल जलमें छोडे तो
जलमें पुष्प देख पडे ॥ ९१ ॥
भंगजाहीरयोर्बीजमंकोलतैलेन स्पृशेत् ॥
तादृशौ चैव दृश्येते यादृशा चभवंतिहि ॥ ९२ ॥
भांगके बीज और जाहीरके बीज अंकोलके तेल में भिजोवे तो वैसेही
वृक्ष देख पडे जैसे रहे ॥ ९२ ॥
यादृशं बीजं भवति तादृशो तैललेपनात् ॥
यादृशोजीवधारी च प्रोच्चलति न संशयः ॥
पत्रे पुष्पे च धातौ च लेपनादृश्यते तथा ॥ ९३ ॥
जैसा बीज छोडे तैसा ही वृक्ष देख पडे, जैसाजीव छोडे तैसा जीव देख
पडे, पत्तेमें पुष्पमें धातुमें लेपन करे तैसा ही देख पडे ॥ ९३ ॥
गुंजां च मर्दयेत्तैलेपादयोस्तच्च लेपयेत् ॥ ९४ ॥
पादुकाभ्यां च गच्छेत विनांगुष्ठप्रसाधिनीम् ॥
क्रोशमात्रप्रमाणं च तैलराजप्रभावतः ॥ ९५ ॥
सपेद गुंजा तैलमें मर्दन कर तलवेमें लगावे तो विना खूंटीकी खराऊ पहिर
कोशभरतकतेल के प्रतापसे चला जाय ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
शिरीषबीजं निंबस्य निर्यासं मर्द्यं लेपयेत् ॥
पादेनैव तदा गच्छेत्पादुकाभ्यां विना खुटीम् ॥ ९६ ॥
सिरसके बीज नींबकीगादिमिलाकरतलवे में लगावे तोविना खूंटीककी
खराऊ पहिर चला जाय ॥ ९६ ॥
सरस्य वर्तिकां तैले दीपं प्रज्वालयेत्तदा ॥
जले तां च विनिक्षिप्यतदापिज्वलते हि सा ॥ ९७ ॥
४४ रुद्रयामलतन्त्रम्
सरकी बाती बनाय तेलमें भिगोय बारे और जलमें छोडे तो भी विशेष
से बरे ॥ ९७ ॥
कृष्णश्वानमृतं चैव कीटी यस्य भवेद्यदि ॥
दीर्घकीटपुरीषं च तिलकं कारयेत्सदा ॥
न पश्यंति तदा तं वै जना सर्वेभुवि स्थिताः । ९८ ॥
कृष्ण कुत्ता मरे और जब उसके कीडे बडे होवें तब तिनकी विष्ठा ले
तिलक करे तौ पृथ्वीमें स्थित कोई जन न देखे ॥ ९८ ॥
कटुतुंबीबीजतैलं लेपयेत्पर्वतोपरि ॥
यत्र चालयेत्पर्वतं तत्र चलति निश्चितम् ॥
अंकोलतैलस्य कृतिमित्थं कथितवानहम् ॥ ९९ ॥
इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते
वार्त्तिके रुद्रयामले संस्कृते चानेककार्य-
कथनं नाम द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥
कडुई तोंबीके बीज और तेल पर्वतके ऊपर लगावे तौ जहाँ पर्वत चलावे
तहाँ चला जाय, अंकोलतेलकी कृतिभी इसी तरह हमने कही है ॥ ९९ ॥
इति रुद्रयामले भाषाटीकायां द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥
मंत्रः । ॐ कारमुखे विधूजि है ॐ हः चेचककजप स्वाहा ।
प्रथमं पूजनं कृत्वा मंत्रेण गृह्य कज्जलम् ॥
हस्ते पादतले चैव लेपयेत्सुसमाहितः ॥
त्रिलोकस्य च वृत्तांतं ज्ञायते नात्र संशयः ॥ १ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ४५
यह मंत्र पढकर प्रथम पूजन करे और मंत्र पढ काजर ले हाथमें तथा
पावके तलवेमें लगावे तो तीन लोकका हाल जाने इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
मंत्रः । ॐ ह्रीं असंभोगवतीकरन पिशाचनी
प्रचंडवेगनी स्वाहा । मृद्गोमयेन शुद्धायां
भूम्यामास्तीर्ययेत्कुशान् ॥ नैवेद्य च
ततो दद्यान्महादेवं च पूजयेत् ॥ २ ॥
बिसोर्णं बंधयेद्धस्ते मंत्रं रात्रौ जपेत्ततः ॥
तत्रार्द्धरात्रौ देवी च ह्यागत्य सुवदेद्वचः ॥ ३ ॥
यह मंत्र जप माटी गोबरसे भूमि शुद्ध कर कुश बिछाके महादेवका
पूजन करे, नैवेद्य देय कमलका सूत्र लेकर हाथमें बाँधे, रात्रिको मंत्र जपे तो
अर्द्ध रात्रिको देवी आकर बातें करे ॥ २ ॥ ३ ॥
मंत्रः । ॐ आगच्छ आगच्छ चामुंडे ह्रीं स्वाहा ।
गोरोचनं केशरं च गोदुग्धेन समन्वितम् ॥
एतैरष्टदलं यंत्रं कमलं भूर्जपत्रके ॥ ४ ॥
मंत्र पढ़ गोरोचन केशर दुग्ध मिलाके इन वस्तुओंसे भोजपत्रपर
अष्टपद्मकमल लिखे ॥ ४ ॥
मध्ये प्रतिमां बीजं च लिखेच्च सुसमाहितः ॥
मस्तके धार्यं यंत्रं च जपेत्स्वप्ने च देवताः ॥
वार्ता कुर्वंति सततं मंत्रस्य च प्रसादतः ॥ ५ ॥
मध्यमें देवीकी प्रतिमा लिखे, बीजमंत्र लिखे, यंत्रको मूंडमें धरे और
मंत्र जपे तो मंत्र के प्रतापसे स्वप्नमें देवता बातें करे ॥ ५ ॥
मंत्रः । ॐ ह्रीं त्रिंचितिनी पिशाचिनी स्वाहा ।
कटुतुंबीमूलबीजौ दीर्घदद्रुघ्नमूलकम् ॥ ६ ॥
४६ रुद्रयामलतन्त्रम्
मंत्रेण मंत्रितं चैव शिरे बद्ध्वा च स्वापयेत् ।।
स्वप्ने तदा देवताश्च वार्त्तां कुर्वंति तेन वा ।। ७ ।।
मूलमें मंत्र है सो जपे, कटु तुंबीकी जड़ और बीज ले और कसौंदीकी
जड़ ले मंत्र जपके शिरपर बाँधके सोवे तो उसके संगस्वप्नमें देवता बातें
करें ।। ६ ।। ७ ।।
मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय कर्णपिशाचाय स्वाहा ।
सर्वांजने सिद्धयेच्च मंत्रमघोरसंज्ञकम् ।।
विनाघोरेण सिद्धिर्न जायते नात्र संशयः ।। ८ ।।
मंत्र पढ़ अंजन करे । सब अंजनोंमें सिद्ध करनेवाला यह अघोर मंत्र है,
विना अघोरके सिद्ध नहीं होती इसमें संशय नहीं है ।। ८ ।।
मृत्कालिकां च निर्माय पूजयेद्धूपदीपकैः ।। ९ ।।
अष्टादशसहस्रं तु जपेन्मंत्रं समाहितः ।।
तदा च सर्वसिद्धिं हि दर्शयेन्नात्र संशयः ।। १० ।।
माटीकी कालिका बनाकर पूजे, धूप दीप देवे, सावधानतासे अठारह
हजार मंत्र जपे तो सब सिद्धि देख पड़े ।। ९ ।। ।। १० ।।
मंत्रः । ॐ बहुरूपे विश्वतेजसे ॐविद्याध-
रमहेश्वरं जपाम्यहं महादेवसर्वसिद्धिप्रदा-
यकम् ।। रुद्राय नमो बहुरूपाय नमो स्व-
रूपाय नमः ततः पूषाय नमः यक्षरूपाय
नमः नुदे नद स्वाहा । इमं मंत्रं पठित्वा च
पूजयेद्गिरिजापतिम् ।। तदा सिद्धिर्भवेच्चैव
महादेवप्रसादतः ।। ११ ।।
हिन्दीटीकासहितम् ४७
अघोरमंत्र मूलमें लिखा है वह पढकर गिरिजाके पतिको पूजन करे
तो महादेवके प्रसादसे सिद्धि होय इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ ११ ॥
करेलापत्रमानीय द्विजवेश्मानलंदले ॥
मनुजस्य चितायां च स्थित एकाग्रमानसः ॥ १२ ॥
करेलेके पत्ते ले ब्राह्मणके घरकी अग्निको ले मनुष्यकी चिताके तीर
एकाग्रचित्त करके बैठकर ॥ १२ ॥
रजकशिलिष्टमृच्चैव तथा वल्मीकसंभवा ॥
तयोर्दीपं विनिर्माय प्रज्वाल्य च प्रयत्नतः ॥ १३ ॥
धोबीकी लादीकी तथा वल्मीककी माटीका दीया बनाके प्रज्वलित
करे ॥ १३ ॥
दीपप्रज्वलनमंत्रः । ॐ जुलितविधादेसाय
स्वाहा । दीपस्थानमंत्रः । ॐ नमो भगवते
वासुदेवाय घरधामवं धूवंधश्रीमते वसुपते
स्वाहा । ॐ नमो भगवते सि-
द्धसवाराय ज्वालय ज्वालय पातय पातय
बंध बंध संहर संहर दर्शय दर्शय निधी-
न्मे । मंत्रेणानेन दीपं च प्रार्थयेत्सुसमाहि-
तः ॥ कज्जलमंत्रः । ॐ काली काली महा-
काली रछदजनमोविहेंस्वाहा । कज्जलं
मंत्रयेत्तेन मंत्रेण चक्षुरंजयत् ॥ अंजनकरण-
मंत्रः । ॐ ह्रीं सर्वसर्वहितें क्लोँ सर्वसर्वहितें
सर्व औषधीप्रानीहितेंनिरतें नमो नमः
४८ रुद्रयामलतन्त्रम्
स्वाहा । मंत्रेण चांजयेन्नेत्रं सुवर्णस्य शला-
कया ॥ श्वेतवस्त्रेण बध्नीयात् नेत्रे च सुस-
माहितः ॥ १४ ॥
दीप जलानेका और स्थापनाका तथा कज्जलका मंत्र पढकर कज्जल
तैयार कर अंजनका मंत्र पढकर सुवर्णकी शलाकासे अंजन करे, और सफेद
कपडेसे सुंदर तरहसे नेत्र बांधे ॥ १४ ॥
पत्रद्रोणे स्थितंकत्र घृतं दधि विलोकयेत् ॥
तदग्नौ न निर्दहेच्च पुनः स्नानं समाचरेत् ॥ १५ ॥
पत्तोंकी दोनकी में धर देखे तो अग्निमें न जरे, फिर स्नान करे ॥ १५ ॥
कंठाच्च सुशुचिर्भूत्वा फलाहारं दिनद्वयम् ॥
शिरे चैव शिखां बद्ध्वा जपेन्मंत्रं ततः परम् ॥ १६ ॥
कंठसे सुंदर पवित्र होकर फलोंको भोजन करे, दो दिन शिरमें शिखाको
बांध मंत्र जपे ॥ १६ ॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय उलमाहेल
महेल हुलहुल विहल मिमिहुलु मिमिहुल
हर हरजक ऋपूजितें जक्षकूभार्ये सुलोचन
स्वाहा । पूर्वोक्त कालिकांमूर्तिमग्रे स्थाप्य
जपेत्ततः ॥ सूर्योदयादस्तमये जपेच्चैव
दिनद्वयम् ॥ १७ ॥
पहिले कही कालिकाकी मूर्ति बनाके आगे स्थापन करे और सूर्योदयसे
सूर्यास्ततक दोनों दिन जपे ॥ १७ ॥
ततो निर्मुच्य नेत्रे पश्येद्भूभौ निधानकम् ॥
शरत्काले विशेषेण वस्तु सर्वं भुवि स्थितम् ॥ १८ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ४९
फिर आँखियोंमें लपेटा हुआ वस्त्र खोले और भूमिमें द्रव्य देखे । शर-
त्कालमें विशेषसे भूमिकी सब वस्तु देखे ॥ १८ ॥
हरिद्रारक्तमूलं च सिंदूरेण समन्वितम् ॥
अर्कसूत्रे वेष्टनं च कारयेद्वर्तिकां बुधः ॥ १९ ॥
हरदीकी लाल गाँठ ले उसमें सिंदूर मिलावे और आकका सूत लपेटे
और बत्ती बनावे ॥ १९ ॥
तिलतैलेन संयोज्य मृद्दीपे धार्यते च ताम् ॥
तैलपूर्णं च दीपं च स्मशाने सुनिवेशयेत् ॥ २० ॥
वह बत्ती तिलके तेलमें बोरके माटीके दीपमें घरे और दीपमें तेल भर
स्मशानमें घरे ॥ २० ॥
कपाले कारयेच्चैव कज्जलं चैव चांजयेत् ॥
भूमौ निखातद्रव्यं च पश्यच्चैव न संशयः ॥ २१ ॥
और कपालमें कज्जल पार नेत्रोंमें लगावे तो भूमिमें गडा द्रव्य दीखे
इ समें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
कृष्णकाकस्य जिह्वां च मांसं चैव निगृह्य वै ॥
अर्कसूत्रेण वर्त्तिं च ह्यजाघृतसमाप्लुताम् ॥ २२ ॥
कृष्ण काककी जीभ और मांस ले आकके सूतमें लपेटकर बत्ती बना
छेरीके घृतमें भिगोय ॥ २२ ॥
दीपं प्रज्वालयेच्चापि निशायां सुसमाहितः ॥
तया हि चांजयेन्नेत्रे भूमिखातं च दृश्यते ॥ २३ ॥
रात्रिमें दीप बारके उस बत्तीसे कज्जल कर नेत्रोंमें लगावे तो पृथ्वीका
द्रव्य दीखे ॥ २३ ॥
५० रुद्रयामलतन्त्रम्
कमलसूत्रस्य वर्त्तिं कारयेत्सुविधानतः ॥
एरंडपत्ररसेन चार्द्रयेत्तां पुनः सुखेत् ॥ २४ ॥
कमलके सूतकी बाती बनाकर एरंडके पत्रके अर्कमें भिगोके फिर सुखावे
॥ २४ ॥
अंकोलतैले प्रज्वाल्य कज्जलं समकारयेत् ॥
पुष्यर्क्षे चांजयेच्चैव त्रयोदश्यां स्वनेत्रके ॥
पृथ्वोनिखातद्रव्यं तु दृश्यते नात्र संशयः ॥ २५ ॥
और अंकोलके तेल में बाती भिगोयके दीप बारे और कज्जल ले पुष्य-
नक्षत्रमें तेरसको अपने नेत्रों में अंजन करे तो भूमिमें गढ़ा द्रव्य दीखे इसमें
संदेह नहीं है ॥ २५ ॥
दीपमाल्यां स्मशाने न कज्जलं च कपालके ॥
कृत्वा तु चांजयेन्नेत्रे भूद्रव्यमवलोकयेत् ॥ २६ ॥
दिवालीकी रात्रिको श्मशानमें कपालमें कज्जल करे और अंजन करे
तो भूमिका द्रव्य दीखे ॥ २६ ॥
काकरारक्तसंश्लिष्टं मनः सिलसमन्वितम् ॥
तदा भूनिखातद्रव्यं चांजनेनैव दृश्यते ॥ २७ ॥
काकके रक्तमें भिगोय मनसिल ले नेत्रमें अंजन करे तो भूमिमें गढ़ा
धन दीखे ॥ २७ ॥
तुलसीं शीघ्रमृतस्य पुरुषस्योदरस्य च ॥
जलमानीय यत्नेन गोरोचनं च शर्कराम् ॥ २८ ॥
तुलसी शीघ्र मरे मनुष्यके पेटका पानी, गोरोचन और शर्करा ॥ २८ ॥
एकत्र कारयेत्तां च घर्मे स्थाप्य दिनाष्टकम् ॥
नवमे दिवसे चैव कारयेदंजनं स्वके ॥ २९ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ५१
नेत्रे तदा च पश्येत सकलान्निधीन्शुभान् ॥
प्रसिद्धमंजनं चैव सर्वज्ञेन च भाषितम् ॥ ३० ॥
इकट्ठा कर घाममें आठ दिन धर नवें दिन अपने नेत्रोंमें अंजन करे
और सब निधियोंको देखे यह प्रसिद्ध अंजन सर्वज्ञने कहा है ॥ २९ ॥ ३० ॥।।।
मंत्रः ॥ नमो भगवते रुद्राय डामरेश्वराय
सिलिशालपुननेनागवेतालिनिस्वाहा । , इति
सर्वजनानां च मंत्रं चैव ह्युदाहृतम् ॥ पुष्यर्क्षे
च शनौ वारे तुलसीवृक्षमूलकम् ॥ ३१ ॥
सूक्ष्मं कृत्वा जलेनैव लघुकन्याकुमारयोः ॥
अंजयेदंजनेनैव तदा पश्यन्निखातकम् ॥
पाताले च स्थितं वस्तु तदा दृश्यति निश्चितम् ॥३२॥
यह अंजन करने का मंत्र है इसको पढे और पुष्यनक्षत्रमें शनिवारको
तुलसीकी मूल ले जलमें महीन पीस छोटी कन्या वा बालकके नेत्रोंमें अंजन
लगावे तो गडी वस्तु दीखे, पातालकी धरी वस्तु निश्चयसे दीखे ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
कृष्णपक्षचतुर्दश्यां रविवारो यदा भवेत् ॥
गुरवैवृक्षस्य मूलं जलेन सह पेषयेत् ॥ ३३ ॥
स्त्रीदुग्धं क्षिपेत्तस्मिन्यदि पुत्रो भवेत्तदा ॥
तदंजनं कारयेद्वै तदा द्रव्यं स पश्यति ॥ ३४ ॥
कृष्णपक्षचतुर्दशीको रविवार पड़े तो गुरवे वृक्षकी जड जलमें पीस
उसमें पुत्रवती स्त्रीका दुग्ध छोडे और अंजन करे तौ द्रव्य दीखे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
गोदुग्धे रक्तसर्षपं तिलं पिष्ट्वा तथापि च ॥ ३५ ॥
शशवृक्षस्य बीजं च तस्मिन्क्षिप्तवा स लेपयेत् ॥
यत्रस्थितो ज्ञायते च तत्र पश्यति नान्यथा । ३६ ।।
५२ रुद्रयामलतन्त्रम्
गोदुग्धमें रक्त सरसों तिल डार पीस शनके बीज तिसमें छोडकर लेपन
करे तो जहाँ स्थिर होय तहाँही वस्तुज्ञान होय, यह अन्यथा नहीं ॥ ३५ ॥
॥ ३६ ॥
अदृष्टकरणम्
चतुर्लक्षं जपेन्मंत्रं नग्नो भूत्वा स्मशानके ॥
प्रातःकाले यक्षिणी च वस्त्रैकं च ददाति तम् ॥ ३७ ॥
नग्न होकर स्मशानमें चार लक्ष मंत्र जपे तो प्रातः-समय यक्षिणी
एक वस्त्र देय सो ॥ ३७ ॥
वस्त्रमाच्छाद्य गच्छंतं तं न पश्यंति केचन ॥
गृहे तिष्ठन्सदा द्रव्यं स पश्यति न संशयः ॥ ३८ ॥
वस्त्र ओढकर जहाँ जाय तहाँ कोई न देखे, वह गृहमें बैठे सबको देखे
और सब द्रव्य देखे इसमें संदेह न करना ॥ ३८ ॥
मंत्रः । ॐ ह्रीं ह्रीं स्मशानवासिनी स्वाहा ।
कार्तिकस्य कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां विशेषतः ॥
स्मशानेषु जपेन्मंत्रं बलिं पूजां तथाकरोत् ॥ ३९ ॥
इस मंत्रको कार्तिककृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्मशानमें जपे, बलिदान
पूजन करे ॥ ३९ ॥
अंकोलतैले प्रज्वाल्य दीपं कज्जलमाचरेत् ॥
कपाले स्थाप्य तं चापि नेत्रयोर्यदि ह्यंजयेत् ॥
केपि न पश्यंति तं च महादेवप्रसादतः ॥ ४० ॥
अंकोलके तेलमें दीप बारे, कज्जल करे और कपालमें धर नेत्रोंमें लगावे
त े उसको महादेवके प्रसादसे कोई न देखे ॥ ४० ॥
हिन्दीटीकासहितम् ५३
अर्कफलस्य तूलं च कार्पासं कमलं तथा ॥
एषां सूत्रैः वर्तिकां च कार्येद्विधिना बुधः ॥
मनुष्यकपाले कृत्वा कज्जलं नेत्रमंजयेत् ॥ ४१ ॥
अर्कफलके भीतरकी रुई और कपास और कमलके भीतरका सूत्र इनके
सूतकी बाती बना मनुष्यके कपालमें कज्जल कर नेत्रोंमें लगावे ॥ ४१ ॥
मंत्रः । ॐ फट काली काली महाकाली
मांसशोणितभोजनसुखे देवी ममेयसिति-
मानर्षीतोमानशोति । हरीतक्यां वचं पिष्ट्वा
गुटिकां कारयेद्बुधः ॥ त्रिधातोगुटिकां धृत्वा
मुखे न पश्यंति केचन ॥ ४२ ॥
यह मंत्र पढ हरडमें वच पीस गुटिका बनाके तीन धातुसे मढावे और
संमुखमें रखे तो कोई नहीं देखे ॥ ४२ ॥
पादुकासाधनम्
असगंधं तथा तैलमंकोलस्य विशेषतः ॥
श्वेतसर्षपमेकत्र हस्तौ पादौ प्रलेपयेत् ॥
शतयोजनं च गच्छेत् नात्र कार्या विचारणा ॥ ४३ ॥
असगंध अंकोलका तेल और सफेद सरसों एकत्र कर हाथ पाँवोंमें लगावे
तो सौ योजन चले इसमें विचार नहीं ॥ ४३ ॥
कंदुरीमूलमादाय तिलतैलेन क्वाथयेत् ॥
जंघे पादे च लेपेन चतुर्योजन गच्छति ॥ ४४ ॥
कंदुरीकी जड ले तिलके तेलमें क्वाथ कर जंघामें तथा तलुवोंमें लगावे
तो चार योजन चले ॥ ४४ ॥
५४ रुद्रयामलतन्त्रम्
कंदुर्य्यामलयोर्मूलं पिष्ट्वा चांकोलतैलके ॥
पादलेपेन गच्छंति मनुजाः शतयोजनम् ॥ ४५ ॥
कंदुरी और आंवलेकी जड ले अंकोलके तेलमें पीसकर तलुवोंमें लगावे
तो सौ योजन चले ॥ ४५ ॥
मंत्रः । ॐ नमः चंडिकायै गगनं गमय
गमय चालय वेंगवाहिनी ॐ ह्रीं स्वाहा ।
कृष्णकाकस्य हृन्नेत्रे जिह्वां चैव मनःसि-
लम् ॥ सिंदूरं गैरिकं चैवामरवल्लीं च
मालतीम् ॥ ४६ ॥ रुद्रजटां मस्तकीं च
मूलमेकत्र कारयेत् ॥ पादयोलेपयेच्चैव
सहस्रं स च गच्छति ॥ ४७ ॥
काले काकका हृदय अर्थात् करेजा नेत्र और जिह्वा तथा मनशिल
सिंदूर गैरिक अमरवेलि मालती रुद्रजटामस्तकीकी जड़ ये सब एकत्र कर
पांवके तलुवोंमें लेप करके एक सहस्र वार मंत्र जप करे तो सिद्धि होय ॥ ४६ ॥
॥ ४७ ॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमो हरि-
तगदाधराय त्रासय त्रासय क्षोभय क्षोभय
चलने बलने स्वाहा । पारदं च त्रयं टंकं
चिल्हनीडे निधापयेत् ॥ यस्मिन्नीडे भवे-
डंडास्तस्मिन् समवधारयेत् ॥ ४८ ॥ दीर्घ-