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सर्वकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 68 में से

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हिन्दीटीकासहितम् ४३
अंकोलके तेल में कमलबीज छोड मर्दन कर वह तेल जलमें छोडे तो
जलमें पुष्प देख पडे ॥ ९१ ॥
भंगजाहीरयोर्बीजमंकोलतैलेन स्पृशेत् ॥
तादृशौ चैव दृश्येते यादृशा चभवंतिहि ॥ ९२ ॥
भांगके बीज और जाहीरके बीज अंकोलके तेल में भिजोवे तो वैसेही
वृक्ष देख पडे जैसे रहे ॥ ९२ ॥
यादृशं बीजं भवति तादृशो तैललेपनात् ॥
यादृशोजीवधारी च प्रोच्चलति न संशयः ॥
पत्रे पुष्पे च धातौ च लेपनादृश्यते तथा ॥ ९३ ॥
जैसा बीज छोडे तैसा ही वृक्ष देख पडे, जैसाजीव छोडे तैसा जीव देख
पडे, पत्तेमें पुष्पमें धातुमें लेपन करे तैसा ही देख पडे ॥ ९३ ॥
गुंजां च मर्दयेत्तैलेपादयोस्तच्च लेपयेत् ॥ ९४ ॥
पादुकाभ्यां च गच्छेत विनांगुष्ठप्रसाधिनीम् ॥
क्रोशमात्रप्रमाणं च तैलराजप्रभावतः ॥ ९५ ॥
सपेद गुंजा तैलमें मर्दन कर तलवेमें लगावे तो विना खूंटीकी खराऊ पहिर
कोशभरतकतेल के प्रतापसे चला जाय ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
शिरीषबीजं निंबस्य निर्यासं मर्द्यं लेपयेत् ॥
पादेनैव तदा गच्छेत्पादुकाभ्यां विना खुटीम् ॥ ९६ ॥
सिरसके बीज नींबकीगादिमिलाकरतलवे में लगावे तोविना खूंटीककी
खराऊ पहिर चला जाय ॥ ९६ ॥
सरस्य वर्तिकां तैले दीपं प्रज्वालयेत्तदा ॥
जले तां च विनिक्षिप्यतदापिज्वलते हि सा ॥ ९७ ॥