रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ३७
श्वेतसर्षपवालू च सप्तवारेण मंत्रितौ ॥
क्षिपेत्क्षेत्रे तदा चैव सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ ६१ ॥
सफेद सरसों और वालू ले सात वार मंत्रपढकर खेतमें छोडे तो सब
उपद्रव नष्ट होंय ॥ ६१ ॥
सैंजनस्य च काष्ठस्य सप्तांगुलकं कीलकम् ॥
क्षेत्रे तं निखनेच्चापि न क्षेत्रं बर्द्धते तदा ॥ ६२ ॥
सहिजनेकी कील सात अंगुलकी मंत्रपढकर खेतमें गाडे तो खेत न
बढे ॥ ६२ ॥
मंत्रः । ॐ नमोमंजनाथपतदविद्याहरहर-
सिलिसिलिसर्वासनानांतुंड बंधकुरु कुरु
हंफट्स्वाहा । ॐ उज्जैननगरीमेंहोवालेमहा-
देवभंडारफलफलहोहनुमंतसाखी । अस्ति
ह्यस्तिकरोत्युच्चैचौषधींश्चापि निक्षिपेत् , ॥
तदाक्षेत्रे फलं पुष्पं भवेत्तत्र न संशयः ॥ ६३ ॥
लस्थ मंत्र पढकर अस्तिर उच्चस्वरसे कह क्षेत्रमें औषधी लगावे तो
फूले फले इसमें संदेह नहीं है ॥ ६३ ॥
षंढकरणम् ।
नरो यत्राकरोन्मूत्रं निखनेत्कृष्णवृश्चिकम् ॥
नपुंसको तदा यातोचोद्धृतेन पुनः पुमान् ॥ ६४ ॥
मनुष्य जहाँ पर मूत्र करे वहाँ कृष्ण विच्छू गाडे तो नपुंसक होय और
उखाडे तो फिर पुरुष होय ॥ ६४ ॥