रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ रुद्रयामलतन्त्रम्
सरकी बाती बनाय तेलमें भिगोय बारे और जलमें छोडे तो भी विशेष
से बरे ॥ ९७ ॥
कृष्णश्वानमृतं चैव कीटी यस्य भवेद्यदि ॥
दीर्घकीटपुरीषं च तिलकं कारयेत्सदा ॥
न पश्यंति तदा तं वै जना सर्वेभुवि स्थिताः । ९८ ॥
कृष्ण कुत्ता मरे और जब उसके कीडे बडे होवें तब तिनकी विष्ठा ले
तिलक करे तौ पृथ्वीमें स्थित कोई जन न देखे ॥ ९८ ॥
कटुतुंबीबीजतैलं लेपयेत्पर्वतोपरि ॥
यत्र चालयेत्पर्वतं तत्र चलति निश्चितम् ॥
अंकोलतैलस्य कृतिमित्थं कथितवानहम् ॥ ९९ ॥
इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते
वार्त्तिके रुद्रयामले संस्कृते चानेककार्य-
कथनं नाम द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥
कडुई तोंबीके बीज और तेल पर्वतके ऊपर लगावे तौ जहाँ पर्वत चलावे
तहाँ चला जाय, अंकोलतेलकी कृतिभी इसी तरह हमने कही है ॥ ९९ ॥
इति रुद्रयामले भाषाटीकायां द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥
मंत्रः । ॐ कारमुखे विधूजि है ॐ हः चेचककजप स्वाहा ।
प्रथमं पूजनं कृत्वा मंत्रेण गृह्य कज्जलम् ॥
हस्ते पादतले चैव लेपयेत्सुसमाहितः ॥
त्रिलोकस्य च वृत्तांतं ज्ञायते नात्र संशयः ॥ १ ॥