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सर्वकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 68 में से

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पृष्ठ 53

हिन्दीटीकासहितम् ५१
नेत्रे तदा च पश्येत सकलान्निधीन्शुभान् ॥
प्रसिद्धमंजनं चैव सर्वज्ञेन च भाषितम् ॥ ३० ॥
इकट्ठा कर घाममें आठ दिन धर नवें दिन अपने नेत्रोंमें अंजन करे
और सब निधियोंको देखे यह प्रसिद्ध अंजन सर्वज्ञने कहा है ॥ २९ ॥ ३० ॥।।।
मंत्रः ॥ नमो भगवते रुद्राय डामरेश्वराय
सिलिशालपुननेनागवेतालिनिस्वाहा । , इति
सर्वजनानां च मंत्रं चैव ह्युदाहृतम् ॥ पुष्यर्क्षे
च शनौ वारे तुलसीवृक्षमूलकम् ॥ ३१ ॥
सूक्ष्मं कृत्वा जलेनैव लघुकन्याकुमारयोः ॥
अंजयेदंजनेनैव तदा पश्यन्निखातकम् ॥
पाताले च स्थितं वस्तु तदा दृश्यति निश्चितम् ॥३२॥
यह अंजन करने का मंत्र है इसको पढे और पुष्यनक्षत्रमें शनिवारको
तुलसीकी मूल ले जलमें महीन पीस छोटी कन्या वा बालकके नेत्रोंमें अंजन
लगावे तो गडी वस्तु दीखे, पातालकी धरी वस्तु निश्चयसे दीखे ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
कृष्णपक्षचतुर्दश्यां रविवारो यदा भवेत् ॥
गुरवैवृक्षस्य मूलं जलेन सह पेषयेत् ॥ ३३ ॥
स्त्रीदुग्धं क्षिपेत्तस्मिन्यदि पुत्रो भवेत्तदा ॥
तदंजनं कारयेद्वै तदा द्रव्यं स पश्यति ॥ ३४ ॥
कृष्णपक्षचतुर्दशीको रविवार पड़े तो गुरवे वृक्षकी जड जलमें पीस
उसमें पुत्रवती स्त्रीका दुग्ध छोडे और अंजन करे तौ द्रव्य दीखे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
गोदुग्धे रक्तसर्षपं तिलं पिष्ट्वा तथापि च ॥ ३५ ॥
शशवृक्षस्य बीजं च तस्मिन्क्षिप्तवा स लेपयेत् ॥
यत्रस्थितो ज्ञायते च तत्र पश्यति नान्यथा । ३६ ।।