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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( ५७ )
कान्तपाषाणके पर्याय ।
राजपट्टं महापट्टं शिखिग्रीवं विराटकम् ॥
राजपट्ट, महापट्ट, शिखिग्रीव और विराटक यह कान्तपाषाणके
नाम हैं ॥
कांतपाषाणका शोधन ।
चूर्णितं कान्तपाषाणं महिषीक्षीरसंयुतम् ।
विपचेदायसे पात्रे गोघृतेन समन्वितम् ॥ २५ ॥
लवणे च तथा क्षारे शोभाञ्जनरसे क्षिपेत् ।
अम्लवर्गस्य तोयेन दिनं घर्मे विभावयेत् ॥ २६ ॥
तथैव दोलिकायन्त्रे दिवसं पाचयेत्सुधीः ।
कांतपाषाणशुद्धौ तु रसकर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥
कांतपाषाणको कूटकर भैंसके दूध और गोघृतमें दोलायन्त्र विधिसे
लोहेके पात्रमें पकावे फिर नमक जौखार और सुहांजनेके रस ( क्वाथ )
में स्वेदन करे । तदनन्तर अम्लवर्गके पानीमें एक दिन भिगोकर धूपमें
रक्खे, फिर दोलायन्त्र द्वारा अम्लवर्गमें एक दिन पकानेसे कांतपाषाण
शुद्ध और रसकर्मके योग्य हो जायेगा ॥ २५–२७ ॥ इति कांत-
पाषाण शोधन ॥
कौड़ीके भेद ।
पीताभा ग्रन्थिला पृष्ठे दीर्घवृन्दा वराटिका ।
सार्द्धनिष्कभरा श्रेष्ठा निष्कभारा च मध्यमा॥२८॥
पादोनानिष्कभारा च कनिष्ठा परिकीर्तिता ।
रसवैद्यविनिर्दिष्टा सा वराटकसंज्ञिका ॥ २९ ॥
जो कौड़ी पीले वर्णकी पीठपरसे गांठदारसी लंबी और गोल हो
तोलमें डेढ़ टंक ( ६ मासे ) हो वह रसवैद्योंने श्रेष्ठ वराटिका कही

( ५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
है। जो कौड़ी तोलमें एक टंककी हो वह मध्यम है। जो पौनटंक
( ३ मासे ) तोलमें हो वह कौड़ी कनिष्ठा कही है। इसको वराटक
भी कहते हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥
कौड़ियोंका शोधन ।
वराटी काञ्जिके स्विन्ना यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् २३०
कौड़ियोंको कांजीमें दोलायंत्र द्वारा एक प्रहर स्वेदन करे तो
शुद्ध होजाती है ॥ २३० ॥
कौड़ियोंकी भस्मविधि ।
भूगर्ते च समे शुद्धे पोटलीं स्थापयेत्सुधीः ।
तुषेण पूरयेत्तस्याः किञ्चिन्मध्यं भिषग्वरः ॥ ३१ ॥
वराटपूरितां मूषां तन्मध्ये विनिवेशयेत् ।
करीषाग्निं ततो दद्यात्पालिकायन्त्रमुत्तमम् ।
अनेन म्रियते नूनं वराटं सर्वरोगजित् ॥ ३२ ॥
कौड़ियोंका कपड़ेमें पोटली बांध पृथ्वीमें गढा खोदकर उस गढेको
स्वच्छ बना उसमें जंगली उपले और तुष भर बीचमें कौड़ियोंवाली
पोटली सरावमें रखकर गजपुट विधानसे फूंक दे । अथवा
( “ चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोर्ध्वदण्डकम् । एतद्धि पालिकायंत्रं वह्नि-
जारणहेतवे॥ १॥ ” एक लोहेका प्यालासा गोल बनाकर उसमें ऊपरसे
मुड़ी हुई एक लंबी डंडी लगावे जैसे माठमेंसे तेल निकालनेके लिये
दुकानदार पली रखते हैं ऐसा बनावे इसको पालिकायंत्र कहते हैं इसमें
कौडियें और तुष भरकर उपलोंकी आगमें फूके तो कौड़ियोंकी भस्म
होजायगी) यह भस्म संपूर्ण रोगोंको जीतनेवाली उत्तम है ॥ ३१॥३२॥
वराटिकाभस्मके गुण ।
परिणामादिशूलघ्नी क्षयहा ग्रहणीहरा ।
कटूष्णा दीपनी वृष्या तिक्ता वातकफापहा ॥ ३३॥

भाषाटीकासहित । ( ५९ )
वराटिकाभस्म परिणामशूल आदि संपूर्ण शूलोंका नाश करती है
तथा क्षयरोगनाशक, ग्रहणीरोगको हरनेवाली, कटु, उष्ण, दीपनी,
वृष्य, तिक्त और वातकफनाशक है ॥ ३३ ॥
नीलांजन शोधन ।
नीलाञ्जनं चूर्णयित्वा जम्बीरद्रवभावितम् ।
दिनैकमातपे शुद्धं भवेत्कार्येषु योजयेत् ॥ ३४ ॥
सुरमेंको चूर्णकर नींबूके रसमें एक दिन भावना देकर धूपमें सुखा
ले तो सुरमा शुद्ध होजाता है इसको जिस कार्यमें लेना हो उसमें
प्रयोग करे ॥ ३४ ॥
अथ हिंगुलप्रकरण ।
सिंगरफके पर्याय ।
हिंगुलो हिंगुलुर्यातिर्दरदः शुकतुण्डकः ।
रसगन्धकसम्भूतो हिङ्गलो दैत्यरक्तकः ॥ ३५ ॥
हिंगुल, हिंगुलु, याति, दरद, शुकतुण्ड, रसगंधकसम्भूत, हिङ्गुल,
दत्यरक्तक ( रसगर्भ, कपिशीर्षक, मनोहर ) यह सिंगरफके
नाम हैं ॥ ३५ ॥
हिंगुलशोधनविधि ।
अम्लवर्गद्रवैः पिष्ट्वा दरदो माहिषेण च ।
दुग्धेन सप्तधा पिष्टः शुष्कीभूतो विशुद्धयति ॥३६॥
सिंगरफको अम्लवर्गके रसमें पीस २ कर सात भावना देवे और
भैंसके दूधमें सात भावना देकर सुखा लेनेसे सिंगरफ शुद्ध होजाता है ३६॥
मेषीदुग्धेन दरदमम्लवर्गैर्विभावितम् ।
सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ॥ ३७ ॥

( ६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
दूसरी विधि-सिंगरफको भेडके दूधमें सात भावना देकर सुखा ले
फिर नींबू आदि अम्ल वर्गके रसमें सात भावना देकर सुखा ले तो
सिंगरफ निश्चय ही शुद्ध होजाता है ॥ ३७ ॥
दरदं दोलिकायन्त्रे पक्वं जंबीरजैर्द्रवैः ।
सप्तवारमजामूत्रैर्भावितं शुद्धिमेति हि ॥ ३८ ॥
तीसरी विधि-सिंगरफके टुकड़ोंको कपडेमें बांध दोलायंत्रद्वारा
जंबीरीके रसमें एक दिन पकावे फिर निकालकर बकरीके मूत्रमें
सात भावना देवे ( रगड़कर सुखावे ) तो शुद्धताको प्राप्त हो निर्दोष
होजाता है ॥ ३८ ॥
आर्द्रकैलकुचद्रावैः सप्तधा भावितो यदि ।
हिंगुलः शुद्धतां याति निर्दोषो जायते खलु ॥ ३९ ॥
चौथी विधि-सिंगरफको अदरखके रसमें और लकुच ( बडहर )
के रसमें सात भावना देनेसे शुद्धताको प्राप्त हो निश्चय ही निर्दोष
होजाता है ॥ ३९ ॥
हिंगुलके लक्षण और गुण ।
बिम्ब्याभं हिंगुलं दिव्यं रसगन्धकसम्भवम् ।
मेहकुष्ठहरं रुच्यं बल्यं मेधाग्निवर्धनम् ॥ २४० ॥
जो हिंगुल ( सिंगरफ ) बिम्बी ( कंदूरी ) फलके समान लाल-
वर्णवाला होता है वह दिव्य गुणोंवाला है, पारे गंधकके संयोगसे उत्पन्न
होता है। यह प्रमेहनाशक, कुष्ठको हरनेवाला, रुचिकारक, बलवर्धक,
मेधाजनक और जठराग्निको दीपन करनेवाला है ॥ २४० ॥
शिलाजीतके नाम ।
शिलाजतुनि शैलेयमद्र्यं गिरिजमश्मजम् ।
धातुजं चाश्मजतुकं शैलजं चाश्मसम्भवम् ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासहित । ( ६१ )
शिलाजतु, शैलेय, अद्र्य, गिरिज, अश्मज, धातुज, अश्मजतु, शैलज
और अश्मसंभव यह नाम शिलाजीतके हैं ॥ ४१ ॥
शिलाजीतका शोधन ।
गोदुग्धे त्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु ।
दिनैकं लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥ ४२ ॥
शिलाजीतको कूटकर लोहेकी कडाहीमें डाल उसमें गोदुग्ध, त्रिफ-
लेका क्वाथ और भांगरेका रस डालकर एक दिन रक्खा रहने दे फिर
अग्निपर उबाल देकर तीक्ष्ण धूपमें रख दे, इसके ऊपर जो मलाईके
समान गाढ़ा २ पदार्थ हो उसको उतारकर ( गर्दैसे बचाकर ) सुखा ले
तो शिलाजीत निःसन्देह उत्तम शुद्ध हो जायगी ॥ ४२ ॥
शिलाजीतके गुण ।
शिलाजतु भवेत्तिक्तं कटुकञ्च रसायनम् ।
क्षयशोथोदरार्शांसि हंति वस्तिरुजां जयेत् ॥४३॥
शिलाजीत-रसमें तिक्त और कटु है । गुणमें रसायन ( सर्वरोग-
नाशक आयुर्वर्द्धक ) तथा क्षयरोग, शोथरोग, उदररोग, बवासीर इन
सबको नष्ट करनेवाली है एवं मूत्राशयके प्रमेह कृच्छ्रादि संपूर्ण
रोगोंको जीतनेवाली है ॥ ४३ ॥
सौवीरादिकोंकी साधारण शुद्धि ।
सौवीरं टंकणं शंखं कंकुष्ठं गैरिकं तथा ।
एते वराटवच्छोध्या भवेयुर्दोषवर्जिताः ॥ ४४ ॥
सुरमा, सुहागा, शंख, कंकुष्ठ ( मुरदासिंगके समान पदार्थ ), गेरू
इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसको कांजीमें स्वेदन कर ले तो
शुद्ध होजाता है ॥ ४४ ॥
१ कोई कंकुष्ठको मुर्दासिंग मानते हैं, रसरत्नसमुच्चयकारने दोनाको
भिन्न भिन्न पदार्थ माना है । वर्णमें कंकुष्ठ और मुर्दासिंग पीलेसे होते हैं,
कंकुष्ठ वंगका मल होता है !

( ६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
कंकुष्ठं गैरिकं शंखं काशीशं टंकणं तथा ।
नीलाञ्जनं शुक्तिभेदा खुल्वका सवराटका ॥ ४५ ॥
जम्बीरवारिणा स्विन्नाः क्षालिताः कोष्णवारिणा ।
शुद्धिमायान्त्यमी योज्या भिषग्भिर्योगसिद्धये ॥४६॥
कंकुष्ठ, गेरू, शंख, काशीस, सुहागा, सुरमा, सब प्रकारकी सिप्पिएँ
( सींप ), खुल्वक ( नख गंधद्रव्य ) और कौडिएं यह सब जम्बीरी
नींबूके रसमें स्वेदन कर गरम पानीसे धो देनेसे शुद्ध होजाते हैं ।
इनमेंसे जिस पदार्थको शुद्ध करना हो जंबीरीके रसमें दोलायन्त्रद्वारा
स्वेदन कर गरम पानीसे धोवे तो शुद्ध होजाता है । फिर जिस कर्ममें
प्रयोग करना हो करे ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
टकण ( सुहागे ) - के नाम ।
टंकणं क्रामणष्टंकः सम्यकक्षारश्च पाचनः ।
शुभगो मालतीजातो द्रवी लोहविशुद्धिदः ॥४७॥
टंकण, क्रामण, टंक, सम्यक्क्षार, पाचन, शुभग, मालतीजात,
द्रावक, लोहशुद्धिकारक यह सुहागेके नाम हैं ॥ ४७ ॥
सुहागेका शोधन ।
आदौ टंकणमादाय काञ्जिकास्ले विनिःक्षिपेत् ।
एकरात्रात् समुद्धृत्य शोषयेद्वै चिरातपे ॥ ४८ ॥
नरमृत्रगतं टंकं गवां मूत्रगतं तथा ।
दिनान्ते तत्समुद्धृत्य जम्बीराम्बुगतं ततः ॥ ४९॥
जम्बीराम्लात्समुद्धृत्य नारिकेलस्य पात्रके ।
मरीचचूर्णसंयुक्तं क्षालयेच्छीतलाम्बुना ॥
टङ्कणं वह्नियोगेन सूत्फुल्लं शुद्धतां व्रजेत् ॥ २५० ॥

भाषाटीकासहित । ( ६३ )
प्रथम सुहागेको लेकर खट्टी कांजीमें डाल दे फिर एक दिन रातके
अनंतर निकालकर छायामें सुखा ले । फिर मनुष्यके मूत्रमें एक दिन
डुबा रक्खे, एक दिन गोमूत्रमें डुबाकर रक्खे फिर सायंकाल गोमू-
त्रमेंसे निकालकर जंबीरी नींबूके रसमें रक्खे । फिर निकालकर नारि-
यलके पात्रमें डाल उसमें काली मिरचका चूर्ण मिला शीतल जलसे धो
डाले तो सुहागा शुद्ध होजाता है । ( कोई अग्निपर फुला लेने मात्रसे
सुहागेको शुद्ध मानते हैं, कोई जंबीरी नींबूके रसमें एक दिनरात
भावना देनेसे सुहागा शुद्ध होता है ऐसा मानते हैं ) ॥ ४८--५० ॥
सुहागेके गुण ।
एवं टङ्कं समादाय सर्वरोगेषु योजयेत् ।
टंकणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो रेचनो लघुः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार शोधन किया हुआ सुहागा सब जगह प्रयुक्त करना
चाहिये । यह शुद्ध टंकण जठराग्निको चैतन्य करता है, रूक्ष है, कफना-
शक है, रेचन है और हलका है ( एवं ज्वर, शूल, वायु, विष इनको नष्ट
करता है और सुवर्ण तथा चांदीको शोधन करनेवाला है ) ॥ ५१ ॥
शंखका शोधन और मारण ।
अन्धमूषागतं शङ्खं पलमेकं विचक्षणः ।
माषार्द्धटङ्कणैर्मिश्रं दण्डयन्त्रेण मारयेत् ॥ ५२ ॥
( शंखके टुकड़े कर दोलायंत्रद्वारा एक प्रहर कांजीमें पकावे तो
शंख शुद्ध होजाता है ) शंख ४ तोला, सुहागा ४ रत्ती इन दोनोंको
अंधमूषामें रख कोयलोंकी तीक्ष्ण अग्निमें फूंक देवे, शीतल होनेपर डंडे
या पत्थर आदिसे पीसकर रक्खे यह शंखभस्म होगई ॥ ५२ ॥
शंखके गुण ।
शङ्खः सर्वरुजां हन्ति विशेषादुदरामयम् ।
शूलाम्लपित्तविष्टम्भमेहदह्रद्दिदीपनः ॥ ५३ ॥

( ६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शंख संपूर्ण रोगोंको हरनेवाला है, विशेषतासे उदर रोगोंको दूर
करता है तथा शूल, अम्लपित्त, विष्टम्भ और प्रमेह इनको हरनेवाला
है एवं दीपन है ( इसकी भस्मका ही प्रयोग करना चाहिये। परंतु नेत्रके
फोला आदि रोगोंमें कच्चा शंख ही रगड़कर डाला जाता है ) ॥५३॥
इति उपरसशोधन समाप्त ।
अथ स्वर्णादिधातुशोधनमारण ।
सोना आदि ८ धातुओंकी साधारण शुद्धि ।
हेमादि लोहकिट्टान्तं शोधनं मारणं शृणु ।
तैले तक्रे गवां मूत्रे काञ्जिकेऽथ कुलत्थके ॥५४॥
तप्ततप्तानि सिञ्चेत तत्तद्भावे च सप्तधा ।
एवं स्वर्णादिलोहानि शुद्धिमायान्त्यसंशयः ॥५५॥
सुवर्णसे लेकर लोह किट्ट ( मण्डूर ) पर्यंत सब धातुओंका शोधन
और मारण सुनो-सुवर्णादि धातुओंमेंसे जिसका शोधन करना हो
उसको अग्निमें तपा २ कर तेल, तक्र ( मट्ठा ), गोमूत्र, कांजी और
कुलथीका काय इन हरेक द्रव्यमें सात सात वार बुझावे । इस प्रकार
इन पांचों ही द्रव्योंसे सात सात वार बुझानेसे सुवर्ण आदि सब धातु
निश्चय ही शुद्ध होजाती हैं ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
अशुद्ध सुवर्णका दोष ।
सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति नानारोगं करोति च ।
अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं तु मारयेत् ॥५६॥
अशुद्ध सुवर्ण-सौख्य, वीर्य, बल इन सबको हनन करता है तथा
अनेक प्रकारके रोगोंको उत्पन्न करता है इसलिये अशुद्ध सुवर्णकी
भस्म नहीं करनी चाहिये । “ अशुद्धममृतं ” इस पुस्तकमें ऐसा
पाठ है इसका यह अर्थ है कि अशोधित सुवर्ण और मारणमें अधमरा

भाषाटीकासहित । ( ६५ )

सुवर्ण उपरोक्त दोषोंको करता है । अन्य पुस्तकोंमें “ अशुद्धं
नामृतं ” ऐसा पाठ है, उसका यह अर्थ है कि अशुभ स्वर्ण अमृतके
समान गुणकारी नहीं है परन्तु यहाँ “ अशुद्धं वै मृतं स्वर्णं ” ऐसा
पाठ चाहिये जिसका यह अर्थ हो सकता है कि बिना शोधन किये
मारा हुआ सुवर्ण सौख्य बल वीर्यादि नाशक होता है इसलिये प्रथम
सुवर्णका शोधन कर फिर भस्म करे ॥ ५६ ॥
सुवर्णशोधन ।
मृत्तिकामातुलुङ्गाम्लैर्भावितं पञ्चवासरम् ।
मृद्भस्मलपणाद्येम शोधयेत्पुटयेत्ततः ॥ ५७ ॥
आगे कही पंच मृत्तिकाके चूर्णमें बिजौरे नींबूका रस डालकर
इसमें सुवर्णके पत्रोंको पांच दिन भिगोये रक्खे फिर निकाल कर
पीली मिट्टी या गेरू और सेंधानमक तथा उपलोंकी भस्म इन तीनोंको
पीसकर स्वर्ण पत्रोंपर लेप कर इन पत्रोंको जंगली उपलोंकी अग्निमें
रख पुट देवे, इस प्रकार तीन पुट देनेसे सुवर्ण शुद्ध होजाता है ॥५७॥
[

( ६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सुवर्णभस्मकी विधि ।
माक्षिकं नागचूर्णञ्च पिष्टमर्करसेन च ।
हेमपत्रं पुटेनैव म्रियते क्षणमात्रतः ॥ २६० ॥
सुवर्णके शुद्ध पत्रोंपर सोनामक्खी और शीसे ( सिक्के ) को आकके
दूधमें रगड़कर लेप करे फिर इनको अन्धमूषामें रख पुटमें फूंक दे तो
सोनेकी भस्म होजायगी ॥ २६० ॥
सुशुद्धं पारदं दत्त्वा कुर्याद्यत्नेन पीठिकाम् ।
दत्त्वोर्ध्वाधो नागचूर्णं पुटेन म्रियते ध्रुवम् ॥ ६१ ॥
दूसरी विधि-शुद्ध बारीक स्वर्णपत्रोंमें ( दोगुना ) शुद्ध पारा मिला-
कर दोनोंको रगड़कर पीठीसी बना ले, इसको वज्रमूषाओंके संपुटमें
रख नीचे ऊपर सिक्केका चूर्ण देकर संपुटको बंदकर पुट देनेसे सुव-
र्णकी एक ही पुटमें भस्म होजाती है ॥ ६१ ॥
गलितस्य सुवर्णस्य षोडशांशेन सीसकम् ।
योजयित्वा समुद्धृत्य निम्बुनीरेण मर्दयेत् ॥ ६२ ॥
गोलं कृत्वा गन्धचूर्णं समं दद्यात् तथोपरि ।
शरावसंपुटे कृत्वा पुटेत्त्रिंशद्वनोपलैः ।
एवं मुनिपुटैर्हेम नोत्थानं लभते पुनः ॥ ६३ ॥
तीसरी विधि-सुवर्णको मूषा ( कठाली ) में रख कोयलोंकी तीक्ष्ण
अग्नि देकर गलावे जब सुवर्ण पिघल जावे तो सुवर्णसे सोलहवां भाग
सिक्का मिलाकर दोनोंको उत्तम खल्वमें डाल नींबूके रससे मर्दन करे
( तीन दिन ) रगड़कर गोला बनावे इस गोलेके नीचे ऊपर सुवर्णके
बराबर शुद्ध गंधकका चूर्ण देकर शरावसंपुट करे, संपुटको धूपमें सुखा-
कर तीस जंगली उपलोंकी अग्निमें पुट देवे ( किसी पुस्तकमें “ घनो -

भाषाटीकासहित । ( ६७ )
पलैः" पाठ है जिसका अर्थ घरकी बनी हुई कठोर भारी सूखी गोबरी
है) इस प्रकार सात पुट देनेसे सुवर्णकी निरुत्थ भस्म हो जाती है ६२॥ ६३
शुद्धसूतसमं स्वर्णं खल्ले कृत्वा तु गोलकम् ।
ऊर्ध्वाधो गन्धकं दत्त्वा सर्वतुल्यं निरुध्य च॥६४॥
त्रिंशद्वनोपलैर्दद्यात्पुटान्येवं चतुर्दश ।
निरुत्थं जायते भस्म गन्धो देयः पुनः पुनः॥६५॥
चौथी विधि-शुद्ध सुवर्णके बारीक २ पत्र बनाकर उसमें बराबरका
शुद्ध पारा मिलावे दोनोंको खरलकर एकजीव होनेपर गोला बना ले,
इस गोलेके ऊपर नीचे बराबरकी शुद्ध गंधकका चूर्ण डाल शरावसंपुट
करे इस संपुटको तीस जंगली उपलोंमें रख पुट देवे ऐसे १४ पुटें
देनेसे सुवर्णकी निरुत्थ भस्म हो जाती है । इसमें प्रत्येक पुटमें पूर्ववत्
गंधकका चूर्ण डालते रहना चाहिये ॥ ६४ ॥ ६५ ॥
सुवर्णके गुण ।
कषायं तिक्तमधुरं सुवर्णं गुरु लेखनम् ।
हृद्यं रसायनं बल्यं चक्षुष्यं कान्तिदं शुचिः ॥६६॥
आयुर्मेधावयःस्थैर्यवाग्विशुद्धिस्मृतिप्रदम् ।
क्षयोन्मादगदानाञ्च कुष्ठानां नाशनं परम् ॥ ६७ ॥
सुवर्ण-कषाय, तिक्त, मधुर, भारी, लेखन, हृद्य, रसायन, बल-
कारक, नेत्रोंको हितकारी, कांतिदायक, पवित्र, आयुवर्धक, मेधाजनक,
वयस्थापक, वाणीको शुद्ध करनेवाला, स्मृतिदायक तथा क्षय,
उन्माद और कुष्ठ आदि रोगोंको नष्ट करनेवाला है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
इति सुवर्ण शोधन मारण ।

( ६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
चांदीका शोधन-मारण ।
उत्तम ( तार ) चांदीके लक्षण ।
दग्धोत्तीर्णं सुशीतं यन्निर्मलं कुन्दसन्निभम् ।
गुरु स्निग्धं कुमारञ्च तारमुत्तममिष्यते ॥ ६८ ॥
जो चांदी अग्निमें तपाकर लाल होनेपर निकालकर ठंढी की
जानेसे उत्तम सफेद वर्ण रहे, भारी हो, चिकनी हो और नरम हो
उसे उत्तम चांदी जाननी ॥ ६८ ॥
अशुद्ध चान्दी ( रौप्य ) के दोष ।
आयुः शुक्रं बलं हन्ति रोगसङ्घं करोति च ।
अशुद्धं चामृतं तारं शुद्धं ग्राह्यमतो बुधैः ॥ ६९ ॥
अशुद्ध और मारणमें कच्ची रही हुई चान्दी आयु, शुक्र और बल
को नष्ट करती है एवं रोगोंके समूहको पैदा करती है इसलिये बुद्धि-
मानोंको शुद्ध चान्दी लेना ही सब कर्मोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६९ ॥
चान्दीका शोधन ।
नागेन क्षारराजेन द्रावितं शुद्धिमृच्छति ।
रजतं दोषनिर्मुक्तं किं वा क्षाराम्लपाचितम्॥२७०॥
सिक्का और सुहागा मिलाकर चान्दीको तीक्ष्णाग्निमें रखकर पिघलावे
तो सिक्का चांदीका दोष लेकर उड जायगा और चान्दी निर्दोष शुद्ध
हो जायगी। अथवा चान्दीके पात्रोंको तपा तपा कर सुहागा मिले खटा-
ईके बीचमें बार २ बुझानेसे भी चान्दी शुद्ध हो जाती है ॥ २७० ॥
चान्दीके मारनेकी विधि ।
माक्षिकं गन्धकञ्चैवमर्कक्षीरेण मर्दयेत् ।
तेन लिप्तं रूप्यपत्रं पुटेन म्रियते ध्रुवम् ॥ ७१ ॥

भाषाटीकासहित । (६९)
सोनामाखी और गंधकको आकके दूधमें रगड़ कर चान्दीके
पत्रोंपर लेप कर शराव संपुटमें रख पुट देनेसे चान्दीकी भस्म
हो जाती है ॥ ७१ ॥
कण्टवेध्यं तारपत्रं दिह्याद्द्विगुणहिङ्गुलम् ।
पातयन्त्रे रसो ग्राह्यो रजतं मृतमुच्यते ॥ ७२ ॥
दूसरी विधि-शुद्ध चान्दीके कंटकवेधी बारीक पत्र लेकर उनमें दो-
गुना सिंगरफ डालकर (नींबूके रसमें) खूब रगडे जब एकजीव हो
जाये तो डमरुयंत्रमें रख ४ प्रहरकी अग्नि देवे तो सिंगरफका पारा
उडकर ऊपरके पात्रमें लग जायेगा । नीचेके पात्रमें चांदीकी भस्म
होजायेगी (उसको अलग निकाल ले) ऊपरके पात्रमेंसे पारा अलग
निकाल ले ॥ ७२ ॥
तालं गन्धं रौप्यपत्रं मर्दयेन्निम्बुकद्रवैः ।
त्रिपुटैश्च भवेद्भस्म योज्यमेतद्रसादिषु ॥ ७३ ॥
तीसरी विधि-हरिताल, गंधक और चांदीके बारीक पत्र इन तीनोंको
खरलमें डाल नींबूके रससे खूब रगडे फिर शरावसंपुट करके लघुपुटमें
फूंक दे, इस प्रकार तीन पुटें देनेसे चांदीकी भस्म होजायेगी । यह रस
आदिकोंमें सर्वत्र प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ७३ ॥
तारपत्रं चतुर्भागं भागैकं शुद्धतालकम् ।
मर्द्यं जम्बीरजैर्द्वावैस्तारपत्राणि लेपयेत् ॥ ७४ ॥
रुद्धा त्रिभिः पुटैः पाच्यं पञ्चविंशद्वनोपलैः ।
म्रियते नात्र सन्देहो गन्धो देयः पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
चौथी विधि-एक तोला शुद्ध वर्की हरितालको जंबीरी नींबूके रसमें
रगड़कर चार तोला चांदीके पत्रोंपर लेप कर शरावसंपुटमें रख नीचे
ऊपर गंधकका चूर्ण डाल बंद करे, इस संपुटको २५ जंगली उपलोंकी

( ७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह.
अग्निमें पुट दे, ऐसे तीन पुट देनेसे निःसंदेह चांदीकी भस्म हो जाती है
इसमें हरेक वार गंधक नीचे ऊपर संपुटमें डाल देना चाहिये॥७४॥७५॥
चांदीके गुण ।
शीतं कषायं मधुरमम्लं वातप्रकोपजित् ।
दीपनं बलकृत्स्निग्धं गुल्माजीर्णविनाशनम् ।
आयुष्यं दीर्घरोगघ्नं रजतं लेखनं स्मृतम् ॥ ७६ ॥
शुद्ध चांदी ( भस्म ) शीतल, कसैली, मधुर, अम्ल, वातप्रकोपको
जीतनेवाली, दीपन, बलकारक, स्निग्ध, गुल्मनाशक, अजीर्णको दूर
करनेवाली, आयुवर्धक, लेखन और दीर्घ रोगोंको दूर करनेवाली है॥७६॥
इति रौप्य मारण ।
अशुद्ध तांबेके दोष ।
न विषं विषमित्याहुस्ताम्रञ्च विषमुच्यते ।
एकदोषो विषे त्वष्टौ दोषास्ताम्रे प्रकीर्तिताः ॥ ७७॥
भ्रमो मूर्च्छा विदाहश्च उत्क्लेदः शोषवान्तयः ।
अरुचिश्चित्तसन्तापः एते दोषा विषोपमाः ॥
तस्माद्विशुद्धं ताम्रं हि ग्राह्यं रोगोपशान्तये ॥७८॥
विष इतना अवगुण नहीं करता किंतु तांबा विषसे भी अधिक
हानिकारक है । क्योंकि विषमें केवल एक ही दोष है; ताम्रमें आठ
दोष कहे हैं । अशुद्ध तांबेमें यह आठ दोष होते हैं जैसे-भ्रम, मूर्च्छा,
विदाह, उत्क्लेद, शोष, वांति, अरुचि और चित्तको संतापित करना ।
इसलिये तांबेको शुद्ध करके ही रोगशांतिके लिये ग्रहण करना
चाहिये ॥ ७७ ॥ ७८ ॥
ताम्रके शोधनकी विधि ।
पटुना रविदुग्धेन ताम्रपत्राणि लेपयेत् ।
अग्नौ सन्ताप्य निर्गुण्डीरसे सिञ्चेत्पुनः पुनः॥७९॥

भाषाटीकासहित । ( ७१ )
लवणको आकके दूधमें रगड़कर तांबेके पत्रोंपर लेप करे, फिर इन
पत्रोंको अग्निमें तपाकर संभालूके रसमें बार बार बुझाता रहे ( ऐसे २१
बार बुझानेसे तांबा शुद्ध होजाता है ) ॥ ७९ ॥
गोमूत्रेण पचेद्यामं ताम्रपत्रं दृढाग्निना ।
शुद्धयते नात्र सन्देहो मारणञ्चात्र कथ्यते ॥ २८०॥
अन्य प्रकार-तांबेके पत्रोंको गोमूत्रमें डालकर तीक्ष्णाग्निसे एक प्रहर
पकावे तो तांबा अवश्य शुद्ध होजाता है । अब आगे मारणकी विधिको
कहते हैं ॥ २८० ॥
तांबाके मारणकी विधि ।
सूतमेकं द्विधा गन्धं यामं मर्द्यं तु कन्यया ।
द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं लिप्त्वा स्थाल्यां निधापयेत् ।
सम्यक्शूरणजैः सार्द्धं पार्श्वे भस्म निधापयेत् ।
चतुर्यामं पचेच्चुल्यां पात्रपृष्ठे सगोमये ।
जलं पुनः पुनर्दयं स्वाङ्गशीतं विमर्दयेत् ।
म्रियते नात्र सन्देहः सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ८३ ॥
शुद्ध पारा दो तोले, शुद्ध गंधक चार तोले और शुद्ध तांबेके पत्र
छः तोले लेवे । प्रथम पारे और गंधकको एक प्रहर रगड़कर घीकुमा-
रका रस मिला फिर रगड़े तदनंतर इसको ताम्रपत्रोंपर लेप करे ।
इनको एक हांडीमें रख ( ऊपर एक छोटीसी शरावीसे ढक दे फिर इस
शरावीके ऊपर ) जिमीकंदकी भस्म हांडीमें भर दे ऊपरसे शराव देकर
गोबरसे संधी लेप करे और शरावके ऊपरले भागपर दो अंगुल मोटा
गोबर चढ़ा दे, फिर इस हांडीको चूल्हेपर चढ़ा चार प्रहरकी तीक्ष्ण
अग्नि देवे, हांडीके मुखपर गोबरपर पानीका पोचा देता रहे जिससे
गोबर सूखकर तिड़ न जावे, चार प्रहरके बाद अग्नि बुझा दे, स्वांग-
शीतल होनेपर युक्तिसे निकाल ले ताम्रपत्रोंकी भस्म हो जायेगी ।
इसे पीसकर सब रोगोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥

( ७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
जम्ब्वम्भसा सैन्धवसंयुतेन सगन्धकं स्थापय
शुल्वपत्रम् । पक्वायमानं पुटयेत्सुयुक्त्या वातादिकं
यावदुपैति शांतिम् ॥ ८४ ॥
दूसरी विधि—सेंधानमक ४ तोले गंधक ४ तोले इन दोनोंको जामु-
नके रसमें खरल कर तांबेके बारीक पत्रोंपर लेप करे, इन पत्रोंको
एक चौड़े मुखकी हांडीमें रख इन पत्रोंको पतलीसी शरावीसे ढककर
सन्धी लेप करे । फिर इस हांडीको बालूरेतसे भर चूल्हे पर चढ़ा
बारह घंटेकी तीक्ष्ण अग्नि जलावे फिर स्वांगशीतल होनेपर युक्ति-
पूर्वक निकालकर पंचगव्य ( घृत, दूध, दही, गोमूत्र, गोबरका रस )
में रगड़कर शरावसंपुटमें रख तीन पुटें दे तो वमनादि दुर्गुण रहित
उत्तम भस्म होजायेगी ॥ ८४ ॥
शुद्धं ताम्रदलं विमर्द्य पटुना क्षारेण जम्बीरजै-
नीरैर्घस्रमिदं स्नुगर्कपयसा लिप्तं धमेत्सप्तधा ।
निर्गुण्ड्यंबुहिमं रसेन्द्रकलितं दुग्धाज्यगन्धेनतत्
तुल्येनाथ मृतं भवेत्सपुटितं पञ्चामृतेन त्रिधा८५॥
वांतिभ्रांतिविवर्जितं क्षयरुजाकुष्ठानि पाण्ड्वामयं,
शूलं मेहगुदांकुरानिलगदानुक्तानुपानैर्जयेत् ।
गुञ्जामात्रमिदं ततो द्विगुणितं तच्छुद्धकायेन चेत्,
भुक्तं स्थौल्यजरापमृत्युशमनं पथ्याशिनावत्सरात्॥
तीसरी विधि—शुद्ध ताम्र पत्रोंमें सेंधानमक और सुहागा मिलाकर
जम्बीरीके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर इन पत्रोंपर थोहरका दूध
लेप कर अग्निमें तपा संभालूके रसमें बुझावे, ऐसे सात वार थोहरके
दूधसे लेप करके बुझावे और सात वार आकका दूध लेप कर
अग्निमें तपा संभालूके रसमें बुझावे । इस प्रकार बुझानेसे संभालूके

भाषाटीकासहित । ( ७३ )
रसमें तांबेके बारीक २ पत्र गेरूके चूर्ण समान वर्णवाले नीचे बैठ
जायँगे, ठंडा होनेपर संभालूका रस ऊपरसे युक्तिपूर्वक नितार कर
गेर दे, नीचेसे तांबेका चूरा लेकर उस चूरेके बराबर पारा गंधक मिला
खरल करे इसमें दूध और घी डालकर पीठोसी बना ले फिर शराव-
संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । स्वांगशीतल होनेपर निकालकर
पञ्चामृत ( दूध, दही, शहद, घी, मिश्री ) में रगड तीन पुटें देवे
तो वांति, भ्रांति आदि दोषरहित उत्तम भस्म हो जायगी । इस
भस्मको एक रत्ती प्रमाण उचित अनुपानसे सेवन करावे तो क्षयरोग,
सब प्रकारके कुष्ठ, पाण्डुरोग, शूल, प्रमेह, बवासीर और वातरोग
यह सब रोग नष्ट होते हैं । यदि शुद्ध कायावाला मनुष्य दो रत्ती
प्रमाण एक वर्ष पर्यंत नित्य सेवन करे और पथ्य भोजन करता रहे तो
मेदरोग, बुढ़ापा और अकालमृत्यु भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ८५॥ ८६॥
तांबेके गुण ।
ताम्रमुष्णं गरहरं यकृत्प्लीहोदरापहम् ।
क्रिमिशूलामवातघ्नं ग्रहण्यार्शोऽम्लपित्तजित् ॥ ८७ ॥
शुद्ध ताम्रभस्म-उष्ण है, गरनाशक, यकृत्रोग, प्लीहरोग, उदररोग,
क्रिमिरोग, शूल, आमवात, ग्रहणीरोग, अर्शरोग और अम्लपित्त इन
सब रोगोंको दूर करती है ॥ ८७ ॥
इति ताम्र मारण ।
पित्तल और कांसीका मारण व शोधन ।
पित्तलञ्च तथा कांस्यं ताम्रवन्मारयेत्पृथक् ।
ताम्रवच्छोधनं तेषां ताम्रवद्गुणकारकम् ॥८८॥
पित्तल या कांसी इनमेंसे जिसकी भस्म करना हो उसको तांबेके
समान शोधन और तांबेकी भस्मके समान ही इनकी भस्म हो सकती
है, एवं तांबेके समान ही यह दोनों गुणकारी हैं ॥ ८८ ॥
इति पित्तल कांस्य मारण ।

( ७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
नागा ( सिक्का ) वंग ( कली ) शोधन ।
नागवङ्गे च गलिते रविदुग्धेन सेचिते ।
त्रिवाराच्छुद्धिमायांतः सच्छिद्रे हण्डिकांतरे॥ ८९ ॥
एक हाण्डीमें आकका दूध डालकर उस हाण्डीके मुखपर छिद्रयुक्त
शराव ढक दे, फिर नाग या वंग जो शोधन करना हो उसको पिघ-
लाकर उस छिद्रवाले शरावमें डाले जिससे यह पिघला हुआ धातु
छिद्रद्वारा हाण्डीमें गिरकर आकके दूधमें डूब जावे, इस प्रकार तीन बार
पिघला २ कर बुझानेसे नाग और वंग शुद्ध हो जाते हैं ॥ ८९ ॥
वङ्गं चूर्णोदके स्विन्नं यामार्डेन विशुद्ध्यति॥२९०॥
अन्य प्रकार-वंग ( कली ) के बारीक बारीक पत्रोंको छोटे छोटे
बना पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा चूनेके पानीमें चार घडी पकावे तो
वंग शुद्ध हो जाती है ॥ २९० ॥
इति नाग-वंग-शोधन ।
नाग ( सिक्का ) मारण ।
भुजंगममगस्त्यं च पिष्ट्वा पत्रं प्रलेपयेत् ।
तत्र संविद्रुते नागे वासापामार्गसंभवम् ॥ ९१ ॥
क्षारं विमिश्रयेत्तत्र चतुर्थांशं गुरूक्तितः ।
प्रहरं पाचयेच्चुल्ल्यां वासादर्या च चालयेत् ॥९२॥
तत उद्धृत्य तच्चूर्णं वासानीरेण मर्दयेत् ।
एवं सप्तपुटैर्नागं सिन्दूरं जायते ध्रुवम् ॥ ९३ ॥
सीसे ( सिक्के ) के बारीक पत्रोंपर अगस्तिये वृक्षके फूलों ( और
नागरवेलके पत्रों ) को रगड़कर लेप करे, फिर इन पत्रोंको मट्टीके
तौले ( कटाहका पात्र ) में डाल चूलहे पर चढ़ा नीचे अग्निको जलावे,
जब सीसा पिघल जाये तो वांसे और अपामार्गका क्षार सीसेके तोलसे
चौथा भाग ले थोडा थोडा बुरकाता जाये और वांसा ( अडूसे ) की

भाषाटीकासहित । ( ७५ )
मोटी लकड़ीसे रगड़ता रहे, इस प्रकार एक प्रहर मर्दन करे तो यह
भस्माकार होजायेगा । फिर इसको वांसेके पत्तोंके रसमें रगड़कर शराव-
संपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार सात पुट देनेसे सिंदूरके समान
वर्णवाली उत्तम नाग ( सीसा ) की भस्म होजायगी ॥ ९१-९३ ॥
त्रिभिः कुम्भपुटैर्नागो वासारसविमर्दितः ।
सशिलो भस्मतामेति तद्रजः सर्वमेहजित् ॥ ९४ ॥
दूसरी विधि-सिकेमें मनसिल मिलाकर वांसेका रस डाल खूब
रगडे पीठीसी बन जानेपर शरावसंपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार
तीन पुट देनेसे उत्तम भस्म होजायगी । यह भस्म संपूर्ण प्रमेहोंको
जीतती है ॥ ९४ ॥
नाग भस्मके गुण ।
दशनाबलं धत्ते वीर्यायुःकांतिवर्द्धनम् ।
मेहान् हंति हतं नागं सेव्यं वंगं च तद्गुणम् ॥९५॥
यह नागभस्म मनुष्योंके शरीरमें दश हाथीके समान बल देने-
वाली है तथा वीर्य, आयु और कांतिको बढ़ाती है एवं संपूर्ण प्रमे-
होंको नष्ट करती है। वंगभस्म भी विधिवत् सेवन की जाय तो इन्हीं
गुणोंको करती है ॥ ९५ ॥
तारस्य रंजनो नागो वातपित्तकफापहः ।
ग्रहणीकुष्ठगुल्मार्शः शोषव्रणविषापहः ॥ ९६ ॥
शुद्ध सीसाभस्म चांदीको रञ्जन करती ( रंग देती ) है; वात, पित्त
और कफको दूर करती है; एवं ग्रहणी, कुष्ठ, गुल्म, अर्श, शोष और
विषके विकारको दूर करती है ॥ ९६ ॥ इति नागमारण विधि ॥
वंगभस्म विधि ।
वङ्गं सतालमर्कस्य पिष्ट्वा दुग्धेन संपुटैत् ।
शुष्काश्वत्थभवैर्वल्कैः सप्तधा भस्मतां नयेत् ॥९७॥

( ७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शुद्ध वंग और शुद्ध हरितालको आकके दूधमें रगडे ( पहिले वंगको
पिघला उसमें आधा भाग पारा डाल उतारकर खरलमें डाले फिर
हरिताल मिला रगडे ) इसकी चौडीसी टिकिया बना इसको अश्वत्थ
( पीपलवृक्ष ) के सूखे छिलकोंके चूर्णमें रख कपडमट्टी कर पुटमें
फूंक दे, इस प्रकार सात पुटें दे तो उत्तम वंगभस्म हो जायेगी। (कोई
ऐसा अर्थ करते हैं कि हरितालको आकके दूधमें रगडकर वंगके
कंटकवेधी पत्रोंपर लेपकर पीपलके छिलकोंसे सात बार लपेट पुट देवे
तो एक पुटमें ही भस्म हो जायगी । परंतु यह असंगत है, क्योंकि सूखे
अश्वत्थ छिलकोंसे सप्तधा वेष्टित कैसे हो सकता है ? किंतु ऐसा आम
लोग करते हैं कि वंगके छोटे २ पत्र कर अश्वत्थके छिलकोंके चूर्णपर
चावलसे जमाकर ऊपरसे और अश्वत्थके छिलकोंका चूर्ण डाल नीचे'
ऊपर उपले लगा आग लगा देते हैं तो शीतल होनेपर खीलोंके
समान फूले हुए भस्मके टुकडे मिलेंगे । परंतु इससे उपरोक्त सात-
पुटी भस्म गुणमें उत्तम होती है ) ॥ ९७ ॥
विशुद्धवंगपत्राणि द्रावयेद्धाण्डिकान्तरे ।
अपामार्गोद्भवं चूर्णं तत्तुल्यं तत्र मेलयेत् ॥ ९८ ॥
स्थूलाग्रया लोहदर्व्या शनैस्तदभिमर्दयेत् ।
यावद्भस्मत्वमाप्नोति तावन्मर्द्यन्तु पूर्ववत् ॥ ९९ ॥
ततस्त्वेकीकृतं चूर्णं कृत्वा चांगारवर्जितम् ।
नूतनेन शरावेण रोधयेच्च भिषग्वरः ।
पश्चात्तीव्राग्निना पक्वं वंगभस्म भवेद् ध्रुवम् ॥३००॥
दूसरी विधि-शुद्ध वंगको एक तौलेमें डाल चूल्हेपर चढ़ावे नीचे
अग्नि जलावे जब पिघल जावे तो इसमें वंगके बराबर अपामार्गका चूर्ण
बुर्की २ कर एक बडे मुखकी लोहेकी कडछीसे धीरे २ रगडता रहे
जबतक वंगकी उस पात्रमें ही भस्म न होजाये तबतक थोडा थोडा
अपामार्गका चूर्ण मिला रगडता ही रहे। जब भस्माकार बन जाय तो