रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५७ )
कान्तपाषाणके पर्याय ।
राजपट्टं महापट्टं शिखिग्रीवं विराटकम् ॥
राजपट्ट, महापट्ट, शिखिग्रीव और विराटक यह कान्तपाषाणके
नाम हैं ॥
कांतपाषाणका शोधन ।
चूर्णितं कान्तपाषाणं महिषीक्षीरसंयुतम् ।
विपचेदायसे पात्रे गोघृतेन समन्वितम् ॥ २५ ॥
लवणे च तथा क्षारे शोभाञ्जनरसे क्षिपेत् ।
अम्लवर्गस्य तोयेन दिनं घर्मे विभावयेत् ॥ २६ ॥
तथैव दोलिकायन्त्रे दिवसं पाचयेत्सुधीः ।
कांतपाषाणशुद्धौ तु रसकर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥
कांतपाषाणको कूटकर भैंसके दूध और गोघृतमें दोलायन्त्र विधिसे
लोहेके पात्रमें पकावे फिर नमक जौखार और सुहांजनेके रस ( क्वाथ )
में स्वेदन करे । तदनन्तर अम्लवर्गके पानीमें एक दिन भिगोकर धूपमें
रक्खे, फिर दोलायन्त्र द्वारा अम्लवर्गमें एक दिन पकानेसे कांतपाषाण
शुद्ध और रसकर्मके योग्य हो जायेगा ॥ २५–२७ ॥ इति कांत-
पाषाण शोधन ॥
कौड़ीके भेद ।
पीताभा ग्रन्थिला पृष्ठे दीर्घवृन्दा वराटिका ।
सार्द्धनिष्कभरा श्रेष्ठा निष्कभारा च मध्यमा॥२८॥
पादोनानिष्कभारा च कनिष्ठा परिकीर्तिता ।
रसवैद्यविनिर्दिष्टा सा वराटकसंज्ञिका ॥ २९ ॥
जो कौड़ी पीले वर्णकी पीठपरसे गांठदारसी लंबी और गोल हो
तोलमें डेढ़ टंक ( ६ मासे ) हो वह रसवैद्योंने श्रेष्ठ वराटिका कही