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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 584 में से

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भाषाटीकासहित । ( ७५ )
मोटी लकड़ीसे रगड़ता रहे, इस प्रकार एक प्रहर मर्दन करे तो यह
भस्माकार होजायेगा । फिर इसको वांसेके पत्तोंके रसमें रगड़कर शराव-
संपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार सात पुट देनेसे सिंदूरके समान
वर्णवाली उत्तम नाग ( सीसा ) की भस्म होजायगी ॥ ९१-९३ ॥
त्रिभिः कुम्भपुटैर्नागो वासारसविमर्दितः ।
सशिलो भस्मतामेति तद्रजः सर्वमेहजित् ॥ ९४ ॥
दूसरी विधि-सिकेमें मनसिल मिलाकर वांसेका रस डाल खूब
रगडे पीठीसी बन जानेपर शरावसंपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार
तीन पुट देनेसे उत्तम भस्म होजायगी । यह भस्म संपूर्ण प्रमेहोंको
जीतती है ॥ ९४ ॥
नाग भस्मके गुण ।
दशनाबलं धत्ते वीर्यायुःकांतिवर्द्धनम् ।
मेहान् हंति हतं नागं सेव्यं वंगं च तद्गुणम् ॥९५॥
यह नागभस्म मनुष्योंके शरीरमें दश हाथीके समान बल देने-
वाली है तथा वीर्य, आयु और कांतिको बढ़ाती है एवं संपूर्ण प्रमे-
होंको नष्ट करती है। वंगभस्म भी विधिवत् सेवन की जाय तो इन्हीं
गुणोंको करती है ॥ ९५ ॥
तारस्य रंजनो नागो वातपित्तकफापहः ।
ग्रहणीकुष्ठगुल्मार्शः शोषव्रणविषापहः ॥ ९६ ॥
शुद्ध सीसाभस्म चांदीको रञ्जन करती ( रंग देती ) है; वात, पित्त
और कफको दूर करती है; एवं ग्रहणी, कुष्ठ, गुल्म, अर्श, शोष और
विषके विकारको दूर करती है ॥ ९६ ॥ इति नागमारण विधि ॥
वंगभस्म विधि ।
वङ्गं सतालमर्कस्य पिष्ट्वा दुग्धेन संपुटैत् ।
शुष्काश्वत्थभवैर्वल्कैः सप्तधा भस्मतां नयेत् ॥९७॥