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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 584 में से

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पृष्ठ 89

भाषाटीकासहित । ( ६३ )
प्रथम सुहागेको लेकर खट्टी कांजीमें डाल दे फिर एक दिन रातके
अनंतर निकालकर छायामें सुखा ले । फिर मनुष्यके मूत्रमें एक दिन
डुबा रक्खे, एक दिन गोमूत्रमें डुबाकर रक्खे फिर सायंकाल गोमू-
त्रमेंसे निकालकर जंबीरी नींबूके रसमें रक्खे । फिर निकालकर नारि-
यलके पात्रमें डाल उसमें काली मिरचका चूर्ण मिला शीतल जलसे धो
डाले तो सुहागा शुद्ध होजाता है । ( कोई अग्निपर फुला लेने मात्रसे
सुहागेको शुद्ध मानते हैं, कोई जंबीरी नींबूके रसमें एक दिनरात
भावना देनेसे सुहागा शुद्ध होता है ऐसा मानते हैं ) ॥ ४८--५० ॥
सुहागेके गुण ।
एवं टङ्कं समादाय सर्वरोगेषु योजयेत् ।
टंकणोऽग्निकरो रूक्षः कफघ्नो रेचनो लघुः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार शोधन किया हुआ सुहागा सब जगह प्रयुक्त करना
चाहिये । यह शुद्ध टंकण जठराग्निको चैतन्य करता है, रूक्ष है, कफना-
शक है, रेचन है और हलका है ( एवं ज्वर, शूल, वायु, विष इनको नष्ट
करता है और सुवर्ण तथा चांदीको शोधन करनेवाला है ) ॥ ५१ ॥
शंखका शोधन और मारण ।
अन्धमूषागतं शङ्खं पलमेकं विचक्षणः ।
माषार्द्धटङ्कणैर्मिश्रं दण्डयन्त्रेण मारयेत् ॥ ५२ ॥
( शंखके टुकड़े कर दोलायंत्रद्वारा एक प्रहर कांजीमें पकावे तो
शंख शुद्ध होजाता है ) शंख ४ तोला, सुहागा ४ रत्ती इन दोनोंको
अंधमूषामें रख कोयलोंकी तीक्ष्ण अग्निमें फूंक देवे, शीतल होनेपर डंडे
या पत्थर आदिसे पीसकर रक्खे यह शंखभस्म होगई ॥ ५२ ॥
शंखके गुण ।
शङ्खः सर्वरुजां हन्ति विशेषादुदरामयम् ।
शूलाम्लपित्तविष्टम्भमेहदह्रद्दिदीपनः ॥ ५३ ॥