रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ६१ )
शिलाजतु, शैलेय, अद्र्य, गिरिज, अश्मज, धातुज, अश्मजतु, शैलज
और अश्मसंभव यह नाम शिलाजीतके हैं ॥ ४१ ॥
शिलाजीतका शोधन ।
गोदुग्धे त्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु ।
दिनैकं लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥ ४२ ॥
शिलाजीतको कूटकर लोहेकी कडाहीमें डाल उसमें गोदुग्ध, त्रिफ-
लेका क्वाथ और भांगरेका रस डालकर एक दिन रक्खा रहने दे फिर
अग्निपर उबाल देकर तीक्ष्ण धूपमें रख दे, इसके ऊपर जो मलाईके
समान गाढ़ा २ पदार्थ हो उसको उतारकर ( गर्दैसे बचाकर ) सुखा ले
तो शिलाजीत निःसन्देह उत्तम शुद्ध हो जायगी ॥ ४२ ॥
शिलाजीतके गुण ।
शिलाजतु भवेत्तिक्तं कटुकञ्च रसायनम् ।
क्षयशोथोदरार्शांसि हंति वस्तिरुजां जयेत् ॥४३॥
शिलाजीत-रसमें तिक्त और कटु है । गुणमें रसायन ( सर्वरोग-
नाशक आयुर्वर्द्धक ) तथा क्षयरोग, शोथरोग, उदररोग, बवासीर इन
सबको नष्ट करनेवाली है एवं मूत्राशयके प्रमेह कृच्छ्रादि संपूर्ण
रोगोंको जीतनेवाली है ॥ ४३ ॥
सौवीरादिकोंकी साधारण शुद्धि ।
सौवीरं टंकणं शंखं कंकुष्ठं गैरिकं तथा ।
एते वराटवच्छोध्या भवेयुर्दोषवर्जिताः ॥ ४४ ॥
सुरमा, सुहागा, शंख, कंकुष्ठ ( मुरदासिंगके समान पदार्थ ), गेरू
इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसको कांजीमें स्वेदन कर ले तो
शुद्ध होजाता है ॥ ४४ ॥
१ कोई कंकुष्ठको मुर्दासिंग मानते हैं, रसरत्नसमुच्चयकारने दोनाको
भिन्न भिन्न पदार्थ माना है । वर्णमें कंकुष्ठ और मुर्दासिंग पीलेसे होते हैं,
कंकुष्ठ वंगका मल होता है !