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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 584 में से

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पृष्ठ 95

भाषाटीकासहित । (६९)
सोनामाखी और गंधकको आकके दूधमें रगड़ कर चान्दीके
पत्रोंपर लेप कर शराव संपुटमें रख पुट देनेसे चान्दीकी भस्म
हो जाती है ॥ ७१ ॥
कण्टवेध्यं तारपत्रं दिह्याद्द्विगुणहिङ्गुलम् ।
पातयन्त्रे रसो ग्राह्यो रजतं मृतमुच्यते ॥ ७२ ॥
दूसरी विधि-शुद्ध चान्दीके कंटकवेधी बारीक पत्र लेकर उनमें दो-
गुना सिंगरफ डालकर (नींबूके रसमें) खूब रगडे जब एकजीव हो
जाये तो डमरुयंत्रमें रख ४ प्रहरकी अग्नि देवे तो सिंगरफका पारा
उडकर ऊपरके पात्रमें लग जायेगा । नीचेके पात्रमें चांदीकी भस्म
होजायेगी (उसको अलग निकाल ले) ऊपरके पात्रमेंसे पारा अलग
निकाल ले ॥ ७२ ॥
तालं गन्धं रौप्यपत्रं मर्दयेन्निम्बुकद्रवैः ।
त्रिपुटैश्च भवेद्भस्म योज्यमेतद्रसादिषु ॥ ७३ ॥
तीसरी विधि-हरिताल, गंधक और चांदीके बारीक पत्र इन तीनोंको
खरलमें डाल नींबूके रससे खूब रगडे फिर शरावसंपुट करके लघुपुटमें
फूंक दे, इस प्रकार तीन पुटें देनेसे चांदीकी भस्म होजायेगी । यह रस
आदिकोंमें सर्वत्र प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ७३ ॥
तारपत्रं चतुर्भागं भागैकं शुद्धतालकम् ।
मर्द्यं जम्बीरजैर्द्वावैस्तारपत्राणि लेपयेत् ॥ ७४ ॥
रुद्धा त्रिभिः पुटैः पाच्यं पञ्चविंशद्वनोपलैः ।
म्रियते नात्र सन्देहो गन्धो देयः पुनः पुनः ॥ ७५ ॥
चौथी विधि-एक तोला शुद्ध वर्की हरितालको जंबीरी नींबूके रसमें
रगड़कर चार तोला चांदीके पत्रोंपर लेप कर शरावसंपुटमें रख नीचे
ऊपर गंधकका चूर्ण डाल बंद करे, इस संपुटको २५ जंगली उपलोंकी