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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 584 में से

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पृष्ठ 90

( ६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शंख संपूर्ण रोगोंको हरनेवाला है, विशेषतासे उदर रोगोंको दूर
करता है तथा शूल, अम्लपित्त, विष्टम्भ और प्रमेह इनको हरनेवाला
है एवं दीपन है ( इसकी भस्मका ही प्रयोग करना चाहिये। परंतु नेत्रके
फोला आदि रोगोंमें कच्चा शंख ही रगड़कर डाला जाता है ) ॥५३॥
इति उपरसशोधन समाप्त ।
अथ स्वर्णादिधातुशोधनमारण ।
सोना आदि ८ धातुओंकी साधारण शुद्धि ।
हेमादि लोहकिट्टान्तं शोधनं मारणं शृणु ।
तैले तक्रे गवां मूत्रे काञ्जिकेऽथ कुलत्थके ॥५४॥
तप्ततप्तानि सिञ्चेत तत्तद्भावे च सप्तधा ।
एवं स्वर्णादिलोहानि शुद्धिमायान्त्यसंशयः ॥५५॥
सुवर्णसे लेकर लोह किट्ट ( मण्डूर ) पर्यंत सब धातुओंका शोधन
और मारण सुनो-सुवर्णादि धातुओंमेंसे जिसका शोधन करना हो
उसको अग्निमें तपा २ कर तेल, तक्र ( मट्ठा ), गोमूत्र, कांजी और
कुलथीका काय इन हरेक द्रव्यमें सात सात वार बुझावे । इस प्रकार
इन पांचों ही द्रव्योंसे सात सात वार बुझानेसे सुवर्ण आदि सब धातु
निश्चय ही शुद्ध होजाती हैं ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
अशुद्ध सुवर्णका दोष ।
सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति नानारोगं करोति च ।
अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं तु मारयेत् ॥५६॥
अशुद्ध सुवर्ण-सौख्य, वीर्य, बल इन सबको हनन करता है तथा
अनेक प्रकारके रोगोंको उत्पन्न करता है इसलिये अशुद्ध सुवर्णकी
भस्म नहीं करनी चाहिये । “ अशुद्धममृतं ” इस पुस्तकमें ऐसा
पाठ है इसका यह अर्थ है कि अशोधित सुवर्ण और मारणमें अधमरा