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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सुवर्णभस्मकी विधि ।
माक्षिकं नागचूर्णञ्च पिष्टमर्करसेन च ।
हेमपत्रं पुटेनैव म्रियते क्षणमात्रतः ॥ २६० ॥
सुवर्णके शुद्ध पत्रोंपर सोनामक्खी और शीसे ( सिक्के ) को आकके
दूधमें रगड़कर लेप करे फिर इनको अन्धमूषामें रख पुटमें फूंक दे तो
सोनेकी भस्म होजायगी ॥ २६० ॥
सुशुद्धं पारदं दत्त्वा कुर्याद्यत्नेन पीठिकाम् ।
दत्त्वोर्ध्वाधो नागचूर्णं पुटेन म्रियते ध्रुवम् ॥ ६१ ॥
दूसरी विधि-शुद्ध बारीक स्वर्णपत्रोंमें ( दोगुना ) शुद्ध पारा मिला-
कर दोनोंको रगड़कर पीठीसी बना ले, इसको वज्रमूषाओंके संपुटमें
रख नीचे ऊपर सिक्केका चूर्ण देकर संपुटको बंदकर पुट देनेसे सुव-
र्णकी एक ही पुटमें भस्म होजाती है ॥ ६१ ॥
गलितस्य सुवर्णस्य षोडशांशेन सीसकम् ।
योजयित्वा समुद्धृत्य निम्बुनीरेण मर्दयेत् ॥ ६२ ॥
गोलं कृत्वा गन्धचूर्णं समं दद्यात् तथोपरि ।
शरावसंपुटे कृत्वा पुटेत्त्रिंशद्वनोपलैः ।
एवं मुनिपुटैर्हेम नोत्थानं लभते पुनः ॥ ६३ ॥
तीसरी विधि-सुवर्णको मूषा ( कठाली ) में रख कोयलोंकी तीक्ष्ण
अग्नि देकर गलावे जब सुवर्ण पिघल जावे तो सुवर्णसे सोलहवां भाग
सिक्का मिलाकर दोनोंको उत्तम खल्वमें डाल नींबूके रससे मर्दन करे
( तीन दिन ) रगड़कर गोला बनावे इस गोलेके नीचे ऊपर सुवर्णके
बराबर शुद्ध गंधकका चूर्ण देकर शरावसंपुट करे, संपुटको धूपमें सुखा-
कर तीस जंगली उपलोंकी अग्निमें पुट देवे ( किसी पुस्तकमें “ घनो -