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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 508 में से

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पृष्ठ 18

पात्रों का चित्रण-पात्र-चित्रण की दृष्टि से रंगनाथ रामायण विशेष महत्त्व रखती है ।
जैसा हमने पहले ही निवेदन किया है, रंगनाथ रामायण में श्रीराम के महिमा-समन्वित शक्ति,
शील तथा सौंदर्य से परिपूर्ण चरित्र को प्रस्तुत करने का अधिक प्रयत्न हुआ है । इस रामायण
के नायक राम जहां एक धीरोदात्त वीर तथा सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति थे, वहां इस काव्य
का खलनायक रावण भी उदार, वीर, साहसी, असमान पराक्रमी, राजनीतिकुशल, स्वाभि-
मानी एवं शिवजी का अनन्य भक्त भी था । किन्तु, उसके दोष भी उसके गुणोसे
कम नहीं थे । वह कामुक, अभिमानी तथा उद्धत था । इसलिए, इस रामायण के कवि ने
रावण के चरित्र का चित्रण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा एव सहृदयता का
परिचय दिया है । उन्होंने एक कलाकार तथा इतिहास-लेखक—इन दोनो के उत्तर-
दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है । जहाँ उन्होंने रावण के कृष्ण पक्ष की निंदा की है
वहाँ उसके उज्ज्वल पक्ष को प्रकट करने की उदारता भी दिखाई है । उनकी दृष्टि
में रावण एक विलक्षण वीर था, जिसमें जड़-चेतन तथा गुण-दोषो का अद्भुत
सम्मिश्रण था। उसका पतन इसलिए हुआ था कि जड़ ने चैतन्य पर पूरा-पूरा अधिकार
प्राप्त कर लिया था । कदाचित् यह रामायण के प्रति द्राविड़ दृष्टि का प्रमाण भी हो ।
द्राविड़ लोग रावण को उसी दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से आर्यों ने उसे देखा और
राक्षस, निशाचर आदि नामो से संबोधित किया । द्रविड़ दृष्टि में रावण भी एक वीर,
विद्वान्, पराक्रमी मनुष्य ही था, किन्तु उसके गुणो पर दुर्गुणो ने विजय प्राप्त कर ली थी
और यही उसके सर्वनाश का कारण हुआ । इसके अतिरिक्त, कला की दृष्टि से
देखा जाय, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि रामचन्द्रजी का प्रतिद्वन्द्वी केवल एक लपट
तथा नीच व्यक्ति नहीं हो सकता था । रावण को अपने बल-पौरुष का जहाँ अभिमान है,
वहां उसके हृदय में अपने शत्रु के गुणो के प्रति आदर भी है । वह राम के बल-
विक्रम पर आश्चर्य ही प्रकट नहीं करता, वल्कि उनकी प्रशंसा भी करने लगता है। श्रीराम
की धनुर्विद्या की निपुणता देखकर रावण कहता है—
नल्लवो रघुराम नयनाभिराम, विल्लविद्या गुरुव, वीरावतार ।
वापुरे, राम भूपाल, लोकमुल नीपाटि विलुकाडु नेर्चुने कलग ?
(हे नीलमेघश्याम, नयनाभिराम, धनुर्विद्या-निपुण, वीरावतार, रघुराम,
हे राजा राम, इस संसार में तुम्हारे समान धनुर्धर और कोई हो सकता है ?)
रावण की इस प्रशंसापूर्ण शब्दो को सुनकर रावण के मत्री रावण से कहते हैं
कि आपका इस प्रकार शत्रु की प्रशंसा करना आपको शोभा नहीं देता । तब रावण
कहता है--
विल्लुविद्या पेंपुनु, विक्रम क्रममु, गलितनवुनु, बाहुगर्व राजसमु,
लादियो गुणमुल नधिकुडैनहि, कोदंडदीक्षा गुरुनितो राज
वरुनितो, रामभूवरुनितो नोरुलु पकिचि चूड नेपट्टुन नैन,
साटिये इम्भूडु जगमुलयदु ? मेटि शूरुल पंषु पेच्चंग वलदे ?