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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 508 में से

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पृष्ठ 19

( १५ )
(धनुर्विद्या-नैपुण्य, पराक्रम, शौर्य, बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ राजा राम की समता
करनेवाला तीनो लोको में कौन है ? क्या महान् पराक्रमी व्यक्तित्वयो की महानता की प्रशसा नहीं
करनी चाहिए ?
रावण के इन शब्दो से कवि दो उद्देश्यो की पूर्ति करना चाहते हैं। रावण के ये
वचन जहाँ एक ओर उसकी उदारता प्रकट करते हैं वहाँ वे शत्रु के द्वारा भी
प्रशसा प्राप्त करनेवाले श्रीराम के असाधारण एवं अलौकिक व्यक्तित्व पर भी प्रकाश
डालते हैं ।
यही नहीं, रावण अच्छी तरह जानता था कि श्रीराम विष्णु के अपर रूप हैं
और उनके हाथो मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिए, वह सोचता है कि युद्ध
के लिए ललकारनेवाले शत्रु के सामने घुटने टेककर में अपनी दीनता क्यो प्रकट
करूँ और अपनी वीरता को क्यो कलंकित करूँ । जब मंदोदरी राम की महिमा
का वर्णन करके रावण को युद्ध करने से रोकने का प्रयत्न करती हैं, तो रावण
कहता है-
ये नेल्लभगुल ఁनिक राघवुल बोनीक चपुदु; भूमिज नीय
वारुठ बलुडनै, यटु गाक येनु श्रीरामु शरमुलचे जत्तुनेनि
नाकवासुलु मेच्च ना कोरुचुन्न वेंकुंठ मेदुरागवच्चु निच्चटिकि
ललन नीवेटिकि ? लक येमिटिकि ? दलकोन्नु मुक्ति सत्पथमु गेकोडु ।
(अब मैं किसी भी प्रकार राघवो का वध करूँगा ही; मैं सीता को नहीं दूंगा। यदि
इसके विपरीत मैं श्रीराम के शरो से ही मारा जाऊँगा, तो मेरा चिर अभिलषित
स्वर्ग मेरे पास स्वयं आ जायगा और स्वर्ग के निवासी मेरी प्रशसा करेंगे । जब मैं
मुक्तिपथ को प्राप्त करने जा रहा हूँ, तब हे सुन्दरी ! मुझे न तुम्हारी आवश्यकता है न
लका की ।)
वाल्मीकिरामायण में सुलोचना का वृत्तात नहीं मिलता है । तुलसी-रामायण
की कुछ प्रतियो में इस कथा का बडा सरस वर्णन मिलता है। किन्तु पडितो का विचार है
कि तुलसी-रामायण का यह अंश प्रक्षिप्त है । रंगनाथ रामायण में इस महान् साध्वी
के चरित्र का अत्युत्तम चित्रण मिलता है । बँगला-कवि माइकेल मधुसूदन ने अपनी रचना
'मेघनाद-वध' में सुलोचना के चरित्र को विशेष प्रधानता दी है और उस वीर एव
सती-साध्वी स्त्री का एक भव्य चरित्र उपस्थित किया है । इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरात
उसकी वीर पत्नी सुलोचना अपने पति के मृत शरीर के साथ सती होना चाहती है ।
अतः, वह अपने ससुर रावण से इन्द्रजीत के मृत शरीर को मँगा देने की प्रार्थना करती है ।
किन्तु, रावण अपनी असमर्थता प्रकट करता है; क्योकि इन्द्रजीत का शव शत्रुओ के अधीन
में था । तब सुलोचना अपने पति का मृत शरीर प्राप्त करने के हेतु स्वयं साहस के साथ
शत्रु-शिविर में चली जाती है। वहाँ पहुँचकर वह पहले रामचन्द्रजी से पति-भिक्षा देने
की प्रार्थना करती है । उसके साहस पति-भक्ति एवं निर्मल चरित्र से प्रभावित होकर
रामचन्द्र उसकी प्रार्थना स्वीकार करने को प्रस्तुत-से होते दीखते हैं । तब हनुमान् उन्हें