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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 508 में से

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पृष्ठ 13

उन्नति की। श्रीकृष्णदेवराय स्वयं भी कवि थे और उन्होंने 'आमुक्तमाल्यदा' नामक
एक प्रौढ काव्य की रचना की थी। उनके दरबार में आठ महाकवि थे, जो 'अष्टदिग्गज'
के नाम से प्रख्यात थे। इस युग में कई प्रबंध-काव्यो की रचना हुई । तेलुगु में प्रबंध-
काव्य की एक विलक्षण परिभाषा प्रचलित है । किसी पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा
काल्पनिक प्रेमाख्यान को आश्रित कर आवश्यकता तथा औचित्य की दृष्टि से उसे घटा-बढ़ाकर
अपनी प्रतिभा एवं कला-कौशल के अनुसार तेलुगु की मुहावरेदार भाषा में, तेलुगु-जन-
जीवन को प्रतिबिंबित करते हुए जिस कला-कृति का निर्माण कवि करता है, उसे प्रबंध-
काव्य कहते हैं। ऐसे प्रबंध-काव्यो में अल्लसानि पेद्दना का 'मनुचरित्र', तिम्पना का
'पारिजातापहरण' तथा रामराजभूषण का 'वसुचरित्र' अत्यत प्रसिद्ध है । धूर्जटि कवि का
'कालहस्तीश्वरशतक' और तेनालि रामकृष्ण का 'पांडुरंगमाहात्म्यम्' इस युग के भक्ति-परक
महाकाव्य है। इस युग के उत्तरार्द्ध में पिंगलि सूरना ने 'फलापूर्णोदयमु' नामक एक मौलिक
प्रबंधन्काव्य की रचना की, जो वस्तु, भाव एवं कला की दृष्टि से बेजोड है। उन्होने
'राघवपांडवीयम्' नामक एक द्वयर्थी काव्य लिखा, जो अपने ढंग का प्रथम काव्य है।
इसको अपना आदर्श मानकर आगे कई कवियो ने तीन-तीन, चार-चार अर्थवाले
काव्योकी रचना की।
दक्षिणांध्र-युग-विजयनगर-साम्राज्य के पतन के पश्चात् आन्ध्र-साम्राज्य दक्षिण
म तंजाऊर और मदुरै में प्रस्फुटित हुआ । वहां के प्रायः राजा स्वय विद्वान् होते थे
और विद्वानो तथा कवियो का बहुत आदर करते थे। उनका आश्रय प्राप्त करके कई तेलुगु-
कवि तेलुगु-साहित्य-मंदिर को अपनी सरस कृतियो से सजाने लगे। इस युग की कविता
भी प्रबंध-शैली को ही अपनाकर चली, किन्तु समय के साथ-साथ उसकी भाव-प्रवणता
में शिथिलता आती गई । भाव-सौंदर्य की अपेक्षा पांडित्य-प्रदर्शन एवं आश्रयदाता
की अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा को ही कवि अधिक महत्त्व देने लगे । फिर भी, इस
युग में कई सुंदर काव्यो की रचना हुई, जिनमें ककटि पापराजू-कृत 'उत्तर-
रामायण', चेमकूरि वेंकट कवि-कृत 'विजयविलासम्', कवयित्री मोल्ला द्वारा विरचित
'रामायण' तथा कवयित्री मुद्ददु पलनी कृत 'राधिका स्वातनमु' आदि अत्यत
प्रसिद्ध हैं ।
आधुनिक काल के साहित्य का परिचय देने के पहले तेलुगु-साहित्य की एक
और प्रवृत्ति का उल्लेख कर देना आवश्यक है । तेलुगु की प्रबंध-काव्य-धारा के साथ ही
'मुक्तक-काव्य-धारा का भी विकास समानांतर में होता रहा । मुक्तक-साहित्य के
अतर्गत शतक, गीत, सकीर्त्तन तथा यक्षगान आदि आते हैं । तेलुगु में लगभग एक
हजार शतक हैं, जिनमें बहुत-से प्रकाशित हो चुके हैं। तेलुगु-साहित्य में इन शतको का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । इनमें बहुत-से शतक भक्तिपरक हैं, कुछ नीति-बोधक हैं और
कुछ शृङ्गार-रस से भरे हैं। इनकी कविता उच्चकोटि की है। इसके अलावा समय-समय
पर भक्तो के द्वारा रचे हुए पद तथा संकीर्त्तन साहित्य तथा संगीत की दृष्टि से अद्वितीय हैं ।
अन्नमय्या, त्यागय्या और क्षेत्रय्या, ये तेलुगु के तीन भक्त-कवि हैं, जिन्होने भक्ति के उन्मेष में