रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० )
कितने ही मधुर गीतो का गान किया है। त्यागय्या (त्यागराज) तमिलनाड के तिरुवाड़ी
नामक स्थान में हुए थे । उनके कीर्त्तन सारे दक्षिण में गाये जाते हैं।
आधुनिक युग--आधुनिक युग में तेलुगु-गद्य की अच्छी उन्नति हुई। गद्य की
विभिन्न प्रवृत्तियो को प्रारभ करके गद्य का विकास करने का श्रेय स्व० श्रीवीरेशलिंगम्
पंतुलु को है । उन्होंने स्वयं कितने ही निबंध, नाटक, प्रहसन तथा उपन्यास आदि लिखे और
दूसरे लेखको को लिखने की प्रेरणा दी। आधुनिक तेलुगु-साहित्य में उनका वही स्थान है, जो
हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। इस युग के प्रारम्भ में कई ऐसी संस्थाओ की स्थापना हुई,
जो गद्य-साहित्य के निर्माताओ को प्रोत्साहन देती थीं। चिलकमर्त्ति लक्ष्मीनरसिंहम्, पानुगंटि
नरसिंहराव, गुरजाड़ अप्पाराव उन प्रारंभिक लेखको में से हैं, जिन्होंने गद्य-साहित्य के निर्माण
में अथक परिश्रम किया था । इसी समय व्यावहारिक भाषा को साहित्य-रचना के लिए प्रयोग
करने के प्रश्न पर जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ। कई युवा-लेखको तथा पत्र-पत्रिकाओ ने
इस आंदोलन का समर्थन किया । इस आंदोलन के फलस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में गद्य-लेखक
निकल आये, जो आजतक गद्य-साहित्य की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं ।
कविता के क्षेत्र में भी तेलुगु-साहित्य भारत की अन्यान्य भाषाओ की साहित्यिक
प्रगति के साथ कदम-ब-कदम आगे बढ़ रहा है। अँगरेजी साहित्य का अध्ययन, स्वतंत्रता-
आंदोलन, वर्त्तमान जीवन का संघर्ष और व्यक्ति-स्वातंत्र्यवाद ने इस युग के कवियो को एक
नई दृष्टि प्रदान की तथा उसका प्रभाव उनकी कविताओ में लक्षित होने लगा । छाया-
वाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की जैसी कविताएँ हिन्दी-साहित्य में पाई
जाती है, वैसी रचनाएँ तेलुगु में भी है। भेद इतना ही है कि तेलुगु में उनके नाम भिन्न-
भिन्न हैं--जैसे भाव-कविता, अतिवास्तविक कविता, अभ्युदय-कविता आदि। वर्त्तमान समाज में
पाई जानेवाली आर्थिक असमानता, संघर्षमय जीवन, प्राचीन रूढियो तथा परंपराओं के प्रति
विद्रोह तथा समस्त मानव-जाति के कल्याण का आग्रह आज की कविताओ में दिखाई पड़ते हैं।
[ २ ]
रामायण, महाभारत एवं भागवतपुराण भारत की सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित
रखनेवाले महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं । वस्तुतः,
आसेतुहिमाचल इन अलौकिक महापुरुषो की पूजा होती है और प्रत्येक भारतीय भाषा
के कवि इनके जीवन-वृत्तो का गान करने में ही अपने कवि-कर्म की सफलता मानते आये हैं।
रामायण की कथा नित्य नवीन है । हम अपनी बाल्यावस्था से ही न जाने
कितनी वार और कितने लोगो के द्वारा इस कथा को सुनते तथा स्वयं पढ़ते रहे हैं,
फिर भी जब-जब इसे सुनने या पढ़ने का अवसर मिलता है, तब-तब हम में नवोत्साह
जागरित हो उठता है । यही इस कथा की महत्ता है । वाल्मीकि-रामायण में चतुरानन के
मुंह से निकले हुए निम्नलिखित शब्द अक्षरशः सत्य प्रमाणित होते हैं -
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ।
तावत् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥