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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

श्रीरामचन्द्राय नमः।
रामरामेतिरामेति रमेराभेमनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनामवरानने ॥

भूमिका ।
जैसे कि, हिन्दी रसिक हरिभक्तिपरायण सुजन जन रामा-
यणादि रामचरित्र पढ़कर अपार आनंद भोगते हैं वैसेही यह
रामचन्द्रिकाभी हरिचरित्रका अपार समुद्र लहरारहा है इसकी
एकही लहर लेनेसे आनंदही नहीं बरन् भुक्ति और मुक्तिभी
मिलती है, रामचरणमें अनुराग बढ़कर पुरुष अतुल कीर्तिका
भागी होता है यद्यपि केशवदासकी कविता बहुत कठिन और
ललित है ( जैसे कि-देनो न चाहै विदाई नरेश तो पूछत
केशवकी कविताई ) तथापि इसकी टीका ऐसी मनोविलास
बुद्धिप्रकाश लोक रंजनार्थ परम उत्कृष्ट हुई है कि, बारहखडी
जाननेवालाभी उत्तम रीतिसे पठनका फल प्राप्त कर सकताहै
इसमें रामचन्द्रजीका अपूर्व चरित्र सर्वत्र यथाक्रम वर्णितहै
इसके सिवाय काव्यनिरूपणभी ऐसा उत्तमहै कि, लोक देख-
नेसेही सन्तुष्ट होंगे अधिक प्रशंसा व्यर्थ है. आशा है कि,
सूर्य्यकी किरणों सहश इसकी प्रतियेंभी सारे संसारमें गुण-
ग्राहकोंके पास शीघ्र फैल जायँगी और वे अपने विशालने-
त्रोंसे इसका अवलोकन पठन स्वाद सदासर्वदा हृदयकम-
लमें धारण करेंगे.
आपका कृपापात्र-
खेमराज श्रीकृष्णदास,

॥ श्रीः ॥
अथ रामचन्द्रिका-सटीककी-
विषयानुक्रमणिका।
सं. प्र. विषय. पृष्ठांक.
१ यहि पहिले परकाशमें, मङ्गल चरण विशेषि।
ग्रन्थारम्भरु आदिकी, कथा लहहिं बुध लेखि ॥ १-२०
२ या द्वितीय परकाशमें, मुनिआगमन प्रकाश।
राजासों रचना वचन, राघव चलन विलास ॥ २१-२६
३ कथा तृतीय प्रकाशमें, वन वर्णन शुभ जानि।
रक्षण यज्ञ मुनीशको, श्रवण स्वयंवर मानि ॥ २७-३४
४ कथा चतुर्थ प्रकाशमें, बाणासुर सम्बाद।
रावणसों अरु धनुषसों, दशमुख बाण विषाद् ॥ ३५-४०
५ यह प्रकाश पञ्चम कथा, राम गवन मिथिलादि।
उद्धारण गौतम धरनि, स्तुति अरुणोदय आदि ४१-५३
६ छठै प्रकाश कथा रुचिर, दशरथ आगमजानि।
लगनोत्सव श्रीरामको, व्याह विधान बखानि ॥ ५३-६७
७ या प्रकाश सप्तम कथा, परशुराम सम्वाद।
रघुवरसों अरु रोष त्यहि, भञ्जन मान विषाद् ॥ ६७-८०
८ यह प्रकाश अष्टम कथा, अवध प्रवेश बखानि।
सीतावरण्यो दशरथहि, और बन्धुजन मानि ॥ ८०-८४
९ यह प्रकाश नवमें कथा, राम गमन वनजानि।
जनक नन्दिनीको सुकृत, वर्णन रूप बखानि ॥ ८४-९५
१० यह प्रकाश दशमें कथा, आवन भरत सुनाम।
राज मरण अरु तासुको, बसिबो नन्दीग्राम ॥ ९५-१०२
११ एकादशे प्रकाशमें, पञ्चवटीको वास।
शूर्पणखाके रूपको, रघुपति करि हैं नाश ॥ १०२-१११
१२ या द्वादश प्रकाश खर दूषण त्रिशिरा नाश।

अनुक्रमणिका । ( ३ )
सं. प्र. विषय. पृष्ठांक.
१३ या तेरहें प्रकाशमें, बालिवध्यो कपिराज ।
वर्णन वर्षा शरदको, उदधि उल्लङ्घनसाज ॥ १२४-१४४
१४ या चौदहें प्रकाशमें, हैहै लङ्कादाह ।
सागरतीर मिलान पुनि, करिहैं रघुकुलनाह ॥ १४४-१५३
१५ यह प्रकाश दश पश्चमें दशशिर करै विचार ।
मिलन विभीषण सेतु रचि, रघुपति जैहैं पार ॥ १५४-१६३
१६ यह वर्णनहै षोडशै, केशवदास प्रकाश ।
रावण अंगदसों विविध, शोभित वचन विलास ॥ १६३-१७३
१७ या सत्रहें प्रकाशमें, लङ्काको अवरोध ।
शत्रु चमू वर्णन समर, लक्ष्मणको परवोध ॥ १७३-१८२
१८ अष्टादशे प्रकाशमें, केशवदास कराल ।
कुम्भकर्णको वर्णियो, मेघनादको काल ॥ १८२-१९०
१९ या उन्नीस प्रकाशमें, रावण दुःख निधान ।
जूझैगो मकराक्ष पुनि, हैहै दूत विधान ॥ १९०-२०२
२० या बीसएँ प्रकाशमें, सीता मिलन विशेषि ।
ब्रह्मादिक अस्तुति गमन, अवध पुरीको लेषि ॥ २०२-२१४
२१ एकईसयें प्रकाशमें, कह ऋषिदान विधान ।
भरत मिलनकपिगुणनको, श्रीमुख आप बखानि ॥ २१४-२२४
२२ या बाइसें प्रकाशमें, अवधपुरिहि प्रवेश ।
पुरवासिन मातानिसों, मिलिबो रामनरेश ॥ २२४-२२८
२३ या तेइसयें प्रकाशमें, ऋषिजन आगमलेषि ।
राज्यश्री निन्दा कही, श्रीमुख राम विशेषि ॥ २२८-२३६
२४ चौबीसयें प्रकाशमें, रामविरक्ति बखान ।
विश्वामित्र वशिष्ठसों, बोधकही शुभआनि ॥ २३६-२४८
२५ कथापचीस प्रकाशमें, ऋषिवशिष्ठ सुखपाय ।
जीव उधारन रीति सब, रामहि कहो सुनाय ॥ २४८-२५६
२६ कथा छब्बीस प्रकाशमें, कह्यो वशिष्ठ विवेक ।

४) अनुक्रमणिका ।
सं. प्र. विषय. पृष्ठांक.
२७ सत्ताइसें प्रकाशमें, रामचन्द्र सुखसार ।
ब्रह्मादिक अस्तुति विविध, निजमतिके अनुसार ॥ २६१-२६६
२८ अट्ठाइसें प्रकाशमें, वर्णन बहुविधि जानि ।
श्रीरघुवरके राजको, सुरनरको सुखदानि ॥ २६७-२७०
२९ उनतीसएँ प्रकाशमें, वर्णण कह्यो चौगान ।
अवधि दीप शुककी विनति, राजलोक गुणगान ॥ २७१-२७९
३० या तीसएँ प्रकाशमें, बरण्यो बहुविधि जानि ।
रङ्गमहल संगीत अरु, रामशयन सुखदानि ॥ २८०-२९३
३१ इकतीसएँ प्रकाशमें, रघुवर बाग पयान ।
शुकमुखसिय दासीनको, वर्णन विविध विधान ॥ २९४-३०२
३२ बत्तीसएँ प्रकाशमें, उपवन वर्णन जानि ।
अरु बहुविधि जलकेलिको, करहु राम सुखदानि ॥ ३०२-३१०
३३ त्रयतीसएँ प्रकाशमें, ब्रह्माविनय बखानि ।
शम्बुक वध सिय त्याग अरु, कुश लव जन्मसो जानि ॥ ३१०-३१७
३४ आयो श्वान फिरचादिको, चौंतीसयें प्रकाश ।
अरुसनाढ्य द्विज आगमन, लवणासुरको नाश ॥ ३१७-३२५
३५ पैंतीसयें प्रकाशमें, अश्वमेध किय राम ।
मोहन लव शत्रुघ्नको, ह्वै है संगर धाम ॥ ३२५-३३०
३६ छत्तीसयें प्रकाशमें, लक्ष्मण मोह न जानि ।
आयसु लहि श्रीरामको, आगम भरत बखानि ॥ ३३०-३३५
३७ सैंतीसयें प्रकाशमें, लवकटुबैन बखानि ।
मोहन बहुरि भरतको, लागै मोहन बाण ॥ ३३५-३३८
३८ अडतीसयें प्रकाशमें, अङ्गदयुद्ध बखान ।
व्याज सैन रघुनाथको, कुशलव आश्रम जान ॥ ३३९-३४२
३९ नवंतीसयें प्रकाश सिय, राम संयोग निहारि ।
यज्ञ पूरि सब सुतनको, दीन्हों राज विचारि ॥ ३४२-३४८

श्रीगणेशाय नमः ।
कवि केशवदासकृत-
रामचन्द्रिका-सटीक ।
जानकीप्रसाद टीकाकारकृत मंगलाचरण ।
कवित्त ॥ कुंडलित शुंडगण्ड गुंजत मलिंद झुंड वंदन विराजै मुंड अद्भुत
गतिको । बालशशि भाल तीनि लोचन विशाल राजैं फणिगणमाल शुभ सदनै
सुमतिको ॥ ध्यावत विनाही श्रम लावत न बार नर पावत अपार मोदभार धन
पतिको । पाप गण मंदनकों विघ्न निकंदनकों आठों यामँ वंदन करत गण-
पतिको ॥ १ ॥ सवैया ॥ जिनको अवलोकतहां मन रंजन कंजनैंकी रुचि दूरि
बहैये । मधुपालिन मालिनकी द्युतिशालिन आलिन दासनके मन ठैये । निधि-
सिद्धि अशेषके धाम सदा सुख पूरन पूरन पुण्यन पैये । पगवंदनकै गिरिजा-
पतिके रघुनन्दन रामकि कीरति गैये ॥ २ ॥ कवित्त ॥ तीन्योंरूप तेरेई प्रभाव-
नि त्रिदेव उतपति प्रतिपाल प्रलै निजमति कीजिये । नारद गणेश व्यास
वाल्मीकि शेषआदि तव कृत पूरो लांक लोक यश लीजिये । सागर अपार हौं
चहत पैरि पार जायो जग उपहासके प्रकाश भयभीजिये । शारदा भवानी कहौं
जोरि युगपानी जन जानकीप्रसाद पै कृपाकि कोर दीजिये ॥ ३ ॥ दोहा ॥
उत वर्णन रघुवर सुयश, इत ममप्रण प्रतिपाल ॥ ताते पवनकुमारको, करौं
भरोस विशाल ॥ ४ ॥ बारबार वंदन करौं, गुरुचरणन सुखपाइ ॥ निजशिक्षा
अंजनहृदय, दियो अदृष्टै दिखाइ ॥ ५ ॥ कवित्त ॥ दामिनीसी दमकति पीतपट
भाँति हीरहार बक पाँतिको प्रकाश धरियतुहै । जुगुनूसे भूषण जवाहिर जगत
सुनि शब्दमयूरहु साधुमोद भरियतु है । जानकीप्रसाद जग हरित करन मीठे
बैनरस वैरीज्यों जवासे जरियतु है । राजसभा विपद् विराजैं छविधाम नित राम-
घनश्यामको प्रणाम करियतुहै ॥ ६ ॥ षट्पद-परम प्रीति सिय जासमंगढा-

(२) रामचंद्रिका-सटीक ।

मिनि समसोहै। शीश मुकुट बहुरंग अंगसुर धनुछबि रोहै। क्रोधनिहँसनिसुबैन
बारि जगहित बरसावहिं। निरखि संतजन मोर जोर जय शोर मचावहिं। मन
चतुरकिसान विचारिकरि नहिं उपाय देख्योबियो ॥ घनश्याम राम उरआनि-
करि स्वमतिशालि सिंचन कियो ॥ ७ ॥ दोहा ॥ तापरिपाकअघायमन, चंचल-
तानिबिहाइ। रामचंद्रिकाको तिलक, लाग्योकरन बनाइ ॥ ८ ॥ कठिनाई
तम ग्रंथगृह, थलथल विविध विहारु ॥ तिलक दीप बिनु अबुधक्यों, लखै
पदारथ चारु ॥ ९ ॥ तासों सुमति विचारि चित, कीन्हेँ तिलक अपार ॥ देखि
रीति तिनकी करचौं, हौं निजमति अनुसार ॥ १० ॥ घनाक्षरी कबित्त ॥
मेदिनी अमर अभिधान चिंतामणि गनि हारावली आदिको समत उर धारिकै।
वाल्मीकि आदि कविताकी मतिभीनो दीनो ज्योतिष प्रमाणकहूँ जुगुति निहा-
रिकै ॥ ग्रंथगुरुताके भय सकल न लीन्हों कीन्हों अरथ उकुति पद कठिन ठिहा-
रिकै । रामचंद्रजूके चरणनि चित राखि रामचंद्र चंद्रिकाको कीन्हों तिलक
विचारिकै ॥ ११ ॥ चंचलाछंद ॥ नयनसूरजबाजिसिद्धिनिशीश संवतचारु।
शुक्रसंयुक्तशुक्लपक्ष सुरेशपूजितवारु ॥ चारुदिक् तिथि हस्त तार वरिष्ठयोग
नवीन। राम भक्ति प्रकाशिका अवतार तादिनकीन ॥ १२ ॥ सोरठा ॥ राव
णादि मतिहीन, राम सीय प्रति कटुवचन ॥ तहाँ अर्थ मृदु कीन, जानि प्रभाव
सरस्वती ॥ १३ ॥ दोहा ॥ शब्दलग्यो संबंधमें, रह्यो छंदमें शेष ॥ ताहि
मिलायो आनिकै, यों कहुँकथा विशेष ॥ १४ ॥ कहुँ पूरव परकथनको, लखयो
विरोध विचारि ॥ तहाँ निवारणको कियो, निजमतिकी अनुहारि ॥ १५ ॥
जहाँ केर पर्याय पद, अर्थ बोध नहिं होहि ॥ तहाँ तासु इति अंतदै, लिख्यो
दूसरो जोहि ॥ १६ ॥ जहाँ विरोधाभासहै अर्थ विरोध प्रकाश ॥ लिख्यो अर्थ
अविरोधही, तासों सहित हुलास ॥ १७ ॥ कठिन शब्द को अर्थ जहँ, एक-
ठौर नहिं देखि ॥ तहाँ दूसरे ठौर में, जानब लिख्यो विशेषि ॥ १८ ॥
ग्रंथारम्भः।
मू०-बालक मृणालनि ज्यों तोरि डारै सब काल कठिन
कराल त्यों अकाल दीह दुखको । विपति हरत हठि पद्मिनी
के पातसम पंक ज्यों पताल पेलि पठवै कलुषको ॥ दूरिकै
कलंक अंकभवशीश शशिसम राखतहें केशोदास दासके

प्रथमप्रकाशः १. ( ३ )

वपुषको ॥ साँकरे की साँकरन सनमुख होतेही तो दशमुख
मुख जोवै गजमुख मुखको ॥ १ ॥
टी०-बालक पाँच वर्षको हाथीको जैसे मृणाल पौनारांका सब कालमें
तोरि डारत है तैसे गणेश कठिन औ कराल भयानक औ अकाल कहे
असमयको जो दीह कहे बडो पुत्र मरणादि दासनको दुःख है ताको तोरत हैं
औ जैसे बालक पद्मिनी कमलिनीके पातको हरत तोरत है तैसे ये विपत्ति
दरिद्रादिको हरत हैं औ बालक जैसे पग सों दावि पङ्क कहे कीचको
पेलिकै पातालको पठावत है तैसे ये कलुष जे पाप हैं तिनको पठावत हैं
इहां गजराजको त्यागकरि बालक सम यासों कह्यो कि पद्मिनी पत्रादि तोरनमें
बालकको उत्साह रहत है तैसे गणेशजूको विपत्त्यादि विदारणमें बडो उत्साह
रहत है कौतुकही विदारतहैं औ गणेशजू दासनके कलङ्कको अङ्ककहे चिह्नको
दूरि करिकै जैसे भव महादेवके शीशको शशि है कलङ्क रहित ताही विधि
दासनके वपुष शरीरको राखत हैं औ जनके सन्मुख होतेही साँकर राजभयादि
ताकि साँकर बंधन जंजीरन कही नहीं रहति ऐसे जे गजमुख गणेश हैं तिनके
मुखको दशमुख जे ब्रह्मा विष्णु महेश हैं तिनके मुख जोवै कहे निरखत हैं
स्तुति करत हैं अथवा दशमुख जे दशौं दिशा हैं तिनके जे मुख हैं अर्थ यह
दशौं दिशनके प्राणी स्तुति करतहैं ॥ “पञ्चवर्षोगजोवाल-इत्यभिधानाच्चिन्ता-
मणिः” तौ इहाँ स्तुतिसों अभिकांक्षितवस्तुको मांगिवो सूचित भयो तासों
आशीर्वादात्मक मंगल है दूसरो अर्थ जो ग्रंथ कविलोग करत हैं ताकी कथा
प्रथम संक्षेपसों कहतहैं सो युक्तिसों याही मंगलाचरणमें कह्यो है बालक या
पदने श्रीरामचंद्रको जन्मसूचित भयो औ सबको कालरूप जो सुबाहु ताडकादि हैं
तिन्हें मृणालन पौनारिनके समान सहजही तोरि डारत भये मारत भये औ कठिन
औ कराल कहे भयानक ऐसा जो धनुष है औ अकाल कहे कुसमयको जो दीह
बडो दुःख है व्याह कृत उत्सवमें परशुरामकृत दुःख गर्वगति समेत तिनहुँ-
नको त्यों कहे ताही प्रकार ते मृणालन बहुवचन है तासों ताडकादि वध धनुभंग
परशुरामगतिभंग सर्वत्र समता कियो ॥ इति बालकाण्ड कथा ॥ औ राज्य-
त्यागरूप जो विपत्तिहै ताको हठिकै हरत कहे ग्रहण करत भये भरतादिको
कह्यो न मान्यो आप पद्मिनी कमलिनीके पातकहे पुष्पपत्र सम सुकुमार हैं ॥

( ४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

इति अयोध्याकाण्ड कथा ॥ औ पङ्क ज्यों कहे पङ्कके सदृश नीच ऐसा जो
विराध है ताको पेलिकै पातालको पठावत भये वाल्मीकीय रामायणमें लिख्यो है
कि काहूअस्त्रशस्त्रसों न मरै तब रामचंद्रजीवतही गाडि लियो ताही प्रकार
कलुष पापरूप जे खर दूषणादिहैं तिनहुँनको मारचो ॥ इति आरण्यकाण्ड
कथा ॥ औ कुलङ्कको हैं अङ्क चिह्नजाके ऐसा जो बंधुपत्नी भोगी वालि है
ताको दूरि करत मारत भये औ दास जो सुग्रीव है ताको भव महादेवके
शीशके शशिक सम राखत भये जैसे भवशीश शशिको राहुको भय नहीं रहत
तैसे शत्रुभय रहित सुग्रीवको कियो अथवा महादेवके माथेमें द्वितीयाको
चन्द्रमा है यासों या जनायो कि भवसंसारको राज्य पाइ सुग्रीव की और
बढती हैहै ॥ इति किष्किन्धाकाण्ड कथा ॥ तथा याही पदमें सुन्दरौकाण्ड है ॥
केशव जे रामचंद्र हैं तिनके दासजे सुग्रीवहैं तिनके दासजे हनुमान हैं ताके
वपुष शरीरको भवशीश शशिसम राखत भये कि लङ्कामें प्रकाशित करते भये कलङ्क
रूपजे सिंहिका अक्षकुमारादिहैं तिनको दूरि करिकैकहे मारिकै ॥ इति सुन्दरकाण्ड
कथा ॥ औ रामचंद्रके सन्मुख होत ही विभीषणके साँकर कष्टकी जो साँकर
जंजीर रही सो न कहे न रहत भई रामचंद्रके दर्शनहीं सो विभीषणको दुःख
दूरिभयो तब दशमुख जो ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ते बिभीषणको मुख जोवत भये
कि धन्य हैं विभीषण जाको रामचन्द्र अंगीकार करचो औ गजमुखजे गणेश हैं
तिन मुख कहे आदि दै और देवता हैं ते को कहे कहाँ हैं अर्थ यह गणेशादि
देवता तौ जोवतही भये औ साँकर जे यमादिक हैं तिनको साँकर कहे कष्ट
देवैया ऐसा जो रावण है सो रामचंद्रके सन्मुख होतही न रहत भयो गजमुख
जे गणेश हैं तिनको मुख कहे श्रेष्ठ ऐसे जे रामचंद्र हैं तिनके मुखको जोवत
भयो अर्थ यह उनके लोकको प्राप्त भयो अथवा मुख जो वै कहे मुखमें लीन
होत भयो तुलसीकृत रामायणमें लिख्यो है कि “ तासुतेजप्रभुवदनसमाना ।
सुरनरसबनअचम्भौमाना” ॥ इति युद्धकाण्ड कथा ॥ औ साँकर जो रावण
है ताके साँकर जो रामचन्द्र हैं तिन्हें अयोध्याके सन्मुख होत ही
दशमुख जे ब्रह्मा विष्णु महेश हैं ते मुख कहे मुख्य औ गजमुख जे गणेश हैं ते
रामचन्द्रको मुख जोवै कहे स्तुति करतहें अथवा दशमुख कहे दशौंदिशाके मुख
औ गजमुख मुख कहे हाथिनमें मुख्य ते मुख जोवै कहे रामचन्द्रको मुख निहा-
रतहैं ॥ इति उत्तरकाण्ड कथा ॥ कोऊ कहै कि एक पदमें कैयो फेरि अर्थ कियो
सो संक्षेप कथा है तासों दूषण नहीं है याही विधि रामायणादिक तिलककारसे

प्रथमप्रकाशः १. ( ५ )
अर्थ कियो है याहूपर कोऊ हठकरै ताकारण द्वितीय प्रकारसों अर्थ बालक जो है
शिशु सो जैसे बालखेलमें मृणालनको बिनही श्रम तोरिडारे कहे तोरिडारतहै
इहाँ बालक पदमें जातिमें एकवचन है त्यां कहै ताहीविधि कठिन अतिकठोर
औ भयानक ऐसा जो शंभु धनुष है ताको बाल अवस्था में बालखेल सम राम-
चन्द्र तोरचो त्यहीमुख कहे आदिदै ताडकावधादि सीय विवाहादिजे बाल-
कांडकी संपूर्ण कथा हैं तिनको इहाँ मुखपदक्रमकी आदि मों नहीं है श्रेष्ठतामो
है औ अकाल कहे कुसमयको जो दीह दुःख है अर्थ गमराज्याभिषेकमें कैके-
यीको वर मांगिबो राम वनगमन दशरथ मरण भरतको व्रतकरि नंदिग्राममें
बसन या प्रकारको जो अकाल दुःख है त्यहि मुख जे चित्रकूट गमनादि अयो-
ध्याकांड कथा है तिनको औ विराध खर दूषणादि राक्षस्रनको मारिकै ऋषि
लोगनकी विपत्तिको सहजही पद्मिनीके पातसम हरत कहे दूरिकरन पंकरत
पंक जे पापहैं तिनको जैसे पेलिकै पातालको पठवै कहै पैठे देत हैं अर्थ अपने
दासनके जैसे पातक नाश करतहैं ताहीविधि कलुषकहे पापरूप बंधुपत्नी भोगी
जो बालिहै ताको पठायो अर्थ मारचो तिनमुख जे अरण्यकांड औ
किष्किन्धाकाण्डकी कथा हैं तिनको ऋषिनकी विपत्ति हरणादि अरण्यकाण्ड
कथा जानो आदिपदते सीयहरणादि जानो औ वालिवधादि किष्किन्धाकाण्ड
कथा जानो आदि पदते सप्तताल बेधन सुग्रीव राज्याभिषेकादि जानी औक जो
है अग्नि तासां लंकके जे अंककहे ध्वजादि चिह्नहैं तिन्हें दूरिकै कहे विध्वंस
कारिकै जारिकै इति अर्थ हनुमानके करसों लंकाजारिकै दास जो विभीषण है
ताके वपुषको आजु पर्यंत राखतहैं रक्षाकरतहैं अर्थ रावणादिको मारि जो विभी-
षणको लंकाको राज्यदियो तामें आजुलों रक्षा करत हैं तिनमुखकथनको हनु-
मान्‌के करसों लंकादाहादि सुन्दरकाण्डकी कथा जानो औ रावणादिको बध-
करि बिभीषणको राज्यदानादि लंकाकाण्ड कथाजानौ औ भरतको जो साँकर
कहे नाँदिग्राममें यतीवेष बसिबे को कष्ट है ताहीकी जो साँकर कहे बंधन जंजीर
है ताको जो नशन कहे नाश करिबोहै अर्थ रामचन्द्र आइकै भरत यतीवेषको
क्लेश दूरि करचो है तेहिमुखकस है आदिदै औज कहे यज्ञ मुख कहे आदिदै
अर्थ अश्वमेधादि जे मुख कहे मुख्य कथा हैं तिनको योग कहे गीत है अर्थ
कथन है ताको जे जोवै कहे देखत हैं. अर्थ इन कथनसों युक्त रामचंद्रिकाको जे
पढतहैं तेही कहे निश्चय करिकै दशमुख मुख होत हैं अर्थ वक्तृत्व करिकै दशमुखके

( ६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

सदृश जिनका एक मुख होतहै अर्थ बडे वक्ता होतहैं “मयूरेंगौचपुंसिस्यात्सुख-
शीर्षजलेषुकम्” इति मेदिनी ॥ “गंगीर्तगातुगीताचगौश्वधेनुःसरस्वतीत्येका-
क्षरी यजनेयः समाख्यातः” इत्येकाक्षरी ॥ १ ॥
मू०-बानी जगरानीकी उदारताबखानी जाइ ऐसीमति
कहौधौं उदार कौनकी भई । देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषि
राज तपवृद्ध कहिकहि हारेसब कहिन कहूँलई ॥ भावी भूत
वर्त्तमान जगत बखानतहै केशोदास केहूं न बखानी काहूपै
गई ॥ वर्णैपति चारिमुख पूतवर्णै पाँच मुख नाती बर्णै षट
मुख तदपि नईनई ॥ २ ॥
टीका-जगरानी कहं जगमें श्रेष्ठ ऐसी जेवाणी सरस्वती हैं तिनकी उदारता
बडाई जासों बखानी जाइ कहौ ऐसी मति बुद्धि उदारबडी कौने प्राणी की
भई है अर्थ काहूकी नहीं भई देवता बृहस्पति आदि औ प्रसिद्ध जे सिद्ध देव-
योनि विशेष हैं अथवा भृगु आदि ऋषिराज वाल्मीकादि अथवा सिद्ध जे ऋषि-
राज हैं तप वृद्ध लोमश मार्कण्डेय आदि जाकी उदारताको कहि कहि कहे वर्णि
वर्णिकै सब हारे हैं कहिकै सब उदारता काहू न लई कहे न पायी अर्थ उदार-
ताको अन्त न पायो हारे यासों कह्यो कि अब नहीं बखानत औ भावी कहे जे
हैंहैं औ भूत जे हैगये वर्तमान जेहैं जगत् कहे जगत्के प्राणी ते बखानत हैं सो
केशवदास कहते हैं कि केहूं कहे काहू प्रकार सों काहू प्राणीसों उदारता न बखानी
गई औ पति जे ब्रह्मा हैं ते चारि मुखसों औ पूत महादेव पांचमुखसों नाती
स्वामिकार्त्तिक षण्मुख सों वर्णतहैं ताहू पर नई नई कहे नवीन नवीन रहति है अर्थ
यह कि यहि प्रकार मुख वृद्धि सों वर्णत हैं परंतु इनको वर्णन जाकी उदारताको
छुइ नहीं सकत अथवा ज्यहिवाणीके पति चारिमुख औ पूतके पांच मुख
नातीको षण्मुख वर्णन करत हैं यासों या जनायो किचारिमुख सों संपूर्ण जगत
उत्पत्तिके कर्त्ता पंचमुखसों नाशकर्त्ता षण्मुखसों देवतनके रक्षक ऐसे पति
पुत्र नाती हैं जाके यासों बडी बडाई जनायो औ ताहूपर नवीन नवीन होति
जातिहै २ और अर्थ जामतिसो वाणी जो सरस्वती है तासों जगरानी सीता जू की
उदारता बखानी जाइ ऐसी मति वाणीकी कौनकी कीन्हीं भई है अर्थ कौने

प्रथमप्रकाशः १. ( ७ )
ऐसी मति वाणीको दीन्हीं औजवाणी के पति पुत्रादि चतुरादि मुखसों वर्णत हैं
और अर्थ एकही है अथवा सरस्वती की उक्ति है कि वाणी जो मैंहों तासों
जगरानी सीताजूकी उदारता बखानी जाइ कहे जाति हैं कोहसों अर्थ यह कि
मोसों नहीं बखानी जाती काहे ते कि ऐसी कौनकी उदारमति भई है कि जो
बखाने काहेते कि देवतादि औ मेरे पति पुत्रादि सब बखानत हैं ताहू पर नई नई
रहति है ऐसी सरस्वती को अथवा सीताजूको नमस्कार करत हौं इति शेषः यामें
नमस्कारात्मक मंगल है ॥ २ ॥
मू०-अन्यच्च ॥ पूरण पुराण अरु पुरुष पुराण परिपूरण
बतावैं न बतावैं और उक्तिको ॥ दरशन देत जिन्हें दरशन
समुझै न नेति नेति कहै वेद छाँडि भेद युक्तिको ॥ योनि
यह केशोदास अनुदिन राम राम रटत रहत न डरत पुन-
रुक्तिको । रूप देहि अणिमाहि गुणदेहि गरिमाहि भक्तिदेहि
महिमाहि नाम देहि मुक्तिको ॥ ३ ॥
टी०-जिन रामचंद्र को पूर्णकहे संपूर्ण अठारहौं पुराण अथवा पूरण कहे जे
कछु वस्तु चाहत नहीं शुकादि पुराण स्कंदादि औ पुरुषपुराण लोमश मार्कं-
डेय आदि ते परिपूर्ण कहे सर्वत्र व्याप्त बतावत हैं और उक्ति कहै कथाको
नहीं बतावत अर्थ कि और तर्क नहीं करत श्रीरामचंद्रजी जाकोदर्शन देतहैं
ताको फेरि दर्शनकी समझ ज्ञान नहीं रहति अर्थ जाको रामचंद्र को दर्शन
होतहै सो तिनमें लीन ह्वै जात हैं सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होतहै अथवा और
दर्शन स्त्री पुत्रादिकी समझ नहीं रहति अर्थ संसार को बंधन मोह छूटिजात है
रामरूपही ध्यानमें निरखत हैं औ वेद जिनको अनेक भेदसों गान करि नेति नेति
कहे ना इति ना इति कहे याही प्रकारको है सो न कहे नहीं हम जानत या प्रकार
सबभेदकी युक्तिको छोडि कहत है अर्थ यह कि जिनको प्रमाण वेदऊ नहीं
जानत रूप जो रामचंद्र को है सो अणिमा सिद्धिको देतहै औ गुण जेहैं ते
गरिमा सिद्धिको देतहैं औ मुक्तिमहिमा सिद्धिको देतिहै औ नाम मुक्तिको
देतहै यह जानिकै काव्यरीतिमें एकई वस्तु को द्वै बारकहौं तौ पुनरुक्ति दूषण
होतहै ताको भय छोडिकै मुक्ति की इच्छा करि अनुदिन रोज रोज राम

( ८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

नामको रतनहौं ॥ “अर्थी दोषं नपश्यतीतिप्रमाणात्” ॥ और अर्थ रामनामको
पुराणादि परिपूर्ण कहे भुक्ति मुक्त्यादि सब वस्तुसों पूरित अथवा सर्वत्र व्याप्त
बखानत हैं सर्वत्र रहत हैं जहां चाहिये तहाँ लीजिये सब स्थानमें मिलत हैं औ जिन-
नको दर्शन कहे षट्शास्त्र तिनकी समझ नहीं है तिनको रामचंद्र दर्शन देतहैं अति मूर्ख
वाल्मीकादि नामहीके जपसों रामचन्द्रको दर्शन पायो अथवा दर्शन ज्ञान देतहैं
नेति नेति कहे नाइति नाइति कि संपूर्णार्थ इनहीं से कहे की वाल्मीकि से हीन
गणिका यमनादि अनेकन पतितनको राम नामै सिद्धताको प्राप्त कीन्है जाति
कुल विद्याके भेदकी युक्तिको छाँडिकै कछु जाति कुल विद्या परनहीं है जोई
नामोच्चारण करै सोई सिद्धहोइ या प्रकार वेदकहतहैं अथवा प्रथमहीं को अर्थ
जानो जा नामके माहात्म्यको वेद नहीं जानत फेरि नाम कैसोहै रूपसौंदर्य औ
अणिमासिद्धि औ अनेक गुण औ गरिमा सिद्धि औ महिमा सिद्धि औ नाम
कहे यश औ मुक्ति को देतहै तौ सौन्दर्य्यादि जे दृष्टफल हैं ते जहाँ देखिये तहाँ
राम नामहीके प्रभाव सों जानियों औ मुक्ति अदृष्ट फल है ताके अर्थ अंत्य
अवस्था में सब राम नाम कहावतहै यह सनातन रीति चली आवतिहै तासों जानि
यतहै कि मुक्तिका दाता रामनाम छोडि दूसरो नहीं है अथवा रूप जो है वेष
तामें अणिमादि सिद्धि देतहैं जैसा सूक्ष्म रूप चाहै तैसो धरै औ गुणन में गरिमा
सिद्धि देतहैं राम नामके जप प्रभावते सबगुण विद्यादि गरू होतहैं औ भक्तिमें
महिमा सिद्धि बडाई देतहै जो रामनाम जपतहै सो बडो भक्त कहावत है औ
नाममें मुक्तिको देत है अर्थ राम भक्तन प्राणिन की मुक्ति जीवन में सब नाम
गणतहैं अथवा नाम यश औ मुक्तिको देतहै सो यह कहे ऐसो प्रभाव जानिकै
केशवदास जो है सो पुनरुक्ति भय छाँडिकै अनुदिन रामनामको रटत है या
ग्रंथमें रामनाम वस्तु है ताका निर्देश कथनमात्र है तासों वस्तु निर्देशात्मक
मंगलहै ॥ ३ ॥
मू०-सुगीतछंद ॥ सनाढ्य जाति गुनाढ्य हैं जग सिद्ध
शुद्धस्वभाव। कृष्णदत्त प्रसिद्ध हैं महिमिश्र पंडितराव ॥ गणे-
शसो सुत पाइयो बुधकाशिनाथअगाध। अशेषशास्त्र विचा-
रिकै जिनजानियो मतसाध ॥ ४ ॥ दोहा ॥ उपज्यो त्यहि
कुल मंदमति, शठकवि केशवदास ॥ रामचन्द्रकी चन्द्रिका,

प्रथमप्रकाशः १. ( ९ )
भाषाकरी प्रकाश ॥५॥ सोरहसै अठ्ठावन, कार्तिकशुदि बुध
वार ॥ रामचन्द्रकी चन्द्रिका, तब लीन्हों अवतार ॥६॥ बाल
मीकि मुनि स्वप्नमें, दीन्हों दरशन चारु ॥ केशव तिनसों यों
कह्यो, क्यों पाऊं सुखसारु ॥७॥ मुनिश्रीछंद सिद्धिऋद्धिः॥८॥
सारछंद ॥ रामनाम सत्यधाम ॥९॥ और नामकोन काम १०॥
टीका-गुणाढ्यगुणन सों पूरित औ साधु मत उत्तम मत छंद उपजाति है जा
छंदमें और और द्वै आदि छंदके चरण होइ सो छंद उपजाति कहावति है ॥४॥
॥५॥ जो मैं तिथि नहीं कह्यों सो वार पढ़ते सात वार हैं तासों सप्तमी तिथि सब
कहतेहैं परंतु ज्योतिषके ग्रंथ ग्रहलाघवादिके मतसों कल्पांत अहर्गण किये बुधवार
पंचमी और द्वादशी को आवत है सो द्वादशी भद्रा तिथी है और बुधे भद्रा
सिद्धियोग होतहै और कार्तिक शुदी एकादशीको विष्णु जागतेहैं विष्णुके जागे-
के उपरांत ग्रंथारम्भ करचो तौ चैत्रादि

(१०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टीका-केशव पूँछयो कि लोभ मोहादि कृत जो दुःख हैं सो कैसे तरिहैं
तब मुनि कह्यो कि, जब तू रामनाम ग्रहण करिहै तब रामचन्द्र हरि हैं छोडाइ हैं
इहां हरिशब्द यासों कह्यो कि 'हरतिदुःखमिति' हरिः अर्थ दुःख हरिवो उनके
नामहींको अर्थ है ॥ ११ ॥ दुःख छोडाई रामचंद्र मुक्ति देहिं या निश्चय के अर्थ
रामचंद्रको ईश्वरत्व केशवको मुनि चारिछंदमें देखावत हैं जो जगत्‌को शरण
रक्षक है सो बरण रूप राम रूप अथवा रामनामांक तुम करिकै वर्णिवे है अर्थ
रामचंद्र को रूप अथवा राम नाम वर्णन करो ॥ १२ ॥ सब जग कहत है कि
रघुनन्दन जे रामचन्द्र हैं ते सुखके कंद कहे मूलहैं इनहीं के आश्रित सब सुख
है औ जग वंद्यहै सब जग जिनको वंदना करत है सुखकंद कहि या जनायो कि
सुखसार रामचंद्रही सों पाइ है और देव देवेको समर्थ नहीं हैं ॥ १३ ॥ जिन
रामचंद्रको वेद जो हैं सो एकरूपी कहे जो सदा एकरूप रहतहें ब्रह्मज्योति
जासों गुन्यो कहे ठहरायोहै सो गान करत हैं सो हम वेद वाक्य सों सुन्यो है
अथवा एककहे जिन सम दूसरो नहींहै औ रूपीकहे अनेक रूपसों सर्वत्र व्याप्त हैं
फिरि कैसे हैं जिनको महादेव सदा ध्यावते हैं ॥ १४ ॥ यामें रामचंद्रके गुणन-
को माहात्म्य है अनंत शेष विशेष निर्णय ॥ १५ ॥
मू०-नगस्वरूपिणीछंद ॥ भलोबुरोनतुंगुनै। वृथाकथाकह्रै-
सुनै॥ नरामदेवगाइहै। न देवलोक पाइहै ॥ १६ ॥ षटपद॥
बोलिनबोल्यो बोल दयो फिर ताहि न दीन्हों। मारिनमार्यो-
शत्रुक़ोधमनवृथानकीन्हों ॥ जुरिन मुरे संग्राम लोककीलीक
न लोपी । दान सत्य सन्मान सुयश दिशि विदिशा ओपी॥
मनलोभ मोहमदकामवश भये न केशवदास भणि । सोइ
परब्रह्म श्रीरामहै अवतारी अवतार मणि ॥ १७ ॥ दोहा ॥
मुनिपति यहउपदेशकै, जबहीं भयो अदृष्ट ॥ केशवदास तहीं
करचो, रामचन्द्रजू इष्ट ॥ १८ ॥
टी०-तू अनेक कथा वृथा कह्यो सुनो करत है आपनो भलो बुरो नहीं
गुनतो विचारतो जबलौं जैसो पूर्व कहि आयं ऐसे रामदेव को न गाइ है तबलों
अनेक कथन सों देवलोक न पैहै इहाँ देवलोक वैकुंठ जानो वैकुंठ देवेकी शक्ति

प्रथमप्रकाशः १. (११)
रामचन्द्रही में है और देव नहीं देसकत कहूं न रामलोक पाइ है पाठ है तौ
रामलोक वैकुंठ ॥ १६ ॥ प्रथम ईशत्व वर्णन करचो अब यामें रामचंद्रको
स्वभाव गुण वरण्यो है गमचन्द्रजू जो बोले सो फेरि नहीं बोले अर्थ जो
एक बान कह्यो सोई करचो है फेरि बदलि कै और बातनहीं कह्यो वन गमनादि
बचन ते जानो औ जाकों दान दियो ताको फेरि वही दीन्हों अर्थ एकही बार
ऐसो दियो जामें वाकें फेरि माँगिबेकी इच्छा नहीं रही विभीषणादि को लंका-
दानादि ते जानो और शत्रुको एकही बार ऐसा मारिकै नाश कियो जामें फेरि
नहीं मारिबे पर्यो खरदूषणादि वधते जानो औ संग्राम में जुरिकै नहीं मुरे
खरदूषण रावणादि के युद्धते जानों औ लोक की लीक मर्यादा को लोप नहीं
कियो रावण के बधसों ब्रह्मदोष मानि अश्वमेध करणादि सों जानो औ
दान औ सत्य औ सन्मान के सुयश करिकै दिशा औ विदिशा ओपी हैं अर्थ
जिनको सुयश दिशि विदिशन में छाइ रहा है औ जिनको मन लोभ औ
मोह औ मद औ काम के वश नहीं भयो राज्य त्यागादि सों लोभ विवशजानी
माता पिताको दुःखितहुए देखि वन गमन करणादि सो मोह विवश जानो औ
अगस्त्यादि ऋषिनके यथोचित सत्कार सों मद विवश जानी एक पत्नी व्रतसो
काम विवश जानो जाके ऐसे स्वभाव गुणहैं सोई श्रीराम वाराहादि अवतारन में
मुनिश्रेष्ठ अवतारी कहे अवतारको धरे साक्षात्परब्रह्म है अथवा श्रीराम अवतारी
कहे अनेक अवतारन को धरत हैं औ परब्रह्म हैं ॥ १७ ॥ अदृष्ट अंतर्द्धान इष्ट-
पूज्य देवता ॥ १८ ॥
मू०-गाहाछंद॥ रामचन्द्र पदपद्मं वृन्दारक वंदाभिवृंदनीयं॥
केशवमतिभूतनया लोचनंचंचरीकायते ॥ १९ ॥ चतुष्पदी-
छंद॥ जिनको यशहंसा जगत प्रशंसा मुनिजन मानसरंता ।
लोचन अनुरूपनि श्याम स्वरूपनि अंजन अंजित संता ॥
कालत्रयदर्शी निर्गुणदर्शी होत विलम्ब न लागै । तिनके गुण
कहिहौं सब सुख लहिहौं पाप पुरातन भागै ॥ २० ॥
टी०-वृंदारक जे देवताहैं तिनके वृंदसमूह तिन करिकै अभिवंदनीय अर्थ
जिनको अनेक देवता वन्दना करतहैं ऐसे जे रामचंद्र के पदपद्म पदकमल हैं तिन
प्रति केशवदास की मतिरुपी जो भूतनया सीता हैं ताके लोचन चंचरीकाय ते कहे
चंचरीक भ्रमरके ऐसे आचरण करत हैं अर्थ जब मुनि की आज्ञा सों राम-

( १२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चंद्र को इष्टदेवता करचो तब सीता सम सदा रामनिकट वर्तिनी हमारी मति के
लोचन कमलमें भ्रमर सदृश रामचन्द्र चरण में अनेक कौतुक करने लगे ॥१९॥
मानस मानसर औ मन आय आपने लोचननके अनुरूप कहे योग्य और के
लोचनके योग्य कज्जलादि अंजन है संतन के लोचननके योग्य रामरूपही हैं ऐसे जे
जिन रामचंद्र के अनेक प्रतिबिंब श्यामरूप रूपी अंजन हैं तिनकरि जे
संत अंजित हैं अर्थ रामचंद्र के प्रतिबिंब रूपनको जे संत जन ध्यानमें आनत
हैं अथवा श्याम स्वरूपनि कहे श्यामरूपता रूपी जो अंजन है ता करिकै, जे
संत अंजित हैं तिन संतनको त्रिकालदर्शी और निर्गुण पशीं नेत्रन करि ज्योति
स्पर्श करै या अर्थ ब्रह्मज्योति के दृष्टा होत बेर नहीं लागति जे रामचंद्रको
ध्यान करत हैं ते त्रिकालदर्शी होत हैं औ ब्रह्मज्योति को देखत हैं इति भावार्थः॥
अथवा निर्गुणपर्शी होत कहे निर्गुणज्योति में मिलिजात बेर नहीं लागति
अथवा निर्गुणते पर अन्य विष्णुकी श्रीशोभा होत बेर नहीं लागति पुरातन
पूर्व कृत ॥ २० ॥
मू०-दो०-जागति जाकी ज्योति जग; एकरूपस्वच्छंद ॥
रामचंद्रकी चन्द्रिका, वरणतहों बहुछंद ॥२१॥ रोलाछंद ॥
शुभ सूरजकुल कलशनृपति दशरथ भये भूपति ॥ तिनके
सुतभये चारि चतुर चितचारु चारुमति ॥ रामचन्द्र
भुवचन्द्र भरत भारत भुवभूषण । लक्ष्मण अरु शत्रुघ्न
दीहदानव दलदूषण ॥ २२ ॥ धत्ताछन्द ॥ सरयूसरिता तट
नगर बसै अवध नाम यश धामघर ॥ अघओघ विनाशी
सब पुरवासी अमरलोक मानहुँ नगर ॥ २३ ॥
टी०-ज्योति ब्रह्मज्योति अथवा अंगछवि औ बहु छंद कहे अनेक रंगतौ
जा रामरूपी चन्द्रकी ज्योति तौ एक रूप है ताकी चन्द्रिका अनेक रंगहै वो
आश्चर्य है यह युक्ति है औ अर्थ यह कि बहुत छंद जे दोहाहि हैं तिनसों
युक्त ॥ २१ ॥ सूर्य कुलके कलश जे नृपति अजादि हैं तिनमें दशरथ
भूपति राजा भये भारत भरतखंड ॥ २२ ॥ यश को धाम कहे घर है धरा पृथ्वी
जाकी अयोध्यापुरी के वासी देवतन सरिस अघपापन के ओघ समूहन के विनाशी
हैं तासों देवलोक सम है ॥ २३ ॥

प्रथमप्रकाशः १. ( १३ )

मू०-छप्पै ॥ गाधिराजको पुत्र साधिसब मित्रशत्रुबल ।
दान कृपान विधान वश्य कीन्हों भुवमण्डल ॥ कैमन अपने
हाथ जीति जग इन्द्रियगन अति । तपबल याही देह भये
क्षत्रिय ते ऋषि पति ॥ तेहि पुर प्रसिद्ध केशव सुमति
काल अतीतागतनिगुनि । तहँ अद्भुत गति पगु धारियो
विश्वामित्र पुनि ॥ २४ ॥ प्रज्झटिकाछन्द ॥ पुनि आये
सरयू सरित तीर तहँ देखे उज्ज्वल अमलनीर । नव नि-
रखि निरखि द्युति गति गंभीर । कछु बरनन लागे सुमति
धीर ॥ २५ ॥ अति निपट कुटिल गति यदपि आय ।
वह देत शुद्ध गति छुवत पाय ॥ कछु आपुन अध अध
गति चलन्ति । झलपति तन को ऊरध फलन्ति ॥ २६ ॥
मदमत्त यदपि मातंग संग । अति तदपि पतित पावन
तरंग बहु न्हाइ न्हाइ जेहि जल सनेह ॥ सब जात स्वर्ग
शूकर सुदेह ॥ २७ ॥
टी०-त्रिकाल दरशीत्व ते जेतो कालबीते रामचन्द्रको अवतार होनो रहै
सो कालअतीतकहे बीतो गुनिकै औ जा कालमें रामचन्द्रजू यज्ञरक्षा करनलायक
भये सो काल आगत आयो गुनिकै ॥ २४ ॥ २५ ॥ दुवौछंदन में विरोधा-
भास है आप कहे अपना औ आप कहे जल के छुवतही शुद्धगति मुक्ति देत है
अथवा जाके जलको कहूँ अनतहूँ छुवौ तौ शुद्धगति देतहै ऊरधपदते स्वर्ग
जानौं ॥ २६ ॥ मद मदिरा सों मत्त यद्यपि मातंग चाण्डालनको संग है
विरुद्धार्थः॥“मातंगःश्वपचीहस्तीत्यभिधानचिंतामणिः”॥औ मत्तगज जामें स्नान
करते हैं इत्यविरोधः पतितपावन कहे पतितन को पवित्र कर्ता स्नेह सों ताके
जलमें न्हाइन्हाइकै शूकरपर्यंत बहु प्राणी सुंदर देह को धरि सब स्वर्ग जातेहैं
अथवा सनेह कहे अप्सरादिकनके इति शेषः ॥ स्नेहसहित अर्थ अप्सरादि स्नेह
सहित ताको स्वर्ग लैजाती है अथवा तेहिके जलके स्नेहहूँ सों कहूं होइ सरयू
जलमें स्नेह करै स्वर्ग जाइ कहूं सदेहपात है देह सहित स्वर्ग जाइ अर्थ याही

( १४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
देहमें देवरूप ताको प्राप्त है जातहै जिनको देहत्यागहू को कष्ट नहीं होत इति
भावार्थः अथवा शूकर देह सहित जे जीव हैं ते स्वर्ग जातहै और देहधारी तौ
जातेही हैं ॥ २७ ॥
मू०-नवपदीछंद ॥ जहँ तहँ लसत महामदमत्त । वर
वारन वारन दलदत्त । अंग अंग चरचे अति चंदन । मुंडन
झुरके देखिय वंदन ॥ २८ ॥ दोहा ॥ दीह दीह दिग्गजन
के, केशव मनहुँ कुमार ॥ दीन्हीं राजा दशरथहि, दिगपाल
न उपहार ॥ २९ ॥ अरिल्लछंद ॥ देखि बाग अनुराग उप
जिय । बोलत कलध्वनि कोकिल सजिय ॥ राजति रति-
की सखी सुवेषनि । मनहुँ बहति मनमथ संदेशनि ॥ ३० ॥
टी०-ग्रामबाहर जहाँ तहाँ महावत हाथिनको फेरतहैं तिन का वर्णन है
सुमावोक्ति है अथवा स्थान पर बँधे हैं वारन हाथी तिनके दल चमू को अके
लेई दलि डारत हैं यासों अतिबली जानो अथवा बार कहे बेर नहीं लागति
शत्रुदलको दलि डारत हैं झुरके लगाये चन्दन रोरी ॥२८॥ दिक्पाल इन्द्रादि
उपहार भेंट ॥ २९ ॥ कल अव्यक्त मधुर ॥ ३० ॥
मू०-फूलि फूलि तरु फूल बढ़ावत । मोदत महामोद
उपजावत । उड़त परागन चित्त उठावत । भ्रमर भ्रमत
नहिं जीव भ्रमावत ॥ ३१ ॥ पादाकुलकछंद ॥ शुभ सर
शोभै मुनिमन लोभै । सरसिज फूले अलि रस भूले ॥ जल
चर डोलैं बहुखग बोलैं । बरणि न जाहीं उर अरु झाहीं ॥
॥ ३२ ॥ चतुष्पदीछंद ॥ देखीबनवारी चंचलभारी
तदपि तपोधन मानी । अति तपमय लेखी गृहथितपेखी जगत
दिगंबर जानी ॥ जग यदपि दिगंबरपुष्पवती नर निरखि
निरखि मन मोहै । पुनि पुष्पवती तन अति अति पावनगर्भ
सहित सब सोहै ॥ ३३ ॥

प्रथमप्रकाश: १. ( १५ )

टी०-मोदतकहे सुगंधको पसागत ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ द्वैछंदको अन्वय एक है
बनवारी कहे उपवन औ श्लेषते वनकी वारी कुमारी कुमारीपक्ष विरोध है वाटिका
पक्ष शुद्धार्थ है विरोधाभास अलंकार है चंचल स्वभाव चंचल औ वायु योग-
सां चंचलहै पत्तजाभारी कहे गरूहे देह जाकी और दीर्घवृक्षयुक्त तपोधन
तपस्विनी औ तपस्वी सम शीत घाम तोय दुःख सहनिहैं गृहघर और परिखा-
छार दिवालीति दिगंबर वस्त्र रहित दुवौ पक्ष में पुष्पवती रजो धर्मिणी औ प्रफु-
ल्लित तन अति कहे स्थूलकाय औ बहुत भूमि में विस्तार है जाको अति पावन
पवित्र अति दुवौ पक्ष में गर्व सहित गुर्विनी औ फलगर्भ सहित यासां सदा
फलोत्पत्ति जनायो रति रस सुरत औ प्रीति जग जन लीना अनेक पुरुष भोगिनी
परकीयाइति । औ जगके जनन करिकै युक्त अर्थ अति सुख पाइ जग जन
बैठत हैं जामें प्रवीना दोष रहित औ सर्वोत्तमा नवीनापाठ होइ तौ नवोढा औ
नूतनयनि आपनो पुरुष औ राजा सौंपीपति की औ स्त्री औ राजपत्नी ॥ ३३ ॥
मू०-पुनिगर्भ संयोगी रति रस भोगी जगजनलीन कहावै ।
गुणि जग जललीना नगरप्रवीना अति पतिके चित भावै ।
अति पतिहि रमावै चित्त भ्रमावै सौतिन प्रेम बढ़ावै । अब
योंदिनरातिन अद्भुतभाँतिन कविकुल कीरतिगावै ॥ ३४॥
हाकलिकाछंद ॥ संग लिये ऋषि शिष्यन घने पावक
सेतपतेजनिसने ॥ देखत सरिता उपवनभले । देखन अव-
धिपुरी कहँ चले ॥ ३५॥ मधुभारछंद ॥ ऊंचे अवास ।
बहु ध्वज प्रकाश ॥ शोभा विलास । शोभै अकास ॥ ३६ ॥
आभीरछन्द ॥ अति सुन्दर अति साधु । थिर न रहत पल
आधु । परमतपोमय मानि । दण्ड धारिनी जानि ॥ ३७ ॥
हरिगीत छन्द ॥ शुभद्रोण गिरिगण शिखर ऊपर उदित
औषधिसी गनौ । बहु वायु वश वारिद बहोरहि अरुझि
दामिनि द्युतिमनौ ॥ अति किधौं रुचिर प्रताप पावक