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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 269 में से

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पृष्ठ 7

श्रीगणेशाय नमः ।
कवि केशवदासकृत-
रामचन्द्रिका-सटीक ।
जानकीप्रसाद टीकाकारकृत मंगलाचरण ।
कवित्त ॥ कुंडलित शुंडगण्ड गुंजत मलिंद झुंड वंदन विराजै मुंड अद्भुत
गतिको । बालशशि भाल तीनि लोचन विशाल राजैं फणिगणमाल शुभ सदनै
सुमतिको ॥ ध्यावत विनाही श्रम लावत न बार नर पावत अपार मोदभार धन
पतिको । पाप गण मंदनकों विघ्न निकंदनकों आठों यामँ वंदन करत गण-
पतिको ॥ १ ॥ सवैया ॥ जिनको अवलोकतहां मन रंजन कंजनैंकी रुचि दूरि
बहैये । मधुपालिन मालिनकी द्युतिशालिन आलिन दासनके मन ठैये । निधि-
सिद्धि अशेषके धाम सदा सुख पूरन पूरन पुण्यन पैये । पगवंदनकै गिरिजा-
पतिके रघुनन्दन रामकि कीरति गैये ॥ २ ॥ कवित्त ॥ तीन्योंरूप तेरेई प्रभाव-
नि त्रिदेव उतपति प्रतिपाल प्रलै निजमति कीजिये । नारद गणेश व्यास
वाल्मीकि शेषआदि तव कृत पूरो लांक लोक यश लीजिये । सागर अपार हौं
चहत पैरि पार जायो जग उपहासके प्रकाश भयभीजिये । शारदा भवानी कहौं
जोरि युगपानी जन जानकीप्रसाद पै कृपाकि कोर दीजिये ॥ ३ ॥ दोहा ॥
उत वर्णन रघुवर सुयश, इत ममप्रण प्रतिपाल ॥ ताते पवनकुमारको, करौं
भरोस विशाल ॥ ४ ॥ बारबार वंदन करौं, गुरुचरणन सुखपाइ ॥ निजशिक्षा
अंजनहृदय, दियो अदृष्टै दिखाइ ॥ ५ ॥ कवित्त ॥ दामिनीसी दमकति पीतपट
भाँति हीरहार बक पाँतिको प्रकाश धरियतुहै । जुगुनूसे भूषण जवाहिर जगत
सुनि शब्दमयूरहु साधुमोद भरियतु है । जानकीप्रसाद जग हरित करन मीठे
बैनरस वैरीज्यों जवासे जरियतु है । राजसभा विपद् विराजैं छविधाम नित राम-
घनश्यामको प्रणाम करियतुहै ॥ ६ ॥ षट्पद-परम प्रीति सिय जासमंगढा-