राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. “पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तेऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
( उसे ) सुनकर, आप क्रोध से-'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिताः ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोञ्ज्वल आनन राजा बोले-“वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय,"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह ( नृप ) राजाओं को हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियाँ :
है। मैंने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोकों २४ ( १ ) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चक्कलं-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्म्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियाँ :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि ते' मिलता है। २७ ( १ ) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन१ ( बुद्ध ) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमगापावर्णवजितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति१ ( सागर ) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर ( अन्य द्वीप पर ) आक्रमण करने के लिये क्षण भर ( उसने ) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्ताच्चेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह ( मैं ) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध
में धीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र
प्रयास—।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभून'; 'जिन-
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद
'स्वदीय' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
( १ ) जिन : अनेक लेखको ने जिन और जैन
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरो को विजेता
किंवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरूनी ने १:२४३
में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
१:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
२२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ठ १३६ हैं ।
२९( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
है । नदियो का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पालन किया है ।
पाठभेद :
श्लोक सख्या ३० में 'सैनिक:' का 'सैनिकै:'
तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पाग्ते ते' तथा
'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. "पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तैऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
(उसे) सुनकर, आप क्रोध से -'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिता ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोज्ज्वल आनन राजा बोले-"वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय ।"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय'
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह (नृप) राजाओं की हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियां :
है । मैने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोको २४ (१) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चवक्त-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियां :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि तं' मिलता है। २७ (१) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन' (बुद्ध) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमवापावर्णवर्जितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति' (सागर) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर (अन्य द्वीप पर) आक्रमण करने के लिये क्षण भर (उसने) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्तात्तेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह (मैं) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध किवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरुनी ने १:२४३
में श्रीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र १:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
प्रयास--।' २२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ट १३६ हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभूत'; 'जिन- २९ ( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद है । नदियों का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
'त्वदीय' मिलता है । गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पादटिप्पणियाँ : पालन किया है ।
( १ ) जिन : अनेक लेखकों ने जिन और जैन पाठभेद :
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका श्लोक संख्या ३० में 'सैनिकः' का 'सैनिकैः'
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पान्ते ते' तथा
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरों को विजेता 'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।
४७० राजतरंगिणी
तप्तायःशङ्कुनेयान्तर्व्रणितः स द्रुतं ततः ।
संचारिणाऽऽतपत्रेण सन्ना तां वसुधामगात् ॥ ३२ ॥
३२. तप्त लौह शंकु से अन्तर्विध सदृश (नृप) संचारो आतपत्र¹ (राज-छत्र) के
साथ शीघ्र ही उस भूमि पर गया।
अपश्यदथ केनापि चण्डिकायतनाग्रतः ।
नरं शबरसेनान्या हन्यमानमघोमुखम् ॥ ३३ ॥
३३. वहाँ देखा—चण्डिकायतन¹ के आगे कोई शबर² सेनानी अधोमुख नर को
मार रहा है।
श्लोक संख्या ३२ में 'तः' का 'तस्य'; 'द्रुतं'
का 'श्रुत', तथा 'सन्ना तां' का पाठभेद 'स तत्र';
'सन्नाता' 'सद्भाता' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३२ (१) आतपत्र = छत्र: यहाँ तात्पर्य
श्वेत वरुण छत्र से है। छत्र के सन्दर्भ में एक
पौराणिक कथा मिलती है। किस प्रकार छत्र की
उत्पत्ति हुई थी। देवी रेणुका महर्षि जमदग्नि की
धर्मपत्नी थी। सूर्य ताप से कदाचित् विकल हो
गयी। महर्षि अपनी पत्नी की व्याकुलता देखकर
क्रुद्ध हो गये। सूर्य के वध के हेतु धनुष बाण
उठाया। सूर्य भगवान् भयभीत हो गये। प्रकट
हुए। एक छत्र बनाकर महर्षि को दिया। सामान्य
छत्र तथा राजछत्र में भिन्नता होती है। छत्र,
चामर, मुकुट आदि राजा के चिन्ह माने जाते हैं।
सम्राट् के छत्र का चतुर्थांश युवराज का छत्र होता
है। सम्राट् के छत्र के अग्रभाग में भिन्नता प्रदर्शन
हेतु आठ अंगुल की एक पताका लगी रहती है।
इस छत्र को दिग्विजयी छत्र कहते हैं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३३ में 'शबर' का पाठभेद 'शवर'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ
(१) आयतन. देवस्थान यज्ञ स्थान के अर्थ
में यहा इस शब्द का प्रयोग किया गया है। आध्या-
त्मिक दृष्टि से छः आयतन बाहर तथा छ. भीतर
होते हैं। चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय एवं मन
आन्तरिक आयतन हैं। बाह्यायतन रूप, शब्द, गंध,
रस, स्पर्श एवं धर्म हैं। प्राणियों की तृष्णाओं के
कारण उक्त बारह आयतन हैं। तृष्णाओं के परे हैं।
भवन, गृह, निवेशन, आलय, वेश्म, आयतन,
अट्टालक इन शब्दों का प्रयोग नीलमत पुराण में
किया गया है। उनमें क्या भेद या इन पर प्रकाश
नहीं डाला गया है। (नी० 187, 359, 362,
364, 369, 370, 400, 551, 558)
(२) शबर : पुराणों के अनुसार यह एक
विशेष म्लेच्छ जाति थी। ये दक्षिणापथ के
निवासी थे। वायु पुराण में इन्हें 'दक्षिणा-
पथवासिनः' कहा गया है। इनका उल्लेख,
आभीर, आटव्य, पुलिंद, वैदर्भ, दण्डक आदि
के साथ प्राप्त होता है। (वायुः ४५:१२६) ब्राह्मण
ग्रन्थो के अनुसार विश्वामित्र के ज्येष्ठ पचास पुत्र
उन्हीं के शाप से आन्ध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिंद आदि
हो गये थे (ऐ. ब्रा० ७: १८: २; सां. श्रौ: १५:
२६: ६) वह दक्षिण मे पेन्नार नदी के प्रदेश मे
रहते थे। रामायण में प्राप्त शबरी की कथा इस
ओर संकेत करती है। इनकी आबादी राजस्थान
तथा हिमाचल प्रदेश आदि में थी।
महाभारत के अनुसार शबर मूलतः क्षत्रिय थे
परन्तु आचार त्याग देने के कारण म्लेच्छ हो गये
थे। महाभारत में शबरों ने कौरवों के पक्ष से युद्ध
तृतीय तरंग ४७१
अनात्मज्ञ धिगेतत्त्वे कुकर्मेति महीभुजा ।
तर्जितः स भयादेवं शबरस्तं व्यजिज्ञपत् ॥ ३४ ॥
३४. 'ओ अनात्मज्ञ ! कुकर्मी !! तुम्हें धिक्कार है ।'—राजा के इस प्रकार
वर्जित करने पर, भय से उस शबर ने उन्हें बताया-
शिशुर्मुमूर्षुर्मे राजन्नयं रोगादितः सुतः ।
कर्मैतद्देवैरुक्तमस्य श्रेयोल्पावद्दम् ॥ ३५॥
३५. 'हे राजन् ! रोग पीड़ित मेरा पुत्र यह शिशु मरणासन्न है । देवों-द्वारा कहा
गया, यह कर्म ( बलि) इसके लिये श्रेयस्कर है ।
उपहारनिरोधेन सद्य एव विपद्यते ।
बन्धुवर्गमशेषं च विद्ध्येतज्जीवजीवितम् ॥ ३६ ॥
३६. 'इस उपहार के निरोध से यह सद्यः (तत्काल) मृत हो जायगा । समस्त
बन्धु वर्ग को इसी के जीवन से जीवित जानिये ।
अरण्यगहनाल्लब्धमनाथं देव रक्षसि ।
बहुलोकाश्रयं बालं कथमेतमुपेक्षसे ॥ ३७ ॥
३७. देव ! गहन वन में प्राप्त अनाथ को आप रक्षा करते हैं फिर अनेकों के आश्रय-
भूत उस बालक की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ।
अथाभ्यधान्महात्मा स वचोभिः शबरस्य तैः ।
वध्यस्य दृष्टिपातैश्च विप्लवैश्चैवशीकृतः ॥ ३८ ॥
३८. उस महात्मा ( नृप) ने शबर की बातों एवं वध्य के कातर दृष्टिपातों से विवश
होकर कहा—
में भाग लिया था । सात्यकी ने इनका संहार एकादश पिशाचकाः ।"
किया था ।
पाठभेद :
३३ (२) आमटन : कल्हण का वर्णन श्लोक संख्या ३४ में 'अनात्मज्ञ' का 'धनात्मज्ञा'
पुराणों से मेल खाता है क्योकि यह स्थान दक्षिण और 'देवं' का 'देव' पाठभेद मिलता है ।
का समुद्र तट था जहाँ शबर से राजा को भेंट हुई
थी । शबर शिव भक्त थे। एकमत है कि वर्तमान श्लोक संख्या ३६ में 'एव' का पाठभेद 'एव'
भील जाति के शबर ही पूर्व पुरुष थे । मिलता है ।
एक मत शबर जाति को पिशाच के एकादश श्लोक संख्या ३८ में 'स वचोभिः' का पाठभेद
उपजातियो में एक मानता है । "शाबरं द्राविडं चैव 'सुवचोभिः' मिलता है ।
४७२ राजतरंगिणी
किरात कातरो मा भूः स्वयं संरक्ष्यते मया ।
बहुवन्धुस्तव सुतो वध्योऽप्ययमवान्धवः ॥ ३९ ॥
३६. “ओः किरात' ! कातर मत हो। मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र की जिसके बहुत
बन्धु हैं; और बन्धु हीन उस वध्य की रक्षा करता हूँ।
श्लोक सङ्ख्या ३९ में 'वध्यो' का पाठभेद
'वाध्यो' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३९ (१) किरात : विन्ध्य तथा राजस्थान
में रहने वालो एक आदिम जाति है। किरात शब्द
अनार्यों के लिये बहुत प्रयुक्त किया गया है। राजस्थान
तथा विन्ध्य के निवासी भीलों को किरात की
संज्ञा हो जाती है। वंशानुक्रम तथा जाति के विचार
से किरात एव भील में अन्तर है।
इस जाति का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है।
यह पहाड़ी जाति है। महाभारत सभा पर्व (अ. २६)
से प्रतीत होता है कि प्राग्ज्योतिष के समीप किरात
प्रदेश था। हिमालय के पूर्व लौहित्य नदी के आगे
किरात निवास करते थे। टालेमी ने किरात जाति
का प्रदेश वर्मा का अराकान प्रदेश बताया है।
पांचवी तथा छठी शताब्दियों के प्राप्त बर्मी तथा
कम्बुज शिलालेखों से पता चलता है कि वहाँ के
मूल निवासी किरात थे। इन प्रमाणो से माना
जा सकता है कि पूर्वी हिमालय अंचल, भूटान,
मणिपुर, वर्मा तथा कम्बुज (कम्ब्रोडिया) तक
किरात जाति फैली थी। प्राग्ज्योतिष के राजा
भगदत्त ने किरात तथा चीन का सेना के साथ
अर्जुन से युद्ध किया था।
महाकवि भारवि के किरातार्जुनोय महाकाव्य
में पता चलना है कि महाभारत काल में किरात
सैनिक तथा गुप्तचरों का कार्य करते थे। महादेव
ने किरात वेश में अर्जुन से युद्ध किया था। नेपाल
में प्राचीन किरात जाति आजकल किराती नाम से
प्रसिद्ध है। वे वल्ली, माझ तथा पल्ल किरात वर्गों
में विभक्त है। वल्ली किरान्त लिम्बू, पल्ल तथा
तथा रायछ श्रेणियों में विभक्त है। लिम्बू किरात
पत्नी खरीदते हैं। गरीब लिम्बू अपने ससुर के
घर नौकरी कर पत्नी प्राप्त करता है। नेपाल की
वंशावली से प्रतीत होता है कि महिर वंश के पश्चात्
किरात वंश के २९ राजाओं ने नेपाल में शासन
किया था। नेपाल के किरात बौद्ध तथा हिन्दू दोनों
हैं। सिक्किम के पश्चिम मोरंग में आज भी किरात
जाति रहती है।
वराहमिहिर को बृहत् संहिता में भारत के
दक्षिण पश्चिम किरात जनपद होने का उल्लेख
किया गया है। शक्ति संगम तंत्र में 'तप्त कुण्ड' से
'राम क्षेत्राग्त' पर्यन्त किरात देश कहा गया है।
यह विन्ध्य प्रदेश में स्थित है।
किरात एक शिवावतार भी हुआ है। मूक
नामक दानव का इसने सूकर रूप में वध किया है।
ऋग्वेद में किरात तथा आकुलो दो असुरों का
का उल्लेख मिलता है (ऋ० १०:५७:१; १०:६०:१;
बृहद् देवता ७.११:१६; पं०ब्रा० १३:१२:५, श०
ब्रा० २:१.४ १४, जै. ब्रा. ३:१६० ।
यह जाति सम्भवतः अनार्य थी। प्राचीन ग्रन्थो
में प्रायः उनका सम्बन्ध पर्वतों तथा गुफाओं से जोड़ा
गया है। उनकी मुख्य जीविका आखेट बतायो गयी
है। अथर्ववेद (१०४ १४) में किरात का उल्लेख
मिलता है। वाजसनेयी संहिता (३०.१६) तथा
तैत्तिरीय ब्राह्मण में किराता का सम्बन्ध गुहा से
बताया गया है। अभिप्राय यह मालूम होता है कि
वे गुहावासी थे।
तृतीय तरंग ४७३
उपहारीकरोम्येष चण्डिकायै स्वविग्रहम् ।
मयि प्रहर निश्शङ्कं जीवत्वेतज्जनद्वयम् ॥ ४० ॥
४०. "मैं अपने शरीर को चण्डिका के लिये उपहार¹ में दे रहा हूँ। तुम मुझ पर
निःशंक होकर प्रहार करो। वे दोनों जन जीवित होवें।"
तदद्भुतमहासत्त्वचित्तेरुदात्यविस्मितः ।
उन्मिषद्रोमहर्षस्तं ततः स शबरोऽभ्यधात् ॥ ४१ ॥
४१. तदनन्तर यह शबर उस महासत्त्व के चित्त की उदात्तता से विस्मित एवं
रोमांचित हो गया और उनसे बोला—
अतिकारुण्यनिपतस्तवायं पृथिवीपते ।
कश्चिन्मतिविपर्यांसप्रकारो हृदि रोहति ॥ ४२ ॥
४२. पृथिवीपते ! आपके हृदय में अति कारुण्य के कारण किसी प्रकार का मति
विपर्यय (बुद्धि भ्रम) उत्पन्न हो गया है।
वाल्मीकि रामायण में किरातों की नारियों के
जूड़ा का वर्णन है। उनके वर्ण की सुवर्ण से उपमा
दी गयी है। (किष्किन्धा काण्ड : ४०;२७)
महाभारत कर्ण पर्व (७३:१९-२०) में उन्हें
बर्बर अनार्य जाति तुषार, यवन, खस, आंध्रक,
पुलिन्द, म्लेच्छों के साथ रखा गया है। उन्हें पर्वतीय
जाति कहा गया है। द्रोण पर्व (४.७) में उन्हें
हिमालय पर्वत में निभृत कहा गया है। सभा पर्व
(५२:१-१२) में किरात लोग युधिष्ठिर को
भेंट लेकर आते हुए देखे जाते हैं। उन्हें क्रूरकर्मी
कहा गया है। फल-मूलभोजी, चर्मवस्त्रधारी तथा
भयंकर शस्त्र चलाने वाला कहा गया है। कालान्तर
में किरात लोग समस्त भारत में फैल गये थे।
खारवेल के अभिलेख में चीन तथा किरात
दोनों का एक साथ उल्लेख किया गया है। सांची
के एक स्तूप पर एक किरात भिक्षु के दान का
उल्लेख अंकित है। नागार्जुनोय कोंड के एक अभिलेख
में किरातों का उल्लेख है।
६०
महाभारत के उपायन पर्व में किरात के चन्दन
लेकर भेंट में आने का उल्लेख है। अतएव किरात
दक्षिण में थे। ललितादित्य का उनसे समुद्रतट
पर भेंट होना वास्तविकता की ओर संकेत करता है।
मनु ने किरातों की गणना व्रात्य क्षत्रियों में की
है। (मनु० १०:४३-४४)
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४० में 'स्ववि' का पाठभेद
'सुवि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४० (१) उपहार : कल्हण ने उपहार शब्द
का प्रयोग यहाँ किया है। बलि तथा उपहार में स्पष्ट
अन्तर कल्हण ने किया है। बलि किसी भी व्यक्ति
अथवा पशु की उसकी इच्छा अथवा अनिच्छा होने
पर भी जबर्दस्ती बलिकर्त्ता अपने प्रतिनिधि रूप में
कर देता था। परन्तु उपहार से यह ध्वनि नहीं
निकलती। अपना उपहार नैवेद्य अथवा भोग लगाने
की तरह देवता को चढ़ाया जाता है।
४७४ राजतरंगिणी
त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यो हेलयैव तम् ।
पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥
४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस
काया की आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ?
न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् ।
न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया¹ ॥ ४४ ॥
४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी
रक्षा नहीं करते ।
तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः ।
शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥
४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने
पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी ।"
उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः ।
अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥
४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो
चामुण्डा¹ की अर्चना करते हुए कहा-
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) राजतरंगिणी मुक्ति संग्रह का ५६वाँ
श्लोक है ।
४६ (१) चामुण्डा : स्कन्द पुराण (५:१:३८)
में उल्लेख मिलता है । शुंभ तथा निशुंभ ने देवी
का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो
राक्षसों को भेजा था । देवी ने उनका वध किया ।
चण्ड एव मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं
निशुंभ का वध किया । अतएव देवी का नाम
चामुण्डा पड़ा ।
रक्तबीज एक असुर था । वह शुम्भ निशुम्भ
के पक्ष का योद्धा था । रुद्र के वर प्रभाव से
उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पड़ते रक्त बूंद के
बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था ।
चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी ।
असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी ।
चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया । (दे० भा०
५:२७-२९, मार्क० ८५, शिव० उमा ४७ )
चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति
ने 'मालती माधव' नाटक में किया है । नाटक के
पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते
समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था ।-
तृतीय तरंग ४३५
सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः ।
जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥
४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल
निवासी गंगा स्नान ( मज्जन ) के आनन्द को नहीं जानते ।
ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् ।
ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥
४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते,
मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह ( क्यों ? ) बढ़ गया है ।
मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव ।
न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४६ ॥
४९. 'और कुछ मत कहो। यदि प्रहार करने में तुम्हें दया ( आती ) है, तो क्या
मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?'
इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः ।
खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥
५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के
खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकूर, धारण कर लिया ।
ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः ।
करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥
५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और
किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१
अथापश्यत्तथाभूतः कश्चिद्दिव्याकृतिं पुरः ।
न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥
५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । ( किन्तु ) चण्डिका, किरात,
दारक ( शिशु ) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया ।
पादटिप्पणियाँ :
४०(१) राजतरंगिणी मृत्तिका ४७वाँ श्लोक है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढो' का पाठभेद 'मूढो' मिलता है ।
श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५१ ( १ ) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था। उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।
४७४ राजतरंगिणी
त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यौ हेलयैव तम्।
पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥
४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस
काया को आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ?
न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् ।
न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया१ ॥ ४४ ॥
४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी
रक्षा नहीं करते।
तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः ।
शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥
४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने
पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी।"
उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः ।
अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥
४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो
चामुण्डा१ की अर्चना करते हुए कहा-
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५६वां
श्लोक है।
४६ (१) चामुण्डा: स्कन्द पुराण (५:१:३८)
में उल्लेख मिलता है। शुंभ तथा निशुंभ ने देवी
का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो
राक्षसों को भेजा था। देवी ने उनका वध किया।
चण्ड एवं मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं
निशुंभ का वध किया। अतएव देवी का नाम
चामुण्डा पड़ा।
रक्तबीज एक असुर था। वह शुम्भ निशुम्भ के पक्ष का योद्धा था। रुद्र के वर प्रभाव से उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पडते रक्त बूंद के बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था। चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी। असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी। चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया। (दे० भा० ५:२७-२९; मार्क० ८५, शिव० उमा ४७)
चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति ने 'मालती माधव' नाटक में किया है। नाटक के पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था।-
तृतीय तरंग ४७५
सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः ।
जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥
४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल
निवासी गंगा स्नान (मज्जन) के आनन्द को नहीं जानते ।
ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् ।
ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥
४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते,
मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह (क्यों ?) बढ़ गया है ।
मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव ।
न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४९ ॥
४९. 'और कुछ मत कहो । यदि प्रहार करने में तुम्हें दया (आती) है, तो क्या
मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?'
इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः ।
खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥
५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के
खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकर, धारण कर लिया ।
ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः ।
करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥
५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और
किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१
अथापश्यत्तथाभूतः कञ्चिद्दिव्याकृतिं पुरः ।
न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥
५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । (किन्तु) चण्डिका, किरात,
दारक (शिशु) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया ।
पादटिप्पणियाँ :
४७(१) राजतरंगिणी सूक्तिका ५७वां श्लोक है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढ़ो' का पाठभेद 'मूढ़ो' मिलता है ।
श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५१ (१) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था । उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।
राजतरंगिणी
४६७
स तं दिव्यस्तदाऽवादीन्मां त्वं सत्त्ववशीकृतम् ।
विद्धि मध्यमलोकेन्दो वरुणं करुणानिधे ॥ ५३ ॥
५३. उस समय उस दिव्य (व्यक्ति) ने उससे कहा—'हे मध्यमलोकेन्दु !
करुणानिधे ! ! तुम मुझे सत्त्व वशीकृत वरुण' जानो।
यदेतत्त्वामुपास्तेऽद्य छत्रं तन्मत्पुरात्पुरा ।
महाबलोऽहरद्भौमः पुराणश्वशुरस्तव ॥ ५४ ॥
५४. 'आज यह जो छत्र तुम्हारी सेवा में है, उसे पहले मेरे नगर से तुम्हारे पुराण
श्वशुर महाबली भीम' ने अपहृत कर लिया था।
रसातलेकतिलकं माहात्म्यवदिदं विना ।
उपद्रवाः प्राणहराः पौराणां नः पदे पदे ॥ ५५ ॥
५५. 'रसातल' का एक मात्र तिलक माहात्म्यशाली इस (छत्र) के विना मेरे
पुरवासियों के पद-पद पर प्राणहारी उपद्रव होते हैं।
श्लोक संख्या ५३ में 'त्वं' का पाठभेद 'स्वा'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५३ ( १ ) वरुण : पाद टिप्पणी 'वरुण'
रा० त० २।५८ द्रष्टव्य है। वरुण सूर्य के नव
ग्रहों में एक ग्रह भी है। यह बहुत बड़ा पिण्ड है।
अत्यन्त दूरस्थ होने के कारण दूरदर्शी के बिना
नहीं देखा जा सकता था। सन् १८४६ में प्रथम
बार दूरदर्शी द्वारा इसकी वास्तविक स्थिति ज्ञात
हुई थी। किन्तु अविष्कार बहुत पूर्व ही विना दूर-
दर्शी के हो चुका था। भारतीयों को इसका ज्ञान
सुदूर पूर्व काल से था। वरुण का व्यास लगभग
३३,००० मील है। सूर्य से २७९ करोड़ मील पर
स्थित है। यह साड़े तीन मील प्रति सेकण्ड घसकर
१६५ वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
नेपचून शब्द के लिये वरुण शब्द का प्रयोग किया
गया है।
शतपथ ब्राह्मण में कूर्म को वरुण का सहायक
माना गया है। (७.५.१.९) नीलमत पुराण में
वरुण को मरुत ( 619, ), आदित्य (607) तथा,
जलदेवता ( 384 ) के रूप में चित्रित किया गया
है। उसका सम्बन्ध नरक से भी जोड़ा गया है।
( 1381 ) "जलाधिपेन शातस्य नरके पतनं कृत."
इसी पुराण के अनुसार वरुण तीर्थ की बलि तथा
प्रतिमा की स्थापना पुलहस्त्य ने की थी। ( 1004
—1006 ) कार्तिक पूर्णिमा को वरुण पूजा का भी
उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। ( 435—
437 ) वरुण पंचमी की विशेष रूप से पूजा कश्मीर
में होती थी। ( 755 ) वरुण यात्रा उत्सव का
विधान भी नीलमत पुराण में अन्य यात्रोत्सव के
साथ रखा गया है। ( 804-865 ) नीलमत
वरुणलोक का भी उल्लेख करता है।
५४ ( १ ) भौम : इस दैत्य का दूसरा नाम
'नरक' है। उसे 'नरकासुर' भी कहते हैं।
५५ ( १ ) रसातल : सप्त अधोलोकों में से
एक लोक है। पाताल के पाँच लोक यथा-अधोभुवन
पाताल, बलि सद्मन, रसातल तथा नागलोक हैं।
तृतीय तरंग ४७९
तदिदं प्राप्तुकामेन त्वदौदार्यं परीक्षितुम् ।
कारुण्यमय मायेयं निर्मायि मयेदृशी ॥ ५६ ॥
५६. 'हे करुणामय ! ! इसे (छत्र) प्राप्त करने की इच्छा से तुम्हारे औदार्य की
परीक्षा हेतु, इस प्रकार की यह माया निर्मित की।
त्वदादिर्यो व्यधाज्जन्तून्व्यसून्वसुकुलात्मजः ।
प्रायश्चित्तममारेण चरसीव तदेनसः ॥ ५७ ॥
५७. 'तुम्हारे पूर्ववर्ती वसुकुलात्मज' जिसने प्राणियों का वध किया था, उसके
पाप का इस अहिंसा द्वारा (अब) प्रायश्चित्त कर रहे हैं।
भयस्पृहाजनकयोर्धरणीधारणोचिते ।
शेषदेहे विषोद्गारफणारत्नौघयोरिव ॥ ५८ ॥
५८. 'धरणी धारण हेतु शेष शरीर में जैसे क्रमशः भय एवं अभिलाष (स्पृहा)
उत्पन्न कारक विषोद्गार तथा फणरत्न समूह रहते हैं।
सुभाषित रत्नाकर में इसका अर्थ पृथ्वी किया
गया है। रसातल शब्द साधारणतया नरक के लिये
प्रयुक्त होता है। प्राग्ज्योतिष तथा वरुण लोक
रसातल नहीं है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५६ में 'कारुण्यमय' का पाठभेद
'करुणामय' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५७ (१) वसुकुलात्मज : कल्हण मेघ-
वाहन को मिहिरकुल का वंशज यहाँ बताता है।
द्रष्टव्य है रा. त. १:२८८-३२५ पृष्ठ २१२-३३३ ।
दक्ष कन्या एवं धर्म की पत्नी का नाम वसु
था। उससे आठ वसु हैं। उन्हें अष्ट वसु कहा
जाता है। हरिवंश, स्कन्द एवं विष्णु पुराणों में
इनका नाम—धर, ध्रुव, सोम, अप, अनल, अनिल
प्रत्यूष तथा प्रभास हैं। नीलमत पुराण भी आठ
वसुओं की तालिका देता है। उससे यह तालिका
मिलती है । (603) नीलमत नव संवत्सर
अर्थात् चैत्र शुक्ल एक को वसुपूजा का माहात्म्य
उपस्थित करता है।
भागवत में उनका नाम—द्रोण, प्राण, ध्रुव,
अर्क, अग्नि, दोष, वसु तथा विभावसु दिया गया
है। महाभारत में 'अप्' के स्थान में 'अहः' तथा
शिव पुराण में 'अयज' नाम दिया गया है। अष्ट
वसुओं के नायक अग्नि हैं।
ऋग्वेद में वसु गण पृथ्वी निवासी देवता है।
वसु नाम के अनेक वैदिक एवं पौराणिक देवताओं
का उल्लेख मिलता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५८ में 'पारणांचिते' का पाठ
भेद 'धरणोचिते' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५८ (१) चकलम् : कतिपय अनुवादकों ने
श्लोक संख्या ५८-६१ श्लोकों का अनुवाद एक साथ
चार श्लोकों को 'चवस्कलम्' चारपद का मान कर
किया है। यहाँ अनुवाद प्रत्येक श्लोक का अलग-अलग
दिया गया है। निस्सन्देह कुछ प्रति में चवक्कलम होने
का निर्देश किया गया है।
राजतरंगिणी
४७८
तमःप्रकाशावहयोस्तेजःक्रान्तदिगन्तरे ।
उपर्बुधे धूमजालज्वालापल्लवयोरिव ॥ ५६ ॥
५९. 'तेज से दिगन्तरव्यापी अग्नि में जैसे अन्धकार तथा प्रकाशप्रद धूम पुञ्ज एवं ज्वाला पल्लव रहते हैं।
क्रमाप्यायक्रियाभाजो रुद्धतेजस्विमण्डले ।
प्रावृट्पयोदच्छन्नेऽह्नि संतापासारयोरिव ॥ ६० ॥
६०. आवृत रवि मण्डल एवं प्रावृट् पयोद से आच्छन्न दिन में जैसे क्रम (खेद और शान्तिदायी सन्ताप तथा वृष्टि होते हैं—
द्वयोरालोकितं चित्रं जन्मैकस्मिन्महाकुले ।
तस्य त्रिकोटिहन्तुश्च तवाऽहिंस्रस्य च प्रभोः ॥ ६१ ॥
६१. 'उसी तरह एक ही महाकुल में त्रिकोटिहन्ता१ (मिहिर कुल) उसका एवं अहिंसक प्रभु आप दोनों का विचित्र जन्म देखा।'
नम्रः सम्राडथैवं स वदतो यादसां प्रभोः ।
चकार पूजां स्तोत्रेण छत्रेण च कृताञ्जलिः ॥ ६२ ॥
६२. यादस् पति (वरुण)१ के इस प्रकार कहने पर, विनम्र उस सम्राट् ने अंजलि-बद्ध होकर, स्तोत्र एवं छत्र से उनकी पूजा की।
तं च स प्रतिगृह्णन्तं प्रणयादुष्णवारणम् ।
जगाद गुणिनामग्र्यो वरुणं धरणीधवः ॥ ६३ ॥
६३. सप्रणय छत्र ग्रहण करते वरुण से गुणियों में अग्रणी धरणीपति ने कहा—
पाठभेदः
श्लोक संख्या ५९ में 'क्रान्त' का पाठभेद 'समावृत' मिलता है।
श्लोक संख्या ६१ में 'हन्तुश्च' का 'हर्तृश्च' 'हन्तुंश्च' तथा 'अहिंस्र' का पाठभेद 'अहिंस्र' मिलता है। श्लोक में 'चतुर्भिः 'कुलकम्' किंवा 'चवक्लकम्' जोडने का सुझाव दिया गया है।
पादटिप्पणियाँ :
६१ ( १ ) त्रिकोटिहन : कल्हण ने मिहिर-कुल के लिये त्रिकोटिहन्ता एवं त्रिकोटिहन शब्द का उल्लेख रा. त. १:३१०, ३२२ तथा ८:३४१५ में किया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६२ में 'प्रभोः' का पाठभेद 'परः' मिलता है।
तृतीय तरंग ४५९
कल्पद्रुमाश्च सन्तश्च नार्हन्ति समशीर्षिकाम् ।
अर्थिनां प्रार्थिताः पूर्वे फलन्त्यन्ये स्वयं यतः¹ ॥ ६४ ॥
६४. “कल्पद्रुम एवं सन्त सम कोटि में होने योग्य नही । क्योकि प्रथम ( कल्पद्रुम )
आकांक्षी के प्रार्थना करने पर तथा अन्य ( सन्त ) स्वतः फल देते हैं ।
अत्रालम्बिष्यत छत्रं कथं नः पुण्यपण्यताम् ।
तत्रार्थयिष्यत न चेदार्तोपकृतये भवान् ॥ ६५ ॥
६५. "छत्र हमारे पुण्य पण्यता को कैसे प्राप्त करता, यदि आप आर्त के उपकार
हेतु न प्रार्थित होते ।”
वदान्यः संविभागेभ्यः पूर्णं कुर्यादनुग्रहम् ।
छाययाऽऽप्याययन्दद्यात्फलान्यपि महीरुहः¹ ॥ ६६ ॥
६६. वदान्य² संविभाग ( दान ) पूर्वक अनुग्रह पूर्ण करता है, क्योंकि महीरुह
( वृक्ष ) छाया द्वारा सन्तुष्ट करता हुआ, फल प्रदान करता है ।
तदेवं विहितोदात्तसंभागाभिचोदितः ।
जनोऽयं भगवन्किञ्चिद्वरं प्रार्थयतेऽपरम् ॥ ६७ ॥
६७. 'भगवन् ! आपके इस प्रकार के उदात्त व्यवहार से प्रोत्साहित, यह जन एक
अन्य वर की प्रार्थना करता है ।
पादटिप्पणियाँ : 'भागेभ्यः' का 'भागेभ्यः' तथा 'वदण्यत्' का
६४(१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का पाठभेद 'दध्यात्' मिलता है ।
५८ वाँ श्लोक है । पादटिप्पणियाँ :
६६ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
मेघवाहन वरुण को प्रार्थना आरम्भ ५९ वां श्लोक है ।
करता है । सम शीर्षिकाम् शब्द का यहाँ
कल्हण ने प्रयोग किया है । सम का अर्थ समान ( २ ) वदान्य : सबको दान देने के लिये जो
तथा शीर्ष का अर्थ शिर होता है । इसका शाब्दिक कहता है, उसे वदान्य कहते हैं ।
अर्थ सन्तुलित मस्तिष्क लगाया जा सकता है । इस पाठभेद :
शब्द का उल्लेख पुनः कल्हण ने ३:१३५ में श्लोक संख्या ६७ में 'तदेवं' का 'तदेव' और
किया है । 'अपरम्' का पाठभेद 'परम्' मिलता है ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ
श्लोक संख्या ६५ में 'न' का पाठभेद 'न' ६७ (१) वर : वरुण के द्वारा छत्र स्वीकार
मिलता है । कर लेने पर उत्साहित होकर, अपने उपकार का
प्रत्युपकार पाने की अभिलाषा,-से राजा वर की
श्लोक संख्या ६६ में 'वदान्य' का 'वदन्यः' आकाँक्षा करता है ।
४८० राजतरंगिणी
वशीकृतेयं पृथिवी कृत्स्ना भवदनुग्रहात् ।
जेतुं द्विपान्कथ्यतां तु युक्तिः पाथोघिलङ्घने ॥ ६८ ॥
६८. 'आपकी कृपा से मैंने समस्त पृथिवी को वशीकृत किया है। (अब) द्वीपों को
जीतने के लिये, समुद्र लंघन हेतु कोई उपाय बतायें'।
इत्यर्थ्यमानोऽकथयद्भूमिपालं जलेश्वरः ।
तितीर्षौ भवति स्तम्भं नीयतेऽम्भो मयाऽम्बुधेः ॥ ६९ ॥
६९. इस प्रकार भूमिपाल के प्रार्थना करने पर जलेश्वर ने कहा, —"जब आप
समुद्र पार करने की इच्छा करेंगे तो मैं जल स्तम्भित कर दूंगा।"
ततो महान्प्रसादोऽयमित्युक्ते पृथिवीभुजा ।
तिरोबभूव भगवान्वरुणः सोष्णवारणः ॥ ७० ॥
७०. तदुपरान्त राजा के 'आपका यह महान् प्रसाद है'—यह कहने पर, भगवान्
वरुण छत्र सहित तिरोहित हो गये ।
अन्येद्युर्विस्मयस्मेरैर्बलैः सीमन्तयञ्जलम् ।
प्रभावस्तम्भितक्षोभं प्रोत्ततार स वारिधिम् ॥ ७१ ॥
७१. दूसरे दिन (वरुण के) प्रभाव से जल स्तम्भित हो गया। तब उसने जल को
'सीमन्तित' करते हुए, विस्मित तथा सम्मित सैनिकों के साथ समुद्र पार किया।
गुणरत्नाकरः शैलं स रत्नाकरशेखरम् ।
नानारत्नाकरं सैन्यैरारुरोहाऽथ रोहणम् ॥ ७२ ॥
लंका विजय—
७२. गुणरत्नाकर उसने ससैन्य, नाना रत्नों की खान एवं रत्ननिधियों का शेखर
रोहण पर्वत पर आरोहण किया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ६९ में 'तितीर्षौ' का पाठभेद
'तितीर्षोः' मिलता है।
श्लोक संख्या ७१ में 'क्षोभं' का पाठभेद 'जलं'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
७१( १ ) सीमन्तित : कल्हण की उपमा यहाँ
अनुपम है सीमन्त का अर्थ माँग होना है। शिर
पर बाल काले होते हैं। भूरे होते हैं। माँग काढ़ने
पर बाल दोनो ओर घूमते हट जाते हैं। मध्य में
सीधी पवित्र ललाट से उठती पीछे चली जाती है।
सीमन्त अर्थात् माँग के मध्य का भाग त्वचा वर्ण
के अनुसार उज्ज्वल किंवा भूरा लगता है । दोनो
ओर जल हट जाने पर सीमन्त के समान दिखायी
पड़ा होगा । जल उछल कर दोनों ओर हो जाएगा ।
सीमन्त तुल्य रेखा बन जाएगी । इसी प्रकार बाल
मस्तक त्वचा से उठकर दोनों ओर गिर कर बालों
से मिल जाता है । जल का तल नीला होता है ।
बाल का रंग काला उसके वर्ण के निकट होता है ।
७२ ( १ ) रत्नाकर शब्द पर यहाँ जोर दिया
गया है। रत्नाकर समुद्र को कहा जाता है। कल्हण
ने यहाँ राजा के लिये गुणरत्नाकर विशेषण का प्रयोग
कर उसे रत्न के साथ गुणों से भी विभूषित किया है।
( २ ) रोहण : श्रीलंका के पर्वत 'आदमस्
तृतीय तरंग ४८१
तत्र , तालीतरुवनच्छायाध्यामितसैनिकम् ।
प्रीत्या लङ्काधिराजस्तमुपतस्थे विभीषणः ॥ ७३ ॥
७३. जब कि उसके सैनिक वहाँ ताल वृक्ष वनच्छाया में बैठे थे, लंकाधिपति
१विभीषण प्रेम पूर्वक उसके पास आया ।
समागमः स शुशुभे नरराक्षसराजयोः ।
वन्दिनादाश्रुतान्योन्यप्रथमालापसंभ्रमः ॥ ७४ ॥
७४. नर एवं राक्षसराज का यह समागम सुशोभित हुआ । किन्तु वन्दिगणों के
नाद से उनका परस्पर उद्वेग पूर्ण (प्रथम) संलाप सुनायी नहीं पड़ा ।
अथ रक्षःपतिर्लङ्कां नीत्वाऽलंकरणं चितेः ।
अमर्त्यसुलभाभिस्तं विभूतिभिरुपाचरत् ॥ ७५ ॥
७५. राक्षसपति पृथ्वीभूषण (मेघवाहन) को लेकर लंका गया । वहाँ अमर्त्य
सुलभ विभूतियों से उसका उपचार किया ।
यदासीत्पिशिताशा इत्यन्वर्थं नाम रक्षसाम् ।
तदा तदाज्ञाग्रहणे प्राप तद्रूढिशब्दताम् ॥ ७६ ॥
७६. राक्षसों का 'पिशिताश' (मांसभक्षी) नाम चरितार्थ था, परन्तु (उसकी)
आज्ञा ग्रहण करने पर, वह शब्द रूढ हो गया ।
कीट' अथवा श्रीपाद पर्वत का नाम है। द्रष्टव्य
है पाद टिप्पणियां तरंग १:२९४ तथा २९९
आदम पीक को ही रामायण वर्णित सुवेलाद्रि कुछ
लोग मानते हैं।
आदम पीक को रहु अथवा रहून मुसलमान
लोग कहते हैं। रोहण का अर्थ ही चढ़ना अथवा
आरोहण करना होता है। रोहण अथवा आरोह
सीढ़ियो तथा आदम पर्वत की लोह शृंखला को
पकड़ कर किया जाता है। श्रीपाद पर्वत शिखर
७३६० फीट तथा पिदुरु तलागल शिखर ८२९६
फीट ऊँची है। पूर्व काल में श्रीपाद पर्वत ही
सबसे ऊँचा माना जाता था। परन्तु आधुनिक
ऊँचाई माप साधन मे श्रीपाद कम ऊँचा श्री लंका
में ठहरा है। उससे भी ऊँची चोटी किरिगिल पोत
की है। यह ७८५७ फीट है इन्हीं तीन शिखरो
६१
के कारण श्री तुलसीदास ने रामायण में लिखा
है—'गिरि त्रिकूट पर बस जहँ लंका।
७३ (१) विभीषण : लंका में विभीषण
को भक्त रूप में चित्रित किया गया है न कि
राक्षसेन्द्र रावण भ्राता रूप में राक्षस ।
राम ने लंका का राज्य विभीषण को दिया था।
विभीषण चिरंजीवी माना जाता है। एकमत उसे
अब तक लंका का राजा मानता है।
मैं समझता हूँ। कालान्तर में 'विभीषण' शब्द
लंका के राजा का पद वाचक हो गया था।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ७६ में 'प्राप' का पाठभेद 'प्रावि'
मिलता है।
४८२ राजतरंगिणी
स्वशिरःप्रतिच्छन्दैः स्थिरप्रणतिसूचकैः ।
सनाथशिखरान्प्रादात्तस्मै रक्षःपतिर्ध्वजान् ॥ ७७ ॥
७७. राक्षसपति ने उसे स्थिर प्रणय सूचक राक्षस शिर की आकृतियों से युक्त
शिखर वाले ध्वजाओं को दिया ।
पाराद्वारिनिधेः प्राप्ताः कश्मीरेष्वधुनापि ये ।
राज्ञां यात्रासु निर्यान्ति ख्याताः पारध्वजाः पुरः ॥ ७८ ॥
७८. वारिनिधि पार से प्राप्त वे ख्यात 'पारध्वज' कश्मीर में आज भी राज-
यात्राओं में निकाले जाते हैं।
इत्थंमाराक्षसकुलं प्राणहिंसां निषिध्य सः ।
स्वमण्डलं प्रति कृती न्यवर्त्तत नराधिपः ॥ ७९ ॥
७९. इस प्रकार समस्त राक्षस कुल में प्राण हिंसा निषिद्ध करके वह कृती राजा
स्वमण्डल को लौटा।
ततःप्रभृति तस्याज्ञा मार्वभौमस्य भूपतेः ।
हिंसाविरतिरूपा सा न कैश्चिददलङ्घ्यत ॥ ८० ॥
८०. तब से लेकर इस सार्वभौम राजा की उस हिंसा विरति आज्ञा का किसी ने
उल्लंघन नहीं किया ।
क्षुद्रैरुद्रादिभिर्नाप्सु सिहार्थैर्गहने न च ।
न श्येनप्रमुखैर्व्योम्नि तद्राज्ये जन्तवो हताः ॥ ८१ ॥
८१. उसके राज्य में क्षुद्र जल मार्जारादि जल में, सिंहादि वन में, श्येनादि आकाश
में, जीव हत्या नहीं करते थे ।
श्लोक संख्या ७८ में 'कश्मीरे' का पाठभेद
'काश्मीरे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७८ (१) पारध्वज : विजय में प्राप्त शत्रुओं
के ध्वजो को विजय यात्रा किंवा उत्सवों पर जलूस
में निकाला जाता है। यह प्रायः रोम सम्राट् के
प्रदर्शनी तथा यूरोप में भी प्रचलित रहा है। कश्मीर
में भी इस प्रकार की शोभा यात्रा प्रचलित रही
होगी। कल्हण के समय तक यह निकाले जाते थे
और लंका विजय की स्मृति हरी करके कश्मीर के
सैनिकों का मस्तक गौरव से ऊँचा करते थे। इस
पारध्वज का पुनः कहीं उल्लेख नही मिलता।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८१ में 'रुद्रा' का पाठभेद 'रुध्रा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८१ (१) उद्र : उद्र किस प्रकार का जलीय
जन्तु था कहना कठिन है। अंग्रेजी अनुवादको
ने उसका अनुवाद 'ओट्टर' अर्थात् ऊदबिलाव किंवा
जलमार्जार किया है।
तृतीय तरंग ४८३
अतिक्रामति¹ कालेऽथ कोऽपि शोकाकुलो द्विजः ।
पुत्रं गदार्तमादाय द्वारि चक्रन्द भूपतेः ॥ ८२ ॥
ब्राह्मण बालक की कथा
८२ कुछ काल अतिक्रान्त² होने पर, कोई शोकाकुल द्विज रोग से पीड़ित पुत्र को
लेकर, भूपति के द्वार पर क्रन्दन किया —
दुर्ग्या¹ प्रार्थितं राजन् पश्वाहारं विनैव मे ।
अनन्यसंततेः सूनुर्ज्वरेणाद्य व्यपद्यते ॥ ८३ ॥
८३. हे राजन् ! दुर्गा¹ वाञ्छित पशु आहार के बिना मेरा यह एक मात्र पुत्र
आज ज्वर से मृत हो रहा है।
पाठभेद :
श्लोक संख्यः ८२ में 'गदार्त' का पाठभेद
'गतासु' 'गदात्त' तथा 'गदातु' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८२ (१) बाण के हर्षचरित में इस प्रकार की
शब्दावली मिलती है—'अतिक्रामति काले—'
(२) द्विज द्वार क्रन्दन : रामायण में इसी
प्रकार की कथा का वर्णन है । भगवान् राम के द्वार
पर एक ब्राह्मण अपने अकालमृत्यु ग्रस्त ब्राह्मण
बालक को लेकर आया । राजा राम से प्रश्न किया ।
पुत्र की अकाल मृत्यु क्यो हुई ? राजा उसके लिये
उत्तरदायी है । राजा पुत्र को जीवित करे ।
वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड का सर्ग ७३ से
७६ सर्ग का संवाद राजनीति सिद्धान्त तथा प्रजा के
प्रति राजा का कर्तव्य का अनुपम् सिद्धान्त प्रति-
पादित करता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८३ में 'राजन्पश्वाहारं' का
पाठभेद 'राजन्नुपहारं' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
८३ (१) दुर्गा का यहाँ पर अर्थ कालिका लगाया
जाना उचित मालूम पड़ता है ।
दुर्गा का देवस्थान कहाँ था इसका अन्वेषण नहीं
हुआ है । श्री स्टीन तथा अन्य किसी पुरातत्त्ववेत्ता
ने इस पर प्रकाश नही डाला है ।
अनुमान मात्र लगाया जा सकता है । यह स्थान
दुर्गा नाग तथा दुर्गा श्री के मन्दिर से सम्बन्धित
किया जा सकता है ।
यह स्थान आज शाह हमदान नाम से मुसलिम
जियारत है । यही पर दुर्गा नाग है । पादटिप्पणी
तरंग ३.३५२ द्रष्टव्य है ।
मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत 'देवी माहात्म्य' में देवी
का निर्देश दुर्गा नाम से किया गया है । विश्व व्यापक
आदि माया के लिये सामान्य नाम देवी प्रयुक्त किया
है । मार्कण्डेयपुराण में देवी का माहात्म्य बताने
के लिये 'सप्तशती' की रचना की गयी है । दुर्गा
को काली, लक्ष्मी एवं सरस्वती का अवतार माना
गया है । दुर्ग नामक असुर का वध करने के कारण
देवी का नाम दुर्गा पड़ा है ।
दुर्गा का महत्त्वपूर्ण स्थान देवी उपासना में
था । काश्मीर में निरंजन पर्व पर दुर्गा पूजा के समय
अस्त्र शस्त्रों की पूजा होती थी । यह पूजा दुर्गा
मन्दिर के अन्दर होती थी । (नी० 739, 740)
आश्विन की कृष्ण पक्ष अष्टमी को दुर्गा मन्दिर में
उपकरणों की पूजा होती थी । (नी० 786-89)
दुर्गा मन्दिर में पुस्तको की पूजा होती थी ।
(नो० 789) सरस्वती के मन्दिर में पुस्तकों की
पूजा होना साधारणतया माना गया है । परन्तु
यहाँ दुर्गा मन्दिर में पुस्तकों की पूजा से कुछ कौतूहल
उत्पन्न होता है । मैं समझता हूँ । दुर्गा सप्तशती