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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 984 में से

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पृष्ठ 627

४७४ राजतरंगिणी
त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यौ हेलयैव तम्।
पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥
४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस
काया को आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ?
न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् ।
न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया१ ॥ ४४ ॥
४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी
रक्षा नहीं करते।
तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः ।
शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥
४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने
पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी।"
उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः ।
अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥
४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो
चामुण्डा१ की अर्चना करते हुए कहा-
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५६वां
श्लोक है।
४६ (१) चामुण्डा: स्कन्द पुराण (५:१:३८)
में उल्लेख मिलता है। शुंभ तथा निशुंभ ने देवी
का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो
राक्षसों को भेजा था। देवी ने उनका वध किया।
चण्ड एवं मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं
निशुंभ का वध किया। अतएव देवी का नाम
चामुण्डा पड़ा।
रक्तबीज एक असुर था। वह शुम्भ निशुम्भ के पक्ष का योद्धा था। रुद्र के वर प्रभाव से उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पडते रक्त बूंद के बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था। चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी। असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी। चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया। (दे० भा० ५:२७-२९; मार्क० ८५, शिव० उमा ४७)
चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति ने 'मालती माधव' नाटक में किया है। नाटक के पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था।-