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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 984 में से

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पृष्ठ 636

तृतीय तरंग ४८३
अतिक्रामति¹ कालेऽथ कोऽपि शोकाकुलो द्विजः ।
पुत्रं गदार्तमादाय द्वारि चक्रन्द भूपतेः ॥ ८२ ॥
ब्राह्मण बालक की कथा
८२ कुछ काल अतिक्रान्त² होने पर, कोई शोकाकुल द्विज रोग से पीड़ित पुत्र को
लेकर, भूपति के द्वार पर क्रन्दन किया —
दुर्ग्या¹ प्रार्थितं राजन् पश्वाहारं विनैव मे ।
अनन्यसंततेः सूनुर्ज्वरेणाद्य व्यपद्यते ॥ ८३ ॥
८३. हे राजन् ! दुर्गा¹ वाञ्छित पशु आहार के बिना मेरा यह एक मात्र पुत्र
आज ज्वर से मृत हो रहा है।

पाठभेद :
श्लोक संख्यः ८२ में 'गदार्त' का पाठभेद
'गतासु' 'गदात्त' तथा 'गदातु' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८२ (१) बाण के हर्षचरित में इस प्रकार की
शब्दावली मिलती है—'अतिक्रामति काले—'
(२) द्विज द्वार क्रन्दन : रामायण में इसी
प्रकार की कथा का वर्णन है । भगवान् राम के द्वार
पर एक ब्राह्मण अपने अकालमृत्यु ग्रस्त ब्राह्मण
बालक को लेकर आया । राजा राम से प्रश्न किया ।
पुत्र की अकाल मृत्यु क्यो हुई ? राजा उसके लिये
उत्तरदायी है । राजा पुत्र को जीवित करे ।
वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड का सर्ग ७३ से
७६ सर्ग का संवाद राजनीति सिद्धान्त तथा प्रजा के
प्रति राजा का कर्तव्य का अनुपम् सिद्धान्त प्रति-
पादित करता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८३ में 'राजन्पश्वाहारं' का
पाठभेद 'राजन्नुपहारं' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
८३ (१) दुर्गा का यहाँ पर अर्थ कालिका लगाया
जाना उचित मालूम पड़ता है ।
दुर्गा का देवस्थान कहाँ था इसका अन्वेषण नहीं
हुआ है । श्री स्टीन तथा अन्य किसी पुरातत्त्ववेत्ता
ने इस पर प्रकाश नही डाला है ।

अनुमान मात्र लगाया जा सकता है । यह स्थान
दुर्गा नाग तथा दुर्गा श्री के मन्दिर से सम्बन्धित
किया जा सकता है ।
यह स्थान आज शाह हमदान नाम से मुसलिम
जियारत है । यही पर दुर्गा नाग है । पादटिप्पणी
तरंग ३.३५२ द्रष्टव्य है ।
मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत 'देवी माहात्म्य' में देवी
का निर्देश दुर्गा नाम से किया गया है । विश्व व्यापक
आदि माया के लिये सामान्य नाम देवी प्रयुक्त किया
है । मार्कण्डेयपुराण में देवी का माहात्म्य बताने
के लिये 'सप्तशती' की रचना की गयी है । दुर्गा
को काली, लक्ष्मी एवं सरस्वती का अवतार माना
गया है । दुर्ग नामक असुर का वध करने के कारण
देवी का नाम दुर्गा पड़ा है ।
दुर्गा का महत्त्वपूर्ण स्थान देवी उपासना में
था । काश्मीर में निरंजन पर्व पर दुर्गा पूजा के समय
अस्त्र शस्त्रों की पूजा होती थी । यह पूजा दुर्गा
मन्दिर के अन्दर होती थी । (नी० 739, 740)
आश्विन की कृष्ण पक्ष अष्टमी को दुर्गा मन्दिर में
उपकरणों की पूजा होती थी । (नी० 786-89)
दुर्गा मन्दिर में पुस्तको की पूजा होती थी ।
(नो० 789) सरस्वती के मन्दिर में पुस्तकों की
पूजा होना साधारणतया माना गया है । परन्तु
यहाँ दुर्गा मन्दिर में पुस्तकों की पूजा से कुछ कौतूहल
उत्पन्न होता है । मैं समझता हूँ । दुर्गा सप्तशती