राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४७५
सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः ।
जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥
४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल
निवासी गंगा स्नान (मज्जन) के आनन्द को नहीं जानते ।
ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् ।
ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥
४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते,
मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह (क्यों ?) बढ़ गया है ।
मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव ।
न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४९ ॥
४९. 'और कुछ मत कहो । यदि प्रहार करने में तुम्हें दया (आती) है, तो क्या
मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?'
इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः ।
खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥
५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के
खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकर, धारण कर लिया ।
ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः ।
करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥
५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और
किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१
अथापश्यत्तथाभूतः कञ्चिद्दिव्याकृतिं पुरः ।
न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥
५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । (किन्तु) चण्डिका, किरात,
दारक (शिशु) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया ।
पादटिप्पणियाँ :
४७(१) राजतरंगिणी सूक्तिका ५७वां श्लोक है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढ़ो' का पाठभेद 'मूढ़ो' मिलता है ।
श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५१ (१) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था । उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।