राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 620, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन' (बुद्ध) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमवापावर्णवर्जितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति' (सागर) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर (अन्य द्वीप पर) आक्रमण करने के लिये क्षण भर (उसने) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्तात्तेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह (मैं) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध किवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरुनी ने १:२४३
में श्रीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र १:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
प्रयास--।' २२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ट १३६ हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभूत'; 'जिन- २९ ( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद है । नदियों का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
'त्वदीय' मिलता है । गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पादटिप्पणियाँ : पालन किया है ।
( १ ) जिन : अनेक लेखकों ने जिन और जैन पाठभेद :
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका श्लोक संख्या ३० में 'सैनिकः' का 'सैनिकैः'
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पान्ते ते' तथा
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरों को विजेता 'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।