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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 984 में से

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पृष्ठ 622

तृतीय तरंग ४७१
अनात्मज्ञ धिगेतत्त्वे कुकर्मेति महीभुजा ।
तर्जितः स भयादेवं शबरस्तं व्यजिज्ञपत् ॥ ३४ ॥
३४. 'ओ अनात्मज्ञ ! कुकर्मी !! तुम्हें धिक्कार है ।'—राजा के इस प्रकार
वर्जित करने पर, भय से उस शबर ने उन्हें बताया-
शिशुर्मुमूर्षुर्मे राजन्नयं रोगादितः सुतः ।
कर्मैतद्देवैरुक्तमस्य श्रेयोल्पावद्दम् ॥ ३५॥
३५. 'हे राजन् ! रोग पीड़ित मेरा पुत्र यह शिशु मरणासन्न है । देवों-द्वारा कहा
गया, यह कर्म ( बलि) इसके लिये श्रेयस्कर है ।
उपहारनिरोधेन सद्य एव विपद्यते ।
बन्धुवर्गमशेषं च विद्ध्येतज्जीवजीवितम् ॥ ३६ ॥
३६. 'इस उपहार के निरोध से यह सद्यः (तत्काल) मृत हो जायगा । समस्त
बन्धु वर्ग को इसी के जीवन से जीवित जानिये ।
अरण्यगहनाल्लब्धमनाथं देव रक्षसि ।
बहुलोकाश्रयं बालं कथमेतमुपेक्षसे ॥ ३७ ॥
३७. देव ! गहन वन में प्राप्त अनाथ को आप रक्षा करते हैं फिर अनेकों के आश्रय-
भूत उस बालक की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ।
अथाभ्यधान्महात्मा स वचोभिः शबरस्य तैः ।
वध्यस्य दृष्टिपातैश्च विप्लवैश्चैवशीकृतः ॥ ३८ ॥
३८. उस महात्मा ( नृप) ने शबर की बातों एवं वध्य के कातर दृष्टिपातों से विवश
होकर कहा—
में भाग लिया था । सात्यकी ने इनका संहार एकादश पिशाचकाः ।"
किया था ।
पाठभेद :
३३ (२) आमटन : कल्हण का वर्णन श्लोक संख्या ३४ में 'अनात्मज्ञ' का 'धनात्मज्ञा'
पुराणों से मेल खाता है क्योकि यह स्थान दक्षिण और 'देवं' का 'देव' पाठभेद मिलता है ।
का समुद्र तट था जहाँ शबर से राजा को भेंट हुई
थी । शबर शिव भक्त थे। एकमत है कि वर्तमान श्लोक संख्या ३६ में 'एव' का पाठभेद 'एव'
भील जाति के शबर ही पूर्व पुरुष थे । मिलता है ।
एक मत शबर जाति को पिशाच के एकादश श्लोक संख्या ३८ में 'स वचोभिः' का पाठभेद
उपजातियो में एक मानता है । "शाबरं द्राविडं चैव 'सुवचोभिः' मिलता है ।