राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. “पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तेऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
( उसे ) सुनकर, आप क्रोध से-'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिताः ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोञ्ज्वल आनन राजा बोले-“वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय,"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह ( नृप ) राजाओं को हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियाँ :
है। मैंने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोकों २४ ( १ ) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चक्कलं-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्म्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियाँ :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि ते' मिलता है। २७ ( १ ) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..