राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 632, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४५९
कल्पद्रुमाश्च सन्तश्च नार्हन्ति समशीर्षिकाम् ।
अर्थिनां प्रार्थिताः पूर्वे फलन्त्यन्ये स्वयं यतः¹ ॥ ६४ ॥
६४. “कल्पद्रुम एवं सन्त सम कोटि में होने योग्य नही । क्योकि प्रथम ( कल्पद्रुम )
आकांक्षी के प्रार्थना करने पर तथा अन्य ( सन्त ) स्वतः फल देते हैं ।
अत्रालम्बिष्यत छत्रं कथं नः पुण्यपण्यताम् ।
तत्रार्थयिष्यत न चेदार्तोपकृतये भवान् ॥ ६५ ॥
६५. "छत्र हमारे पुण्य पण्यता को कैसे प्राप्त करता, यदि आप आर्त के उपकार
हेतु न प्रार्थित होते ।”
वदान्यः संविभागेभ्यः पूर्णं कुर्यादनुग्रहम् ।
छाययाऽऽप्याययन्दद्यात्फलान्यपि महीरुहः¹ ॥ ६६ ॥
६६. वदान्य² संविभाग ( दान ) पूर्वक अनुग्रह पूर्ण करता है, क्योंकि महीरुह
( वृक्ष ) छाया द्वारा सन्तुष्ट करता हुआ, फल प्रदान करता है ।
तदेवं विहितोदात्तसंभागाभिचोदितः ।
जनोऽयं भगवन्किञ्चिद्वरं प्रार्थयतेऽपरम् ॥ ६७ ॥
६७. 'भगवन् ! आपके इस प्रकार के उदात्त व्यवहार से प्रोत्साहित, यह जन एक
अन्य वर की प्रार्थना करता है ।
पादटिप्पणियाँ : 'भागेभ्यः' का 'भागेभ्यः' तथा 'वदण्यत्' का
६४(१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का पाठभेद 'दध्यात्' मिलता है ।
५८ वाँ श्लोक है । पादटिप्पणियाँ :
६६ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
मेघवाहन वरुण को प्रार्थना आरम्भ ५९ वां श्लोक है ।
करता है । सम शीर्षिकाम् शब्द का यहाँ
कल्हण ने प्रयोग किया है । सम का अर्थ समान ( २ ) वदान्य : सबको दान देने के लिये जो
तथा शीर्ष का अर्थ शिर होता है । इसका शाब्दिक कहता है, उसे वदान्य कहते हैं ।
अर्थ सन्तुलित मस्तिष्क लगाया जा सकता है । इस पाठभेद :
शब्द का उल्लेख पुनः कल्हण ने ३:१३५ में श्लोक संख्या ६७ में 'तदेवं' का 'तदेव' और
किया है । 'अपरम्' का पाठभेद 'परम्' मिलता है ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ
श्लोक संख्या ६५ में 'न' का पाठभेद 'न' ६७ (१) वर : वरुण के द्वारा छत्र स्वीकार
मिलता है । कर लेने पर उत्साहित होकर, अपने उपकार का
प्रत्युपकार पाने की अभिलाषा,-से राजा वर की
श्लोक संख्या ६६ में 'वदान्य' का 'वदन्यः' आकाँक्षा करता है ।