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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

४८४ राजतरंगिणी
यद्यहिंसाऽऽग्रहेणेमं क्षितिपाल न रक्षसि ।
एतद्विपत्तौ तत्कोऽन्यो निमित्तं प्रतिभाति मे ॥ ८४ ॥
८४. 'हे क्षितिपाल ! यदि अहिंसा के आग्रह से इसकी रक्षा नहीं करते हो, तो
इसकी विपत्ति में दूसरा और कौन कारण है।
निर्णयो वर्णगुरुणा त्वयैवैष प्रदीयताम् ।
ब्राह्मणस्य पशोर्वा स्यात्प्राणानां कियदन्तरम् ॥ ८५ ॥
८५. 'वर्ण गुरु' आप ही इसका निर्णय दें कि, ब्राह्मण और पशु के प्राण में कितना
अन्तर है'।
तपःस्थानपि ये जघ्नुर्ब्राह्मणप्राणलब्धये ।
हा मातस्तेऽधुना भूमे प्रजापालास्तिरोहिताः ॥ ८६ ॥
८६. “हा भूमि माता ! तुम्हारे वे भूमिपाल (अद्य) तिरोहित हो गये, जिन्होंने
ब्राह्मण प्राणोपलब्धि हेतु तपस्वियों२ का भी वध किया।"
आदि दुर्गा देवी सम्बन्धी ग्रन्थों से ही यहाँ तात्पर्य
है। दरा मजरी पूजा के दिन दुर्गा को इरा पुष्प
अर्पित किया जाता था । (नी० 668-78)
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८५ मे 'प्राणाना' का पाठभेद
'प्राणिना' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
८५ (१) वर्णगुरुः इस शब्द का यहाँ अर्थ राजा
है । एक अनुवादक ने वर्ण गुरु का अर्थ चारों वर्ण का
रक्षक किया है । यहा वर्ण गुरु शब्द भूपाल, पृथ्वी-
पति, क्षितिपाल आदि के समान राजा का विशेषण
है जिसका अर्थ राजा होता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८६ मे 'तपःस्था' का 'उपस्तथा'
तथा 'भूमे' का 'भूमे' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
८६ (१) भूमि माताः कल्हण ने वैदिक सिद्धान्त
का यहाँ प्रतिपादन किया है । वैदिक साहित्य में पृथ्वी
को माता कहा है । ऋग्वेद में पृथ्वी माता तथा देवी
रूप उसे सम्बोधित किया गया है । पृथ्वी का अर्थ
भूमि है। तैत्तिरीय ब्राह्मण कहता है—'इयं वै माता'
( ३:८:९:१ ) 'तन्माता पृथ्वी तद् द्यौः' ( तै० ब्रा०
२:७:१६:३०) 'धेनुरिव वा इयं मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान्
दुहे माता धेनुर्मातेव वा इयं मनुष्यान् विभर्ति'
( श० ब्रा० २:३:१:२१ )
मोहन्दो जोरो तथा अनेक प्राचीन वैदिक किंवा
अर्धवैदिक कालीन स्थानो के खनन में पृथ्वी को माता
के रूप मे मृत्तिका टेबलेट आदि पर चित्रित किया
गया है । ( इण्डियन एण्ड इन्डोनीशियन आर्ट )
कुमार स्वामी प्लेट ३० आकृति १०५ ।
पृथ्वी को माता कहने का भाव भी बंकिमचन्द्र
चट्टोपाध्याय के आनन्द मठ में निहित गान
'वन्देमातरम्' मे आ जाता है । रा० तरं० ८:१२३६
श्लोक भी द्रष्टव्य है ।
(२) तपस्वी - कल्हण का अभिप्राय यहाँ
रामायण की प्रसिद्ध कथा शम्बूक से है। ब्राह्मण
बालक की मृत्यु के कारण जानने पर तपस्वी
होने पर भी शम्बूक की हत्या कर राम ने ब्राह्मण
बालक को जीवित किया था । शम्बूक एक शूद्र थे

तृतीय तरंग ४८५
इति ब्रुवति साक्षेपं शोकरूक्षाक्षरं द्विजे।
आपन्नार्तिहरो राजा चिरमेवं व्यचिन्तयत् ॥ ८७ ॥
८७. इस प्रकार द्विज के आक्षेप पूर्वक शोक से कटु भाषण करने पर, दुःखियों के
दुःख का हरण कर्ता (परार्तिहर) राजा चिरात् इस प्रकार सोचा—
न वध्याः प्राणिन इति प्राङ्मया समयः कृतः ।
विप्रार्थमपि किं कुर्यां संप्रतिज्ञातविप्लवम् ॥ ८८ ॥
८८. “प्राणी वध्य नहीं हैं।” पूर्व में मैंने ऐसा प्रण किया है, अब क्या विप्र के लिये
भी मैं प्रतिज्ञा भंग करूँ।
निमित्तीकृत्य मामद्य विपद्येत द्विजो यदि ।
तत्राऽप्यत्यन्तपापीयानर्थः संकल्पविप्लवः ॥ ८९ ॥
८९. मुझे निमित्त बनाकर, यदि द्विज मृत हो गया, तो यहाँ भी अत्यन्त पापभय
संकल्प विप्लव होगा।
नैति मे संशयभ्रान्तमेकपक्षावलम्बनम् ।
संभेदावर्तपतितं प्रसूनमिव मानसम् ॥ ९० ॥
९०. ‘संशय भ्रान्त मेरा मन उसी प्रकार किसी एक पक्ष का अवलम्बन नहीं कर पा
रहा है, जैसे संगम के आवर्त में पतित कुसुम ।
तत्स्वदेहोपहारेण दुर्गां तोषयता मया ।
प्रतिज्ञया समं न्याय्यं रक्षितुं जीवितं द्वयोः ॥ ९१ ॥
९१. 'तो दुर्गा को अपने देह के उपहार से सन्तुष्ट करके, प्रतिज्ञा के साथ दोनो की
प्राण रक्षा न्याय्य है।'
शाखा में शिर नीचा और पैर ऊपर कर शाखा पाठभेद :
में लटकता तपस्या कर रहा था। (वाल्मीकि श्लोक संख्या ८८ में 'प्राङ्मया समयः कृतः'
रामायण उत्तर काण्ड सर्ग ७५ तथा ७६ ) का 'प्राग्योऽस्मि समकल्पयम्' तथा 'संप्रति' का
रामायण की इस कथा का उल्लेख भवभूति के पाठभेद 'स प्रति' मिलता है ।
प्रसिद्ध नाटक उत्तररामचरित के प्रथम अंक में श्लोक संख्या ९१ में 'जीवितं' का पाठभेद
मिलता है। 'जीवितु' मिलता है।

४८६ राजतरंगिणी
इति संचिन्त्य सुचिरं देहदानोद्यतो नृपः ।
श्वः प्रियं तव कर्ताऽस्मीत्युक्त्वा विप्रं व्यसर्जयत् ॥ ९२ ॥
९२. देह दान के लिये उद्यत नृप ने चिरकाल तक इस प्रकार सोचा। "कल मैं
तुम्हारा प्रिय (कार्य) करूँगा"- ऐसा कहकर विप्र को विसर्जित किया।
क्षपायां क्ष्मापतिमथ स्वमुपाहर्तुमुद्यतम् ।
निषिध्य दुर्गा व्यधित प्रकृतिस्थं द्विजन्मजम् ॥ ९३ ॥
९३. रात्रि में दुर्गा ने अपने को उपहार करने हेतु उद्यत नृपति को निषिद्ध कर, द्विज
पुत्र को प्रकृतिस्थ (नीरोग) कर दिया।
इत्याद्यद्यतनस्यापि चरितं तस्य भूपतेः ।
पृथग्जनेष्वसंभाव्यं वर्णयन्तस्त्रपामहे ॥ ९४ ॥
९४. अन्य लोगों में असम्भव, उस विगत भूपति के चरित का वर्णन करते, हम
लज्जित हो रहे हैं।
अथवा रचनानिर्विशेषमार्गेण वर्त्मना ।
प्रस्थिता नानुरुन्धन्ति श्रोतृचित्तानुवर्तनम् ॥ ९५ ॥
९५. अथवा आर्ष मार्ग से प्रस्थित रचना में निर्विशेष श्रोता के चित्तानुवर्तन का
अनुरोध नहीं करते हैं।
तस्मिंस्तं गते भुक्त्वा क्ष्मा चतुस्त्रिंशतं समाः ।
अनादित्यमिवाऽशेषं निरालोकमभूज्जगत् ॥ ९६ ॥
९६. पृथ्वी का चातीस वर्ष भोग करने के पश्चात्, राजा के अस्त हो जाने पर,
सम्पूर्ण जगत् बिना सूर्य के प्रकाश रहित जैसा हो गया।
पादटिप्पणियाँ : बात उठाकर अपने काव्य को पवित्र कहने का
९५ (१) आर्ष. श्री रणजीत सीताराम पण्डित प्रयास करता है ।
श्लोक ९४ तथा ९५ पर टिप्पणी करते अपना मत ९६ (१) मूल्यांकन : मेघवाहन शान्त शासक
प्रकट करते हैं कि कल्हण ने अपने समय के पाठकों था। वह तपस्वी था। योगी था। महान् आत्मा
के मनोभाव को परख लिया था। वे रहस्यमय तथा था। आध्यात्मिक प्राणी या। तथापि वह शक्ति-
काव्यमय गाथा को बिना उसका उपहास किये शाली राजा था। चतुर शासक था। आदर्श राज्य
सुनने के लिये तैयार नहीं थे। अतएव कल्हण ने की उसने कल्पना की। उसने राज्य का आधार
यहाँ स्वयं स्पष्टीकरण किया है। वह यही स्पष्टीकरण शक्ति तथा दण्डनीति की अपेक्षा प्रेम एवं मन
करता है कि उसने प्राचीन काव्यपरम्परा का परिवर्तन (र महात्मा गान्धी की तरह विश्वास
निर्वाह तथा अनुसरण किया है। कल्हण यहाँ पर किया। उसने मनुष्य को कृतघ्न, क्रूर, आततायी,
आर्ष शब्द का प्रयोग कर ऋषिकृत, प्रयुक्त एवं निर्भय प्राणी नहीं माना। उसने मनुष्य में मानवता
वैदिक परम्परा क्रिया मार्ग के अनुकरण करने की देखने का प्रयास किया और उसे पाया। उसने

तृतीय तरंग ४८७
अथ क्ष्माभृदरक्षत् क्ष्मां श्रेष्ठसेनस्तदात्मजः ।
प्राहुः प्रवरसेनं यं तुञ्जीनं चाञ्जसा जनाः ॥ ९७ ॥
श्रेष्ठसेन ( प्रवरसेन प्रथम तुञ्जीन द्वितीय )
९७. अथ ( अनन्तर ) उसके पुत्र राजा श्रेष्ठसेन ने पृथ्वी की रक्षा की जिसे लोग
प्रवरसेन एवं तुंजीन कहते हैं।
अपने में, प्रजा में, तपस्वी में तथा विरोधी प्रवृत्ति
वालो के मध्य भेद पाटने का स्तुत्य प्रयास सर्वदा
किया । और उसमें सफल रहा ।
अशोक ने भेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष
किया था। प्रजातुरक्त मेघवाहन ने अहिंसा को
सार्वजनिक रूप देने के लिए, दिग्विजय की
कल्पना की । दिग्विजय द्वारा उसने अहिंसा
को व्यापक बनाने का प्रयास किया । उसकी
दिग्विजय यात्रा में उसके विचारों को जिसने स्वीकार
किया उसे उसने उनके राज्य तथा शक्ति से च्युत नहीं
किया । उसने व्यर्थ हिंसा का आश्रय नहीं लिया ।
उसका चरित्र निखर उठता है। कल्हण ने उसे
इस प्रकार चित्रित किया है कि वह अपने पवित्र
व्यक्तिगत व्यवहार, विचारों के कारण भारतवर्ष
के नृपतियों की श्रेणी में अशोक से भी ऊँचा स्थान
पाने का पात्र है। किसी मत-मतान्तर का खण्डन
किंवा मण्डन न कर उसने एक सरल, सीधा, मर्यादित
पथ का अनुकरण किया । वह पथ निराला था ।
अनुपम था । शान्त था । उसका आशय प्रिय था ।
वह राज मद से दूर था । परन्तु वह जानता था ।
राज्य की शक्ति सेना भी है। उस सैनिक शक्ति
को शिथिल होने नहीं दिया। उस शक्ति को मजबूत
बना कर उसका प्रयोग अत्यन्त उत्तम उदात्त
अहिंसा सिद्धान्त को क्रियात्मक रूप देने का प्रयास
किया। अहिंसा के कारण कसाइयों किंवा पशु हरण
पर जीवित रहने वालों को बेकारी का अनुभव कर
उनको जीविका का भी प्रबन्ध किया। वह दूरदर्शी,
व्यावहारिक एवं प्रजाप्रिय राजा था। उसने भगवान्
बुद्ध के उपदेशों को अपने व्यक्तिगत चरित्र, त्याग,
तपस्या एवं राज्य की सैनिक शक्ति से भारत में
प्रचारित किया । उपदेश एवं सिद्धान्त को मानसिक
स्तर से उतार कर जीवन दर्शन में उतारा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९७ में 'प्राहुः' का पाठभेद
'आहुः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
९७ (१) श्री विल्सन अभिषेक काल सन् ५७
ई० ९ मास तथा राज्य काल सन् ३० वर्ष २ मास
देते हैं ।
श्री एस. पी. पण्डित यह समय सन् ८८ ई०
तथा राज्य काल ३० वर्ष देते हैं ।
श्री स्टीन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३१३२
तथा राज्य काल ३० वर्ष देते हैं ।
श्री वाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४००९ तथा
सन् २३९ ई० देते हैं। कलि गताब्द ३१८४ वर्ष
४ मास आता है। ड्रायर यह समय सन् ५८ वर्ष
६ मास देते हैं। कनिंघम के मत से यह काल सन्
४०० ई० होना चाहिए । आइने अकबरी ने
'सरेशमेन' नाम दिया है ।
बिदउद्दीन श्रेष्ठसेन की गाथा में बहुत कुछ
परिवर्धन करता है। उसका कहना है कि राजा ने
खोट के साथ राजसिंहासन पर अपनी माता को
बैठा दिया। उसने अपने साम्राज्य की सीमा खतई,
चीन तथा मचोन तक फैला ली, बिदउद्दीन कोई
प्रमाण उपस्थित नहीं करता कि उसने इस घटना
का वर्णन कहाँ से प्राप्त किया है। यह गलत है।
हसन कहता है-संवत् विक्रमी ६८ में राजा
श्रेष्ठसेन बाप के इन्तकाल के बाद तख्त नशीन
हुआ। मुल्क की रस्म जब्त्त और अदल व इन्साफ
काम लेने में हद से ज्यादा कोशिश की। मातृ चक्र

४८८ राजतरंगिणी
दोःस्तम्भसंभृतासक्तौ कृपाणमणिदर्पणे ।
संक्रान्तेवोन्मुखी यस्य भुवनश्रीन्र्यभाव्यत ॥ ९८ ॥
९८. जिसके बाहु स्तम्भ से लगे कृपाण मणि दर्पण में उत्सुक भुवन श्री प्रतिबिम्बित
हो रही थी ।
समातृचक्रं निर्माय यः पूर्वं प्रवरेश्वरम् ।
पुण्याः पुराणाधिष्ठाने प्रतिष्ठा विविधा व्यधात् ॥ ९९ ॥
९९. जिसने पुराणाधिष्ठान१ में प्रथम मातृचक्र सहित प्रवरेश्वर का निर्माण करके
विविध पुण्य प्रतिष्ठा की ।
गृह्याङ्गनमिव क्षोणीं गणयन्वशवर्तिनीम् ।
त्रिगर्तेवीं ग्रामसंख्ये प्रवरेशाय यो ददौ ॥ १०० ॥
१००. जिसने वशवर्तिनी पृथ्वी को गृह आंगन तुल्य गिनते हुए, ग्रामो सहित त्रिगर्त२
भूमि प्रवरेश्वर को दी ।
और बीरेश्वर का मन्दिर अपनी यादगार में छोडा ।
इलाका कामड, की पैदावार उसके इखराजात के
लिए वकफ की । तीस बरस हुकूमत करके दुनिया
से रुखसत हुआ । दो बेटे हिरन और तोरमान नामी
अपने पीछे छोडे ।
९८ (१) बाण ने हर्ष चरित में इसी प्रकार
की शब्दावली का प्रयोग किया है—'कृपाणदर्पणेपु'
९९ (१) पुराणाधिष्ठान : योगवासिष्ठ रामायण
में अधिष्ठान नगर का उल्लेख मिलता है । कल्हण ने
प्रतिष्ठान शब्द का प्रयोग किया है । कल्हण के समय
अधिष्ठान पुराने नगर के रूप में रह गया था ।
अतएव पुराणाधिष्ठान किंवा पुराधिष्ठान की संज्ञा
दी गयी । यह स्थान पण्डरेथन है । महाराज यशस्कर
के समय वह पुराणाधिष्ठान की संज्ञा नहीं प्राप्त
कर सका था । मालूम होता है उस समय वहाँ
यथेष्ट आबादी थी और नवीन नगर में वह
मिला था ।
अधिष्ठान का अर्थ नगर होता है । पुराणा-
धिष्ठान का अर्थ पुराना नगर होगा ।
श्लोक १:१०४ की टिप्पणी पृष्ठ १३८ तथा
५:२६७ द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०० में 'संख्ये' का 'मध्ये' तथा
'ददौ' का पाठभेद 'दधौ' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०० (१) बाण ने इसी प्रकार की शब्दावली
का प्रयोग किया हो 'अंगनवेदी वसुधा—।'
(२) त्रिगर्त : कांगड़ा क्षेत्र को त्रिगर्त
कहते हैं । यह क्षेत्र चम्बा पर्वतमाला तथा व्यास
नदी के ऊर्ध्व भाग में है । त्रिगर्त प्राचीन काल
में जालन्धर राज्यान्तर्गत था । इन्द्रचन्द्र कटोच
राजाओं में कांगडा के थे । जिनका उल्लेख तरंग
७:१५० में कल्हण ने किया है । इसका पुनः उल्लेख
८:१५३१ किया गया है ।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी में त्रिगर्त का उल्लेख
किया है । पाणिनि का काल मध्य छठवी शताब्दी
बी. सी. कहा जाता है । कुछ सूत्रों में स्पष्ट और
कुछ सूत्रों में गौण रूप से 'प्राच्यभर्गादियोधेयादिभ्यः'
उल्लेख किया गया है । भर्गादि में, भर्ग, करूष,
कश्मीर, शाल्व देश आते है । योधेयादि में त्रिगर्त

तृतीय तरंग ४८६

तथा योधेय सम्मिलित थे । योधेय का अर्थ आयुध-
जीवो संघ कहना उचित होगा । शस्त्रोपजीवी
होने के कारण उन्हें क्षत्री माना जाता था । महा-
भारत में सभा पर्व (३७:७:३२; ५२:१४-१५)
में त्रिगर्त पाण्डवों से पराजित हो गया था । सभा
पर्व ८:२० में उन्हें क्षत्री कहा गया है। मार्कण्डेय
पुराण में उल्लेख आता है :
कर्णप्रावरणाश्चैव हूणाश्चाः सकृच्छ्रुकाः ।
त्रिगर्ता मालवाश्चैव किरातास्तामसैः सह ॥
मार्कण्डेय तथा वायुपुराण में 'त्रिगर्ता माल-
वाश्चैव, पुनः मार्कण्डेय पुराण में 'त्रिगर्ता मालवा
श्चैव' ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिगर्ता मालवाश्चैव'
वामन में 'त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमराः शशि-
खादिकाः' उल्लेख मिलता है ।
वामन पुराण पर्वताश्रयी देशों में चौदह आदि
की तालिका में त्रिगर्त को रखा गया है । वामन०
१३:५६-५७
'कर्ण प्रावरण, हूण, दार्ब, त्रिगर्त, मालव,
किरातादि हिमालय की पर्वतीय जातियां हैं । मालव
शब्द से भ्रम हो सकता है । वे कही वर्तमान मालवा
के समीप तो नहीं थे । प्राचीन काल में सप्त मालव
का उल्लेख मिलता है । त्रिगर्त वर्तमान जालन्धर
तथा कांगड़ा अंचल कहा जाता है। यहां पर वर्णित
मालव शब्द सतलज क्षेत्र के लिये आया है ।
किरात जाति आधुनिक किरात्तो है । इसी जाति
ने कभी नेपाल के एक भाग पर शासन किया था ।
स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में त्रिगर्त
का नाम नहीं है । परन्तु क्रम संख्या १४ पर जाल-
न्धर का नाम दिया गया है। मालूम होता है । उस
समय त्रिगर्त जालन्धर क्षेत्र में मान लिया गया था ।
क्योकि तोमर देश की क्रम संख्या ५४ स्कन्द पुराण
में दी गयी है । निस्सन्देह जालन्धर का क्षेत्र बहुत
विस्तृत था ।
प्राचीन त्रिगर्त रावी तथा सतलज नदी के मध्य,
जालन्धर का प्रदेश था । प्राचीन ग्रन्थों में कांगड़ा
६२

का नाम त्रिगर्त दिया गया है । मेरे अनेक कांगड़ा
निवासी मित्र जो भारतीय संसद् के सदस्य हैं,
स्पष्ट कहते हैं-कांगड़ा ही प्राचीन त्रिगर्त देश है।
जनरल कनिघम का मत है कि कांगड़ा ही त्रिगर्त
देश है । चम्बा पर्वतमाला तथा व्यास नदी के
ऊर्ध्व भाग में स्थित है । उनका यह भी मत है कि,
त्रिगर्त क्षेत्र तीन नदियो अर्थात् रावी, व्यास एवं
सतलज द्वारा सिंचित होता था । प्रोफेसर जानसन
का मत है कि कटोच राज्य त्रिगर्त देश कहा
जाता है ।
मै स्वयं कागडा मे घूमा हूँ । स्थानीय राजाओं
से भी भेंट की थी । यह जनश्रुति सुदूर प्राचीन
काल से चली आती है कि त्रिगर्त कागड़ा
है । इसी का वर्णन महाभारत तथा पुराणो
में किया गया है । कल्हण ने त्रिगर्त का पुनः
उल्लेख ३:१००, २८५, ५:२४४, ७:२२४, तथा
८:५३० में किया है ।
दशकुमार चरित में तीन धनाढय कुलो के
त्रिगर्त जनपद में निवास करने का मित्रगुप्त के
पर्यटन सन्दर्भ में उल्लेख मिलता है । उस समय
१२ वर्षों का भयंकर अवर्षा था । नदियाँ तक
सूख गयी थी । हेमचन्द ने अभिधान चिन्तामणि
में त्रिगर्त तथा जालन्धर का समानार्थक रूप में
प्रयोग किया है ।
वर्तमान पंजाब का उत्तरी पूर्वीय भाग जो
चम्बा से कागडा तक विस्तृत है और जो इस
समय हिमालय प्रदेश में है, त्रिगर्त कहा जाता था ।
सतलज, व्यास तथा रावी नदियों की तीन घाटियों
अर्थात् गर्त किंवा द्रोणियों के कारण इसको त्रि
तीन गर्त (घाटी ) कहा जाता था ।
इसका नाम जालन्धरायण भी था । रावी तथा
व्यास के संकुचित मार्ग से देश में प्रवेश होता था ।
आज भी यह मार्ग चलता है । गुरदासपुर तथा
पठानकोट के जिले त्रिगर्त राज्यान्तर्गत थे । यहाँ
से औदुम्बर गणराज्य की मुद्रायें प्राप्त हुई है।

४८८ राजतरंगिणी
दोःस्तम्भसंभृतत्रासको कृपाणमणिदर्पणे ।
संक्रान्तेवोन्मुखी यस्य भुवनश्रीन्यरभाव्यत ॥ ९८ ॥
९८. जिसके बाहु स्तम्भ से लगे कृपाण मणि दर्पण में उत्सुक भुवन श्री प्रतिबिम्बित
हो रही थी ।
समातृचक्रं निर्माय यः पूर्वं प्रव्ररेश्वरम् ।
पुण्याः पुराणाधिष्ठाने प्रतिष्ठा विविधा व्यधात् ॥ ९९ ॥
९९. जिसने पुराणाधिष्ठान¹ में प्रथम मातृचक्र सहित प्रवरेश्वर का निर्माण करके
विविध पुण्य प्रतिष्ठा की ।
गृहाङ्गनमिव क्षोणीं गणयन्यशवर्तिनीम् ।
त्रिगर्तावर्ता ग्रामसंख्ये प्रवरेशाय यो ददौ ॥ १०० ॥
१००. जिसने वशवर्तिनी पृथिवी को गृह आंगन तुल्य गिनते हुए, ग्रामो सहित त्रिगर्त²
भूमि प्रवरेश्वर को दी ।

और वीरेश्वर का मन्दिर अपनी यादगार मे छोडा । श्लोक १:१०४ की टिप्पणी पृष्ठ १३८ तथा
इलाका बागढ़ की पैदावार उसके इखराजात के ५:२६७ द्रष्टव्य है ।
लिए वक़्फ़ की । तीस बरस हुकूमत करके दुनिया पाठभेद :
से रुखसत हुआ । दो बेटे हिरन और तोरमान नामी श्लोक संख्या १०० में 'संख्ये' का 'मध्ये' तथा
अपने पीछे छोडे । 'ददौ' का पाठभेद 'दधौ' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
९८ (१) बाण ने हर्ष चरित में इसी प्रकार १०० ( १ ) बाण ने इसी प्रकार की शब्दावली
की शब्दावली का प्रयोग किया है—'कृपाणदर्पणेपु' का प्रयोग किया हो 'अंयतवेशी वसुधा—।'
( २ ) त्रिगर्त : कांगड़ा क्षेत्र को त्रिगर्त
९९ (१) पुराणाधिष्ठान : योगवासिष्ट रामायण कहते हैं । यह क्षेत्र चम्बा पर्वतमाला तथा व्यास
में अधिष्ठान नगर का उल्लेख मिलता है । कल्हण ने नदी के ऊर्ध्व भाग में है । त्रिगर्त प्राचीन काल
प्रतिष्ठान शब्द का प्रयोग किया है । कल्हण के समय में जालन्धर राज्यान्तर्गत था । इन्द्रचन्द कटोच
अधिष्ठान पुराने नगर के रूप में रह गया था । राजाओं में कांगडा के थे । जिनका उल्लेख तरंग
अतएव पुराणाधिष्ठान किंवा पुराधिष्ठान की संज्ञा ७.१५० में कल्हण ने किया है । इसका पुनः उल्लेख
दी गयी । यह स्थान पण्डरेठन है । महाराज यशस्कर ८:१५३१ किया गया है ।
के समय यह पुराणाधिष्ठान की संज्ञा नहीं प्राप्त पाणिनि ने अष्टाध्यायी में त्रिगर्त का उल्लेख
कर सका था । मालूम होता है उस समय वहाँ किया है । पाणिनि का काल मध्य छठवी शताब्दी
यथेष्ट आबादी थी और नवीन नगर में वह बी. सी. कहा जाता है । कुछ सूत्रों में स्पष्ट और
मिला था । कुछ सूत्रों में गौण रूप मे 'दामन्यादित्रिगर्तषष्ठाच्छः'
अधिष्ठान का अर्थ नगर होता है । पुराणा- उल्लेख किया गया है । गर्गादि में, भर्ग, कहप,
धिष्ठान का अर्थ पुराना नगर होगा । कहमोर, शाल्व देश आते हैं । यौधेयादि में त्रिगर्त

तृतीय तरंग ४८६
तथा यौधेय सम्मिलित थे। यौधेय का अर्थ आयुध-
जीवी संघ कहना उचित होगा। शस्त्रोपजीवी
होने के कारण उन्हें क्षत्री माना जाता था। महा-
भारत में सभा पर्व (२७:७:१२; ५२:१४-१५)
में त्रिगर्त पाण्डवों से पराजित हो गया था। सभा
पर्व ८:२० में उन्हें क्षत्री कहा गया है। मार्कण्डेय
पुराण में उल्लेख आता है :
कर्णप्रावरणाश्चैव हूणादार्वाः सहुण्डुकाः ।
त्रिगर्ता मालवाश्चैव किरातास्तामसैः सह ॥
मार्कण्डेय तथा वायुपुराण में 'त्रिगर्ता माल-
वाश्चैव, पुनः मार्कण्डेय पुराण में 'त्रिगर्ता मालवा
श्चैव' ब्रह्माण्ड पुराण में 'त्रिगर्ता मालवाश्चैव'
वामन में 'त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमरा. शशि-
खाद्रिकाः' उल्लेख मिलता है ।
वामन पुराण पर्वताश्रयी देशो मे चौदह आदि
की तालिका में त्रिगर्त को रखा गया है। वामन०
१३:५६-५७
'कर्ण प्रावरण, हूण, दार्व, त्रिगर्त, मालव,
किरातादि हिमालय की पर्वतीय जातियां हैं। मालव
शब्द से भ्रम हो सकता है। वे कहीं वर्तमान मालवा
के समीप तो नहीं थे। प्राचीन काल में सप्त मालव
का उल्लेख मिलता है। त्रिगर्त वर्तमान जालन्धर
तथा कांगड़ा अंचल कहा जाता है। यहां पर वर्णित
मालव शब्द सतलज क्षेत्र के लिये आया है।
किरात जाति आधुनिक किराती है। इसी जाति
ने कभी नेपाल के एक भाग पर शासन किया था।
स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में त्रिगर्त
का नाम नही है। परन्तु क्रम संख्या १४ पर जाल-
न्धर का नाम दिया गया है। मालूम होता है। उस
समय त्रिगर्त जालन्धर क्षेत्र में मान लिया गया था।
क्योकि तोमर देश की क्रम संख्या ५४ स्कन्द पुराण
में दी गयी है। निस्सन्देह जालन्धर का क्षेत्र बहुत
विस्तृत था।
प्राचीन त्रिगर्त रावी तथा सतलज नदी के मध्य,
जालन्धर का प्रदेश था। प्राचीन ग्रन्थों में कांगड़ा
का नाम त्रिगर्त दिया गया है। मेरे अनेक कांगड़ा
निवासी मित्र जो भारतीय संसद् के सदस्य हैं,
स्पष्ट कहते हैं-कांगड़ा ही प्राचीन त्रिगर्त देश है।
जनरल कनिघम का मत है कि कांगड़ा ही त्रिगर्त
देश है। चम्बा पर्वतमाला तथा ब्यास नदो के
ऊर्ध्व भाग में स्थित है। उनका यह भी मत है कि,
त्रिगर्त क्षेत्र तीन नदियां अर्थात् रावी, ब्यास एवं
सतलज द्वारा सिंचित होता था। प्रोफेसर जानसन
का मत है कि कटोच राज्य त्रिगर्त देश कहा
जाता है।
मै स्वयं कांगडा में घूमा हूँ। स्थानीय राजाओ
से भी भेंट की थी। यह जनश्रुति सुदूर प्राचीन
काल से चली आती है कि त्रिगर्त कांगड़ा
है। इसी का वर्णन महाभारत तथा पुराणो
में किया गया है। कल्हण ने त्रिगर्त का पुनः
उल्लेख ३ १००, २८५, ५:१४४, ७:२२४, तथा
८:५३० में किया है।
दशकुमार चरित में तीन धनाढ्य कुलों के
त्रिगर्त जनपद में निवास करने का मित्रगुप्त के
पर्यटन सन्दर्भ में उल्लेख मिलता है। उस समय
१२ वर्षों का भयंकर अवर्षण था। नदियां तक
सूख गयी थी। हेमचन्द ने अभिधान चिन्तामणि
में त्रिगर्त तथा जालन्धर का समानार्थक रूप में
प्रयोग किया है।
वर्तमान पंजाब का उत्तरो पूर्वीय भाग जो
चम्बा से कांगड़ा तक विस्तृत है और जो इस
समय हिमालय प्रदेश में है, त्रिगर्त कहा जाता था।
सतलज, ब्यास तथा रावी नदियों की तीन घाटियां
अर्थात् गर्त किंवा द्रोणियों के कारण इसको त्रि
तीन गर्त (घाटी) कहा जाता था।
इसका नाम जालन्धरायण भी था। रावी तथा
ब्यास के संकुचित मार्ग से देश में प्रवेश होता था।
आज भी यह मार्ग चलता है। गुरदासपुर तथा
पठानकोट के जिले त्रिगर्त राज्यान्तर्गत थे। यहां
से औदुम्बुर गणराज्य की मुद्रायें प्राप्त हुई है।
६२

४९० राजतरंगिणी
ईशो नृपाणां निश्शेषक्ष्माकेदारकुटुम्बिनाम् ।
स समास्त्रिंशतं भूपृदनिस्त्रिंशाशयोऽभवत् ॥ १०१ ॥
१०१. समस्त पृथ्वी क्षेत्र को कुटुम्बी१ समझने वाले नृपों का अधीश्वर निष्क्रूर राजा
ने तीस वर्ष शासन किया।
हिरण्यतोरमाणाख्यौ व्यधत्तामथ तत्सुतौ ।
साम्राज्ययुवराजत्वभाजने रञ्जनं क्षितेः ॥ १०२ ॥
१०२. साम्राज्य एवं युवराज पद के पात्र हिरण्य तथा तोरमाण१ संज्ञक उसके दोनों
पुत्रों ने क्षिति का रंजन किया।

त्रिगर्त के ६ संघ राज्यों का पाणिनि ने वर्णन
किया है । उनके नाम—कौडोपरथ, दांडिक,
कौष्टकी, जालमानि, ब्राह्मगुप्त और जानकि है ।
महाभारत में त्रिगर्त तथा कुलूत अर्थात् उलूक
पर्वतमालाओ में निर्वासित गणों और राजाओं
का वर्णन किया गया है । (सभा-पर्व २७: ५–१६)
कुलूत अर्थात् वर्तमान कुलू अंचल की राजधानी
नगर थी । कश्यादि गण ( ४ २:९ ) पाणिनि वर्णित
नगर यही रहा होगा । कुलूत के दक्षिण मण्डो तथा
सुकेत के राज्य थे। यवादि गण—अष्टाध्यायी
(८:२९) में 'मंडमती' का उल्लेख है । सुकेत
सम्भवतः सुकूट्ट है। इसका उल्लेख सभा पर्व में
कुलिन्दो के सन्दर्भ मे आया है। सतलज के दक्षिण
टोस नदी का क्षेत्र कुलिंद प्राचीन काल में कहा
जाता था । कुलिंद, कुलूत तथा कुणिद एक ही
शब्द के विकृत रूप हैं। अष्टाध्यायी (४.१:१७८ )
में योधेयों के साथ त्रिगर्त सघ का उल्लेख मिलता
है। द्रष्टव्य है आदि पर्व १५५:२ ; सभा पर्व
२७ १८, २३ ७,५२ १८—१९, वन पवे २७-
१५ २६, २७१:१२ ; उद्योग पर्व १६४:८,
१६६ ११, ५ १८, १६०:९, विराट पर्व : अ०
३०, ३२, ३३ ; भीष्म पर्व ५७:७, प्र० ५६, ६१,
७२, १०२ ; द्रोण पर्व : अ० ४, १८:१६ ; कर्ण
पर्व . अ० ८, १७,१९, ३०, १८१, १५७ ; शल्य
पर्व प० २७ ; आश्वमेधिक पर्व: अ. ७४
१०१ (१) कुटुम्बः बाण के हर्ष चरित में
इस प्रकार का पद मिलता है—'चतुरुदधि-
केदारकुटुम्बी ।
इस श्लोक का भाव निम्नलिखित श्लोक में
और स्पष्ट हो जाता है :
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
१०२ (१) तोरमाण . श्री विल्सन अभिषेक
काल सन् ८७ ई. ३ मास तथा राज्य काल ३० वर्ष
२ मास देते हैं ।
श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय सन् ८८ ई.
तथा राज्य काल ३० वर्ष २ मास रखा है ।
श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल लौकिक सं०
३१६२ तथा राज्य काल ३० वर्ष रखा है ।
श्री बाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४०३९ तथा
सन् २६९ ई० देते हैं ।
कलि गताब्द ३२१३ वर्ष ६ मास आता है ।
टायर के अनुसार यह समय सन् ८८ ईस्वी ९ मास
होना चाहिए । कनिंघम ने सन् ४१५ ई. समय
रखा है ।
आइने अकबरी 'हेरेन' नाम देती है । राज्य
काल ३० वर्ष दिया गया है ।
तूरमाण यह तुर्की नाम है । यह उन प्रारम्भिक
तुर्कों में पाया जाता है जिन्होंने भारत विजय किया था

तृतीय तरंग ४९१
और पहले बौद्ध तथा कालान्तर में हिन्दू हो गये
थे । दशवी शताब्दी में काबुल तथा सीमान्त
पश्चिमोत्तर देश के रहने वाले उन्ही तुर्कों को शाही
कहा गया । तरंग ५:२३३ द्रष्टव्य है ।
भारतीय हूण राजा तोरमाण कश्मीर के राजा
तोरमाण से भिन्न है। कुछ इतिहासकारों ने खोज-
खाँचकर कश्मीरी तोरमाण को भारतीय तोरमाण
का पौत्र होने का अनुमान लगाया है।
कश्मीरी तोरमाण ने भी भारतीय तोरमाण
राजा तुल्य मुद्रा टंकणित करवाया था । दोनों की
मुद्राओ में समानता होने के कारण कुछ इतिहास-
कार उन्हें एक मानते हैं । कल्हण के अनुसार हूण-
राज नरेन्द्रदित्य का वंशज था । कश्मीरी तोरमाण
युधिष्ठिर प्रथम का वंशज था ।
कश्मीर में तोरमाण नाम की ताम्र मुद्रायें
बहु संख्या मे मिली है । मुद्रायें मध्य छठवी शताब्दी
की टंकणित है । उनकी लिपि गुप्त कालीन है ।
तोरमाण तुरको नाम है । तुर्क एवं तुरुष्क एक
ही जाति थी । मुसलिम काल के पूर्व तुर्किस्तान से
आने वाले तुर्क बुद्ध धर्मावलम्बी थे । कालान्तर में
हिन्दू बन गये । कुछ इतिहासकारों का मत है कि
काबुल तथा सिन्ध के मध्य रहनेवालो के लिये शाही
शब्द का प्रयोग होने लगा था ।
हसन लिखता है—( ६ ) सन् विक्रमी ९८ में
हिरन वारिस तख्त होकर अपने भाई को तोरमान
वोहदः वज़ारत बख्शा । कुछ अरसा खूब गुजरी ।
लेकिन आखिर मे तोरमान का मिज़ाज़ भाई की
अताअत व फरमा बरदारी से मनहरफ् हो गया ।
सिक्का अपने नाम जारी कर लिया । हिरन को
उसकी यह हरकत बहुत नापसन्द आयी । और
तूरमान को जेल भेज दिया । तूरमान की वोवी
अंजना जो सूरज वंशी राजाओं के चश्म व चिराग़
थी अपने शौहर के हादशा के वक्त फरार हो
गयी । और मुकाम अन्दर कोट में एक कुम्हार के
घर रहने सहने लगी । यह औरत अपने खाविन्द से
हामिला थी । इसलिये वज़ हमल के वक्त इसके
पेट से एक लडका पैदा हुआ । जिसका नाम इसने
परवरसेन रखा । कुम्हार की बीबी इस लडके की
अपनी औलाद की तरह परवरिश किया करती थी ।
सन् बलूग़त तक लोग उसे कुलाल का बेटा ही
ख़्याल करते रहे । बचपन से ही बुजुर्गी के
निशानात उसकी पेशानी से नमूदार थे । बच्चो
के साथ खेल व कूद के दौरान में खुद एक ऊँची
जगह पर बैठता और अपने आप को राजा के खिताब
से पुकारता था । दूसरे लड़को को वज़ारत मोरमरी
और दीगर मुलाज़मतो के अहदसे बख़्शे हुए थे ।
इसका शग़ल हमेशा तोरन्दाजो और निशाना बाज़ी
था । हुसन इत्तफाक से अंजना का भाई जयेन्द्र
अपनी बहन को तलाश में जगह जगह फिरता था ।
एक दिन वह अन्दर कोट में भी जहाँ परवरसेन
बच्चों में खेल रहा था आ पहुँचा । क्या देखता
है कि एक लडका बड़ी शान-शौकत से एक टोला
पर बैठा हुआ है । और अपने मातहत बच्चो पर
हुक्मरानी कर रहा है । जयेन्द्र के दिल में तबज़
मुहब्बत और शफ़्कत ने जोश मारा लेकिन वहाँ कुछ
न कह सका । रात को उस लड़के के पीछे
कुम्हार के घर मे आया । अपने बहन की जो
मुद्दत से जुदा हो गयी थी । पहचान लिया । दोनो
एक दूसरे के साथ गले मिलकर रोये ।
परवरसेन ने इस रोने-धोने का सबब अपनी
मा से पूछा । उसने जवाब दिया कि यह मेरा भाई
है। तेरा बाप तूरमार अपने भाई के जुल्म से कैदी
बना हुआ है । अब मै उसी के फिराक़ में रोती हूँ ।
परवरसेन अपने बाप की हालत सुनकर गुस्सा से
आगबबूला हो गया । इन्दर जे के घर रात दिन
कुश्ती और पहलवानी में बसर करने लगा ।
इस असनाए में हिरन ने बाज़ मुतक़द्दर हस्तियो
के सिफारिश के पेश नज़र तूरमान की रिहाई के
अहकाम जारी कर दिये । तूरमान कुछ मुद्दत बैठ
के हमराह उल्फत और मुहब्बत से ज़िन्दगी गुज़ार

४९२ राजतरंगिणी
भ्राताहृतानां प्राचुर्यं विनिवार्यासमञ्जसम् ।
तोरमाणेन दीनाराः स्वाहताः संप्रवर्तिताः ॥ १०३ ॥
१०३. तोरमाण ने भ्रातृ अंकित मुद्रा का असंगत प्राचुर्य निवारण कर स्वांकित दीनार
प्रवर्तित किया ।

के नागहानी फौत हो गया । इस वाकया के थोडे
अरसः बाद प्रवरसेन अपने खालू जो इन्दर की हम-
राही में हिन्दुस्तान के बड़े बड़े तीरथ और मन्दिर
देखने के लिये गया । इन्ही दिनों तकदीर इलाही से
हिरण की जिंदगी के दिन भी पूरे हो गये और
वह तीस साल हुकूमत करके इस जहांन् से
रुखसत हुआ । राजा हिरण बे औलाद था ।
इसलिए हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा ।
यह देखकर धराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत
की खिदमत में हाज़िर हुए जो हिन्दुस्तान का
शाजदार था । उससे इल्तजा की कि वह सल्तनत
कश्मीर अपने कब्ज इक्तदार में लाए ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १०३ में 'भ्रात्राह' का 'बालाह'
पाठभेद मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ :
१०३ (१) दीनार : संस्कृत दीनार शब्द रोमन
दिनारियस शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है। यह
शब्द आज भी जेकोस्लोविकिया की मुद्रा के लिये
प्रयोग किया गया है । कश्मीर में दीनार मुद्राओं के
लिये प्रायः प्रयोग किया जाता था । यह स्वर्ण, रजत
तथा ताम्र तीनों धातुओं में टंकणित होता था । एक
सौ कौड़ी का एक ताम्र दीनार होता था । कल्हण
जब वर्णन करता है कि एक हजार दीनार मासिक
वेतन अधिकारियों को दिया जाता था । तो उसका
अर्थ यह पैसा ही है । तरंग ८:३८; ७:१४५, १६३;
४१८ तथा ८:१९१८ द्रष्टव्य है । मेरी बाल्यावस्था
में सन् १९१४-१९१६ में काशी में एक ताम्बे के
पैसा का ६० से ४० कौड़ी मिलती थी । कौड़ी का

प्रचलन सन् १९२० के पश्चात् प्रायः नगरो में बन्द
हो गया । उसका स्थान अधेला आधा पैसा तथा
एक पैसा में मिलने वाली तीन पाई ब्रिटिश राज्य
काल में ले लिया था । बारह पाई का एक आना
१६ आना का एक रुपया तथा एक पैसा में ३ पाई
और २ अधेला मिलता था । चार पैसा या आठ
अधेला का एक आना होता था । दो पैसे का एक
सिक्का टका या टकहवा सन् १९२० तक खूब
चलता था परन्तु उसका प्रचलन भी ब्रिटिश अमलदारी
में बन्द कर दिया गया था । इसके अतिरिक्त चाँदी
की दुअन्नी चवन्नी तथा अठन्नी चलती थी । एक
आना का सिक्का मिश्रित धातु का चलता था ।
इस समय एक सौ पैसा का एक रुपया चलने लगा है ।

दीनार ३२ रत्ती का सुवर्ण का सामान्यतः होता
था । संस्कृत भाषा में यह शब्द प्रचलित हो गया
था । ईरान तथा सीरिया में अरबों के आक्रमण के
पूर्व दीनार प्रचलित था । अरबो के यहाँ मुद्रा
टंकणित नहीं होती थी । अरब विजय के पश्चात्
अपने सल्तनत में 'दिरहेम' अरबों ने प्रचलित किया ।
यह दीनार शब्द का ही तद्भव रूप है ।

आइने अकबरी के अनुसार दीनार एक दिरहम
का तीन बँटा सातवाँ वजन मे होता था ।

फरिश्ता लिखता है कि दीनार दो रुपयो के
बराबर होता था । रोमन लोगों का दिनेरियस
रजत मुद्रा था जब कि हिन्दु दीनार सुवर्ण का होता
था । रोमन दिनेरियस सुवर्ण का भी होता था ।
पेरीप्लस का लेखक अद्रियन लिखता है कि 'दिनारो'
स्वर्ण और रजत के यूरोप से 'बर्यगजा' अर्थात्
भड़ौच भेजे जाते थे ।

तृतीय तरंग ४९३
मामवज्ञाय राज्ञेव कस्मादेतेन वल्गितम् ।
इति तं पूर्वजो राजा क्रोधनो बन्धने व्यधात् ॥ १०४ ॥
१०४. राजा के समान इसने मेरी अवज्ञा कर किस हेतु औद्धत्य किया ? इस पूर्ववर्ती
( ज्येष्ठभ्राता ) क्रोधी राजा ने उसे बन्धन में कर दिया ।
चिरं स्थितित्यक्तशुचस्तत्र तस्याऽञ्जनाभिधा ।
ऐक्ष्वाकस्याऽत्मजा राज्ञी वज्रेन्द्रस्याऽस्त गुर्विणी ॥१०५॥
१०५. वह चिरकाल तक वहां रहते, शोकरहित हो गया । उसकी अंजना नामक रानी
गर्भवती हुई, जो ऐक्ष्वाकु वज्रेन्द्र की आत्मजा थी ।
आसन्नप्रसवा भर्त्रा सा त्रपार्तेन बोधिता ।
सुतं प्रविष्टा प्रासोष्ट कुलालानिलये क्वचित् ॥ १०६ ॥
१०६. उसके आसन्नप्रसवा होने पर त्रपा पीड़ित पति ने उससे कहा—कहीं कुलाल
निलय में जाकर प्रसव करो ।
स कुम्भकारगेहिन्या काक्येव पिकशावकः ।
पुत्रीकृतो राजपुत्रः पर्याप्तं पर्यवर्धत ॥ १०७ ॥
१०७. जिस प्रकार काकी १ पिक शावक का वर्धन करती है, उसी प्रकार कुम्भकार
की गृहिणी ने पुत्रीकृत उस राजपुत्र का पर्याप्त संवर्धन किया ।
जनयित्र्याः कुलाल्याश्च रक्षिण्या विदितोऽभवत् ।
रत्नसूतेर्भुजंग्याश्च प्रच्छन्न इव शेवधिः ॥ १०८ ॥
१०८. उसे उसकी माता तथा रक्षिका कुलाली उसी तरह जानती थी, जैसे प्रच्छन्न
मूल्यवान निधि को पृथ्वी तथा भुजंगिनी १ जानती हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०४ में 'एतेन' का पाठभेद
'चोरमाणेने' मिलता है ।
श्लोक संख्या १०६ में 'सा त्रपार्तेन' का पाठभेद
'सत्रपं तेन' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०७ ( १ ) काकी : कोयल के बच्चे को
कौवा अपना समझ कर पालता है । यह केवल गाथा
नहीं है । वास्तविकता है । कवि की कल्पना नहीं
है । कवि का सत्य दर्शन वर्णन है । कोयल अपना
घोंसला नहीं बनाती । वह अण्डा वहाँ देती है जहाँ
कौआ अपना घोंसला या नीड बनाता है । वह
घोसले में जाकर अण्डा देती है । तत्पश्चात् अपने
अण्डे का परित्याग कर उड़ जाती है । कालिदास
ने दुष्यन्त के मुख से अभिज्ञान शकुन्तला नाटक में
कहलवाया है—स्त्रियाँ सर्वदा धोखा देती हैं—
उनकी उपमा 'प्राग् अन्तरिक्षगमनात्' से देता है ।
तरंग ८ ३१७५ तथा ३१७८ भी द्रष्टव्य हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०८ में 'शेवधिः' का पाठभेद
'सेवधि' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०८ ( १ ) भुजंगिनी : पृथ्वी में गड़े रत्न
को पृथ्वी तथा भुजंग जानता है । कंजूसों के लिये
भारत में कोने कोने में सभी भाषाओं में कहावत
प्रचलित है कि वे मरने पर सर्प बनकर पृथ्वी में
गड़े धन पर बैठते हैं । कल्हण उसी कहावत का
यहाँ काव्य रूप में वर्णन करता है ।

४९२ राजतरंगिणी
भ्राताहतानां प्राचुर्यं विनिवार्यासञ्जसम् ।
तोरमाणेन दीनाराः स्वाहताः संप्रवर्तिताः ॥ १०३ ॥
१०३. तोरमाण ने भ्रातृ अंकित मुद्रा का असंगत प्राचुर्य निवारण कर स्वांकित दीनार प्रवर्तित किया ।

के नागहानी फ़ौत हो गया। इस वाकया के थोड़े
अरसः बाद प्रवरसेन अपने खालू जो इन्दर की हम-
राही में हिन्दुस्तान के बड़े बड़े तीरथ और मन्दिर
देखने के लिये गया। इसी दिनों तक़दीर इलाही से
हिरन की जिंदगी के दिन भी पूरे हो गये और
वह तीस साल हुकूमत करके इस जहान् से
रुखसत हुआ। राजा हिरन बे औलाद था।
इसलिए हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा।
यह देखकर अराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत
की खिदमत में हाज़िर हुए जो हिन्दुस्तान का
ताजदार था। उससे इल्तजा की कि वह सल्तनत
कश्मीर अपने कब्ज इक्तदार में लाए।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १०३ में 'भ्रात्राह' का 'बालाइ' पाठभेद मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
१०३ (१) दीनार : संस्कृत दीनार शब्द रोमन दिनारियस शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है। यह
शब्द आज भी जेगोस्लोविया की मुद्रा के लिये प्रयोग किया गया है। कश्मीर में दीनार मुद्राओं के
लिये प्रायः प्रयोग किया जाता था। यह स्वर्ण, रजत तथा ताम्र तीनों धातुओं में टंकित होता था। एक
सौ कौड़ी का एक ताम्र दीनार होता था। कल्हण जब वर्णन करता है कि एक हजार दीनार मासिक
वेतन अधिकारियों को दिया जाता था। तो उसका अर्थ यह पैसा ही है। तरंग ८:३८; ७:१४५, १६३;
४१८ तथा ८:१९१८ द्रष्टव्य है। मेरी बाल्यावस्था में सन् १९१४-१९१६ में काशी में एक ताम्बे के
पैसा का ६० से ४० कौड़ी मिलती थी। कौड़ी का प्रचलन सन् १९२० के पश्चात् प्रायः नगरों में बन्द
हो गया। उसका स्थान अधेला आधा पैसा तथा एक पैसा में मिलने वाली तीन पाई ब्रिटिश राज्य
काल में ले लिया था। बारह पाई का एक आना १६ आना का एक रुपया तथा एक पैसा में ३ पाई
और २ अधेला मिलता था। चार पैसा या आठ अधेला का एक आना होता था। दो पैसे का एक
सिक्का टका या टकहवा सन् १९२० तक खूब चलता था परन्तु उसका प्रचलन भी ब्रिटिश अमलदारी
में बन्द कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त चाँदी की दुअन्नी चवन्नी तथा अठन्नी चलती थी। एक
आना का सिक्का मिश्रित धातु का चलता था। इस समय एक सौ पैसा का एक रुपया चलने लगा है।

दीनार ३२ रत्ती का सुवर्ण का सामान्यतः होता था। संस्कृत भाषा में यह शब्द प्रचलित हो गया
था। ईरान तथा सीरिया में अरबों के आक्रमण के पूर्व दीनार प्रचलित था। अरबों के यहाँ मुद्रा
टंकखित नही होती थी। अरब विजय के पश्चात् अपने सल्तनत में 'दिरहेम' अरबों ने प्रचलित किया।
यह दीनार शब्द का ही तद्भव रूप है।

आइने अकबरी के अनुसार दीनार एक दिरहम का तीन बँटा सातवाँ वजन में होता था।

फरिश्ता लिखता है कि दीनार दो रुपयों के बराबर होता था। रोमन लोगों का दिनेरियस
रजत मुद्रा था जब कि हिन्द दीनार सुवर्ण का होता था। रोमन दिनेरियस सुवर्ण का भी होता था।
पेरीप्लस का लेखक एरियन लिखता है कि 'दिनारी' स्वर्ण और रजत के यूरोप से 'बरिगजा' अर्थात्
भड़ोच भेजे जाने थे।

तृतीय तरंग ४९३
मामवज्ञाय राज्ञेव कस्मादेतेन वल्गितम् ।
इति तं पूर्वजो राजा क्रोधनो बन्धने व्यधात् ॥ १०४ ॥
१०४. राजा के समान इसने मेरी अवज्ञा कर किस हेतु औद्धत्य किया ? इस पूर्ववर्ती
( ज्येष्ठभ्राता ) क्रोधी राजा ने उसे बन्धन में कर दिया ।
चिरं स्थितित्यक्तशुचस्तत्र तस्याऽञ्जनाभिधा ।
ऐक्ष्वाकस्याऽत्मजा राज्ञी वज्रेन्द्रस्याऽऽस्त गर्भिणी ॥१०५॥
१०५. वह चिरकाल तक वहां रहते, शोकरहित हो गया । उसकी अंजना नामक रानी
गर्भवती हुई, जो ऐक्ष्वाकु वज्रेन्द्र की आत्मजा थी ।
आसन्नप्रसवा भर्त्रा सा त्रपार्तेन बोधिता ।
सुतं प्रविष्टा प्रासोष्ट कुलालानिलये क्वचित् ॥ १०६ ॥
१०६. उसके आसन्नप्रसवा होने पर त्रपा पीड़ित पति ने उससे कहा—कहीं कुलाल
निलय में जाकर प्रसव करो ।
स कुम्भकारगेहिन्या काक्येव पिकशावकः ।
पुत्रीकृतो राजपुत्रः पर्याप्तं पर्यवर्धत ॥ १०७ ॥
१०७. जिस प्रकार काकी १ पिक शावक का वर्धन करती है, उसी प्रकार कुम्भकार
की गृहिणी ने पुत्रीकृत उस राजपुत्र का पर्याप्त संवर्धन किया ।
जनयित्र्याः कुलाल्यश्च रक्षिण्या विदितोऽभवत् ।
रत्नसूतेर्भुजंग्याश्च प्रच्छन्न इव शेवधिः ॥ १०८ ॥
१०८. उसे उसकी माता तथा रक्षिका कुलाली उसी तरह जानती थी, जैसे प्रच्छन्न
मूल्यवान निधि को पृथिवी तथा भुजंगिनी १ जानती हैं ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १०४ में 'एतेन' का पाठभेद
'तोरमाणेन' मिलता है ।
श्लोक संख्या १०६ में 'सा त्रपार्तेन' का पाठभेद
'सत्रपं तेन' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०७ ( १ ) काकी : कोयल के बच्चे को
कौआ अपना समझ कर पालता है । यह केवल गाथा
नहीं है । वास्तविकता है । कवि की कल्पना नहीं
हैं । कवि का सत्य दर्शन वर्णन है । कोयल अपना
घोंसला नहीं बनाती । वह अण्डा वहाँ देती है जहाँ
कौआ अपना घोंसला या नीड बनाता है । वह
घोंसले में जाकर अण्डा देती है । तत्पश्चात् अपने
अण्डे का परित्याग कर उड़ जाती है । कालिदास
ने दुष्यन्त के मुख से अभिज्ञान शाकुन्तला नाटक में
कहलवाया है—स्त्रियां सर्वदा धोखा देती हैं—
उनको उपमा 'प्राग् अन्तरिक्षगमनात्' से देता है ।
तरंग ८।३१७५ तथा ३१७८ भी द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०८ में 'शेवधिः' का पाठभेद
'सेवधि' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१०८ ( १ ) भुजंगिनी : पृथ्वी में गड़े रत्न
को पृथ्वी तथा भुजंग जानता है । कंजूसों के लिये
भारत में कोने कोने में सभी भाषाओं में कहावत
प्रचलित है कि वे मरने पर सर्प बनकर पृथ्वी में
गड़े धन पर बैठते हैं । कल्हण उसी कहावत का
यहाँ काव्य रूप में वर्णन करता है ।

४९४ राजतरंगिणी

पौत्रः प्रवरसेनस्य गिरा मातुर्नृपात्मजः ।
पैतामहेन नाम्नैव कुलाल्या ख्यापितोऽभवत् ॥ १०६ ॥
१०९. माता के कहने पर कुलाली ने प्रवरसेन के पौत्र नृपात्मज को पितामह के
नाम से प्रख्यात किया ।
वर्धमानः स संपर्कं न सेहे सहवासिनाम् ।
तेजस्विमैत्रौरसिकः शिशुः पद्म इवाऽम्भसाम् ॥ ११० ॥
११०. वर्धमान वह शिशु तेजस्वियों के मैत्री का प्रेमी था । उसने सहवासियों का
उसी प्रकार सम्पर्क नहीं किया, जैसे रवि मैत्री का प्रेमी पद्म, जल का सम्पर्क नहीं करता ।
तं कुलीनैश्च शूरैश्च विद्याविद्भिश्च दारकैः ।
अन्वीतमेव ददृशुः क्रीडन्तं विस्मयाज्जनाः ॥ १११ ॥
१११. कुलीन शूर विद्याविद् बालकों के साथ ही क्रीड़ा करते हुये, उसे लोग विस्मय
पूर्वक देखते थे ।
स्ववृन्दस्याऽभ्युदारौजा राजा चक्रे स दारकैः ।
मृगेन्द्रशावः क्रीडद्भिर्वने बालमृगैरिव ॥ ११२ ॥
११२. साथ में क्रीड़ा करते बालकों ने उस। तेजस्वी को उसी प्रकार अपने दल का राजा
बना लिया, जैसे वन में साथ क्रीड़ा करते बाल मृग सिंह शावक को ।
संविभेजेऽनुजग्राह वशीचक्रे च सोऽर्भकान् ।
अगजोचितमाचारं नैव कंचिदसेवत ॥ ११३ ॥
११३. उसने संविभाग एवं अनुग्रहण पूर्वक बालकों को वश में कर लिया और कभी
अगजोचित आचार नहीं किया ।
भाण्डादि कर्तुं मृत्पिण्डं कुम्भकारैः समर्पितम् ।
स्वीकृत्य चक्रिरे तेन शिवलिङ्गपरम्पराः ॥ ११४ ॥
११४. कुम्भकारों के भाण्डादि निर्माण हेतु प्रदत्त मृत्पिण्ड को लेकर, वह शिव लिंग
की परम्परा तैयार करता था ।
तथा साश्चर्यचयैः स क्रीडञ्ज्ञातु व्यलोक्यत ।
मातुलेन जयेन्द्रेण सादरं चाभ्यनन्द्यत ॥ ११५ ॥
११५. उस प्रकार के आश्चर्य जनक कृत्यशाली क्रीड़ा करते, उस बालक को कदा-
चित् मातुल जयेन्द्र ने देखा और सादर अभिनन्दन किया ।
आवेद्यमानं शिशुभिस्तं जयेन्द्रोऽयमित्यसौ ।
भूपालवत्सावहेलं पश्यन्नन्वग्रहीदिव ॥११६॥
११६. शिशुओं ने ज्ञात कराया 'यह जयेन्द्र है,' तो भूपाल सदृश उसने अवहेलना
पूर्वक देखते हुए मानो अनुग्रह किया।

तृतीय तरंग ४९५
संभाव्य सत्त्वावष्टम्भात्तमसामान्यवंशजम् ।
सादृश्याद्भगिनीभर्तुर्भागिनेयमशङ्कत ॥ ११७ ॥
११७. प्रबल साहस के कारण उसे असामान्य कुलोत्पन्न समझकर भगिनीपति के
सादृश्य से भगिनी पुत्र की शङ्का (जयेन्द्र) ने की।
सस्वरस्तत्त्वजिज्ञासारसेनानुससार तम् ।
प्राप्तस्तद्गृहमौत्सुक्यात्स्वसारं च व्यलोकयत् ॥ ११८ ॥
११८. वस्तु स्थिति जानने की जिज्ञासा रस से उत्सुकता पूर्वक अनुसरण कर (जयेन्द्र)
शीघ्र उसके घर गया और अपनो वहन को देखा।
सा स चान्योन्यमुन्मन्यू पश्यन्तौ भ्रातरौ चिरात् ।
निश्वासद्विगुणोष्मणि मुहुरश्रुण्यमुञ्चताम् ॥ ११९ ॥
११९. उन दोनों भाई बहन ने देर तक एक दूसरे को उत्कण्ठा पूर्वक देखा और पुनः
निश्वास' के कारण अत्यधिक अश्रुपात किया।
कुलाल्या दारको मातः कावेताविति पृष्टवान् ।
अकथ्यतेत्थं वत्सैषा माताऽयं मातुलश्च ते ॥ १२० ॥
१२०. दारक (पुत्र) के यह पूछने पर 'माता ! ये दोनों कौन है' कुलाली ने इस प्रकार
कहा—'वत्स, यह तुम्हारी माता एवं यह मातुल है।'
पितुर्बन्धेन सक्रोधं तं कालापेक्षयाऽक्षमम् ।
शिक्षयित्वा जयेन्द्रोऽथ कार्यशेषाय निर्ययौ ॥ १२१ ॥
१२१. पिता के बन्धन से क्रुद्ध एवं काल की अपेक्षा से असमर्थ उसको जयेन्द्र
शिक्षा देकर अवशिष्ट कार्य हेतु चला गया ।
उत्पिञ्जोत्पादनासज्जे तस्मिन्भ्राता यदृच्छया ।
बन्धात्त्यक्तो नृतरणिस्तोरमाणोऽस्तमाययौ ॥ १२२ ॥
१२२. वह जब विद्रोह हेतु तैयार हुआ। उसी समय स्वेच्छा से भाई (हिरण्य) ने
मानव सूर्य (तोरमान) को बन्धन मुक्त कर दिया, जो अस्त हो (मर) गया।
पाठभेद :
पादटिप्पणियाँ :
श्लोक संख्या ११८ के 'स्तस्त्व' का पाठभेद
११९ (१) निश्वास : कल्हण ने इसी प्रकार
की उपमा राज० त० १:१५७ में दी हैं ।
'स्तर्क' मिलता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२२ में 'त्पादनासज्जे' का,
श्लोक संख्या ११९ में 'निश्वास' का पाठभेद
'त्पादनसज्जे' तथा 'बन्ध्यात्य' का पाठभेद 'बन्धा-
'निःश्वासात्' मिलता है ।
न्मु' मिलता है।

४९६ राजतरंगिणी
निवार्य मरणोद्योगं मातृनिर्वेदखेदितः ।
ययौ प्रवरसेनोऽथ तीर्थौत्सुक्याद्दिगन्तरम् ॥ १२३ ॥
१२३. माता के मरणोद्योग^१ को रोक कर वेदना से खिन्न, प्रवरसेन तीर्थ करने की
उत्सुकता से दिगन्तर गया।
रक्षित्वा दशमासोनाः क्ष्मामेकत्रिंशतं समाः ।
तस्मिन्क्षणे हिरण्योऽपि शान्तिं निस्सन्ततिर्ययौ ॥ १२४ ॥
१२४. उस समय सन्तान रहित हिरण्य भी दश मास कम इकतीस वर्ष पृथ्वी की
रक्षा कर शान्ति (मृत्यु) प्राप्त किया।
तत्रानेहस्युज्जयिन्यां श्रीमान्हर्षापराभिधः ।
एकच्छत्रश्चक्रवर्ती विक्रमादित्य इत्यभूत् ॥ १२५ ॥
१२५. उस समय उज्जैनी में एकछत्र चक्रवर्ती श्रीमान् विक्रमादित्य^१ हुआ जिसका
अपर नाम हर्ष था।

पादटिप्पणियाँ :
१२३ ( १ ) मरणोद्योग : तोरमाण के मरने पर रानी स्वयं सती होना चाहती थी। उसके इस प्रयास को प्रतीत होता है प्रवरसेन ने रोका और माता को सती होने से विरत किया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२५ में 'हर्षापराभिध.' का पाठभेद 'हर्षाभिधा पुरा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१२५ ( १ ) विक्रमादित्य : तरंग २:७ में कल्हण ने हर्ष का उल्लेख किया है। श्लोक २:९ में कल्हण स्पष्ट कहता है कि वहाँ वर्णित हर्ष किंवा विक्रमादित्य शकारि विक्रमादित्य नही था। कल्हण के अनुसार शकारि विक्रमादित्य वहीं मातृगुप्त पड़ते हैं। शकों को पराजित करने के कारण शक संवत् ईसवी सन् ७८ में प्रचलित किया गया था। शक पराजय का उल्लेख कल्हण अगले १२८ वें श्लोक में पुनः करता है। उसने इस तरंग के श्लोक ३३० में पुनः कहा है कि शीला-दित्य प्रतापादित्य का पिता हर्ष विक्रमादित्य था। ह्वेन सांग ने शीलादित्य का उल्लेख अपने पर्यटन संस्मरण में किया है। ( २:२६१ ) उसका शासन काल सन् ५८० ईसवी मालवा में था।
शक संवत् दक्षिण तथा कश्मीर में भी चलता है। गणतंत्र के पश्चात् भारत सरकार ने भी शक ही संवत् को स्वीकार कर मान्यता दी है। सरकारी कागजो में अब इसी का व्यवहार किया जाता है। इस समय विक्रम संवत् २०१५ शक संवत् १८९० तथा अंग्रेजी सन् १९५८ है।
मुस्लिम इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के सम्बन्ध में भ्रम पैदा कर दिया है। वे एक नाम विक्रमादित्य का ही दुहराते हैं। किसी भी विक्रमा-दित्य के सम्बन्ध में न कुछ आलोचना करते हैं और न उनका समय आदि देते हैं। उनसे इस सम्बन्ध में कुछ सहायता नहीं मिलती।

तृतीय तरंग ४९७
भूपमद्भुतसौभाग्यं श्रीर्वद्वरभसाऽभजत् ।
विहाय हरिबांहूश्च चतुरः सागरांश्च यम् ॥१२६॥
१२६. अद्भुत सौभाग्यशाली जिसके आश्रय में विष्णु के चारों बाहु और चारों
समुद्र को छोड़कर, लक्ष्मी स्वतः सवेग आयी ।
लक्ष्मीं कृत्वोपकरणं गुणे येन प्रवर्धिते ।
श्रीमत्सु गुणिनोऽद्यापि तिष्ठन्त्युद्गुरकंधराः ॥१२७॥
१२७. जिसने लक्ष्मी को उपकरण (बनाकर) गुण (ॉ) का वर्धन किया, जिसके
कारण गुणी (जन) धनियों में उन्नत स्कन्ध बैठते हैं ।
म्लेच्छोच्छेदाय वसुधां हरेरवतरिष्यतः ।
शकान्विनाश्य येनाऽऽदौ कार्यभारो लघूकृतः ॥१२८॥
१२८. म्लेच्छों¹ के नाश हेतु पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हरि के कार्य भार को
आदि में ही जिसने शकों का विनाश कर लघु (हल्का) कर दिया ।
नानादिगन्तराख्यातं गुणवत्सुलभं नृपम् ।
तं कविर्मातृगुप्ताख्यः सर्वस्थानस्थमासदत् ॥१२९॥
१२९. नाना दिगन्तरों से प्रख्यात एवं गुणवानों के लिये सुलभ, उस नृप के पास जो
कि सार्वजनिक सभा भवन में स्थित था-कवि मातृगुप्त पहुँचा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२७ में 'गुणे' का 'गुणो',
'प्रवर्धिते' का 'प्रवर्धने' तथा 'त्युद्गुर' का पाठभेद
'त्युद्वत' मिलता है ।
श्लोक संख्या १२८ में 'लघू' का पाठभेद 'लघु'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२८ (१) म्लेच्छनाश : यहाँ पर कल्हण ने
कल्कि अवतार की ओर संकेत किया है । भगवान्
कल्कि अवतार लेकर म्लेच्छों का संहार करेंगे । गीत
गोविन्द ने इसका उल्लेख किया है ।
म्लेच्छनिविद्रनिधने कलयसि करवालम् ।
केशव धृतकल्किशरीर ॥
१२९ (१) मातृगुप्त : कुछ विद्वान् मातृगुप्त
को कवि कालिदास मानते हैं । इन्ही विद्वानों ने यह
भी माना है कि जिस विक्रमादित्य के सभा में नव
रत्नों का होना कहा जाता है वह छठी शताब्दी का
विक्रमादित्य हर्ष था । डाक्टर भाऊदा जी का तर्क है
कि कालिदास और मातृगुप्त का शाब्दिक अर्थ एक
ही है । काली का अर्थ माता होता है । दास का
अर्थ गुप्त होता है । इस प्रकार कालिदास ही
मातृगुप्त हैं ।
कल्हण ने कालिदास का राजतरंगिणी में कहीं
भी उल्लेख नहीं किया है । प्राकृत काव्य सेतु बन्ध
जो प्रवरसेन के अनुरोध पर कालिदास ने लिखा
था उसका भी उल्लेख नहीं मिलता । इसी
प्रकार मिलाया गया है कि प्रवरसेन द्वितीय का
उत्तराधिकारी मातृगुप्त दिलाया गया है ।
क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा में मातृगुप्त
की कविताओं का उल्लेख किया है । श्री वल्लभदेव
की सुभाषितावली में भी मातृगुप्त के पदों का उल्लेख
६३

४९८ राजतरंगिणी

मिलता है। एक मातृगुप्त का उल्लेख अलंकार एवं
नाट्य शास्त्र के प्रणेता के रूप में मिलता है।
मातृगुप्त को कालिदास मानने में आधुनिक
विद्वानों ने असहमति प्रकट की है। बम्बई के प्रसिद्ध
विद्वान् डाक्टर भाऊदा जी का मत है कि मातृगुप्त
ही कालिदास हैं।
डाक्टर श्री ह्यरन्ले का मत है कि पुरा कथा
विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जो कही जाती है वह
राजा यशोवर्धन पर लगती है जो वास्तव में हूण
विजेता था। प्रोफेसर पाठक भी इस मत का समर्थन
करते हैं। कालिदास कृत रघुवंश में रघु के विजय का
वर्णन वस्तुतः हूणों के सम्बन्ध में है जो कश्मीर में
रहते थे। क्यों कि कालिदास उसी सन्दर्भ में केसर
का वर्णन करता है जो केवल भारत में कश्मीर में
ही होता है। सम्राट् समुद्रगुप्त ने मातृगुप्त का
उल्लेख किया है।
मातृगुप्तो जयति यः कविराजो न केवलम् ।
कश्मीरराजोऽप्यभवत् सरस्वतीप्रसादतः ॥
सम्राट् समुद्रगुप्त का निधन सन् ३६४ ई० में
हुआ था। अतएव मातृगुप्त का उसके पूर्व होना
निश्चित प्रतीत होता है।
आइने अकबरी के अनुसार मातृगुप्त एक कश्मीरी
ब्राह्मण था। राजा विक्रमादित्य उसके गुणों तथा
बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उसे कुछ द्रव्य देकर कश्मीर
भेजा। उसने कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों के
नाम एक पत्र दिया। उसे आदेश दिया कि वह
अकेला यात्रा करे। वह कश्मीर आया। आदेशा-
नुसार पत्र दिया। पत्र में लिखा था-इसे कश्मीर
का राज्य दे दिया जाय। कश्मीर के मन्त्रियों तथा
कुलीनों ने पत्र पर विचार करने के लिये परिषद्
बुलायी। अन्त में निश्चय किया गया कि राजा के
आदेशों का पालन किया जाय।
हसन लिखता है-राजा हिरन बे औलाद था।
इस लिये हकूमत का चिराग बे रौनक रहा। यह
देखकर आराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत
की खिदमत में हाजिर हुए। जो हिन्दुस्तान का
ताजदार था। उसने इल्तजा की कि वह सल्तनत
कश्मीर अपने कब्ज़ा अकदार में लाये। इसके पहले
एक बहुत बड़ा इज़ाज़त केश बरहमन मातृगुप्त जो
कश्मीर का था महाराज मजकूर की खिदमत में
गया हुआ था। और बादशाह के खास लश्कर में
इन्तहाई मुफलिसी की हालत में ज़िन्दगी औकात
बसर कर रहा था।
एक दिन सरदियों के मौसम में राजा विक्रमा-
जीत नींद से जागा। शमा हवा के चलने से गुल
हो गयी थी। दरबार के मुलाज़िमों और चौकीदारों
को आवाज़ दी। लेकिन वह गुलबा नींद से होशियार
न हो सके। मातृगुप्त महलखाना के बाहर बाग़ के
सहन में इन्तहाई परेशानी की हालत में बैठा हुआ
था। उसने राजा की आवाज़ सुन ली और फौरन
राजा की ख़िदमत में हाज़िर हो गया। शमा जलाई
और राजा के हुजूर में बारयाबी पाली। राजा ने
पूछा-'किस कदर रात बाकी है-?'
बरहमन ने कहा-'आध पहर।' राजा ने पूछा
'तुझे कैसे मालूम हुआ कि आध पहर रात बाकी है?'
मातृगुप्त ने एक इन्तहाई फ़सीह व बलीग़ फिकरा
नज़्म किया हुआ था। जो राजा के सामने पढ़
दिया।
"सरदी की शिद्दत से मेरा जिस्म सोभकर
लोबिया के दाना की तरह हो गया है। और मेरी आग
इस तरह ज़ईफ़ हो गयी है कि सांसों की कसरत से
मेरे होंट तड़क गये हैं। और भूख की वजह से मेरा
हलक और तालू खुश्क हो गया है। गम और रंज के
दरया में डूब गया हूँ। जिसके बाइस नींद मेरी आँखों
से इस तरह जाती रही है जिस तरह कोई औरत
को बेइज़्ज़त करके निकाल दे। जिस तरह एक बड़े
आदमी को जागीर में हो और वह जमीन उससे
कम नहीं होती इस तरह यह स्याह रात मुझसे
कम नहीं होती।"

तृतीयस्तरंग ४२९
स गम्भीरस्य भूर्भर्तुरनुभावं महाद्भुतम् ।
विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽप्यूह्य व्यचिन्तयत् ॥१३०॥
१३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धित, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के
महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा—
सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः ।
परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥
१३१. 'गुणी प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप
प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा।
राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्ब
महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर मदारज के शुमार सोना और जरकार खिलअते
गश्त हैरान हुआ इसके सलामें मुल्क कश्मीर उसे अता की। रिशनादारो और मुअल्लकीन को बेहदतहाई
इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर
खत के जवाब में मुन्दरजा जैल खत लिखा। सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफीस चीजो
'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफे मुहय्या
की तरफ से सरफराज किया गया है। उसकी करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत में भेजे।
अताअत और फर्मा बरदारी अपने ऊपर वाजबी रिआया पर बदल व अहसान की तरफ मुतवज्ज होकर
और लाजिम जाने।' अपने मुल्क में जानवरों का कतल बन्द कर दिया।
दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता
उसके हाथ में लिफाफा देते हुए कहा कि फौरन था रात को फिकरा और मुसाकीन को बख्श कर
कश्मीर जाओ और वहाँ के मतकद्दर लोग तुम्हें इस खजाना खाली कर देता था। चार साल और नव
लिफाफा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा-
ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त
अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना सल्तनत तर्क करके इबादत कुबूलियत की। काशो
हो गया। जिस वक्त होरापुरा पहुँचा तो वहाँ के के मुल्क को गया।
सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का
फरमान दे दिया। खत पढ़ते ही अमीरों में खुशी पाठभेद :
के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद
पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफरोज़ किया। 'गुणा' मिलता है।
तनकीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'क्षोणि'
जीत के मुख्तसर हालात तारीखी तफसील को
मलहूज़ रखते हुए रदीया करिने किये जाते हैं। तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है।
मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से पादटिप्पणियाँ :
संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह
सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व