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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

प्रथम तरंग १५९
हरिमुकुट यात्रा से लौटते समय भूतेश मन्दिर
का स्थान मार्ग पर पड़ता है। परन्तु इस पर विशेष
ध्यान कभी नहीं दिया गया था। मालूम होता है
मन्दिर के नष्ट भ्रष्ट हो जाने के कारण इसका महत्त्व
लोग भूल गये थे।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०८ में 'साध्य' का पाठभेद
'मोधो' तथा 'ज्वलोको' का 'उजलोको' तथा 'गुधया'
का 'श्रद्धया' मिलता है।
१०८ (१) जलोक : आइने अकबरी में नाम
ज्यूलोक दिया है। अबुल फजल के अनुसार—'राजा
ने समुद्र तक विजय प्राप्त किया था। विजय यात्रा
से लौटते समय वह कन्नौज गया था। उस समय
कन्नौज (कान्यकुब्ज) हिन्दुस्तान की राजधानी
थी। जलोक कन्नौज से अनेक गुणी तथा विद्वानों
को कश्मीर लाया। उनमें सात को चुनकर विभिन्न
विभागों का मुख्याधिकारी नियुक्त किया। उनमें
एक ज्योतिष विभाग था।
'उसके आदेश पर सर्पों का एक बहुत बड़ा
समूह चलता था। उन्हीं पर आरूढ होकर राजा
लम्बी जल यात्रा करता था। राजा किसी समय
युवा और किसी समय वृद्ध बन जाता था। उसके
सम्बन्ध में अनेक चमत्कारिक बातें कही जाती है।
इस राजा के समय बुद्ध धर्म मानने वालों के साथ
सहिष्णुता का व्यवहार किया जाता था।'
अबुल फजल ने राजतरंगिणी के फारसी अनुवाद
तथा प्रचलित जनश्रुति पर राजा जलोक का उल्लेख
किया है। जलोक के समय कन्नौज भारतवर्ष की
राजधानी नहीं था। पाटलीपुत्र राजधानी
था। यहाँ सर्पों का तात्पर्य नागो से अबुल फजल
का मालूम होता है।
इतिहासकार आज़म ने लिखा है :—कश्मीर
पर एक नया धर्म लादा गया। उश्ट्रि टिम्ब से
अशोक के पुत्र जलोक ने म्लेच्छों को निकाल बाहर
किया। राजा देश-विजय हेतु निकला। उसने
उत्तरी ईरान जीत लिया।
उत्तरी ईरान जीतने का कोई साधिकार प्रमाण
नहीं मिलता। विदेश यात्रा का अर्थ आज़म ने
उत्तरी ईरान लगाया है। आज़म ने यह तथ्य कहाँ
से पाया कोई प्रमाण नहीं देता।
बैदुद्दीन इतिहासकार लिखता है :—'ईरान का
राजा इस समय 'दोराव' था। ईरान के विजय के
पश्चात् उसने कन्नौज जीता था।'
आज़म तथा बैदुद्दीन की बातें यदि मान ली
जाँय तो नवीन धर्म पारसियों की अग्नि पूजा हो
सकती है। कश्मीर में बुद्ध तथा सनातन धर्म दोनों
उस समय प्रचलित थे। दोनों में विरोध नहीं था।
ईरान से सम्पर्क में आने पर इसी की सम्भावना
हो सकती है।
अग्नि पूजक पंजाब के उत्तर तथा पश्चिमी
भाग में एक समय आबाद थे। किन्तु कश्मीर में
अग्नि पूजा पारसियों की शैली की कभी प्रचलित
नहीं थी। हवन, यज्ञ, पञ्चाग्नि, अग्निहोत्र आदि
सनातन धर्म के अंग थे। आर्य धर्म में परम्परा से
यज्ञ होता आया है। वह यज्ञ वेदी तक सीमित था।
महात्मा जरदस्तू द्वारा प्रसारित तथा प्रचलित
अग्नि पूजा का चिह्न कश्मीर में अभी तक मिल
नहीं सका है।
किसी अग्निकुण्ड, अग्निमन्दिर किंवा अग्नि
वेदी का उल्लेख नीलमत पुराण एवं राजतरंगिणी
में नहीं मिलता। जलोक ने ईरान विजय के पश्चात्
एक नवीन धर्म कश्मीर पर लादा वह भ्रामक एवं
तथ्यहीन है।
हसन लिखता है :—'जलोक राजा अशोक का
दूसरा बेटा था। कलिसंवत् १७२६ मुखालिफों का
किला फतह करके सखावत और इन्साफ परवरी में

१६० राजतरंगिणी

नेकनामी हासिल की। मुल्क की आबादी में हद
दरजा कोशा रहा। लार में मौजा बारहमूला उसी
की तासीरात में से है। कल्हण पण्डित ने उसे
फरिश्ता सीरत जानकर अच्छी अच्छी खूबियों से
मुत्तसफ इंसान साबित किया है। पण्डित उद्भट्ट जो
अपने वखत का एकता था उसी के तरतीययाफ्तो
में से था। उसके कहने सुनने से राजा जलौक ने
फोरन् बुद्धमजहब छोड़ दिया। और अपने बाप के
बर खिलाफ शेव मजहब अख्तियार कर लिया।
विजयेश्वरी और नन्दह किशोर मन्दिरों की पूजा
पाठ अपने ऊपर लाजिम कर ली। सख्त रियाजतो
और वहानी सफाई और करावतो के पेश नजर
अपने जमाना का एकता था।

कफ—'कहते हैं कि हर दिन वाडू वेजवारह
और बारहमूला के मन्दिरो की पूजा-पाठ के लिए
घोड़ो पर सवार होकर जाया करता था। एक सांप
तावा किया हुआ था। जिस पर हर दिन सवार
होकर जहाँ चाहता था पहुँचता था। यह साँप उसे
बाकी सांपो से भी बचाता था। शिवजी के तमाम
मन्दिरो को निहायत उम्दगी से सजाया। इसके
जमाने मे बुद्धमजहब की कोई रौनक न रही।

'मशहूर है कि एक औरत ने उससे सवाल
किया कि मुझे कुछ बतौर खैरात के दे। राजा
ने कहा कि जो मांगेगी दूँगा। इसके बाद औरत
मजकूर देवी की शक्ल में मुतशक्ल हो गयी।
और राजा से इन्सान का गोश्त मांगा। राजा
किसी इन्शान के कतल पर राजी न हुआ। और
खुद उसके हवाला कर दिय'। देखकर उस औरत
ने इन्तहाई खुशी के साथ राजा के हक में तौफीक
इबादन की दुआ माँगो—फकत।

'बाद अजई राजा ने मुल्को के फतह करने का
पुख्त. इरादा कर लिया। सर जमीन हिन्दुस्तान मुल्क
में कन्नोज और बिहार तक के बहुत से शहर अपने
कब्जा अख्तियार मे कर लिये। तिमिर नाशक के
कोल के मुताबिक कन्दहार और वाख्तर तक के
बहुत से शहरो पर अपना कब्जा और इक्तदार जमा लिया। गाम गाम के मुल्को और इलाको की फतह
के बाद जब अपने मुल्क को लोटा तो बहुत से दस्तकार
और अहल पेशा आदमी उमरे साथ थे। अपने मुल्क
की दौलतमन्दी और शान व शोकत इम दरजा तक
पहुँचा दी कि दूर दराज के इलाको के रहने वाले
लोगो के दिल उसे सुनकर बाग बाग हो जाते थे।
उसके वखत तक कश्मीर में मुल्की ओहदेदारों का
इन्तजाम न था। राजा ने मुल्की मुआमलात के
इन्तजाम को चलाने के लिए अजखुद आफ़िसर
मुकर्रर किये। भोर उन्हें अपने फराइज का जवाब
देह करार दिया। जो ओहदेह जात इस राजा ने पैदा
किये उनकी तफसोल हस्व जैल है।

(१) उहदा दिवानी—इसके जिम्मा मुल्को लेन
देन का इन्तजाम था।
(२) उहदा खानसामानी—इसके जिम्मा खजानो
की हिफाजत और आमदनियों का हिसाव व
किताब था।
(३) दारोगा फोरखाना—इसका काम फौज
के हथियार, लिवाम और सामान वगैरह को हिफाजत
था।
(४) बख्शी—फौज की इन्तजाम के लिये।
(५) वजारत—बादशाह की राय और मशविरा
के लिए।
(६) दारोगा मदर—खैरात और सदकात की
तक्सीम के लिए।
(७) नकीब—सिपाहियो और किसानो की
खबरगोरो के लिये।

अलगरज हकूमत के इन्तजाम को पुस्तगो और
अद्दल व इन्साफ, सखावत और रास्त बाजी में
लाशानी था। कहते हैं कि गोटी नीद नाम की एक
दवाई पाई थी। जिससे सोना बनाया करता था।
इल्म सीमया बखूबी जानता था। आखिर कार कपाल
मोचन के मुकाम जो कसवा सूपियान में सोनगुल
नहर का मुन्बथ है राहे बहक हो गया। उसको वीवी
ईशान देवी इन्तहाई दरजा की रियाजत कीश भोर
बाहिम्मत औरत थी। उसके मादर चकर और हस्त

प्रथम तरंग १६१
यस्य दिव्यप्रभावस्य कथाः श्रुतिपथं गताः ।
आश्चर्याच्चपलतां यान्ति नियतं द्युपदामपि ॥ १०९ ॥
१०९. राजा के दिव्य प्रभाव की कथा जब देवताओं के कानों तक पहुँची तो वे आश्चर्य
चकित स्तम्भित हो गये ।
कोटिवेधिनि सिद्धे हि स रसे हाटकार्पणैः ।
असीसुषिरतां हर्तुं हेमाण्वस्य ध्रुवं क्षमः ॥ ११० ॥
११०. कोटिवेधिनो रस की सिद्धि द्वारा करोड़ों वस्तुओं को सुवर्ण में परिणत कर शून्य
गगन मण्डल को सुवर्ण दान द्वारा भर देने में राजा सक्षम था ।
हाल बनाकर गरीबों और मसकीनों को बख्श दिये ।
शामदेव के शागिर्द से नन्दी पुराण पढ़कर नन्दीश्वर
का मजहब अपने ऊपर अख्तयार कर लिया । बुद्ध
मजहब फजहवन् तर्क कर दिया । राजा जलोक की
कुल हुकूमत साठ साल थी ।' (पृष्ठ ३९४०)
हसन ने अपने पूर्व के मुस्लिम इतिहासकार
तथा कल्हण सब के द्वारा वर्णित घटनाओं का
समन्वय कर लिया है । सब की बात मान
ली है ।
उसने 'इतिहास तिमिर नाशक' का उल्लेख
किया है। काशी के राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द'
ने भारत का एक अत्यन्त संक्षिप्त इतिहास लिखा
था । मैंने उसे अपनी बाल्यावस्था में पढ़ा था। वह
हिन्दी तथा शायद उर्दू दोनों भाषाओं में छपा था।
हसन ने यही इतिहास पढ़ा था। इतिहास तिमिर
नाशक साधारण लोगों के पढ़ने के लिये उन्नीसवीं
शताब्दी में लिखा गया था। मेरे पास इसकी मूल
प्रति थी । वह 'कलकतिया नागरी' मोटे टाइप में
धार्ट कागज पर छपा था । उन दिनों उसका मूल्य
था । क्योंकि कोई और इतिहास भाषा में उपलब्ध
नहीं था । राजा शिवप्रसाद नागरी और हिन्दी
भाषा के महान् पक्षपातियों एवं उन आन्दोलकों में
थे जिन्होंने हिन्दी को उर्दू से भारत में बचाया था।
उन दिनों हिन्दी के स्थान पर उर्दू चलाने का प्रचार
तेजी पर था। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा की
स्थापना तथा तत्कालीन हिन्दी आन्दोलन की यही
पीठिका थी । हसन का ऐतिहासिक ज्ञान कितना
सीमित था यह इसी एक बात से प्रमाणित होता है
कि उसने अपने मत की पुष्टि इतिहास तिमिर नाशक
का उद्धरण देकर करना चाहा है; जिसका ऐतिहासिक
महत्त्व साधारण है। जलोक सम्बन्धी हसन के मत
को मैं उसी प्रकार मान्यता देने में अपने को असमर्थ
पा रहा हूँ जैसे अबुल फजल, आजम तथा हैदुद्दीन
को ।
जलोक का वर्णन कल्हण ने कवि श्री छविलाकर
के आधार पर किया है। श्री छविलाकर ने जैसा
वर्णन किया होगा उसे ही कल्हण ने अपनी पुस्तक
राजतरंगिणी में स्थान दिया है। इस सम्बन्ध में
विस्तारपूर्वक वर्णन परिशिष्ट 'जलोक' में द्रष्टव्य है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १०९ में 'आश्चर्याच्च' का
'आश्चर्याश्च' और 'नियतं' का 'निश्चयं' और
'द्युपदां' का 'द्युसदां' पाठभेद मिलता है ।
श्लोक संख्या ११० में 'वेधिनि' का 'वेदिनि';
'सुषिरताम्' का 'सुस्वितताम्' और 'हर्तुं' का 'कर्तु'
और 'हेमाण्वस्य' का 'हेमांगस्य' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११० (१) कोटिवेधिनि रस : कल्हण ने धातुओं
से सुवर्ण बनाने का उल्लेख राजा ललितादित्य (रा०
त० ४ : २४६ तथा ३६३) और सिकन्दर बुतशि-
कन के वर्णन प्रसंग में; जोनराज ने अपनी राज-
तरंगिणी (श्लोक संख्या ५७८) में किया है।
२१

१६२ राजतरंगिणी
संस्तम्भ्याम्भःप्रविष्टेन तेन नागसरोऽन्तगम् ।
तारुण्यं फणिकन्यानां निन्ये संभोगभज्यताम् ॥ १११ ॥
१११ अपना तारुण्य फणि कन्याओं के संभोग में सफल करने के निमित्त राजा नाग-
'सरोवरों में जल स्तम्भित कर प्रवेश करता था ।
भारत में प्राचीनकाल से यह कथा प्रचलित
चली आती है । साधु महात्मा तथा चामत्कारिक
पुरुष स्वर्ण बनाने की सिद्धि प्राप्त करते हैं । मुख्यतया
पारा सिद्ध कर उसके द्वारा सोना बनाया जाता है ।
इसी प्रकार यह कथा भी प्रचलित है । पारस
पत्थर के स्पर्श कराने से धातुएँ तथा लोहा सोना
बन जाता है । इस प्रकार चामत्कारिक बातें माधु
महात्मा तथा महान् पुरुषों की महत्ता वृद्धि के निमित्त
उनके जीवन से सम्बन्धित कर दी जाती हैं ।
कोटिवेधिनी रस का कल्हण ने उल्लेख यहाँ
किया है । यह रस क्या था ? कैसे बनता था ? इसका
प्रयोग किस प्रकार किया जाता था ? इस पर अब
तक प्रकाश नही पड़ सका है । यह किसी प्रकार का
रस था । जिसके सिद्ध करने से सुवर्ण तैयार हो
जाता था ।
१११ (१) नागसरोऽन्तरम्ः यहाँ यह अर्थ
करना समीचीन मालूम होता है। नाग अर्थात् झरनों,
प्रपातों एवं सरोवरों का जल स्तम्भित, अर्थात् रोककर
राजा नागकन्याओं के साथ भोग कर अपना यौवन
सुफल करता था । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर
कश्मीर में नागो के स्थान माने गये हैं । वे प्रत्येक
सरोवर तथा प्रपातो एवं स्रोतों में निवास करते हैं ।
यहाँ पर नागकन्याओ का रहना स्वाभाविक है ।
जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर को स्तम्भित करने का
अर्थ जल शान्त करना है । उन्हें अपने काम प्रसग
निमित्त हलचलहीन बनाना है । अत्यन्त एकान्त
वातावरण उत्पन्न करना है । यहाँ पर कल्हण ने
किसी सरोवर, स्रोत एवं प्रपात विशेष का उल्लेख
नही किया है । उसका मन्तव्य मालूम होता है। राजा
किसी नाग किंवा सर विशेष की नागकन्या के स्नेह
सूत्र द्वारा ही सीमित नहीं था । वह इच्छानुसार
कश्मीर के अगणित नागों तथा सरों में प्रवेश कर
अनेकानेक नागकन्याओं से सम्बन्ध स्थापित करता
था । वह किसी एक स्थान से बँधा नही था ।
कल्हण इस प्रकार राजा जलोक की ऋद्धि का
वर्णन गौण रूप से कर देता है । राजा ऋद्धि
सम्पन्न था । वह नागो तथा सरों के जलो को बाँध
देता था । जल बाँध देने की कथा योगियो के जीवन
से सम्बन्धित की जाती हैं । योगी नदी के जल को
स्तम्भित किंवा बाँधकर नदी पार पैदल चला जाता
है । जल बाँधकर अपना चमत्कार दिखाता है ।
चामत्कारिक कथानको से साहित्य भग पड़ा है ।
कल्हण राजा जलोक के कोटिवेधिनी रस तुल्य उसके
दूसरे चमत्कार का वर्णन करता है ।
कल्हण एक तीसरे चमत्कार को और राजा के
जीवन से सम्बन्धित करता है । राजा जल मे प्रवेश
करता था । जल में डूबने अथवा रहने पर साधारण
प्राणी प्राणवायु के अभाव मे मर जाता है । परन्तु
राजा जलोक वहाँ नागकन्याओ के साथ विहार
करता था । राजा की दिव्य शक्ति का जो उल्लेख
कल्हण ने श्लोक संख्या १०९ मे किया है उन्ही का
यहाँ विस्तार करता है । राजा में इतना अधिक दैवी
गुण किंवा प्रभाव था कि मनुष्य होते हुए भी वह
देवताओं तुल्य अद्भुत कार्य करता था । राजा का
जल के अन्दर बिना प्राणवायु प्राप्त किये विहार
करना स्वतः एक चमत्कार की बात थी । कल्हण ने
राजा के दिव्य प्रभाव का यह तीसरा उदाहरण
दिया है ।

प्रथम तरंग १६३
तत्कालप्रबलप्रौढबौद्धादिसमूहजित् ।
अवधूतोऽभवत्सिद्धस्तस्य ज्ञानोपदेशकत् ॥ ११२ ॥
११२. राजा का ज्ञानोपदेशक एक तेजस्वी दार्शनिक अवधूत था, जिसने कश्मीर मण्डल में
सफलता से फूल कर प्रबल हो उठे बौद्ध 'समूह को शास्त्रार्थ में परास्त किया था।
११२ (१) बौद्ध : अशोक के कारण बौद्धधर्म
का प्रचार प्रबल हो उठा था। संघ का भी संगठन
सुदृढ़ हो गया था। अशोक ने कश्मीर सीमान्त पर
(१) मानसेहरा, (२) शहबाज गढ़ी, तथा (३)
धौली में लगे शिला अभिलेख में धर्म प्रचार तथा संघ
संघटन का निर्देश दिया है। धौली में कश्मीर के
सीमान्त स्थान तक्षशिला का भी उल्लेख किया
गया है।
अशोक ने धर्म प्रचारार्थ पंच वर्षीय योजना
बनायी थी। शहबाज गढ़ी तृतीय अभिलेख में उसने
स्पष्ट लिखा है—वदष षषभिषितेन... अणपितं ।
सवत्रमअ विजिते युत रजिको प्रदोशक पंचषु पंचषु
५ वषेपु अनुसंयनं निक्रमंतु एताम्ये वो करण इमिस
धंमनुशस्तिये थ अनयेपि क्रमये।' अभिलेख के बारह
वर्ष (पश्चात्) मेरे द्वारा ऐसी आज्ञा दी गयी। सर्वत्र
मेरे राज्य में, युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक पाँच-पाँच (५)
वर्ष पर इस कार्य के लिये, इस धर्मानुष्ठान के लिये
तथा, अन्य कार्य के लिए दौरे पर जाँय।'
मानसेहरा तृतीय अभिलेख में पुनः लिखा गया
है ' देवनं प्रिये प्रियदशि रज एथ अह (१) दुवड
शवष भिपितेन में इयं अणपयिते (२) सवत्र विजि
तसि .......तरनु प्रदेशिके पंचसु ५ वषेषु
' अनुसंयनं निक्रमन्तु एतये अ अध्रये इमये धमनु
शस्तिये यथ अग्रये पि क्रमणे (३) सधुमत पितृप्य
मित्र संस्तुत............
'अतिकिनं च श्रमण भ्रममणं सधुदने प्रणन
अनरंभे सधु अपव्यत अपभडत मधु (४) परिप वि
थ युतनि गणनसि अण पयि शति हेतुने च । वियंज
न ते च ।
देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा
द्वादश वर्षाभिषिक्त मुझने ऐसा आज्ञा हुआ। राज्य
में सर्वत्र मेरे युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक (नामक राज्य
कर्मचारी) पाँच-पाँच (५) वर्षों में दौरे पर निकलें।
इस प्रयोजन के लिए इस धर्मानुशासन के लिए तथा
अन्य भी कार्य के लिए। ... परिषद् युक्तों को हेतु
(कारण) और व्यञ्जन (अक्षरशः अर्थ) के साथ (इन
नियमों की) गणना करने के लिए आज्ञा देंगी।
उक्त दोनों स्थानों के पंचम अभिलेखों में धर्म
महामात्र की नियुक्ति के साथ अपने पुत्र, प्रपौत्र आदि
के लिये अभिषेक के तेरहवें वर्ष में अशोक ने आदेश
दिया।
'११. देवनं प्रियो प्रियदसि रय एवं अहति
कलणं दुकरं यो आदि करो कलणस सो दुकरं करोति
सो मय बहुकलं किटुं तं मअ पुत्र च नतरो च तंन
ये मे अपचं वक्षन्ति अवकप॑ तथ ये अनु वटिशन्ति ते
सुकटं कर्पति यो चु अ तो ... ...कं प हये शदि सो
दुक्टं कवति पयं हि सुकरं स अति क्रतं अतर नो भुत
पुव धंम महमत्र नम सो तोदश वषभिसितेन १२
मम धम महमत्र किट ते सत्र प्रपंड़ेषु वषट धमं धिध
नये व धम वडिय हिद सुखये च धमयुतसं.........।'
[ देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा।
जो कल्याण का प्रारम्भ करता है वह दुष्कर कार्य
करता है किन्तु मुझसे बहुत कल्याण किया गया।
यदि मेरे पुत्र, नाती और उनके परे मेरे अपत्य कल्प
के अन्त तक (इसका) अनुसरण करेंगे ये कुछ सुकृत
करेंगे। जो यहाँ (इस देश में) इसका एक अंश भी
नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा। पाप सुकर है। बहुत
समय बीता। भूतकाल में धर्म महामात्र नाम (का
अधिकारी) नही थे। किन्तु राज्याभिषेक के तेरह वर्ष
पश्चात् मेरे द्वारा धर्म महामात्र (नियुक्त) किये गये।

१६४ राजतरंगिणी
धर्म की स्थापना, धर्मवृद्धि और धर्मयुक्तों के हित
सुख के लिये वे पाषण्डों (धार्मिक सम्प्रदायों) मे
व्याप्त हैं ।']
मानसेहरा में भी यही अभिलेख है । कश्मीर की
सीमा पर प्राप्त दोनों अभिलेखों के पश्चात् 'धौली के
प्रथम पृथक् अभिलेख में अपने राजनैतिक आदर्श में
धर्म प्रचार का आदर्श भी रखा । उसने महामात्रों के
साथ ही साथ कुमार अर्थात् राज्यपालों के लिये
त्रिवर्षीय योजना प्रस्तुत की । यहाँ तक्षशिला के
नाम का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जो
कश्मीर की सीमा और कभी कश्मीर राज्य के अन्त-
र्गत था ।
२१. 'अकस्मा पलिकिलेसे वनो सियाति (२३)
एताये च अठाये हथ्यं मते पंचसु पंचसु वसे ।
२२ सुनिस्ग मयि खामि ए अक्रकसे अचंडे
सखिनालंभे होयति एतं अठं जानितु ... तथा
२३ कलंति अथ मम अनुसथीति (२४) उजेनि
तेपि खु कुमाले एताए य अठायं निखा मयिस ....
२४. हे दिसमेव वग नो च अति कामयिसति
तिनि वसानि (२५) हेमेव तखसिलाते पि (२६)
अद्वा अ ...
२५. ते महामाता निखमिसंति अनुसयानं तदा
अहा पयितु अतने कंमं एतं पि जानिसंति
२६. तं पि तथा कलंति अथ लाजि ने अनु
साथीति (२७)
[ बिना किसी कारण के परिक्लेश (शारीरिक
कष्ट) का दण्ड न मिले । इस प्रयोजनके लिए मैं
महामात्रों को पाँच-पाँच वर्षों के अन्तर से दौरे पर
भेजूँगा । जो अकर्मश, अचण्ड, श्लक्ष्णारम्भ (सर-
निकलेंगे तब वे अपने कर्तव्यों की अवहेलना न करते
हुए मेरे इस आदेश को जानेंगे (२६) और ऐसा
कार्य भी करेंगे जैसा राजाका अनुशासन है । ]
अशोक ने सामाजिक जीवन में भी आमूल परि-
वर्तन करनेका विचार किया जैसे उसने 'विहार
यात्राके स्थानपर' 'धर्म यात्रा' का प्रचलन किया ।
(जौगढ अष्टम अभिलेख) उसने स्वयं स्थान स्थान
पर २५६ से अधिक पड़ाव डाला था । (गुर्जरा तथा
सहसराम अभिलेख) ।
राजाश्रय, प्रचारादिके कारण बौद्ध धर्मको
विशेष बल मिला । चीनी यात्रियोको अशोक निर्मित
कम-से-कम चार स्तूप कश्मीर उपत्यका से मिले थे ।
पाँच सौ चैत्यों का निर्माण हुआ था ।
कल्हण इस दशा की ओर संकेत करता है ।
बौद्ध धर्मानुयायी प्रबल हो गये थे । वे धर्म प्रचारके
उत्साहसे भर गये थे । उनका अपने धर्मके समर्थन
निमित्त शास्त्रार्थ करना व्यावहारिक बात मालूम
होतो है । पुराने सनातन धर्मके पक्षपाती अवधूतने
उन्हें शास्त्रार्थमें पराजित किया था । कल्हण वहाँ
गौण रूपसे संकेत करता है । जनता तथा जलोक
राजा पुराने धर्मकी ओर पुनः मुड़े थे । यद्यपि उसने
बौद्ध धर्मका विरोध नही किया था ।
(२) अवधूत : 'महानिर्वाण तत्र' के अनुसार
अवधूतों का वर्गीकरण किया गया है । अवधूत
शैव तथा वैष्णव दोनो सम्प्रदाय के होते थे ।
अवधूतका शाब्दिक अर्थ त्यागी किंवा संन्यासी होता
है । उनका वर्गीकरण 'महानिर्वाण तन्त्र' के अनु-
सार (१) ब्रह्मावधूत (२) शैवावधूत (३) वीरा-
नया (४) कुलावधूत होते हैं ।

प्रथम तरंग १६५
विजयेश्वरनन्दीशक्षेत्रज्येष्ठेशपूजने ।
तस्य सत्यगिरो राज्ञः प्रतिज्ञा सर्वदाऽभवत् ॥ ११३ ॥
११३. उस सत्यवादी राजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि नन्दिक्षेत्र स्थित ज्येष्ठेश्वर१ तथा
विजयेश्वर की सदा पूजा किया करेगा।

गुह्यांग ढकने मात्र के लिये कौपीन होता है। शरीर
भस्म किंवा रक्त चन्दन से पुता रहता है। हाथो में
काष्ठ दण्ड, परशु एवं डमरू और मृगचर्म रहता है।
कुलावधूत उसे कहते है जो कुलाचार में अभिषिक्त
होकर भी गृहस्थाश्रम में रहता है।

वैष्णव सम्प्रदाय में रामानन्द की शिष्य परम्परा
में अवधूत होते हैं। वैष्णव अवधूत के सर के केश
लम्बे होते हैं। कण्ठ में स्फटिक की माला रहती है।
शरीर पर कंथा रहता है। हाथ में दरियाई नारि-
यल का खप्पर होता है। इस सम्प्रदाय के बंगाल में
पृथक् पृथक् अखाड़े होते हैं। सभी जाति के लोग
इसमें सम्मिलित हो सकते हैं। ये गृहस्थों के द्वार
पर वीर अवधूत नामका स्मरण कर एकतारा किंवा
अन्य कोई वाद्य यंत्र बजाकर गाते हैं। इनके
निवास की शैली अव्यवस्थित रहती है। इन्हें बंगाल
में कुछ लोग बाउल गायक कहते हैं। परन्तु वह
अवधूतो का एक भेद मात्र है।

नाथ सम्प्रदाय में अवधूतों का स्थान बहुत ऊंचा
माना गया है। वे प्रकृति विकारों से दूर रहते हैं।
कैवल्य की प्राप्ति निमित्त आत्मचिन्तन तथा अभ्यास
में निरन्तर रत रहते हैं। 'सगुण एवं निर्गुण' ब्रह्म
दोनों से पर की उनकी स्थिति होती है।

गुरु दत्तात्रेयको अवधूत कहा जाता है। दत्त
सम्प्रदाय में अवधूतको सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
'अवधूत गीता' में अवधूतों का पूर्ण विवेचन विस्तार
के साथ प्राप्त होता है।

स्त्रियां भी अवधूत तुल्य अवधूती कही जाती हैं।
वे विशेषतया पश्चिमोत्तर भारतीय क्षेत्र में मिलती
हैं। वे संन्यासी पुरुषो तुल्य वेश धारण करती हैं।
भस्म लगाती है। कण्ठ तथा बाहु में रुद्राक्ष की
माला पहनती है। कतिपय अवधूतनियां अपने जूड़ा
में भी रुद्राक्ष माला लपेट लेती है।

अवधूती मार्ग सुषुम्ना नाड़ी की एक संज्ञा है।
उस प्राण वायु की इड़ा पिंगला नाडी के स्थान पर
सुषुम्ना नाडी में धारण करने को अवधूती किंवा
अवधूतिका मार्ग कहा जाता है।

अवधूतेश्वर शंकर का एक अवतार माना गया
है। कथा है। एक समय इन्द्र तथा बृहस्पति भगवान्
शंकर के दर्शनार्थ कैलास जा रहे थे। उनकी परीक्षा
लेने का शंकर ने विचार किया। मार्ग में दिगम्बर
और भयंकर रूप बनाकर बैठ गये। वह न तो मार्ग
से हटते थे और न कुछ बोलते थे।

इन्द्र ने चिढ़कर वज्र निकाला। शंकर ने वज्र
का स्तम्भन कर दिया। उनका तृतीय नेत्र खुल
गया। उससे ज्वाला निकलने लगी। बृहस्पतिने
शंकरका उग्र रूप देखकर, स्तुति की। वह अग्नि
ज्वाला लवणोदधि में डाली गयी। उससे जालंधर
उत्पन्न हुआ। उसका वध शंकर ने किया। (शिव०
शत : ३०)

११३ (१) ज्येष्ठेश = शंकर की पूजा कश्मीर में
अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी। उनकी तीन
नामों यथा ज्येष्ठेन, ज्येष्ठेश्वर तथा ज्येष्ठ रूप से पूजा
होती थी। उनके स्थान भी भिन्न थे।

प्रथम ज्येष्ठेश का स्थान हरमुकुट पर्वत के
अधोभाग में नन्दिक्षेत्र किंवा नन्दीश क्षेत्र में था।
इसका उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिरणी १: ३६ में
किया है। द्वितीय स्थान त्रिपुरेश्वर अर्थात वर्तमान
त्रिफर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी में
कल्हण ने ५: १२३ में किया है। तृतीय स्थान
श्रीनगर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी
१: १२४ में कल्हण ने किया है।

१६६ राजतरंगिणी
इस स्थान पर कल्हण ने ज्येष्ठेश का स्थान
निश्चित नन्दिक्षेत्र बता दिया है। द्वितीय ज्येष्ठेश को
प्रथम ज्येष्ठेश से भिन्न मानने के लिये त्रिपुरेशाद्रिनिष्ट
संज्ञा दी है। त्रिपुरेश पर्वत के अधोभाग में उनका
निश्चित स्थान बताता है। तृतीय ज्येष्ठेश्वर रुद्र का
स्थान डल लेक के समीप था। यहाँ महाराज हरी
सिंह ने अपना राजभवन बना लिया है। वह भवन
अब होटल रूप से चलता है। श्रीनगर से गुप्तकर होते
हुए जो सड़क डल लेक के तट से होती चश्माशाही,
शालीमार बाग की तरफ जाती है; वही पर सड़क से
ऊपर राजभवन के स्थान पर यह स्थान था।
नन्दिक्षेत्र के ज्येष्ठेश वही हैं जिनका वर्णन भूते-
श्वर मन्दिर के सन्दर्भ में किया गया है। भूतेश्वर
मन्दिर के प्राकार में अनेक मन्दिर निर्माण किये
गये थे। यह प्रथा अत्यन्त प्राचीन थी। मेवाड़ में
एकलिंग जी के मन्दिर के प्राकार के अन्दर एकलिंग
के मुख्य मन्दिर के चारों ओर अनेक मन्दिरों का
निर्माण कालान्तर में राजाओं ने भूतेश्वर मन्दिर के
समान कराया था। भूतेश्वर मन्दिर के समीप जैसे
सोदर तीर्थ का अति लघु सरोवर है उसी प्रकार
एकलिंग मन्दिर में भी एक लघु सरोवर है।
नीलमत पुराण इसे और स्पष्ट कर देता है :
पूर्वोत्पन्नं च यज्ज्येष्ठाख्यं लिंगं मम द्विज ।
तत्रापि सन्निधानं मे नित्यं विज्ञातुमर्हसि ॥
1110:१३११
ऋषिकोटिसहस्राणि मम भक्त्या द्विजोत्तम ।
तत्र संस्नापयन्ति स्म ज्येष्ठेशं तं सदैव तु ॥
१३१२
यथाभ्यहं च ज्येष्ठेशे भूतैः सह तथामया ।
त्वम स्वमपि मद्भिन्न मद्भक्तो मत्परायणः ॥
1111:१३१७
भयदाम्ना च दैन्यानां सुराणामभयप्रदः ।
ज्येष्ठेश्वरसमीपे तु यस्मिण्डोऽपि महायशः ॥
1119.१३२३
स्नात्वा तु मोदरे पुण्ये दृष्ट्वा भूतेश्वरं हरम् ।
ज्येष्ठेश्वरं नन्दिरुद्रं च गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥
1124:१३२८
ज्येष्ठेश के स्थान निर्णय में इस प्रकार कोई
विवाद नहीं रह जाता। नीलमत स्थान का निश्चय
स्पष्ट करता है। नन्दिक्षेत्र तथा वसिष्ठ आश्रम अर्थात्
वांगध के समीप ज्येष्ठेश का स्थान बताकर, वह भूते-
श्वर स्थित ज्येष्ठेश को ही कल्हण वर्णित ज्येष्ठेश
मानने के लिये बाध्य कर देता है।
शिव तथा नन्दी की कथा में एक प्राचीन लिंग
की बात आती है। उसे ज्येष्ठेश कहते थे। वह
निःसन्देह शिव भूतेश्वर के स्थान में था। प्राचीन
नन्दीक्षेत्र माहात्म्य में उल्लेख मिलता है कि ज्येष्ठेश्वर
किंवा ज्येष्ठनाथ की पूजा नन्दीश तथा भूतेश्वर के
अत्यन्त समीप होती थी। (श्लोक १४६)
कल्हण ने राजतरंगिणी के श्लोक १:१५१ में
ज्येष्ठ रुद्र का उल्लेख किया है। वहाँ पर ज्येष्ठ रुद्र
वास्तव में ज्येष्ठेश है। कल्हण पुनः ४:१९० में
उल्लेख करता है कि ज्येष्ठ रुद्र का एक मन्दिर भूते-
श्वर में निर्माण कराया गया था। कल्हण ने अन्तिम
बार इसका उल्लेख ८:२४३० में किया है। वसिष्ठा-
श्रम जो वूथेसर अर्थात् भूतेश्वर के समीप था वह
कह कर स्पष्ट कर देता है, कि नन्दिक्षेत्र में जो ज्येष्ठेश हैं,
वही यहाँ वर्णित ज्येष्ठेश है।
इस श्लोक से एक बात और स्पष्ट हो जाती है।
उक्त ज्येष्ठेश का लिंग स्वयंभू था। वह अनघट था।
इस प्रकार के अनगढ़ शिलाखण्ड की पूजा आज भी
सारिका पर्वत, श्रीनगर तथा सुरेश्वरी स्थान में
होती है।
ज्येष्ठेश का मन्दिर भूतेश्वर स्थित मन्दिरों के
दो समूहों में पश्चिमी मन्दिर समूह में था।
स्वयंभू लिंगों की पूजा भारतवर्ष के अनेक तीर्थों
में होती है। मैने राजस्थान में अनेक स्थानों पर चाहे

[Header]
प्रथम तरंग १६७

[Left Column]
वे नगर हों अथवा ग्राम अनगढ शिलाखण्ड की पूजा
भैरव, रुद्रादि नामकरण देकर किये जाते देखा हैं।
शिव लिंग के प्राप्त करने की एक पुरानी प्रथा
है। उन्हें गढ़ना अच्छा नही माना जाता । शिवलिंग
प्रायः नर्मदा नदी से प्राप्त किये जाते थे । उन्हें
नर्मदेश्वर कहा जाता था । ब्राह्मण किंवा पुरोहित
अथवा इस कार्य के लिये नियुक्त व्यक्ति स्नानादि
कर शुद्ध होकर नर्मदा की धारा में डुबकी लगाते
थे। नदी तल में जो लिंग मिल जाता था उसे लेकर
निकलते थे। उसी लिंग की स्थापना गढ़े अर्धों
में कर दी जाती थी । नर्मदा तल मे सभी पत्थर के
ढोके प्राय शिव लिंग आकार के गोले तथा लम्बे
आकार के होते हैं। आज कल इस प्रकार के शिव
लिंग मूर्तिकार गढ़ने लगे हैं। पालिश करते हैं।
तत्पश्चात् स्थापनार्थ बेचते हैं।
यहाँ ज्येष्ठेश शब्द की व्याख्या में विस्तार से
जाना अप्रासंगिक होगा । ज्येष्ठेश नाम क्यो दिया
गया ? किसी व्यक्ति के नाम पर, ऋषि के नाम पर
अथवा किसी पुरानी कथा के आधार पर यह नाम-
करण किया गया । इसका सम्बन्ध धार्मिक अनुसंधान
से है । ऐतिहासिक दृष्टि से इतना वर्णन अलम् प्रतीत
होता हैं ।
रुद्र वास्तव में वैदिक देवता है। वैदिक साहित्य
में नैसर्गिक एवं व्याधि जनित उत्पात निर्माण कारक
देवता की संज्ञा रुद्र नाम से दी गयी है ।
शिव की संज्ञा उसी देवता के शमनकारी
रूप को दी गई है। अतएव एक ही देवता के रौद्र
एवं शान्त रूप का नाम रुद्र एवं शिव है ।
पाश्चात्य दैव विज्ञान में सृष्टि संचालक एवं
संहारक एक ही देव को मानकर उसकी द्विविध रूप
में उपासना की जाती है। भारती दैव विज्ञान संचा-
लक एवं संहारक दो शक्तियों किंवा दैव को मानता
है । सचालक शक्ति को विष्णु तथा सृष्टि संहारक
शक्ति को रुद्र की संज्ञा दी गयी है ।
ऋग्वेद से गृह्यसूत्रों के काल तक रुद्र देवता
विषयक कल्पनाओं की उत्क्रान्ति पर दृष्टिपात किया

[Right Column]
जाय तो प्रतीत होता है। ऋग्वेद अथवा वैदिक
साहित्य में रुद्र निसर्ग प्रकोप का देव था ।
वही रुद्र उत्तर कालीन साहित्य में पशु, वन,
पर्वत, नदी, श्मशानादि समस्त सृष्टि व्यापक एक
महान् शक्ति सम्पन्न देवता के रूप में मान्यता प्राप्त
कर लिया है ।
ऋग्वेद में रुद्र के स्वरूप का वर्णन किया गया
है । उनका वर्ण भूरा है। सूर्य तुल्य जाज्वल्यमान एवं
सुवर्ण समान प्रदीप्त हैं। (ऋ० १:४३, २:३३ )
पूषन तुल्य जटाधारी है ।
संहिताओं में वैदिक रुद्र का रूप बदलता दिखाई
देता हैं। उन्हें सहस्राक्ष. नील वर्ण ग्रीवा, एवं केश
युक्त बताया गया है ( वा० सं०: १६; ७, अथर्ववेद.
२:२२ ) उनका उदर किंवा पेट कृष्ण एवं वर्ण रक्त
कहा गया है । ( अथर्व वेद १५: १ ) उन्हे चर्मधारी
भी कहा गया है। (वा० सं : १६-२-४,५१) काला-
न्तर में यह चर्मधारी रूप वाघाम्बर एवं मृग चर्म-
धारी रूप में परिणत हो गया ।
महाभारत एवं पुराणों में रुद्र के स्वरूप की
अनेक कल्पनाएँ की गयी हैं। पंचमुख की कल्पना
विशेष प्रचलित है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं ऊर्ध्व
दिशा वाला मुख सौम्य तथा दक्षिण दिशावर्ती मुख रौद्र
दिखाया गया है । दक्षिण दिशा काल की दिशा कही
गयी है । अतएव रौद्र रूप प्रदर्शित करना इसी काल
किंवा संहार का प्रतीक है । (म० अनु० १४०:४६)
ग्रीवा नील होने का महाभारत में ही दो वर्णन
मिलता हैं । महाभारत अनुशासन पर्व (१४१:८)
इन्द्र के प्रहार के कारण ग्रीवा नील होना कहता
हैं। महाभारत शान्ति पर्व (३४२:१३) दूसरा कारण
देता है । समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल विष पान
करने के कारण शिव की ग्रीवा नीली हो गयी थी ।
नाम नीलकंठ पड़ गया था । उन्हें वही पर श्रीकंठ
कहा भी गया है ।
पुराणो मे रुद्र को चतुर्मुख (विष्णु धर्म: ३:४४-
४८;५५:१ ) अर्धनारीश्वर, नटेश्वर (मत्स्य: २६०)
एवं त्रिनेत्र कहा गया है ।

१६८ गजतरंगिणी
रुद्र का निवास स्थान वैदिक साहित्य के अनुसार
पर्वतों और मुख्यतया मूंजवन् पर्वत है (वा० स०:
२५:२-४; ३.६१; ) महाभारत रुद्र का आद्य निवास
स्थान मेरु पर्वत मानता है । रुद्र का इसलिए एक
नाम मेरुधामा पड़ गया है । (म० अनु० १७:२,१)
आश्वमेधिक पर्व महाभारत (८:१) वायु पुराण
(४७.१९) एवं मौखिक पर्व (१७.२६) के अनुसार
रुद्र का निवासस्थान मुंजवान किंवा मूजवत पर्वत
है । यह पर्वत कैलास के उस पार था । महाभारत
भीष्म पर्व (७.३१) में इनका निवास स्थान कैलास
एवं हिमालय पर्वत बताया गया है ।
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:१७-१६)
के अनुसार रुद्र का निवास स्थान काशी की श्मशान
भूमि है । संवर्त को शव रूप शिव का दर्शन काशी में
हुआ था ।
सभी का समन्वय करने पर निष्कर्ष निकलता है
कि रुद्र का स्थान हिमालय के एकान्त में, तपस्या
योग्य वनश्री के मध्य होना चाहिये । भूतेश्वर का
स्थान इस दृष्टि से आदर्श है । यहाँ ज्येष्ठ रुद्र की
स्थापना की कल्पना सराहना योग्य है ।
दक्ष प्रजापति ने रुद्र को नन्दिकेश्वर नामक
वृषभ वाहन के लिये दिया था । उनकी ध्वजा पर
वृषभ का चिह्न था । अतएव नाम वृषभध्वज पड़
गया । भूतेश्वर स्थान नन्दिक्षेत्र के अन्तर्गत है ।
इनका आयुध, विद्युत दार है। वेद में इनका शस्त्र
धनुष बाण एवं वश कहा गया है । ऋ० २:३३:३;
१०,५४२:११; १०:१२६ ६)
यजुर्वेद के शतरुद्रीय अध्याय में रुद्र का स्वभाव
चित्रण अधिक विस्तार के साथ दिया गया है ।
(तै० सं० ४:५ १, वा० सं० १६) इन्हें 'रुद्रतनु'
अर्थात् रुद्ररूप और 'शिवतनु' अर्थात् शिव स्वरूप
कहा गया है ।
या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥
अथर्ववेद में ग्यारह रुद्रों यथा (१) ईशान, (२) भव,
(३) शर्व (४) पशुपति (५) उग्र (६) रुद्र एवं (७)
महादेव का वर्णन है । पुराणों में अष्ट रुद्रों का
उल्लेख है । यथा-(१) रुद्र (२) भव (३) शर्व (शिव)
(४) पशुपति (५) भीम (६) ईशान (७) उग्र एवं
(८) महादेव । महाभारत में एकादश रुद्रों का उल्लेख
है । यथा (१) मृगव्याध (२) सर्व (३) निर्ऋति
(४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य, (६) पिनाकिन् (७)
दहन (८) ईश्वर (६) कपालिन् (१०) स्थाणु एवं
(११) भव (म० आदि ५०:१०३)
स्कन्द पुराण में (१) भूतेश, (२) नील रुद्र
(३) वृषवाहन (४) त्र्यंबक (५) महाकाल (६)
भैरव (७) मृत्युंजय (८ गणेश एवं (९) योगेश
रुद्रों का नाम दिया गया है । (स्कन्द पु० १७:१:७७)
इस पुराण की मान्यता है । कृतयुग में अष्ट रुद्र थे,
कलियुग में ग्यारह रुद्रों का अवतार हुआ था
भागवत पुराण (२:१३:८-१०) में (१) मन्यु (२)
मनु-(३) महिनस् (सोम) (४) महत् (५) शिव
(६) ऋतध्वज (७) उपरेतस् (८) भव (९) काल
(१०) वामदेव (११) धृतध्वज का नाम दिया
गया है ।
स्कन्द पुराण में 'भूतेश' को एक रुद्र माना गया
है । भूतेश्वर स्थान 'भूतेश' का मन्दिर था । स्थान
का नाम भी भूतेश्वर था । अतएव यह निश्चित हो
जाता है कि स्थान रुद्र से सम्बन्धित था । ज्येष्ठ
रुद्र का नाम उत्तर मध्य तालिकाओं में शिवों में सर्वत्र
मिलता ।
ऋग्वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में जो रुद्र था वही
उपनिषदों में शिव का रूप ले लिया इस प्रकार रुद्र
को परम शुद्ध आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो गया । उनकी
पूजा मद्य मांस से नहीं बल्कि फलपुष्पादि द्वारा होने
लगी । उनका रूप अथर्व वेद वर्णित मातर्व रुद्र उच्च-
लोक के अधिपति 'महादेव' तुल्य हो गया । इसीको
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:३) बड़ी उत्तमता से
प्रकट करता है ।

प्रथम तरंग १६९

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरान्याँ शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥
[ शिव की घोर एवं शिवा नामकी दो मूर्तियाँ
हैं । उनमें घोरा अग्नि रूप हैं एवं शिवा परम गुह्य
अद्यारम स्वरूप महेश्वर हैं ]
रुद्र शिव की उपासना भारत मे अत्यन्त प्राचीन
हैं । उपासना का काल विभाग दो भागों में विभक्त
किया जा सकता है । प्रथम काल में शिव की प्रति-
कृति की उपासना की जाती थी । द्वितीय काल में
शिवलिङ्गोपासना आरम्भ हो गयी ।
भूतेश एवं ज्येष्ठ रुद्र इसी द्वितीय काल विभाग
में आते हैं । उनमें शिवलिंग की स्थापना की गयी
थी । ज्येष्ठ रुद्र का लिंग स्वयंभू था ।
ऋग्वेद (७.२१.५, १०।९९०३) में
शिश्नदेव की उपासना का उल्लेख अनार्य लोगों के
गन्दर्भ में किया गया हैं । प्राचीन वैदिक वाङ्मय
में नहीं मिलता । पतंजलि के महाभाष्य (३:९९)
में शिव, स्कंद, विशाख, की स्वर्णादि की मूल्यवान
प्रतिकृतियों की पूजा के स्पष्ट निर्देश है । वेम कद
फिसस की मुद्राओं पर शिव की त्रिशूलधारी एवं
शिव के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग नहीं अपितु नन्दिन्
उत्कीर्ण किया गया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् (४,११,५.२) में सर्व
प्रथम शिवलिङ्गोपासना का निर्देश मिलता है ।
'ईशान रुद्र' को समस्त योनियों का अधिपति कहा
गया है । किन्तु यहाँ भी शिवलिंग को शिव का
प्रतीक होने का स्पष्ट निर्देश नहीं है ।
महाभारत में उपमन्यु के आख्यान में सर्व प्रथम
शिवलिङ्गोपासना का स्पष्ट रूप से निर्देश प्राप्त
होता है ।
मोहे जो दडो एवं हड़प्पा के उत्खनन में शिव
रूप से मिलती मूर्तियाँ प्राप्त हुई है । उनका काल
ईशा के ३००० वर्ष पूर्व अर्थात् ४९६८ वर्ष है । यही
काल कल्हण तथा नीलमत पुराण के अनुसार महा-
भारत काल था । यहाँ के प्राप्त देवताओं की मूर्तियाँ
२२
महाभारत वर्णित 'त्रिशीर्ष' 'वियम्ब्र' 'ऊर्ध्वलिंग'
'योगाध्यक्ष' स्वरूप से मिलती है । ( म. अनु.: १४:
१६२, १६५, ३०८, १७.४६, ७७.९९ ) वहाँ से प्राप्त
मूर्तियों के वाम हस्त में व्याघ्र एवं हस्तो हैं । दक्षिण
हस्त में वृषभ एवं गण्डक हैं । वह चित्र भी महाभारत
अनुशासन पर्व ( १४:३१३, १७,४८,६१,८५,९१ )
वर्णित 'पशुपति' 'शार्दूल रूप' 'व्याल रूप' 'मृग वाण
रूप, 'नागवर्मोत्तरच्छद' 'व्याघ्राजिन' 'गहिग्घ्न'
'गजहा' एवं 'मण्डलिन्' से मिलता है ।
महाभारत में शिव को सर्वत्र वृषभवाहन कहा
गया है । हिटाइट लोगों के तेशव देवता से शिव का
साम्य मिलता है । बेबिलोन मे प्राप्त अनेक शिल्पो
एवं अवशेषों में तेशब की प्रतिमाएँ मिली है । उनमें
तेशव को वृषभवाहन एवं त्रिशूलधारी दिखाया
गया है । तेशब को पत्नी का नाम माँ था । शिव भी
अम्बिका जिन्हें पार्वती एवं दुर्गा कहा गया है उनके
पति हैं । तेशब की पत्नी सिंहारूढ है । दुर्गा भी सिंह-
वाहिनी है ।
सुगा में प्राप्त तेशब की पत्नी का चित्रण मधु-
मक्षिका के साथ किया गया है। यह मार्कण्डेय
पुराण वर्णित भ्रामरी देवी से साम्य रखता है ।
कल्हण ने भ्रामरी वासिनी देवी का वर्णन राजतरं-
गिणी में ( ३:३९४, ४२३ ) किया है ।
तेशव के समान रुद्र के हाथ में विद्युत, धनुष,
त्रिशूल, दण्ड, परशु, पट्टिश आदि शस्त्र दिखाये गये
हैं । ( ऋ. २: ३३; ३; म. अनु १४: २८८ २८९,
१७:४३, ४४:९९ )
'शत्रुजय सूक्त' शुक्लयजुर्वेद मे रुद्र को लक्ष्य कर
लिखा गया है । उसका विचार सुमेरियन देवता
'नेर्गल' से मिलता है । मत है कि भारतीय रुद्र शिव
का सम्बन्ध किंवा साम्य अनादोलिया, मोसोपेटा-
मिया, एवं सिन्धुघाटी की सभ्यता से अवश्य रखता
है । ( राय चौधरी: स्टडीज इन इण्डियन एण्टि-
क्विटीज पृष्ठ २००-२०४)
निःसन्देह रुद्र सर्व प्रथम वैदिक देवता थे ।
कालान्तर मे वे व्रात्य, निषाद, वन्यादि एवं अनार्य

१७० राजतरंगिणी
ग्रामे ग्रामे स्थितैरश्वैर्धावनं प्रतिषिद्धवान् ।
स्वेनावहत् सततं नागः कोऽपि सुहृत्तया ॥ ११४ ॥
११४. एक सदय हृदय नाग ग्राम ग्राम१ पड़ावों पर प रवर्तनाथं स्थित अश्वों की लम्बी
कष्टप्रद यात्रा२ से राजा को विरत कर स्वयं उन्हें ज्येष्ठेश से विजयेश्वर निरंतर पहुँचा दिया
करता था।
स रुद्धवसुधान्म्लेच्छान्निर्व्वास्याखर्वविक्रमः ।
जिगाय जैत्रयात्राभिर्महीमर्णवमेखलाम् ॥ ११५ ॥
११५. उस विक्रमशाली राजा ने म्लेच्छों१ से आक्रांत वसुधा का उद्धार कर अपनी विजय
यात्राओं द्वारा समुद्र मेखला धारिणी मही का जय किया।
लोगों के देवता बन गये । प्राचीन वैदिक आर्यों द्वारा
प्रस्थापित कल्पनाएँ लुप्त हो गयी । अन्तर पड़ता
गया । रुद्र भूतपति, किंवा भूतेश, सर्पधारी, स्मशान-
निवासी देव में परिणत हो गये । प्रतिकृति की पुरा-
तन उपासना की परंपरा नष्ट हो गयी । उसका स्थान
शिव लिंग की उपासना करने वाली नवीन परम्पराओं
ने ले लिया ।
ज्येष्ठेश किंवा ज्येष्ठ रुद्र नामकरण इसलिये
किया गया कि सप्त, अष्ट, एकादश रुद्रों में सबसे
ज्येष्ठ रुद्र की उपासना ग्राह्य की गयी । अतएव भूतेश
रुद्र के समान ज्येष्ठेश रुद्र नामकरण कर दिया गया ।
पाठभेदः
श्लोक संख्यानु ११४ में 'हसं', का 'हृ' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११४(१) ग्राम ग्राम : अश्व से यदि ज्येष्ठेश से
विजयेश तक की यात्रा की जाय तो चार दिन पड़ाव
डालकर पहुँचा जा सकता है । कल्हण यहाँ स्पष्ट
कहता है । मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों में अश्व
नियुक्त रहते थे । एक ही अश्व द्वारा पूरी यात्रा नहीं
समाप्त हो सकती थी । कुछ दूरी पर नवीन अश्व
तैयार रहते थे । शिथिल अश्व को त्याग कर
नवीन अश्व से यात्रा की जाती थी ।
पड़ाव पर अश्व रखने और बदलने की प्रथा
बहुत पुरानी है । उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ तक
रेल तथा मोटर के आने के पूर्व यूरोप, एशिया तथा
सभ्य जगत् में यह प्रथा प्रचलित थी । राजकीय डाक
तथा संवाद ले जाने के लिये पड़ाव निश्चित रहते थे ।
वहीं अश्व रखे जाते थे । ठहरने किंवा विश्राम का
प्रबन्ध रहता था । कश्मीर में यह प्रथा आज से तेईस
सौ वर्ष पूर्व ही प्रचलित प्रतीत होती है ।
(२) यात्रा : श्री स्टीन ने इस श्लोक की
टिप्पणी में ठीक ही लिखा है । कल्हण ने यहाँ ज्येष्ठेश
से विजयेश्वर तक की लम्बी कष्टप्रद यात्रा का वर्णन
किया है । यह कम से कम अश्वों द्वारा चार दिन
का पड़ाव कर समाप्त की जा सकती थी । शीघ्र
पहुँचने की दृष्टि से और वह किस प्रकार एक ही दिन
में सम्भव हो सकता था, कल्हण ने नाग की कथा जोड़
दी है । प्रतिदिन यह कार्य राजा के लिए किस
प्रकार सम्भव था इसका स्पष्टीकरण नाग को राजा के
वाहन रूप में प्रस्तुत कर कल्हण करता है ।
ज्येष्ठेश से विजयेश की दूरी पक्षी उड़ान या नभ
से सीधे ४५ मिनट की होती है । यदि यह यात्रा अश्व
से की जाय तो सचमुच चार दिन लग जायगा । मार्ग
अत्यन्त लम्बा, पहाड़ियों का चक्कर काटता, ऊबड़-
खाबड़ और कष्टप्रद था। पहाड़ियों के कारण अश्व की
गति तेज भी नहीं हो सकती थी। भूतेश्वर से कनक-
वाहिनी नदी की घाटी पकड़कर चलने से सिन्धु
नदी पहुँचने तक मार्ग है । अतएव
नाग को यहाँ पर लाया गया है कि उसपर
सवारी कर राजा अविलम्ब नित्य पहुँच जाता

प्रथम तरंग
१७१


[बायाँ स्तम्भ]

था। अश्व की सवारी से किसी प्रकार एक दिन में
येशेश से विजयेश्वर नहीं पहुँचा जा सकता। इस
लए इस असंगति दोष को दूर करने के लिये कल्हण
नाग का कथानक वहाँ जोड़ा है। वसिष्ठाश्रम,
ारबल, चीरमोचन, तत्पश्चात् मयग्राम, दुग्धाश्रम,
हेरण्यपुरा, ध्रुवेश्वरी, ईशेश्वर, भोमा देवो, गोपाद्रि
होते हुए श्रीनगर आता है। यहाँ से पुराधिष्ठान,
जयवन, मिहपुर, समरस्वामी, पद्मपुर, ललितपुर,
गोपालपुर, अवन्तीपुर, कत्तिका, होते वितस्ता पार
कर यदि चला जाय तो गम्भीरा संगम होते चक्रधर
से विजयेश्वर पहुँचता है। यह मार्ग त्रिकोण बनाता
भूतेश्वर से विजयेश्वर तक बड़ा लम्बा बन जाता है।
श्रीनगर से विजयेश्वर २९ मिल पड़ता है।
प्राचीन मार्ग का अनुसरण किया जाता तो वह लगभग
भी मिल से उस समय के चक्करदार मार्ग के कारण
कम न होगा। आजकल सुगम राज पथ एवं सभी
स्थानों में पहुँचने के लिए सड़क बन जाने के
कारण मार्ग की दूरी कम हो गयी है और पथ भी
सरल हो गये हैं।
११५ (१) म्लेच्छ : यहाँ म्लेच्छ से तात्पर्य यूनानी
आक्रामकों से है। म्लेच्छ शब्द की विस्तृत व्याख्या
परिशिष्ट 'म्लेच्छ' में की गयी है द्रष्टव्य है।
कश्मीर के सीमान्त पर अर्थात् सिन्धु के पश्चिमी
तट अफगानिस्तान, तथा कश्मीर के उत्तर एवं पश्चिम
यूनानियों का शासन अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के
आक्रमण के पश्चात् हो गया था। सम्राट् अलकसुन्दर
की मृत्यु के पश्चात् यूनानी साम्राज्य अनेक क्षत्रपों में
विभाजित हो गया था। निसन्देह अशोक का प्रभाव
क्षेत्र किंवा राज्य मानसेहरा, तक्षशिला, शहबाजगढ़ी,
लम्पक, कन्दहार तक फैल चुका था। अन्यथा वहाँ
अशोक अपने स्तम्भों का निर्माण और धर्म प्रचार
कराने में समर्थ नहीं हो सकता था।
ईसा पूर्व २०६ ई० में यूनानी क्षत्रप, शासक
किंवा राजा अन्तियोकस तृतीय ने बल्ख पर आक्रमण
किया। जीत लिया। बिखरे राज्य को पुनः
संघटित करने का प्रयास किया। उसने इसी वर्ष


[दायाँ स्तम्भ]

भारत की सीमा का अतिक्रमण किया। वह काबुल
उपत्यका लांघता भारत भूमि पर सेना सहित आ
पहुँचा। उस समय पाटलीपुत्र में मौर्य राजा शालीशुक
था। उसे सुभगसेन भी कहा जाता है। अन्तियोकस
ने शालीशुक से मित्रता कर ली थी।
अलकसुन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला
एवं दर्भाभिसार के राजा आम्भी ने अपनी निष्ठा
अलकसुन्दर के प्रति प्रकट की थी। कश्मीर के राजा
ने भी अपने भाई के साथ चालीस हाथी अलकसुन्दर
के भेंट निमित्त भेजे थे।
अन्तियोकस के अभियान का उद्देश्य मालूम होता
है, अलकसुन्दर द्वारा विजित भूक्षेत्र पर पुनः अधिकार
किंवा प्रभाव स्थापित करना था। सम्भव है। इसी
दृष्टि से कश्मीर के राजा ने भी हाथो भेज कर अपनी
निष्ठा प्रकट की थी। कश्मीर में अशोक का पुत्र
जलोक शासन कर रहा था। कश्मीर भी अशोक के
राज्य का अंश था। एतदर्थ अन्तियोकस ने आक्रमण
किया होगा।
कल्हण स्पष्ट कहता है कि म्लेच्छों के संहार
निमित्त तपस्या कर अशोक ने जलौक पुत्ररत्न
भगवान् शंकर की कृपा से प्राप्त किया था। उसके
जन्म ग्रहण का प्रयोजन म्लेच्छों का संहार करना था।
कल्हण ने उसी बात को दृष्टि में रख कर म्लेच्छ
संहार की बात अपनी वर्णन संगति कायम रखने के
लिये की है।
अशोक का अवसान ईसा पूर्व २३२ वर्ष में हुआ
था। यह घटना अशोक की मृत्यु के २६ वर्ष पश्चात्
की है। भारतीय इतिहास की गणनानुसार इस समय
अशोक का प्रपौत्र शालीशुक पाटलीपुत्र का राजा था।
अशोक का पुत्र जलौक कश्मीर का राजा था।
मालूम होता है। जलौक न तो कभी पाटली-
पुत्र गया और न उसका कोई वंशधर पाटलीपुत्र
का राजा हुआ था। उसने अपने पिता के सिंहासन
पर बैठने का भी प्रयास नहीं किया। वह कश्मीर से
ही सन्तुष्ट था। जलौक का अशोक के पश्चात् २६ वर्ष
तक राज्य करते जीवित रहना कोई आश्चर्य की बात
नहीं मालूम पड़ती।

१७२ | राजतरंगिणी
ते यत्रोज्झटितास्तेन म्लेच्छाः छादितमण्डलाः ।
स्थानमुज्झटडिम्बं तज्जनैरद्यापि गद्यते ॥ ११६ ॥
११६. म्लेच्छाच्छादित मण्डल को जिस स्थान पर म्लेच्छों को उज्झटित कर राजा ने मुक्त किया था उसे लोग उज्झटडिम्ब¹ कहते थे और आज भी कहते हैं ।
जित्वोर्वी कान्यकुब्जाद्यां तत्रत्यं स न्यवेशयत् ।
चातुर्वर्ण्यं निजे देशे धर्म्यांश्च व्यवहारिणः ॥ ११७ ॥
११७. कान्यकुब्ज¹ तथा अन्य भूमि जीतकर राजा ने वहाँ के चातुर्वर्ण्य² निवासियों और धर्म तथा व्यवहार निपुणों को अपने देश में लाकर बसाया ।
कहा जाता है । ईसा पूर्व २०६ वर्ष में कश्मीर के समान जोडते हैं । उज्झटित अर्थात् जिस स्थान
तथा कलिंगादि राज्य स्वतन्त्र हो गये थे । कश्मीर पर पर म्लेच्छों को राजा जलौक ने परास्त किया था
अशोक के विजय की बात कही नहीं मिलती । किन्तु उसका इतना महत्त्व कश्मीरी इतिहास में हो गया
कश्मीर के स्वतन्त्र राज्य होने का प्रमाण अशोक के था कि उसके नामपर एक स्थान का नाम पड गया ।
पश्चात् मिलता है । कश्मीर अपनी स्वतंत्र स्थिति काश्मीरियों ने यूनानियों को पराजित किया था ।
कायम रखने के लिये पाटलीपुत्र का मुखापेक्षी नहीं यह उनके लिये गौरव तथा महत्त्व की बात थी ।
रहता था । अतएव म्लेच्छों के आतंक का सामना यह इस उल्लेख से और स्पष्ट होता है कि कल्हण के
कश्मीरी सेना ने किया । यूनानी अर्थात् म्लेच्छों से समय अर्थात् लगभग १३५४ वर्ष युद्ध के पश्चात्
कश्मीरी सेना ने लोहा लिया । म्लेच्छ पराजित हुए । तक उज्झटडिम्ब स्थान तथा नाम प्रचलित था ।
म्लेच्छाकीर्ण भूमि पुनः म्लेच्छविहीन हो गयी । दूसरी कल्हण ने वहीं से प्राप्त सामग्री एवं किसी कथानक
तरफ मौर्य साम्राज्य दुर्बल होता गया । अशोक जैसी के आधार पर म्लेच्छों के उच्छिन्न करने का वर्णन
क्षमता उसके उत्तराधिकारियों में नहीं रह गयी थी । लिया है ।
शालीशुक म्लेच्छ सेना का सामना करने में असमर्थ इस समय वह स्थान कहाँ पर है । पता नहीं
था । यूनानियों से सन्धि कर ली । चलता । परन्तु इसे काश्मीर के दक्षिण पश्चिम
कश्मीर के राजा जलौक ने म्लेच्छों का उच्छिन्न किंवा पश्चिम होना चाहिए ।
किया । राज्य का विस्तार किया । उसने विजय पाठभेद :
यात्रा किस ओर की थी । किन भूखण्डों पर श्लोकसंख्या ११७ में 'कान्यकुब्ज' का पाठभेद
विजय प्राप्त किया था । इस पर कल्हण कुछ प्रकाश 'कन्यकु' तथा 'सन्य' का 'संन्य' पाठभेद मिलता है ।
नहीं डालता । पादटिप्पणियाँ :
पाठभेद : ११७ (१) कान्यकुब्ज : यह स्थान वर्तमान
श्लोकसंख्या ११६ में 'ते' का 'स', 'यत्रो' का कन्नौज है । इत्र, गुलाबजल, सुगन्धित तेलके लिये
'तत्रो', 'ज्झटिता' का 'ज्जूटित', मुज्झट' का 'मुजुट' आजकल प्रसिद्ध है । उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद
मुजूट', 'मुत्कुट' 'मुज्जूट' पाठभेद मिलता है । जिला में एक नगर है । गंगा के वामतट पर स्थित
पादटिप्पणियाँ : है । वाल्मीकि रामायण में कन्नौज के नामकरण
११६ (१) उज्झटडिम्ब - कश्मीर में डिम्ब का उल्लेख है ।
शब्द स्थानीय नामों के अन्त में 'मूर' अथवा 'योग'

प्रथम तरंग १७३
वाल्मीकीय रामायण में नगर के नामकरण
की एक कथा मिलती है । चन्द्रवंशी राजा
कुशनाभ ने महोदय नगर की स्थापना की थी।
राजा की एक सौ कन्याएँ वायु के शाप से कुब्जा
हो गयीं। उस समय इस नगर का नाम 'कन्य-
कुब्ज' पडा ।
प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन नाम महोदय
नगर था । तत्पश्चात् कान्यकुब्ज पड़ा । अनन्तर
गाधिपुर कुशस्थल कुशिक आदि नाम पडता गया।
कुसुमपुर भी इसका नाम पड गया । जन्हु के नाम
पर गंगा की धारा का नाम जाह्नवी पड़ा था ।
महाभारत के अनुसार वह राजा गाधि की राज-
धानी थी। कान्यकुब्ज राज्य एवं उसके जनपद
दोनों का नाम था। ( म० आदि : १७७:३, वन०
११५:२० ) विश्वामित्र ने कान्यकुब्ज में इन्द्र के
साथ सोमपान किया था। ( म० वन० ८७:१७ )
गाधिराज कुमारी सत्यवती को अपनी पत्नी बनाने
के लिये ऋची ऋषि ने अपना विचार प्रकट किया
था। ( म० उ० ११९:४)
स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में कान्यकुब्ज
का स्थान छठवाँ है । इसमें ३६ लाख ग्राम थे।
कान्यकुब्ज को प्राचीनकाल में गाधिपुर, कुश-
स्थल तथा महोदय नगर कहते थे। भागवत पुराण
में अजामिल को वहीं का निवासी बताया गया है।
विश्वामित्र की वह जन्मभूमि थी ।
बुद्ध काल से गुप्त काल के अंत तक स्वतंत्र
जनपद के रूप में कान्यकुब्ज का नाम प्रायः नही
मिलता। कालान्तर में यह मौखरी राज्य का केन्द्र
हो गया। मौखरी राज्य का संस्थापक हरिवर्मा
था। मौखरी वंश के प्रसिद्ध राजा 'ईशानवर्मा' ने
महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।
थानेश्वर के शासक हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री
का विवाह मौखरी राजा गृहवर्मा से हुआ था।
मालवा के शासक देवगुप्त ने गृहवर्मा को मारकर
राज्यश्री को बन्दी बना लिया। कान्यकुब्ज के
मन्त्रियों ने राज्य-हर्षवर्धन को दे दिया।
महाराजा हर्षवर्धन के समय कान्यकुब्ज की
आशातीत उन्नति हुई । वह राज्य से साम्राज्य की
राजधानी बन गया। महाकवि बाण ने 'हर्ष चरित'
में कान्यकुब्ज का जीता जागता चित्रण किया है।
हुएनत्सांग ने कान्यकुब्ज की यात्रा की
थी। उसने यहाँ की भूरि भूरि प्रशंसा की है।
बौद्ध साहित्य में कान्यकुब्ज का 'कन्यकुब्ज' जो
संस्कृत कान्यकुब्ज का अपभ्रंश है, नाम मिलता
है। हुएनत्सांग ने स्पष्ट उल्लेख किया है। यहाँ पर
बौद्ध विहार थे। उसमें दस सहस्र भिक्षु विहार
करते थे। हुएनत्सांग के अनुसार कान्यकुब्ज का
विस्तार ४००० ली था। उसका कथन है । कान्य-
कुब्ज ने संस्कृति, सभ्यता, युद्ध एवं शान्ति कालीन
कला में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी।
हर्ष के पश्चात् यशोवर्मा राजा हुआ। तत्पश्चात्
क्रमशः आयुध, प्रतीहार तथा गाहडवाल राजवंशों
का कान्यकुब्ज पर अधिकार हुआ। प्रतिहार वंश
में नागभट, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल आदि प्रसिद्ध राजा
हुए है। गाहडवाल वंश मे गोविन्दचन्द्रादि के समय
कन्नौज की विशेष उन्नति हुई थी । निस्सन्देह छठवीं
शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक साहित्य, कला,
धर्मादि का विशेष विकास कन्नौज में हुआ था ।
'कादम्बरी' तथा 'हर्षचरित' के लेखक बाणभट्ट
के अतिरिक्त यशोवर्मा के राजकवि वाक्पति एवं
भवभूति थे। प्रतीहार काल में राजशेखर, गाहड़वाल
काल में लक्ष्मीधर एवं श्रीहर्ष संस्कृत के उद्भट
साहित्यकार एवं कवि हुए थे। प्रतीहारों के समय
कन्नौज स्थापत्य एवं मूर्तिकला में प्रसिद्ध हो गया
था। छठवीं शताब्दी में श्वेत हूणों ने कन्नौज पर
आक्रमण किया था। तालिमी ने इसका नाम 'कनो
गिया' दिया है।
फिरदौसी ने शाहनामा में कन्नौज का प्रशंसनीय
भाषा मे उल्लेख किया है। उसका कथन है कि

१७६ राजतरंगिणी

कर उसके स्थानो पर महाफलदायक 'धर्म मंगल' को
बात चलायी गयी थी। अशोक की दृष्टि मे यह
आवश्यक सुधार था। धर्म प्रचार था। परन्तु यह
सुधार जनता हृदयंगम न कर सकी। पश्चिमोत्तर
सीमान्त पर उठते युद्ध के बादल, जलोक को दूसरे
ढंग पर विचार करने के लिये बाध्य कर दिये।
अशोक का अभिलेख इस सम्बन्ध में स्पष्ट था।
'इय क्यं (८) ये हि एत के मगले सासयिके
तं (९) सिय वो त भ्रठं निवटेयति सिय पुन ना
(१०) इदलोक च वी तं (११) इद पुन धम मंगलं
अकलिकं (१२) यदि पुन तं अथ न निवटे इध अथ
परत अनंतं पुजं प्रसवति (१३) हंचे पुन तं ठं
निवटेति ततो उभयेस लध भोति इध च सो अथो
परत च अनंतं पुजं प्रसवति तेन धमंमलेन।'
[ यह कहूँगा। क्योंकि इस प्रकार के मंगल
सन्दिग्ध फल वाले होते हैं। इनमे अभीष्ट फल की
प्राप्ति हो भी सकती है और नही भी। ये इहलौकिक
हैं। किन्तु धर्म मंगल समय से बाधित नही है।
हो सकता है कि इसमे इस लोक में वाञ्छित फल
की सिद्धि न हो। किन्तु परलोक मे इससे अनन्त
पुण्य होता है। परन्तु यदि इससे ( इस लोक मे
भी) सिद्धि होती है तब तो दोनों लाभ प्राप्त
होते हैं। अर्थात् इस लोक में इससे अर्थ की प्राप्ति
होती है। और परलोक मे इस धर्म मंगल से अनन्त
पुण्य उत्पन्न होता है]
"से अज देवन पियस प्रियदसिने रंजिने धम
चरणेन भेरिघोषे अहो धमधोषे विमन दर्शन हस्तिने
अगिकंधनि अजनि च दिवनि रूपनि दशेति जनस
(२) (मानसेहरा शिला चतुर्थ अभिलेख)
[... किन्तु आज देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा के
धर्माचरण से भेरीघोष (रणभेरी) धर्म घोष हो
गया। विमान दर्शन, हस्ति दर्शन, अग्नि स्कन्ध
तथा अन्य दिव्य प्रदर्शनों को जनता को दिखाकर...]
क्रिया की प्रतिक्रिया होना अनिवार्य है। अशोक
के धर्म प्रचार के उत्साह की प्रतिक्रिया पाटलीपुत्र तथा
कश्मीर दोनों स्थानों में हुई। कश्मीर में कल्हण
के मतानुसार बौद्ध प्रभाव प्रबल हो उठा था। उसने
जनता में विरक्ति की भावना भर दी। गृहत्याग
की भावना भर दी। प्रव्रज्या को श्रेष्ठ माना।
जीवन में उदासीनता को महत्त्व दिया। वह एक
प्रकार से गार्हस्थ्य एवं क्षत्रिय धर्म से निष्क्रियता की
ओर ले गया। राज्याश्रय प्राप्त कर पाटलीपुत्र
सैनिक शक्ति के केन्द्र के स्थानपर धर्म प्रचार का
केन्द्र बन गया।
जलोक ने विदेशी खतरे को देखा। उसका
सामना करने के लिये जनता के विचार में परिवर्तन
लाना चाहा। एतदर्थ कान्यकुब्ज से वर्णाश्रम धर्मा-
नुयायियों एवं विद्वानों को लाया। लुप्त होते वर्णाश्रम
धर्म का उद्धार किया। एक नवीन जीवन उल्लास
किया। नवीन प्रेरणा दी।
कश्मीर में बौद्धधर्म के विरुद्ध वह प्रतिक्रिया
अशोक की मृत्यु के ३० वर्ष के अन्दर ही हो गयी।
बौद्धधर्म 'संघ' शरण की बात करता है। उसके
अनुशासन को मानता है। यूरोप मे मध्ययुग में
संघ अर्थात् चर्च तथा राज्य में संघर्ष हुआ था।
चर्च राज्यपर अपना अंकुश रखना चाहता था।
मूर्त्तमान प्रश्न खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य
दोनों में किसका आदेश किंवा अनुशासन मानना
श्रेयस्कर होगा। इस भावना के कारण यूरोप में
सुधारवादी, नव जागरण तथा धर्मनिरपेक्षता की
विचारधारा बलवती हुई। उसने भयंकर रक्त-
रंजित आन्दोलन का रूप पकड़ लिया।
कुछ इसी प्रकार की बात भारत में हुई। उसका
बीज जलोक ने कश्मीर में डाला। यह उसके समय
अंकुरित हुआ। और महा वृक्ष के रूप में पल्लवित,
पुष्पित होता गया। वर्णाश्रम धर्म में देश, जनपद,
नगर, ग्राम एवं गृह का स्थान था। उनके लिये उत्त-
रोत्तर त्याग करने की बात कही गयी है। देश किंवा
राष्ट्र को आदर्श माना गया है। जननी जन्म भूमि
को स्वर्ग से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। जन्मभूमि

प्रथम तरंग १७७
यथावद् वृद्धिम्प्राप्तं व्यवहारधनादिभिः ।
सामान्यदेशवद्राज्यं तावदस्मिन्हि मण्डले ॥ ११८ ॥
११८. उस समय तक कश्मीर मण्डल में व्यवहार तथा धनादि का यथोचित विकास नहीं
हुआ था और वहाँ की शासन व्यवस्था अन्य सामान्य राज्यों तुल्य थी ।
को माता माना गया है। यह सिद्धान्त राष्ट्रीयता की
ओर ले जाता था ।
संघ का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर
उन्मुख करता था । जनता संघ के अनुशासन में
रहेगी अथवा राज्य—यह कठोर प्रश्न उपस्थित हो
गया था । संघ की शरण गया व्यक्ति संघ के अनु-
शासन को मानने के लिये बाध्य था न कि राज्य के ।
विचारों का संघर्ष उत्पन्न हो गया। शान्ति काल में संघ
अनुशासन चाहे कितना ही आदर्श क्यों न हो परन्तु
जब सीमा पर शत्रु सेना सज्जित खड़ी हो, राष्ट्र
के जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो, देश में भी
जनता की शक्ति संघ एवं देश में विभाजित हो गयी
हो, तो इस काल में सैनिक विहीन, युद्ध सिद्धान्त
विहीन, विरक्त समाज किंवा देश अपनी रक्षा करने
में समर्थ कैसे हो सकता था ? जलौक ने जनता से
प्रतिद्वन्द्वरहित किंवा ऐकान्तिक राजभक्ति की
अपेक्षा की । इसमें उसे सफलता मिली । म्लेच्छों अर्थात्
यूनानियों के आतंक से देश को मुक्त किया । उन्हें
पराजित किया और कान्यकुब्ज तक सैनिक अभियान
के साथ पहुँच गया । दूसरी ओर पाटलीपुत्र का
शासन यूनानियों का सामना करने में असमर्थ
सिद्ध हुआ ।
पाटलीपुत्र में राजा स्वयं बौद्ध था । अशोक
का पुत्र था । तत्पश्चात् पौत्र हुआ। अशोक ने अभि-
लेखों में स्पष्ट आदेश दिया था । उसके पुत्र, पौत्र,
तथा उत्तराधिकारी उसके धर्म घोष को जारी रखेंगे ।
'त मम पुता च पोता च परं च तेन य मे अपचं
आव संवटकपा अनुवति सरे तथा सो सुकतं फासति
(५) यो तु एतं देसं पि हापेसति सो दुकतं फासति
(६) सुकरं ही पापं ( गिरनार पंचम अभिलेख )
२३
यदि मेरे पुत्र, पौत्र, और उनके परे जो मेरे
अपत्य (संतान) कल्प के अन्त तक (इसका)
अनुसरण करेंगे तो वे सुकृत करेंगे। जो इसका एक
अंश भी नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा । पाप सुकर
है ।''''कश्मीर में प्रतिक्रिया बौद्ध केन्द्र पाटलीपुत्र से
दूर होने के कारण शीघ्र हुई। किन्तु पाटलीपुत्र
बौद्धधर्म का केन्द्र था अतएव प्रतिक्रिया की गति मन्द
थी । विलम्ब से हुई ।
राज्याश्रय में भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों
शक्तियाँ वाध्र्यवश्य प्राप्त करती हैं। पाटलीपुत्र में
जिस प्रतिक्रिया रूपी विद्रोह का बीजारोपण हो रहा
थी उस विप्लव वृक्ष के बढ़ने एवं पल्लवित होने में
४८ वर्ष लग गये ।
अशोक की मृत्यु के ठीक ४८ वर्ष पश्चात् मौर्य
वंशीय अन्तिम राजा बृहद्रथ को मारकर पुष्यमित्र
(ईसा पूर्व १८४ वर्ष) ने शुंग वंश की स्थापना की
थी। उसने पुरातन सनातन किंवा वर्णाश्रम धर्म को
पुनः राज्याश्रय दिया ।
बौद्ध लेखक पुष्यमित्र को बौद्ध विरोधी चित्रित
करते हैं। बौद्धधर्म की अपेक्षा वर्णाश्रम धर्म की ओर
उसका झुकाव था । वह स्वयं एक ब्राह्मण का पुत्र
था । बृहद्रथ का सेनापति बन गया था। इस
प्रकार कश्मीर में जो धार्मिक क्रान्ति अशोक की मृत्यु
के ३० वर्षों के अन्दर हुई उसे भारतवर्ष अथवा
पाटलीपुत्र में सफल होने में ४८ वर्ष लग गये । इस
विलम्ब का कारण पाटलीपुत्र में बौद्धों का अत्यधिक
प्राबल्य होना था ।
अशोक के उत्तराधिकारी धर्म घोष करने में
असफल रहे। उन्होंने सनातन धर्म किंवा वर्णाश्रम धर्म
की पुनः प्रतिष्ठा निमित्त भी कोई प्रयास नहीं किया ।

चतुर्थ तरङ्ग: कर्कोट वंश (ललितादित्य मुक्तापीड व जयापीड)

१७८ राजतरंगिणी
धर्माध्यक्षो धनाध्यक्षः कोशाध्यक्षश्चमूपतिः ।
दूतः पुरोधा दैवज्ञः सप्त प्रकृतयोऽभवन् ॥ ११९ ॥
११९. राज्य में सप्तप्रकृति¹ अर्थात् धर्माध्यक्ष, धनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, चमूपति, दूत
पुरोधा, एवं दैवज्ञ केवल सात ही राज्याधिकारी थे।
कर्मस्थानानि धर्म्याणि तेनाष्टादश कुर्वता ।
ततः प्रभृति भूपेन कृता यौधिष्ठिरीस्थितिः ॥ १२० ॥
१२०. राजाने अठारह कर्म स्थानों¹ को धर्मानुसार स्थापित किया। उसने महाराज
युधिष्ठिर के राज्य समान स्थिति उस समय से राज्य में प्रचलित की।
उनकी निष्क्रियता उनके नाश का राजनीतिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टियों से कारण हुई।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११८ में 'मत्प्राप्तं' का 'मत्प्राप्ते' तथा 'राज्यं' वा 'राजा' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
११९ (१) सप्त प्रकृति : महाभारत सभापर्व पंचम अध्याय : अडतीसवें श्लोक में राज्य की सात प्रकृतियों का उल्लेख मिलता है।
कच्चित् प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ ।
राजा के सात अंग किंवा प्रकृति स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग, तथा सेना एवं पुरवासी हैं। राज्य की सप्त प्रकृतियों में दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य एवं ज्योतिषी की भी कहीं कही गणना की गयी है।
कामन्दक नीतिसार में पुरातन भारतीय राज्य की प्रकृति का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार राज्य की सात प्रकृतियां—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र थे।
स्वामी राज्य की प्रथम प्रकृति है। स्वामी शब्द के अन्तर्गत राजतंत्र का राजा तथा गणतंत्र का राष्ट्र-पति दोनों आ जाते हैं। स्वामी शब्द वर्तमान प्रच-लित शब्द सॉवरेन्टि किंवा सम्प्रभुत्व के अर्थ में प्राचीनकाल में प्रयुक्त किया जाता था। कौटिल्य राजा को स्वामी मानता है। वह राजतन्त्र में विश्वास करता था। स्वामी के चार गुण माने गये हैं—अभिगामिका, प्रज्ञा, उत्साह और आत्मसम्पद्।
अमात्य के लिये कौटिल्य दो बातें आवश्यक मानता है। प्रथम उसे जानपद अर्थात् देश का नाग-रिक तथा उसमें दृढ़भक्ति होनी चाहिए। दृढ़भक्ति का अर्थ है, राष्ट्र के प्रति एकमात्र निष्ठा। शब्द का भाव अंग्रेजी शब्द लायल्टी में आ जाता है। परन्तु भक्ति शब्द अधिक व्यापक एवं उदार है।
तृतीय प्रकृति जनपद है। इसका अर्थ राष्ट्र किंवा देश है। राष्ट्र में तीन गुणों का होना कौटिल्य ने आवश्यक माना है। शत्रु द्वेषो शक्यसम्पद् अर्थात् इतना शमित सम्पन्न होना चाहिए कि पड़ोसी राज्यों को नियन्त्रण में रख सके। तृतीय गुण उसे कर्म शील वर्षक अर्थात् कर्मशील तथा कृषी कार्य में निपुण होना आवश्यक है। उसका चौथा गुण भक्तिशील मनुष्यों से युक्त सेना है। जनपद को प्रजाभक्त, देश भक्त तथा शुद्ध होना चाहिए।
राज्य की चौथी प्रकृति है दुर्ग। दुर्ग के अन्तर्गत सैनिक शक्ति आती है। प्राचीन काल में वाष्प तथा अणु परिचालित शस्त्र शल्य नहीं थे। दुर्ग का विशेष महत्व था। कौटिल्य चार प्रकार के दुर्ग का वर्णन करता है। वे जल, गिरि, मरुस्थल तथा अटवी दुर्ग है। दुर्ग उस समय राजधानी किंवा पुर होते थे। दुर्ग के अन्दर नगर बस जाता था। मुस्लिम काल में शहर पनाह तथा खाई नगर के चारो ओर बनायी जाती थी। ऊपर मोर्चेबन्दी होती थी। कहीं कहीं खाई और खाई के पश्चात् शहर पनाह दोनों बनायी जाती थीं। मनु दुर्ग के स्थान पर पुर शब्द का व्यवहार करते हैं। (मनु-स्मृतिः ९:५.२१४-)

प्रथम तरंग १७९
कोश शब्द में धनादि आय-व्यय सभी वित्तीय प्रकार के थे यह राजनीति विज्ञान का विषय है।
वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्रचुर समृद्धि, प्रकृति के सम्बन्ध में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा।
शस्य सम्पत्, पण्य बाहुल्य होना कोश का गुण माना १२० (१) कर्मस्थान : महाभारत में कर्मस्थानों
गया है। को तीर्थ कहा गया है। रामायण मे भी उत्तम
दण्ड शब्द के अन्तर्गत बल शब्द आता है। कोश अठारह कर्मस्थानो का उल्लेख मिलता है।
के समान बल का होना राज्य के लिये अत्यन्त कच्चिद्दष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।
आवश्यक है। बल पुराकालीन भारतीय राज्य प्रकृति त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥
का छठवाँ अंग माना गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र सभापर्व ५ : ३८.
में छह प्रकार के बलों का उल्लेख किया है यथा— अट्ठारह तीर्थ किंवा कर्म स्थान—मन्त्री,
मौल बल, भृतक बल, श्रेणी बल, मित्र बल, शत्रु पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वंशिक,
बल, तथा अटवी बल। कारागाराध्यक्ष, द्रव्यसंचय कर्ता (कोषाध्यक्ष),
राज्यकी अन्तिम तथा सातवी प्रकृति मित्र है। मन्त्रिपात्र, प्रदेष्टा, नगराध्यक्ष, कार्यनिर्माण कर्ता,
कौटिल्य मित्रों को दो श्रेणियों में विभक्त करता है। धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमा-
प्रथम श्रेणी सहज मित्रो की होती है। द्वितीय श्रेणी पाल, तथा वनरक्षक। प्रथम तीन तीर्थों को शेष
में कृत्रिम मित्र आते हैं। सहज मित्रों की श्रेणी में करने पर पन्द्रह तीर्थ होते हैं। शत्रु के अट्ठारह तथा
आनुवंशिक तथा पड़ोसी राष्ट्र होते थे। कृत्रिम मित्र स्वपक्ष के पन्द्रहो तीर्थों का गुप्तचरों द्वारा देखभाल
सन्धि तथा प्रयोजन विशेष के लिये बना लिये करवाना राजा का कर्त्तव्य माना गया है।
जाते हैं। पञ्चतन्त्र (३:६७–७०) में कर्मस्थानो का

  • भारतीय राज्य की इस प्रकृति सिद्धान्त की वर्णन किया गया है।
    तुलना शंकराचार्य ने एक रथ से की है। जिसका कालिदास ने रघुवंश (१७.६८) में तथा
    प्रत्येक भाग एक दूसरे पर आश्रित रहता है। सब शिशुपालवध (१४.१६) में इन कर्मस्थानो किंवा
    मिलकर रथ बन जाता है। गति देता है। राज्य तीर्थों का उल्लेख किया है।
    की यह परिकल्पना शरीर सदृश की गयी है। रामायण तथा महाभारत मे राजा के साथ
    राज्य की प्रकृतियाँ शरीर के विभिन्न अवयव हैं। पुरोहितो का उल्लेख मिलता है। वामदेव प्रसिद्ध
    नीतिसार (४:५;७५) तथा मनुस्मृति (९:२९६, पुरोहित थे। ऋग्वेद में वशिष्ठ तथा विश्वामित्र को
    २९७) में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया पुरोहित कहा गया है। राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति
    है। कौटिल्य एक चरमसीमा पर पहुँच जाता है। का प्रतीक पुरोहित माना गया है। यह शक्ति
    कहता है—राजा राज्यम् इति प्रकृतिसंक्षेपः। शास्त्र में निहित थी। शास्त्र के पण्डित ब्राह्मण थे।
    अर्थात् राजा ही राज्य है। किन्तु यह कथन फ्रान्स पुरोहित ब्राह्मण होते थे। पुरोहित राजा का सलाह-
    के सम्राट् लुई १४ के मत से सर्वथा भिन्न है। जहाँ कार तथा धर्मनियन्त्रक होता था। लौकिक शक्ति
    वह कहता है। वह स्वयं राज्य है। वह राष्ट्र से का प्रतीक राजा किंवा क्षत्री होता था। अनादि काल
    अपने को ऊपर रखता है। परन्तु कौटिल्य राजा को से आध्यात्मिक एवं लौकिक शक्ति के माध्यम से
    राष्ट्र किंवा देश का सेवक मानता है। वह राजा राज्य संचालन की कल्पना भारत में की गयी थी।
    के छह शत्रुओं अर्थात् काम क्रोध मोहादि पर अतएव पुरोहित का स्थान कर्म स्थान मन्त्री के
    नियन्त्रण रखने के लिये जोर देता है। राज्य कितने पश्चात् एवं युवराज किंवा उपराजा के पूर्व
    रखा गया है।

१८० राजतरंगिणी
स विक्रमप्रभावाभ्यां समुपार्जितया श्रिया ।
विदधे वारवालादीनग्रहारानुदग्रधीः ॥ १२१ ॥
१२१. अपने विक्रम एवं प्रभाव से उपार्जित धन द्वारा उस उग्र धीमान् राजा ने वार-
बाल' इत्यादि अग्रहारों की स्थापना की।
मनु कहते हैं। क्षत्रियों का उत्कर्ष ब्राह्मणों
के बिना सहयोग के नहीं हो सकता। इसी प्रकार
ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के एक साथ मिलने पर लोक
तथा परलोक दोनों में वार्धक्य प्राप्त होता है।
(मनु० : ९:३२३)।
प्रारम्भ में पुरोहित का पद चाहे कुछ भी
रहा हो परन्तु कालान्तर में यह पद वंश परम्परा-
गत हो गया था। राजा का यह कर्त्तव्य माना जाता
था कि वह कुलपुरोहित के मतों का आदर करेगा।
पुरोहित धर्मशास्त्र एवं दण्डनीति दोनों में पारंगत
होता था।
राजतन्त्र एवं धर्म अर्थात् पौरोहित्य पद तथा
उसके कार्य एक दूसरे को शक्ति देते थे। पुरोहित
धर्म से राजा को विरत नहीं होने देता था। वह
राजा पर अंकुश रखता था। यदि पुरोहित अनुचित
कार्य करता तो राजा भी उसे दण्ड देनेके लिये धर्मा-
नुसार मुक्त था। नैपोलियन ने एक समय कहा
था—'ईसाइयत का सबसे आश्चर्य जनक कार्य यह
था कि उसने गरीबों को अमीरों से त्रासित करने से
रोका था और यदि पोप का अस्तित्व न होता तो
मुझे एक पोप का आविष्कार करना पड़ता।'
राजनीति एवं धर्म दोनों को मनु ने एक दूसरे
का पूरक माना है। अतएव राजा पर धर्म और धर्म
पर राजा राष्ट्रहित निमित्त अंकुश लगाया गया है।
कल्हण ने राजतरंगिणी में सब स्थानों पर
राजाओं के पुण्य कार्यों, उनके निर्माणों, यथा मन्दिरों,
अग्रहारों, शालाओं, छात्रावासों, विहारों, का वर्णन
करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया है। उसकी
लेखनी में उनके वर्णन काल में स्फूर्ति आ जाती है।
यूरोप के सम्राटों, राजाओं एवं सामंतों ने मध्य काल
में धर्म निमित्त जिस प्रकार के कार्य किये थे उसी प्रकार
के कार्य कश्मीर के राजाओं ने इतिहास के आदिकाल
से चौदहवीं शताब्दी तक अर्थात् हिन्दू राज्य काल में
अनवरत किया हैं। इसमें कहीं भी शिथिलता का
अनुभव नहीं होने पाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२१ में 'नुदग्रधी' का पाठभेद
'नुदारधी' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१२१ (१) वारबाल : यह वर्तमान ग्राम
वारबुल है। सिन्धु तथा कंकणी नदी के संगम से
एक मिल ऊर्ध्व भाग में कंकणी नदी के दक्षिण
तटपर स्थित है। यह भूतेश्वर जाने वाले मार्ग में
पड़ता है। इस कारण इसका और महत्त्व प्राचीन
काल में था।
अगस्त सन् १८९१ में श्री स्टीन भूतेश्वर की
यात्रा काल में इस ग्राम में आये थे। उन्हें मार्ग
के समीप शिवलिंग का अलंकृत एक विशाल पाषाण-
खण्ड पर बना भद्रपीठ मिला था। वह बहुत बड़ा
था। उसे देख कर श्री स्टीन ने घोर अन्वेषण
किया। उन्हें एक और बड़ा अलंकृत पत्थर खेत में
मकानों के नीचे लगा दिखाई दिया था।
श्री स्टीन को वारवाल के वृद्ध मुकद्दम से
मालूम हुआ था। यह अग्रहार अथवा जागीर बहुत
दिनों तक श्रीनगर के एक पीरजादा कुल की
थी। राजा गुलाब सिंह के शासन काल पूर्व तक
यही व्यवस्था थी। वल्लर कल्लर स्थान सर्वे मान-
चित्र में दिया गया है। परन्तु श्री स्टीन को इस
नाम का कोई स्थान वहाँ पर नहीं मिला था।
वारबाल के दक्षिण पश्चिम सिन्धु तटपर
प्राचीन चीर मोचन, पूर्व दक्षिण कंकनपुर, तथा
पश्चिम दक्षिण भव ग्राम था। इसके उत्तर में उत्तुंग
पर्वत शिखर आरम्भ होता हरमुकुट तक चला जाता