राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ | राजतरंगिणी
ते यत्रोज्झटितास्तेन म्लेच्छाः छादितमण्डलाः ।
स्थानमुज्झटडिम्बं तज्जनैरद्यापि गद्यते ॥ ११६ ॥
११६. म्लेच्छाच्छादित मण्डल को जिस स्थान पर म्लेच्छों को उज्झटित कर राजा ने मुक्त किया था उसे लोग उज्झटडिम्ब¹ कहते थे और आज भी कहते हैं ।
जित्वोर्वी कान्यकुब्जाद्यां तत्रत्यं स न्यवेशयत् ।
चातुर्वर्ण्यं निजे देशे धर्म्यांश्च व्यवहारिणः ॥ ११७ ॥
११७. कान्यकुब्ज¹ तथा अन्य भूमि जीतकर राजा ने वहाँ के चातुर्वर्ण्य² निवासियों और धर्म तथा व्यवहार निपुणों को अपने देश में लाकर बसाया ।
कहा जाता है । ईसा पूर्व २०६ वर्ष में कश्मीर के समान जोडते हैं । उज्झटित अर्थात् जिस स्थान
तथा कलिंगादि राज्य स्वतन्त्र हो गये थे । कश्मीर पर पर म्लेच्छों को राजा जलौक ने परास्त किया था
अशोक के विजय की बात कही नहीं मिलती । किन्तु उसका इतना महत्त्व कश्मीरी इतिहास में हो गया
कश्मीर के स्वतन्त्र राज्य होने का प्रमाण अशोक के था कि उसके नामपर एक स्थान का नाम पड गया ।
पश्चात् मिलता है । कश्मीर अपनी स्वतंत्र स्थिति काश्मीरियों ने यूनानियों को पराजित किया था ।
कायम रखने के लिये पाटलीपुत्र का मुखापेक्षी नहीं यह उनके लिये गौरव तथा महत्त्व की बात थी ।
रहता था । अतएव म्लेच्छों के आतंक का सामना यह इस उल्लेख से और स्पष्ट होता है कि कल्हण के
कश्मीरी सेना ने किया । यूनानी अर्थात् म्लेच्छों से समय अर्थात् लगभग १३५४ वर्ष युद्ध के पश्चात्
कश्मीरी सेना ने लोहा लिया । म्लेच्छ पराजित हुए । तक उज्झटडिम्ब स्थान तथा नाम प्रचलित था ।
म्लेच्छाकीर्ण भूमि पुनः म्लेच्छविहीन हो गयी । दूसरी कल्हण ने वहीं से प्राप्त सामग्री एवं किसी कथानक
तरफ मौर्य साम्राज्य दुर्बल होता गया । अशोक जैसी के आधार पर म्लेच्छों के उच्छिन्न करने का वर्णन
क्षमता उसके उत्तराधिकारियों में नहीं रह गयी थी । लिया है ।
शालीशुक म्लेच्छ सेना का सामना करने में असमर्थ इस समय वह स्थान कहाँ पर है । पता नहीं
था । यूनानियों से सन्धि कर ली । चलता । परन्तु इसे काश्मीर के दक्षिण पश्चिम
कश्मीर के राजा जलौक ने म्लेच्छों का उच्छिन्न किंवा पश्चिम होना चाहिए ।
किया । राज्य का विस्तार किया । उसने विजय पाठभेद :
यात्रा किस ओर की थी । किन भूखण्डों पर श्लोकसंख्या ११७ में 'कान्यकुब्ज' का पाठभेद
विजय प्राप्त किया था । इस पर कल्हण कुछ प्रकाश 'कन्यकु' तथा 'सन्य' का 'संन्य' पाठभेद मिलता है ।
नहीं डालता । पादटिप्पणियाँ :
पाठभेद : ११७ (१) कान्यकुब्ज : यह स्थान वर्तमान
श्लोकसंख्या ११६ में 'ते' का 'स', 'यत्रो' का कन्नौज है । इत्र, गुलाबजल, सुगन्धित तेलके लिये
'तत्रो', 'ज्झटिता' का 'ज्जूटित', मुज्झट' का 'मुजुट' आजकल प्रसिद्ध है । उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद
मुजूट', 'मुत्कुट' 'मुज्जूट' पाठभेद मिलता है । जिला में एक नगर है । गंगा के वामतट पर स्थित
पादटिप्पणियाँ : है । वाल्मीकि रामायण में कन्नौज के नामकरण
११६ (१) उज्झटडिम्ब - कश्मीर में डिम्ब का उल्लेख है ।
शब्द स्थानीय नामों के अन्त में 'मूर' अथवा 'योग'