राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० राजतरंगिणी
ग्रामे ग्रामे स्थितैरश्वैर्धावनं प्रतिषिद्धवान् ।
स्वेनावहत् सततं नागः कोऽपि सुहृत्तया ॥ ११४ ॥
११४. एक सदय हृदय नाग ग्राम ग्राम१ पड़ावों पर प रवर्तनाथं स्थित अश्वों की लम्बी
कष्टप्रद यात्रा२ से राजा को विरत कर स्वयं उन्हें ज्येष्ठेश से विजयेश्वर निरंतर पहुँचा दिया
करता था।
स रुद्धवसुधान्म्लेच्छान्निर्व्वास्याखर्वविक्रमः ।
जिगाय जैत्रयात्राभिर्महीमर्णवमेखलाम् ॥ ११५ ॥
११५. उस विक्रमशाली राजा ने म्लेच्छों१ से आक्रांत वसुधा का उद्धार कर अपनी विजय
यात्राओं द्वारा समुद्र मेखला धारिणी मही का जय किया।
लोगों के देवता बन गये । प्राचीन वैदिक आर्यों द्वारा
प्रस्थापित कल्पनाएँ लुप्त हो गयी । अन्तर पड़ता
गया । रुद्र भूतपति, किंवा भूतेश, सर्पधारी, स्मशान-
निवासी देव में परिणत हो गये । प्रतिकृति की पुरा-
तन उपासना की परंपरा नष्ट हो गयी । उसका स्थान
शिव लिंग की उपासना करने वाली नवीन परम्पराओं
ने ले लिया ।
ज्येष्ठेश किंवा ज्येष्ठ रुद्र नामकरण इसलिये
किया गया कि सप्त, अष्ट, एकादश रुद्रों में सबसे
ज्येष्ठ रुद्र की उपासना ग्राह्य की गयी । अतएव भूतेश
रुद्र के समान ज्येष्ठेश रुद्र नामकरण कर दिया गया ।
पाठभेदः
श्लोक संख्यानु ११४ में 'हसं', का 'हृ' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११४(१) ग्राम ग्राम : अश्व से यदि ज्येष्ठेश से
विजयेश तक की यात्रा की जाय तो चार दिन पड़ाव
डालकर पहुँचा जा सकता है । कल्हण यहाँ स्पष्ट
कहता है । मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों में अश्व
नियुक्त रहते थे । एक ही अश्व द्वारा पूरी यात्रा नहीं
समाप्त हो सकती थी । कुछ दूरी पर नवीन अश्व
तैयार रहते थे । शिथिल अश्व को त्याग कर
नवीन अश्व से यात्रा की जाती थी ।
पड़ाव पर अश्व रखने और बदलने की प्रथा
बहुत पुरानी है । उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ तक
रेल तथा मोटर के आने के पूर्व यूरोप, एशिया तथा
सभ्य जगत् में यह प्रथा प्रचलित थी । राजकीय डाक
तथा संवाद ले जाने के लिये पड़ाव निश्चित रहते थे ।
वहीं अश्व रखे जाते थे । ठहरने किंवा विश्राम का
प्रबन्ध रहता था । कश्मीर में यह प्रथा आज से तेईस
सौ वर्ष पूर्व ही प्रचलित प्रतीत होती है ।
(२) यात्रा : श्री स्टीन ने इस श्लोक की
टिप्पणी में ठीक ही लिखा है । कल्हण ने यहाँ ज्येष्ठेश
से विजयेश्वर तक की लम्बी कष्टप्रद यात्रा का वर्णन
किया है । यह कम से कम अश्वों द्वारा चार दिन
का पड़ाव कर समाप्त की जा सकती थी । शीघ्र
पहुँचने की दृष्टि से और वह किस प्रकार एक ही दिन
में सम्भव हो सकता था, कल्हण ने नाग की कथा जोड़
दी है । प्रतिदिन यह कार्य राजा के लिए किस
प्रकार सम्भव था इसका स्पष्टीकरण नाग को राजा के
वाहन रूप में प्रस्तुत कर कल्हण करता है ।
ज्येष्ठेश से विजयेश की दूरी पक्षी उड़ान या नभ
से सीधे ४५ मिनट की होती है । यदि यह यात्रा अश्व
से की जाय तो सचमुच चार दिन लग जायगा । मार्ग
अत्यन्त लम्बा, पहाड़ियों का चक्कर काटता, ऊबड़-
खाबड़ और कष्टप्रद था। पहाड़ियों के कारण अश्व की
गति तेज भी नहीं हो सकती थी। भूतेश्वर से कनक-
वाहिनी नदी की घाटी पकड़कर चलने से सिन्धु
नदी पहुँचने तक मार्ग है । अतएव
नाग को यहाँ पर लाया गया है कि उसपर
सवारी कर राजा अविलम्ब नित्य पहुँच जाता