राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ गजतरंगिणी
रुद्र का निवास स्थान वैदिक साहित्य के अनुसार
पर्वतों और मुख्यतया मूंजवन् पर्वत है (वा० स०:
२५:२-४; ३.६१; ) महाभारत रुद्र का आद्य निवास
स्थान मेरु पर्वत मानता है । रुद्र का इसलिए एक
नाम मेरुधामा पड़ गया है । (म० अनु० १७:२,१)
आश्वमेधिक पर्व महाभारत (८:१) वायु पुराण
(४७.१९) एवं मौखिक पर्व (१७.२६) के अनुसार
रुद्र का निवासस्थान मुंजवान किंवा मूजवत पर्वत
है । यह पर्वत कैलास के उस पार था । महाभारत
भीष्म पर्व (७.३१) में इनका निवास स्थान कैलास
एवं हिमालय पर्वत बताया गया है ।
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:१७-१६)
के अनुसार रुद्र का निवास स्थान काशी की श्मशान
भूमि है । संवर्त को शव रूप शिव का दर्शन काशी में
हुआ था ।
सभी का समन्वय करने पर निष्कर्ष निकलता है
कि रुद्र का स्थान हिमालय के एकान्त में, तपस्या
योग्य वनश्री के मध्य होना चाहिये । भूतेश्वर का
स्थान इस दृष्टि से आदर्श है । यहाँ ज्येष्ठ रुद्र की
स्थापना की कल्पना सराहना योग्य है ।
दक्ष प्रजापति ने रुद्र को नन्दिकेश्वर नामक
वृषभ वाहन के लिये दिया था । उनकी ध्वजा पर
वृषभ का चिह्न था । अतएव नाम वृषभध्वज पड़
गया । भूतेश्वर स्थान नन्दिक्षेत्र के अन्तर्गत है ।
इनका आयुध, विद्युत दार है। वेद में इनका शस्त्र
धनुष बाण एवं वश कहा गया है । ऋ० २:३३:३;
१०,५४२:११; १०:१२६ ६)
यजुर्वेद के शतरुद्रीय अध्याय में रुद्र का स्वभाव
चित्रण अधिक विस्तार के साथ दिया गया है ।
(तै० सं० ४:५ १, वा० सं० १६) इन्हें 'रुद्रतनु'
अर्थात् रुद्ररूप और 'शिवतनु' अर्थात् शिव स्वरूप
कहा गया है ।
या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥
अथर्ववेद में ग्यारह रुद्रों यथा (१) ईशान, (२) भव,
(३) शर्व (४) पशुपति (५) उग्र (६) रुद्र एवं (७)
महादेव का वर्णन है । पुराणों में अष्ट रुद्रों का
उल्लेख है । यथा-(१) रुद्र (२) भव (३) शर्व (शिव)
(४) पशुपति (५) भीम (६) ईशान (७) उग्र एवं
(८) महादेव । महाभारत में एकादश रुद्रों का उल्लेख
है । यथा (१) मृगव्याध (२) सर्व (३) निर्ऋति
(४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य, (६) पिनाकिन् (७)
दहन (८) ईश्वर (६) कपालिन् (१०) स्थाणु एवं
(११) भव (म० आदि ५०:१०३)
स्कन्द पुराण में (१) भूतेश, (२) नील रुद्र
(३) वृषवाहन (४) त्र्यंबक (५) महाकाल (६)
भैरव (७) मृत्युंजय (८ गणेश एवं (९) योगेश
रुद्रों का नाम दिया गया है । (स्कन्द पु० १७:१:७७)
इस पुराण की मान्यता है । कृतयुग में अष्ट रुद्र थे,
कलियुग में ग्यारह रुद्रों का अवतार हुआ था
भागवत पुराण (२:१३:८-१०) में (१) मन्यु (२)
मनु-(३) महिनस् (सोम) (४) महत् (५) शिव
(६) ऋतध्वज (७) उपरेतस् (८) भव (९) काल
(१०) वामदेव (११) धृतध्वज का नाम दिया
गया है ।
स्कन्द पुराण में 'भूतेश' को एक रुद्र माना गया
है । भूतेश्वर स्थान 'भूतेश' का मन्दिर था । स्थान
का नाम भी भूतेश्वर था । अतएव यह निश्चित हो
जाता है कि स्थान रुद्र से सम्बन्धित था । ज्येष्ठ
रुद्र का नाम उत्तर मध्य तालिकाओं में शिवों में सर्वत्र
मिलता ।
ऋग्वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में जो रुद्र था वही
उपनिषदों में शिव का रूप ले लिया इस प्रकार रुद्र
को परम शुद्ध आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो गया । उनकी
पूजा मद्य मांस से नहीं बल्कि फलपुष्पादि द्वारा होने
लगी । उनका रूप अथर्व वेद वर्णित मातर्व रुद्र उच्च-
लोक के अधिपति 'महादेव' तुल्य हो गया । इसीको
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:३) बड़ी उत्तमता से
प्रकट करता है ।