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सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 984 में से

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पृष्ठ 262

प्रथम तरंग १७९
कोश शब्द में धनादि आय-व्यय सभी वित्तीय प्रकार के थे यह राजनीति विज्ञान का विषय है।
वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्रचुर समृद्धि, प्रकृति के सम्बन्ध में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा।
शस्य सम्पत्, पण्य बाहुल्य होना कोश का गुण माना १२० (१) कर्मस्थान : महाभारत में कर्मस्थानों
गया है। को तीर्थ कहा गया है। रामायण मे भी उत्तम
दण्ड शब्द के अन्तर्गत बल शब्द आता है। कोश अठारह कर्मस्थानो का उल्लेख मिलता है।
के समान बल का होना राज्य के लिये अत्यन्त कच्चिद्दष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।
आवश्यक है। बल पुराकालीन भारतीय राज्य प्रकृति त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥
का छठवाँ अंग माना गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र सभापर्व ५ : ३८.
में छह प्रकार के बलों का उल्लेख किया है यथा— अट्ठारह तीर्थ किंवा कर्म स्थान—मन्त्री,
मौल बल, भृतक बल, श्रेणी बल, मित्र बल, शत्रु पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वंशिक,
बल, तथा अटवी बल। कारागाराध्यक्ष, द्रव्यसंचय कर्ता (कोषाध्यक्ष),
राज्यकी अन्तिम तथा सातवी प्रकृति मित्र है। मन्त्रिपात्र, प्रदेष्टा, नगराध्यक्ष, कार्यनिर्माण कर्ता,
कौटिल्य मित्रों को दो श्रेणियों में विभक्त करता है। धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमा-
प्रथम श्रेणी सहज मित्रो की होती है। द्वितीय श्रेणी पाल, तथा वनरक्षक। प्रथम तीन तीर्थों को शेष
में कृत्रिम मित्र आते हैं। सहज मित्रों की श्रेणी में करने पर पन्द्रह तीर्थ होते हैं। शत्रु के अट्ठारह तथा
आनुवंशिक तथा पड़ोसी राष्ट्र होते थे। कृत्रिम मित्र स्वपक्ष के पन्द्रहो तीर्थों का गुप्तचरों द्वारा देखभाल
सन्धि तथा प्रयोजन विशेष के लिये बना लिये करवाना राजा का कर्त्तव्य माना गया है।
जाते हैं। पञ्चतन्त्र (३:६७–७०) में कर्मस्थानो का

  • भारतीय राज्य की इस प्रकृति सिद्धान्त की वर्णन किया गया है।
    तुलना शंकराचार्य ने एक रथ से की है। जिसका कालिदास ने रघुवंश (१७.६८) में तथा
    प्रत्येक भाग एक दूसरे पर आश्रित रहता है। सब शिशुपालवध (१४.१६) में इन कर्मस्थानो किंवा
    मिलकर रथ बन जाता है। गति देता है। राज्य तीर्थों का उल्लेख किया है।
    की यह परिकल्पना शरीर सदृश की गयी है। रामायण तथा महाभारत मे राजा के साथ
    राज्य की प्रकृतियाँ शरीर के विभिन्न अवयव हैं। पुरोहितो का उल्लेख मिलता है। वामदेव प्रसिद्ध
    नीतिसार (४:५;७५) तथा मनुस्मृति (९:२९६, पुरोहित थे। ऋग्वेद में वशिष्ठ तथा विश्वामित्र को
    २९७) में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया पुरोहित कहा गया है। राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति
    है। कौटिल्य एक चरमसीमा पर पहुँच जाता है। का प्रतीक पुरोहित माना गया है। यह शक्ति
    कहता है—राजा राज्यम् इति प्रकृतिसंक्षेपः। शास्त्र में निहित थी। शास्त्र के पण्डित ब्राह्मण थे।
    अर्थात् राजा ही राज्य है। किन्तु यह कथन फ्रान्स पुरोहित ब्राह्मण होते थे। पुरोहित राजा का सलाह-
    के सम्राट् लुई १४ के मत से सर्वथा भिन्न है। जहाँ कार तथा धर्मनियन्त्रक होता था। लौकिक शक्ति
    वह कहता है। वह स्वयं राज्य है। वह राष्ट्र से का प्रतीक राजा किंवा क्षत्री होता था। अनादि काल
    अपने को ऊपर रखता है। परन्तु कौटिल्य राजा को से आध्यात्मिक एवं लौकिक शक्ति के माध्यम से
    राष्ट्र किंवा देश का सेवक मानता है। वह राजा राज्य संचालन की कल्पना भारत में की गयी थी।
    के छह शत्रुओं अर्थात् काम क्रोध मोहादि पर अतएव पुरोहित का स्थान कर्म स्थान मन्त्री के
    नियन्त्रण रखने के लिये जोर देता है। राज्य कितने पश्चात् एवं युवराज किंवा उपराजा के पूर्व
    रखा गया है।