राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १७७
यथावद् वृद्धिम्प्राप्तं व्यवहारधनादिभिः ।
सामान्यदेशवद्राज्यं तावदस्मिन्हि मण्डले ॥ ११८ ॥
११८. उस समय तक कश्मीर मण्डल में व्यवहार तथा धनादि का यथोचित विकास नहीं
हुआ था और वहाँ की शासन व्यवस्था अन्य सामान्य राज्यों तुल्य थी ।
को माता माना गया है। यह सिद्धान्त राष्ट्रीयता की
ओर ले जाता था ।
संघ का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर
उन्मुख करता था । जनता संघ के अनुशासन में
रहेगी अथवा राज्य—यह कठोर प्रश्न उपस्थित हो
गया था । संघ की शरण गया व्यक्ति संघ के अनु-
शासन को मानने के लिये बाध्य था न कि राज्य के ।
विचारों का संघर्ष उत्पन्न हो गया। शान्ति काल में संघ
अनुशासन चाहे कितना ही आदर्श क्यों न हो परन्तु
जब सीमा पर शत्रु सेना सज्जित खड़ी हो, राष्ट्र
के जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो, देश में भी
जनता की शक्ति संघ एवं देश में विभाजित हो गयी
हो, तो इस काल में सैनिक विहीन, युद्ध सिद्धान्त
विहीन, विरक्त समाज किंवा देश अपनी रक्षा करने
में समर्थ कैसे हो सकता था ? जलौक ने जनता से
प्रतिद्वन्द्वरहित किंवा ऐकान्तिक राजभक्ति की
अपेक्षा की । इसमें उसे सफलता मिली । म्लेच्छों अर्थात्
यूनानियों के आतंक से देश को मुक्त किया । उन्हें
पराजित किया और कान्यकुब्ज तक सैनिक अभियान
के साथ पहुँच गया । दूसरी ओर पाटलीपुत्र का
शासन यूनानियों का सामना करने में असमर्थ
सिद्ध हुआ ।
पाटलीपुत्र में राजा स्वयं बौद्ध था । अशोक
का पुत्र था । तत्पश्चात् पौत्र हुआ। अशोक ने अभि-
लेखों में स्पष्ट आदेश दिया था । उसके पुत्र, पौत्र,
तथा उत्तराधिकारी उसके धर्म घोष को जारी रखेंगे ।
'त मम पुता च पोता च परं च तेन य मे अपचं
आव संवटकपा अनुवति सरे तथा सो सुकतं फासति
(५) यो तु एतं देसं पि हापेसति सो दुकतं फासति
(६) सुकरं ही पापं ( गिरनार पंचम अभिलेख )
२३
यदि मेरे पुत्र, पौत्र, और उनके परे जो मेरे
अपत्य (संतान) कल्प के अन्त तक (इसका)
अनुसरण करेंगे तो वे सुकृत करेंगे। जो इसका एक
अंश भी नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा । पाप सुकर
है ।''''कश्मीर में प्रतिक्रिया बौद्ध केन्द्र पाटलीपुत्र से
दूर होने के कारण शीघ्र हुई। किन्तु पाटलीपुत्र
बौद्धधर्म का केन्द्र था अतएव प्रतिक्रिया की गति मन्द
थी । विलम्ब से हुई ।
राज्याश्रय में भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों
शक्तियाँ वाध्र्यवश्य प्राप्त करती हैं। पाटलीपुत्र में
जिस प्रतिक्रिया रूपी विद्रोह का बीजारोपण हो रहा
थी उस विप्लव वृक्ष के बढ़ने एवं पल्लवित होने में
४८ वर्ष लग गये ।
अशोक की मृत्यु के ठीक ४८ वर्ष पश्चात् मौर्य
वंशीय अन्तिम राजा बृहद्रथ को मारकर पुष्यमित्र
(ईसा पूर्व १८४ वर्ष) ने शुंग वंश की स्थापना की
थी। उसने पुरातन सनातन किंवा वर्णाश्रम धर्म को
पुनः राज्याश्रय दिया ।
बौद्ध लेखक पुष्यमित्र को बौद्ध विरोधी चित्रित
करते हैं। बौद्धधर्म की अपेक्षा वर्णाश्रम धर्म की ओर
उसका झुकाव था । वह स्वयं एक ब्राह्मण का पुत्र
था । बृहद्रथ का सेनापति बन गया था। इस
प्रकार कश्मीर में जो धार्मिक क्रान्ति अशोक की मृत्यु
के ३० वर्षों के अन्दर हुई उसे भारतवर्ष अथवा
पाटलीपुत्र में सफल होने में ४८ वर्ष लग गये । इस
विलम्ब का कारण पाटलीपुत्र में बौद्धों का अत्यधिक
प्राबल्य होना था ।
अशोक के उत्तराधिकारी धर्म घोष करने में
असफल रहे। उन्होंने सनातन धर्म किंवा वर्णाश्रम धर्म
की पुनः प्रतिष्ठा निमित्त भी कोई प्रयास नहीं किया ।