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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 984 में से

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पृष्ठ 251

१६६ राजतरंगिणी
इस स्थान पर कल्हण ने ज्येष्ठेश का स्थान
निश्चित नन्दिक्षेत्र बता दिया है। द्वितीय ज्येष्ठेश को
प्रथम ज्येष्ठेश से भिन्न मानने के लिये त्रिपुरेशाद्रिनिष्ट
संज्ञा दी है। त्रिपुरेश पर्वत के अधोभाग में उनका
निश्चित स्थान बताता है। तृतीय ज्येष्ठेश्वर रुद्र का
स्थान डल लेक के समीप था। यहाँ महाराज हरी
सिंह ने अपना राजभवन बना लिया है। वह भवन
अब होटल रूप से चलता है। श्रीनगर से गुप्तकर होते
हुए जो सड़क डल लेक के तट से होती चश्माशाही,
शालीमार बाग की तरफ जाती है; वही पर सड़क से
ऊपर राजभवन के स्थान पर यह स्थान था।
नन्दिक्षेत्र के ज्येष्ठेश वही हैं जिनका वर्णन भूते-
श्वर मन्दिर के सन्दर्भ में किया गया है। भूतेश्वर
मन्दिर के प्राकार में अनेक मन्दिर निर्माण किये
गये थे। यह प्रथा अत्यन्त प्राचीन थी। मेवाड़ में
एकलिंग जी के मन्दिर के प्राकार के अन्दर एकलिंग
के मुख्य मन्दिर के चारों ओर अनेक मन्दिरों का
निर्माण कालान्तर में राजाओं ने भूतेश्वर मन्दिर के
समान कराया था। भूतेश्वर मन्दिर के समीप जैसे
सोदर तीर्थ का अति लघु सरोवर है उसी प्रकार
एकलिंग मन्दिर में भी एक लघु सरोवर है।
नीलमत पुराण इसे और स्पष्ट कर देता है :
पूर्वोत्पन्नं च यज्ज्येष्ठाख्यं लिंगं मम द्विज ।
तत्रापि सन्निधानं मे नित्यं विज्ञातुमर्हसि ॥
1110:१३११
ऋषिकोटिसहस्राणि मम भक्त्या द्विजोत्तम ।
तत्र संस्नापयन्ति स्म ज्येष्ठेशं तं सदैव तु ॥
१३१२
यथाभ्यहं च ज्येष्ठेशे भूतैः सह तथामया ।
त्वम स्वमपि मद्भिन्न मद्भक्तो मत्परायणः ॥
1111:१३१७
भयदाम्ना च दैन्यानां सुराणामभयप्रदः ।
ज्येष्ठेश्वरसमीपे तु यस्मिण्डोऽपि महायशः ॥
1119.१३२३
स्नात्वा तु मोदरे पुण्ये दृष्ट्वा भूतेश्वरं हरम् ।
ज्येष्ठेश्वरं नन्दिरुद्रं च गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥
1124:१३२८
ज्येष्ठेश के स्थान निर्णय में इस प्रकार कोई
विवाद नहीं रह जाता। नीलमत स्थान का निश्चय
स्पष्ट करता है। नन्दिक्षेत्र तथा वसिष्ठ आश्रम अर्थात्
वांगध के समीप ज्येष्ठेश का स्थान बताकर, वह भूते-
श्वर स्थित ज्येष्ठेश को ही कल्हण वर्णित ज्येष्ठेश
मानने के लिये बाध्य कर देता है।
शिव तथा नन्दी की कथा में एक प्राचीन लिंग
की बात आती है। उसे ज्येष्ठेश कहते थे। वह
निःसन्देह शिव भूतेश्वर के स्थान में था। प्राचीन
नन्दीक्षेत्र माहात्म्य में उल्लेख मिलता है कि ज्येष्ठेश्वर
किंवा ज्येष्ठनाथ की पूजा नन्दीश तथा भूतेश्वर के
अत्यन्त समीप होती थी। (श्लोक १४६)
कल्हण ने राजतरंगिणी के श्लोक १:१५१ में
ज्येष्ठ रुद्र का उल्लेख किया है। वहाँ पर ज्येष्ठ रुद्र
वास्तव में ज्येष्ठेश है। कल्हण पुनः ४:१९० में
उल्लेख करता है कि ज्येष्ठ रुद्र का एक मन्दिर भूते-
श्वर में निर्माण कराया गया था। कल्हण ने अन्तिम
बार इसका उल्लेख ८:२४३० में किया है। वसिष्ठा-
श्रम जो वूथेसर अर्थात् भूतेश्वर के समीप था वह
कह कर स्पष्ट कर देता है, कि नन्दिक्षेत्र में जो ज्येष्ठेश हैं,
वही यहाँ वर्णित ज्येष्ठेश है।
इस श्लोक से एक बात और स्पष्ट हो जाती है।
उक्त ज्येष्ठेश का लिंग स्वयंभू था। वह अनघट था।
इस प्रकार के अनगढ़ शिलाखण्ड की पूजा आज भी
सारिका पर्वत, श्रीनगर तथा सुरेश्वरी स्थान में
होती है।
ज्येष्ठेश का मन्दिर भूतेश्वर स्थित मन्दिरों के
दो समूहों में पश्चिमी मन्दिर समूह में था।
स्वयंभू लिंगों की पूजा भारतवर्ष के अनेक तीर्थों
में होती है। मैने राजस्थान में अनेक स्थानों पर चाहे