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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 984 में से

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पृष्ठ 254

प्रथम तरंग १६९

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरान्याँ शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥
[ शिव की घोर एवं शिवा नामकी दो मूर्तियाँ
हैं । उनमें घोरा अग्नि रूप हैं एवं शिवा परम गुह्य
अद्यारम स्वरूप महेश्वर हैं ]
रुद्र शिव की उपासना भारत मे अत्यन्त प्राचीन
हैं । उपासना का काल विभाग दो भागों में विभक्त
किया जा सकता है । प्रथम काल में शिव की प्रति-
कृति की उपासना की जाती थी । द्वितीय काल में
शिवलिङ्गोपासना आरम्भ हो गयी ।
भूतेश एवं ज्येष्ठ रुद्र इसी द्वितीय काल विभाग
में आते हैं । उनमें शिवलिंग की स्थापना की गयी
थी । ज्येष्ठ रुद्र का लिंग स्वयंभू था ।
ऋग्वेद (७.२१.५, १०।९९०३) में
शिश्नदेव की उपासना का उल्लेख अनार्य लोगों के
गन्दर्भ में किया गया हैं । प्राचीन वैदिक वाङ्मय
में नहीं मिलता । पतंजलि के महाभाष्य (३:९९)
में शिव, स्कंद, विशाख, की स्वर्णादि की मूल्यवान
प्रतिकृतियों की पूजा के स्पष्ट निर्देश है । वेम कद
फिसस की मुद्राओं पर शिव की त्रिशूलधारी एवं
शिव के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग नहीं अपितु नन्दिन्
उत्कीर्ण किया गया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् (४,११,५.२) में सर्व
प्रथम शिवलिङ्गोपासना का निर्देश मिलता है ।
'ईशान रुद्र' को समस्त योनियों का अधिपति कहा
गया है । किन्तु यहाँ भी शिवलिंग को शिव का
प्रतीक होने का स्पष्ट निर्देश नहीं है ।
महाभारत में उपमन्यु के आख्यान में सर्व प्रथम
शिवलिङ्गोपासना का स्पष्ट रूप से निर्देश प्राप्त
होता है ।
मोहे जो दडो एवं हड़प्पा के उत्खनन में शिव
रूप से मिलती मूर्तियाँ प्राप्त हुई है । उनका काल
ईशा के ३००० वर्ष पूर्व अर्थात् ४९६८ वर्ष है । यही
काल कल्हण तथा नीलमत पुराण के अनुसार महा-
भारत काल था । यहाँ के प्राप्त देवताओं की मूर्तियाँ
२२
महाभारत वर्णित 'त्रिशीर्ष' 'वियम्ब्र' 'ऊर्ध्वलिंग'
'योगाध्यक्ष' स्वरूप से मिलती है । ( म. अनु.: १४:
१६२, १६५, ३०८, १७.४६, ७७.९९ ) वहाँ से प्राप्त
मूर्तियों के वाम हस्त में व्याघ्र एवं हस्तो हैं । दक्षिण
हस्त में वृषभ एवं गण्डक हैं । वह चित्र भी महाभारत
अनुशासन पर्व ( १४:३१३, १७,४८,६१,८५,९१ )
वर्णित 'पशुपति' 'शार्दूल रूप' 'व्याल रूप' 'मृग वाण
रूप, 'नागवर्मोत्तरच्छद' 'व्याघ्राजिन' 'गहिग्घ्न'
'गजहा' एवं 'मण्डलिन्' से मिलता है ।
महाभारत में शिव को सर्वत्र वृषभवाहन कहा
गया है । हिटाइट लोगों के तेशव देवता से शिव का
साम्य मिलता है । बेबिलोन मे प्राप्त अनेक शिल्पो
एवं अवशेषों में तेशब की प्रतिमाएँ मिली है । उनमें
तेशव को वृषभवाहन एवं त्रिशूलधारी दिखाया
गया है । तेशब को पत्नी का नाम माँ था । शिव भी
अम्बिका जिन्हें पार्वती एवं दुर्गा कहा गया है उनके
पति हैं । तेशब की पत्नी सिंहारूढ है । दुर्गा भी सिंह-
वाहिनी है ।
सुगा में प्राप्त तेशब की पत्नी का चित्रण मधु-
मक्षिका के साथ किया गया है। यह मार्कण्डेय
पुराण वर्णित भ्रामरी देवी से साम्य रखता है ।
कल्हण ने भ्रामरी वासिनी देवी का वर्णन राजतरं-
गिणी में ( ३:३९४, ४२३ ) किया है ।
तेशव के समान रुद्र के हाथ में विद्युत, धनुष,
त्रिशूल, दण्ड, परशु, पट्टिश आदि शस्त्र दिखाये गये
हैं । ( ऋ. २: ३३; ३; म. अनु १४: २८८ २८९,
१७:४३, ४४:९९ )
'शत्रुजय सूक्त' शुक्लयजुर्वेद मे रुद्र को लक्ष्य कर
लिखा गया है । उसका विचार सुमेरियन देवता
'नेर्गल' से मिलता है । मत है कि भारतीय रुद्र शिव
का सम्बन्ध किंवा साम्य अनादोलिया, मोसोपेटा-
मिया, एवं सिन्धुघाटी की सभ्यता से अवश्य रखता
है । ( राय चौधरी: स्टडीज इन इण्डियन एण्टि-
क्विटीज पृष्ठ २००-२०४)
निःसन्देह रुद्र सर्व प्रथम वैदिक देवता थे ।
कालान्तर मे वे व्रात्य, निषाद, वन्यादि एवं अनार्य