पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
सातवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३३०
सूर दूर तिन तेज । मध्य अँधियन यौं बाजे ॥
प्रात ओस जिम बूंद । जबह अयछ अनु लाजै ॥
संगन अनेक जंपत करन । नान वरज्यौ पुन फिरि ॥
मंजाव साह सिसु बत्त सुनि । करहि जुद्ध भुम्मिय सु जुरि ॥
छं० ॥ ३१ ॥ रु० ॥ २९ ॥
सरदारों का पत्त्र सुनकर क्रोध करना ॥
कवित्त ॥ सुनिय बत्त सामंत । बँचे कग्गद परिचारौ ॥
सीस लग्गि असमान । पिथ्यौ खंगा बंजारौ ॥
सिंघाने करि हन्यौ । केन जबू कंवर पड्डौ ॥
केन छीन सनि राह । जुद्ध तारा ससि वध्यौ ॥
वर कन्ह वीर सोमेस पहु । चाहुवान वक्कारियै ॥
बाहंत वीर अरि नीर विच । दत्त चौहाना तारियै ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ ३० ॥
कवित्त ॥ मुक्कै दूत सुद्दूत । रत्त गुन अरिन विरत्ता ॥
चिंत ननौ सिर भार । सार काग्ज सो रत्ता ॥
वर अपन जानही । प्रमान न्मान लुग्धै ॥
द्विग राजान प्रमान । देस विद्देस परष्षै ॥
ते दूत सपत मंडौवरह । चर चरिच अनुसरि परे ॥
भय प्रात राज दरबार गय । दिष्पि धार घर घर डरे ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥
२९ पाठान्तर-आवाज । धूम । मधि । अंधिन । राजे । उस । बुंद । अयन । मंजाह
माह । भूमीय ॥ * यह शब्द अर्थात् "आवाजि और अवाज" आदिपर्व्व के रूपक १८१ तथा
१८२ पृष्ठ ७६ में भी आया है । उस पर की टिप्पण देखो । संस्कृत “वाज” और “वाद” शब्द
Sound, Sounding, discourse, speech, and prayer आदि के अर्थों में प्रयोग होते हैं उन से यह
हिन्दी अपभ्रष्ट शब्द बने दीखते हैं ॥
३० पाठान्तर-सुनीय । सांमंत । बंचे । बचे । कगद । असमांन । लगा । कर । पद्धै ।
छीनं । वधौ । कन्ह । चाहुत्रांन । चाहुवांन । वकारीयै । बाहत । विचि । चौहांनां । तारीयै ॥
३१ पाठान्तर-मूके । कारिज । जांन हि । प्रमांन । न्मिमांन । प्रमांन । राजन । विदेस ।
परषै । संपंत । चर चरित्र । दिषि ॥
३३८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १०
दूहा ॥ तात बरज्यौ बत्त बहु, एक न आवै दाइ ॥
उत पृथिराज नरिंद ने, सज्ज्यो सेन सुभाइ ॥
छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ ३२ ॥
सेना का वर्णन ॥
लघुनाराच ॥ हय ग्गयं सजे अरं । निसांन बज्जि दूभरं ॥
नफेरि बीर बज्जई । मृदंग झंझरी गई ॥ छं० ॥ ३५ ॥
सुनंत ईस रज्जई । तनीस राग सज्जई ॥
सुभेरि झुंकयं घनं । श्रवन्न फुट्टि झंरूनं ॥ छं० ॥ ३६ ॥
नरह नाद रिक्कयं । चुसट्ठ ताल दिज्जयं* ॥
तुरंग पंति चल्लयं । मनौं जलद्द हल्लयं ॥ छं० ॥ ३७ ॥
तरप्पि तेज तामसी । मनौं कि नह वामसी ॥
झलक्कि मंत दंतयं । मनौं किं बीज पंतयं ॥ छं० ॥ ३८ ॥
जेर जरायं बंगरी । मनौं चमक विज्जुरी* ॥
सिरीसु खोभ जग्गयं । कि भान मेघ उग्गयं ॥ छं० ॥ ३९ ॥
श्रवंत खोभ दानयं । झरंत मेघ जानयं ॥
उपंम और दुत्तियं । षिलाव राहु पुत्तयं ॥ छं० ॥ ४० ॥
उपंम तीय उड्डरं । कि मिच कज्जलं गिरं ॥
जु बैरषं विराजची । वसंत वृष लाजची ॥ छं० ॥ ४१ ॥
दुरंत चौर सीसयं । गिरं कि गंग दीसयं ॥
दुती उपंम लग्गयं । कि बह्लं कि बग्गयं ॥ छं० ॥ ४२ ॥
जु घूघरं घमक्कयं । कि दादुरं सु भद्यं ॥
दुती उपंम खेलयं । सुचाग वाम केलयं ॥ छं० ॥ ४३ ॥
३२ पाठान्तर—दाय । पृथीराजनें । सुभाय ॥
३३ पाठान्तर-छंद लघुनाराज वा नराजा । हयगयं । निसांन । दुभरं । बजई ॥ ३५ ॥
रजई । सजई । बजई । नफेरि । श्रवन ॥ ३६ ॥ नारद नरद रिक्षयं । चौसट्ट । * यह दूसरा पाद
सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है । चुलयं । मनों । जलद । हलयं ॥ ३७ ॥ तरपि । तांमसी ।
मनों । वांमसी । भालकि । मनों । लभयंतयं ॥ ३८ ॥ * ये दोनों पाद सं० १६४७ की पुस्तक
में नहीं हैं । ससोभ । जगयं । भांन । उगियं ॥ ३९ ॥ दानयं । जानयं । दुतीयं बिलावै । पुत्तियं ॥
४० ॥ उपंम । कजलं । बृछ ॥ ४१ ॥ चोंर ॥ ४२ ॥ घुघरं । घमघमं । ददुरं । भदयं । उपम ॥ ४३ ॥
सातवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३३६
सुघंट घोर सोरयं सुनंत श्रोन फोरयं ॥
तिलक्क चंद साजच्ची । मनौं गनेस राजच्ची ॥ * कुं० ॥ ४४ ॥
दुती उपंम जग्गयं । दवंकि लग्गि पव्वयं ॥
गह्व गर्ज सद्दयं । मनौं किं मास भद्दयं ॥ कुं० ॥ ४५ ॥
सु पीलवांन चंदयं । अरापती कि इंदयं ॥
सुअस्सवार राजच्ची । कि जंम जोर साजच्ची ॥ कुं० ॥ ४६ ॥
मिलंत मुंक नैनयं । तिलग्गि सीस गैनयं ॥
ते रूप भूप मारखे । कि अश्वनी कुमार खे ॥ कुं० ॥ ४७ ॥
चिगुंन तेज तंतनं । तिनंक कंक मंमनं ॥
सनाह रूप अंगमं । मनौं कि जोग जंगमं ॥ कुं० ॥ ४८ ॥
सणाह जोति दिप्पयं । मरीच भान भिप्पयं ॥
सुभह छंद वद्दयं । कि वीर वान सद्दयं ॥ कुं० ॥ ४९ ॥
आगंम विप्र बोलयं । हुलास रूचि चोलयं ॥
सु पाइ कंपनं षनं । दुखंत ते झनं झनं ॥ कुं० ॥ ५० ॥
जुरंत जाम मल्लयं । प्रभा प्रसाद बुद्धयं ॥
तिमध्य राज पिष्ययं । सु अंग गंग तिष्ययं ॥ कुं० ॥ ५१ ॥
सामंत मध्य सोभयं । कि इंद देव लोभयं ॥
कि पञ्च पंडवं दलं । धनुक्क वान सब्बलं ॥ कुं० ॥ ५२ ॥
चढंत राज प्रातयं । ते दूत देषि जातयं ॥
कहंत अब्ब घाटयं । भई समुद्र पाटयं ॥ कुं० ॥ ५३ ॥
उषाह मध्य ते चलं । सगुन्न बंदि जे भलं ॥
*ससूर सूरयं कलं । दिनं सु अष्टमी चखं ॥ कुं० ॥ ५४ ॥ रू० ॥ ३३ ॥
सुघट्ट । तिलक । मनौ । गनेंस । * यह चौथा पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है ॥ ४४ ॥
गह्र । मनौ ॥ ४५ ॥ पीलवांन । औदापती । जु दासवार ॥ ४६ ॥ मुद्ध । नैनयं । गैनयं ॥ ४७ ॥
त्रिगुन । तिनंन । मनौ ॥ ४८ ॥ दिपयं । मरीचि । भानं । भिषयं । बदयं । बांन ॥ ४९ ॥ पाय ।
झननं झनं ॥ ५० ॥ पिथयं । तिद्ययं ॥ ५१ पद्य । बांन संबलं ॥ ५२ ॥ अब । भयौ ॥ ५३ ॥
उपाह । मधि । सगुन । जै । * अंत के ये दोनों पाद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ ५४ ॥
३४० पृथ्वीराजरासो । [सातवां समय १२
पिता की आज्ञा लेकर अष्टमी को पृथ्वीराज का लड़ाई
के लिये यात्रा करना ॥
कवित्त ॥ दिन अष्टमि रवि वार । राज सुभ मँडि प्रस्थानं ॥
अष्ट दिसा जोगनी । भई साचाय सुध्यानं ॥
अष्ट च्यारि अय भान । राजदै अर्ध बघाइय ॥
इन सें भौम अनिष्ट । चंद चौथे ग्रह आइय ॥
चले नरिंद धायि दूत तब । मन आनंद सु चंद हुअ ॥
प्रथिराज तात अग्या सगुन । चरन बंदि चलि वज्र भुअ ॥
कूं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥ *तात मात अग्या परमानहि । ता समान नह भ्रंम प्रमानहि ॥
गुरु द्रोही पति द्रोही जानं । सो निच्चै नर नर कहि थानं ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥
नाहर राय के दूतों का पृथ्वीराज की चढ़ई और सेना
बल का समाचार नाहर राय को देना ॥
छंद पद्धरी ॥ नाहर नरिंदं जे दूत आइ । समाचार सबै कहिते सुनाइ ॥
दिसि जीत सत्त चहुवान सूर । लषियै चरिच मन मन्झ काफ़र छं० ॥ ५५ ॥
इक सहस स्वान सँग नाम धार । देसान देस बल पंग अपार ॥
तिन संझ पंच सै पवन पात । पित मात असल्ल लाधौर जात ॥ छं०॥५६॥
पांभरी अंग जिन पसम होत । दिषि दीप जोति तिन नैन होत ॥
रातब्ब मंस घृत दुग्ध पान । आजान बाह दिषियै बलान ॥ छं० ॥ ५७ ॥
रेसमी डोरि पट्टी नरमं । रहै सीत क्रांच दुषित गरंम ॥
तिन सथ्य पंच सै और डोरि । ते रषिक बिन को सकै छोरि ॥छं०॥५८॥
३४ पाठान्तर-शुभ । मंडि । भांन । मै । भोम । अरिष्ट । चौथैं । गृह । नरिंद्र । धसि । प्रथौराज । आग्या ॥
३५ पाठान्तर-आग्या । परमानाय । परमांनहि । समान । ध्रुम्म । प्रमांन्नाय । जांनं । निश्चै । नरकन । यांनं ॥ * सं० १६४९ की पुस्तक में इसे अरिल्ल करके लिखा है ॥
३६ पाठान्तर-समचार । सब । जित्त । सत । चहुवांन । मनमैं । स्वान । ॥ ५५ ॥ संग । नांमधार । देसान । मल्ल । से । असिल ॥ ५६ ॥ नयन । रातब । पांन । आजानंबाह । बलांन ॥ ५७ ॥ नरमं । शीत । दुखित । सय । होर । ति । रक्षिक । बिना ॥ ५८ ॥
सातवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३४१
इक आइ पेस इक अश्व सोन । बज्वांन अंग चष रहत षोन ॥
सिक्कार नाम जहंतह तिक्कान । आरंभ जुद्ध सब रूपि विनान ॥ छं० ५८॥
इक सत्त उंट भरी जीन साल । तिन धरै अंग छिप्यै न काह ॥
भेदैन वज्र वर नीर धार । तिन धरैं अंग जे दृढ पगार ॥ छं० ॥ ६० ॥
सन्नाह महिम वरनी न जाइ । जिप्पनि कि देव दनुजनि उपाइ ।
जनु ब्रह्म होम कढि मंच जोर । कै इंदं अग्नि अप्पे अकोर ॥छं ॥६१॥
कै वरुण अप्पि पाताल ईस । कै पवन प्रसन परसाद दीस ॥
वाचिष्ट कढि कै कुंड होम । दीनी कि प्रसन व्है मात भौम ॥ छं०॥६२॥
आंस सिक्ख सध्य तीन नरेस । जितनह समर सज सचुदेस ॥
छं० ॥ ६३ ॥ रु० ॥ ३६ ॥
पृथ्वीराज का प्रताप सुनकर नाहरराय का चौकन्ना होना ॥
दूहा ॥ सुनी पवर जब दूत मुख । चमक्यौ नाहरराव ॥
ए अप्पन गनियै नहीं । वैरी बिस हर घाव ॥
छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
अपने सरदारों से नाहर राय का कहना कि अब क्या
करना चाहिए पहिले चौहानों से हम से और बात
थी पर अब तो बिगड़ गई ॥
कवित्त ॥ सुक्षित सकल लिय बोलि । पुच्छि परिहार तिनहि मत ॥
चाहु आन पाषान । कहत आषेट जुद्ध बत ॥
तनक भनक सी कान । दूत इत्तह सुनि आए ॥
अप्प अचे तन रह्यौ । धरौ धर भूमि सदाए ॥
पाठान्तर-पेसि । बलवांन । सिकार । नांम । जहां । कांन । बिनांन ॥ ५८ ॥ सत ।
उंट । धरै । छिपै । भैदैन । घरैं ॥ ६० ॥ स्रनाह । महिम । जिपन । उपाय । ब्रम्हन । इंद्र । आपे ॥
६१ ॥ कैं । प्रासाद । कढि । प्रसंन । भोम । भौंम ॥ ६२ ॥ सद्य । जितनह । शत्रु ॥ ६३ ॥
३७ पाठान्तर-प्रवरि । चमक्यौँ । अपने । गिनियै । नही ॥
३४२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १४
सोमेस हमह कछु द्वै नहीं । तिन सुचित्त माना लई ॥
तब तौ सनेह कछु और हौ । अब तौ कछु औरै भई ॥
छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
सरदारों का कहना कि लड़ना चाहिए ॥
दूहा ॥ कहत सुभट परिहार के । दध्य चढी क्यों देइ ॥
सस्त्र मारि दल भंजि कैं । षग्ग धार धर लेइ ॥
छं० ॥ ६६ ॥ रू० ॥ ३९ ॥
नाहर राय का कहना कि आगे से बढ़कर एक बारगी उन
पर चढ़ाई करना चाहिए नहीं तो जीत न होगी ॥
कवित्त ॥ सुनि मंडोवर राइ । कहन बलवंत सुभट सह ॥
द्रव्य उनह कर चह्यौ । कहहि सुतौ *सति वंत यह ॥
जाइ अचानक परै । बहुरि छेत्रै। नहिँ जैहै ॥
प्रथीराज उस सबल । मारि धरती सब लैहै ॥
इह सुनत सबन बैठी सुमन । सजन सेन बेगो कह्यौ ॥
चर चरन चरचि कैं वत्त इह । खो झत्ती मारग गह्यौ ॥
छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४० ॥
नाहर राय का सेना सजना ॥
दूहा ॥ सजी सेन मंडोवरह । नाहरराइ नरिंद ॥
संभरि संभरि राव नृप । उर उदोत आनंद ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
३८ पाठान्तर-पुछि । चहुआन । पायांन । कांन । इतह । अचेतनह । सुदाए । हमह
कम । नही । सुहित ॥
३९ पाठान्तर-हथ । कै ॥
४० पाठान्तर-मंडोवरराई । मंडोवरराय । सुनद । कह हि सुतौ सति वत्त इह । *अधिक
पाठ है । परौं । नहिं । जैहैं । डंस । धरती लैहैं । सबल । वेगो । वल । झती ॥
४१ पाठान्तर-नाहरराय । संभरि वार । उद्योत । अनंद ॥
ग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराज रासो । ३४३
पृथ्वीराज की सेना की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ सदस लेन संसारी । नरेसु मध्य सन टारि पंच सम ॥
वीर सिंगार सुभंत । कंत जनु रत्त बाम सम ॥
दन्तउभय नंचारु । सिलह सज्जी चहु आनं ॥
चंद देखि मन मगन । कविन तिन करै बषानं ॥
पंचमी सोम रितु राज गत । सूर तेज जाजुलित धुअ ॥
कर तार धय्य कित्ती कही । वज़ि निसांन चहुआन धुअ ॥
छं० ॥ ६८ ॥ रु० ॥ ४२ ॥
पृथ्वीराज का आगे से बढ़कर लड़ने के लिये
जोवनराय को आज्ञा देना ॥
तवै सुजोवन राई । सूर साह्रौ चहुवानं ॥
तुम गुज्जर बैषंड । गाम सुरधर अगिवानं ॥
पंथ पंथ परवान । धाइ अगिवानी किज्जै ॥
सगा सपन जंपियै । छमनि आरोचि सुलिज्जै ॥
वामान पंथ अंधी प्रकृति । बिन दिट्ठे दिट्ठे न कछु ॥
वन पंन अहु परवत रहे । भेद बिना जानहि न कछु ॥
छं० ॥ ७० ॥ रु० ० ४३ ॥
जोवनराय का उत्तर दे कहना कि नाहरराय का पथ
बांधा सो वह रणभूमि को तिरछी छोड़ कहीं
चला गया ॥
तब्ब सुजोबन राइ । बत्त जंपै चहुवानं ॥
अहु पंन परबत्त । सत्त गुज्जर धर मानं ॥
लोहाना आजान । पंथ बंध्यौ पालक्की ॥
नाहर राइ नरिंद । गयौ तिरछीं भुअ मुक्की ॥
४२ पाठान्तर-संभारि । * अधिक पाठ है । मधि । सिंगार । सजी । चहुआनं । पेषि ।
षषानं । रिति । हथ्थ । किती । निसांन । चहुआन ॥
४३ पाठान्तर-तवै । राय राव । चहुवानं । चहुआनं । गुजर । गांम । मुरधुर । अगिवांनं ।
परवांन । अगिवांनी । कीजै । लिजै । वामांन । दिट्ठै । हिट्ठै । अहु । अद्दु । प्रवत । जानै
१२
३४४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १६
करिघर अनेक कैंवर गहिय । ए अग्गैं कैा धाइया ॥
तिह ठाम चुक चिंत्यो हुतौ । पै नाहर राइ न पाइया ॥
छं० ॥ ७१ ॥ रु० ॥ ४४ ॥
सबेरे नाहरराय के अग जाने पर सांझ को पृथ्वीराज
का पहुँचाना और उसकी खोज करना ॥
गयौ प्रात परिचार । संझ चहुआन सपनौ ॥
बरज्यौ जीवन राइ । षोज क्रम क्रम करिणिजौ ॥
पंथवान पुच्छ्यौ । नदी उत्तरि तिन अषिय ॥
तातें पूर नरिंद । बाज नत्तौ करि नषिय ॥
आनंद सिलह सज्जिय नृपति । पंषी पारिव मोचं जिम ॥
ज्यौं गिद्द अंध पच्छो करै । चित्त दिगंबर कियौ तिम ॥
छं० ॥ ७२ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
चालुक के प्रधान ( दीवान ) के घर नाहरराय
का पता मिलना और सामन्त सहित
पृथ्वीराज का नदी उतरना ॥
कुंडलिया ॥ नदी उतरि सामंत सह । डीस संपते जाई ।
चालुक्कां परधान गृह । पहन नाहर राई ॥
पहन नाहर राइ । सेन सज्जै सथ षंच्यौ ॥
चय हजार असवार । वीर संधान जुसंच्यौ ॥
प्रात कूच उप्परै । आज मुकांम जुदुस्तर ॥
झुकि प्रथिराज नरिंद । सिलह सजी नदि उत्तरि ॥
छं० ॥ ७३ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
४४ पाठान्तर—तवै । तवै । यौवनराय । चहुआनं । चहुवानं । अद्रु । अडु । परबत । गुजर । मानं । लोहांनी । अजानं । पालुकी । नाहरराय । भुहू । रहिय । के आगें उधाइया । तिहि । ठांम । यैं । नाहरराव ॥
४५ पाठान्तर—चहुआन । संपना । यौवनराव । लीना । पंथवांल । पुछ्यौ । नदि । उतरि । अषीय । अषीय । नंडिय । सज्जिय । पारेव । परेव । ज्यो । गट्ट । गंद । पक्खो । चित । डिगंवर । कीया ॥
४६ पाठान्तर—नदि । उतरी । उत्तरि । सामंत सब । संपत्त । जाय । चालुकां । परधांन । राय । सेन जैन । सजे ऊपरै । मुकांम । सुदुक्दूर । प्रथीराज । सजी । उतरि ॥
सातवां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो । ३४५
सुभट सहित सेना में पृथ्वीराज कैसा शोभता है ॥
कवित्त ॥ सुभट सिलह घट जोति । भयौ घट सिलह सुभट्टन ॥
कै * दीप मध्य सूडैन । कै * भान बदल्ली सुभट्टन ॥
कै * मुकुर मध्य प्रति बिंब । कै * संभु विभूत अधारै ॥
कै आरसि सें सार । हथ्य करतार सुधारै ॥
पाचार भार ठिल्लै कमनि । कै * उदधि मडि लंका दहै ॥
चिय वसिन द्रव्य अरु मोच वसि । नजि जुगिंद वानै ग्रहै ॥
छं० ॥ ७४ ॥ रु० ॥ ४७ ॥
पृथ्वीराज के ग्रास पहुंचने का समाचार नाहरराय
का सुनना और सेना इकट्ठी करना ।
दूहा ० ॥ भई खबरि परिछार कौं, चढि आयौ पृथिराज ॥
लग्यौ सेन एकत करन । दंड बजाने बाज ॥ छं० ॥ ७५ ॥ रु० ॥ ४८ ॥
घाटी पर पर्वतराव को रास्ता रोकने के लिये भेजना ॥
दूहा ॥ जहँ पव्वत घाटौ हुतौ, मीना मेर मवास ।
प्रब्बत सौं प्रब्बत मँड्यौ, अनमीजौ धन त्रास ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
दूहा ॥ हुकुम कीन परिछार तिन, प्रब्बत मीना मेर ।
इततें तू रुकि एक टक्क, जितनें आवत वेर ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ५० ॥
पर्वतराव का घाटी रोकना ॥
दूहा ॥ सुनि प्रवत धायौ तुरत, घाटौ रोक्यौ जाइ ।
च्यारि सहस मीना प्रबळ, बैठे आइ वलाइ ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४७ पाठान्तर-ज्योति । * अधिक पाठ हैं । मधि । भांन । बदली । सुघटन । मुकर । सिंमु ।
विभूत । आरसि सार में । हथ । सुधारें । मधि । दहें । वसि । बांनै ॥
४८ पाठान्तर-भई । कां । प्रथीराज ॥
४९ पाठान्तर-जहां । जह । घांटौ । हुतो । तहां मीनां । मीनां । परबत । सां परबत ।
प्रबत । ज्यां । प्रबत । मंडभौ । जो ॥
५० पाठान्तर-परबत । इतने । इतनैं । चु । जितनै ॥
५१ पाठान्तर-पब्बत । घांटों । रोकिय । बैठे । आंनि ॥
३४६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १८
दूहा ॥ तीन पनच धुनचीं करन, बडे कटन तंडीर ॥
सगुन बिना पग ना धरै, विकट बंन झंडीर ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥५२॥
पर्वतराय कैसे घाटी रोक कर बैठा है ॥
कवित्त ॥ मडोवर धर बाज । राज रषन परिचारन ॥
स्वामित सकं वज्रंग । जंग जिन अंग न हारन ॥
देत सेवासनि भेजि । मारि घर पर पसु खावै ॥
देषत कै राजांन । बिरदवा नैन चलावै ॥
बैठे सु ओट रुंषन उपल । करि तरकस उंधे धरनि ॥
देषंत बघ चहुवांन की । भरै जांनि बिसहर बरनि ॥
छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ५३ ॥
घाटी रुकने का समाचार पृथ्वीराज को मिलना ॥
दूहा ॥ छढी षबर प्रथिराज तिन । मीनां सरह अमान ॥
पकरि लोह पब्बय गह्यो । सबै को अगौ जान ॥
छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
क्रोध करके पृथ्वीराज का पर्वतराय से लड़ने को
कान्ह चौहान को भेजना ॥
कवित्त ॥ सुनि कुप्पिय प्रथिराज । जानि पुच्छिय सुअप्प मन्त्रि ॥
मनु मृगराज मृगीन । जोर क्रुद्धिय दिषिय बत्रि ॥
आछ ग्रछन जनु जीव । देषि तुद्दिय सुमीन कछ ॥
समर समुद्द जल पियन । जांनि घट जन्म क्रोध मछ ॥
षिजि कछी कान्ह चहुवांन सहु । रंक आइ अड्डे फिरे ॥
सिर नाइ धावू नरनाह तब । प्रब्बत सम प्रब्बत भिरे ॥
छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ५५ ॥
५२ पाठान्तर-धुनहीं । षट्ठे । कठन ॥
५३ पाठान्तर-बजरंग । जंग किन अगन हारन । दैत । मैवासन । मेवासन । के । राजांन ।
बिरदवां नेन । रुंष ऊटन । औंधे । चहुवांन ! भरे । जांनि ॥
५४ पाठान्तर-पवरि । प्रथीराज । मीनां । अमांन । गृह्यौ । आगैं । अगै । जांन ॥
५५ पाठान्तर-प्रथीराज । जांनि । पुंछिय । मनोँ । क्रुधिय कि दिषि बल । जांनि ।
चहुआन । आंनि । परबत । भिरै ॥
सातवां समय १६] पृथ्वीराजरासो । ४४०
कान्ह का पर्वत से युद्ध और उसमें पर्वतराव
का मारा जाना ॥
छंद भुजंगी ॥ मंडे सेर सीना ग्रछ्यौ चोरि घाटा । मिले आइ कन्हं मनौं लौन आटा ॥
मंडे झुंड वृष्णं कहूं दंत छोटं । ढिले ना सुमेरं मंडे जानि कोटं ॥
छं० ॥ ८३ ॥
भई तीर मारं सरोसं सवेगं । तदै ताद्दि पारै सबिद्धं अच्छेगं ॥
सद्भावज्जघातं उतप्पात मंज्यौ । करे हूह हाकं बरं बेग डंड्यौ ॥ छं०॥८४॥
जुटे जुद्ध अनवद्ध करिकुद्ध ठाढे । करैं हथ्य वाहं पयं संडि गाढे ॥
गिरै बान लग्गै बियं इत्त उत्तं । महामंच विद्या गुरु द्रोन चित्तं। छं ॥८५॥
भई बान छाया न सूझै मरीचं । मिले लोह लकाच तत्ते तरीचं ॥
गिरै अश्व असवार लोहं जहीरं । परै जानि डंडूर वृष्पं गहीरं ॥छं०८६॥
द्ययं कुंडि नर्नाह हुए उनारै । हहंकार बज्जै सहोमं पुतारै ॥
परै अश्व घातं सरोसं सरीरं । बकै केय वक्कं करैं के अरीरं ॥ छं०॥८७ ॥
सरं जान भाखं उडै लोच अग्गी । जरै पंथ पंषी गिरैं स्वर्ग मग्गी ॥
भरै मुट्ठि कन्हं सरं मार बग्गं । निकस्तैं सुविद्धे हुअ पग्ग उग्गं ॥छं०॥८८॥
खगै गुज्ज सीसं कथैं उक्ति कोगी । पछारंत तूंबा सनौं षीजि जोगी ॥
वहै अस्सि त्रिद्धघात रोसं प्रत्तारं । मनौं निक्कसै सद्यनं तंततारं॥ छं० ८९॥
लगै संग हृत्ती फुटै पुट्ठि पच्छी । ककंधं कछारं कटैं जार मच्छी ॥
जितं त्ति जठंत किंकं रकत्तं । फिरैं मह भोतेयानक वकत्तं ॥छं०॥९० ॥
नचै भूत बेताल षेतं भयानकं । रसं वीर रस्से इस्से निर्हयानं ॥
मिल्यौ भुष्प कन्हं परब्बत वीरं । हन्यौ अस्सि घातं धुक्यौ ता सरीरं ॥९१॥
जह्यौ कंध कन्हं असीघात धीरं । करी कहि संना षरी चग्ग चीरं ॥
पद्यौ झुम्झि प्रब्बत राबत्त भेरं । गज्र्यौ नाहरं गाज नाहर्सवेरं ॥
छं० ॥ ९२ ॥ रू० ॥ ५६ ॥
५६ पाठान्तर-मंडे । मोनां । घांटा । मिलैं । कंव्हं । मनों । लोन । लौंन । मंड़े । षप्पै ।
उटं । ढिले । नां । मंड़े ॥ ८३ ॥ सबेगं । हूक्क हाकं ॥ ८४ ॥ करै । हथ्थ । गिरे । बांन । लगैं ।
बोयं । इत । उतं । वित्तं ॥ ८५ ॥ बांन । लकबाछ् । गिरैं । परें । जांनि । वृपं ॥ ८६ ॥ नरनाह ।
हकहाक । बज्जे । महं में । परै । सरोस । बकें । बंकं । षकं । करें ॥ ८७ ॥ जरै । गिरें । भरें ।
३४८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २०
पर्वत के मारे जाने पर नाहरराय का स्वयं टूट पड़ना ॥
कवित्त ॥ परत धरनि परबत्त । आइ हुंकिक्य नाहर रन ॥
बलवड्ढे सह मेर । जानि ह्नुमान लंक बन ॥
इक्क गिरत घन थाप । इक्क बथ्थनि पक्कारिय ॥
बब्बर रूप सम भूप । रूप अनभूत संचारिय ॥
मानिक्क बंस आयौ उतह । दूत नाहर गल गज्जैा ॥
परबत्त पर्यौ पडु पिछिकै । सिंधू बञ्जनं बज्जया ॥
छं ॥ ९३ ॥ रु० ॥ ५७ ॥
पृथिराज का भी चढ़ चलना ।
छंद पद्धरी ॥ चढ चल्यौ राज पृथिराज ताम । साधन सुसेन वर वरन वाम ॥
दुल्लहै भयो खोमेस पुत्त । वनिता विवाह मन कंक वृत्त ॥ ९४ ॥ *
बज्जिचि निसान दस दिस गुरान । आषाढ अग्ग ज्यौं मेघ थान ॥
रथ वाजि करी पयदत्त पुल्लेन । सज्यौ नरिंद चतुरंग षेन ॥ ९५ ॥*
मुक्की सुभुम्मि अजमेर राज । यंतौ सुजान् पहन समाज ॥
धज्जी सुहागि सिंधू निसान । भयभीत भेष भय दस दिसान ॥९६॥
बज्जिय सुभैरि भय शंकरीस । गज गजे गाच घय छठ छींस ॥
गिरनार देस अरु सिंधु बह । गज्जै सुगाज सजि थह यह ॥ ९७॥
ढलकंत ढाल बैरष रंग । सोभंत विपन रिति राज संग ॥
मिलि आय पंथ नाहर नरिंद । वीराधि बीर बड्ढे सुदंद ॥ ९८ ॥
छह्वारि भह षेना सवान । सामंत सूर करि लोह्र पांन ॥
कन्दा नरिंद आजान बाह्र । संगरी राव स्वामित्त राह्र ॥ छं० ॥ ९९ ॥
भूठि । निकसैं । बुद्धी । हुच्चै । उगं । डंगं ॥ ८८ ॥ लगें । गुर्ज । गुरंज । शीसं । कहै । पछां-
रंत । तुंबां । मनो॑ । वहैं अश्व निर्घात । वहै । विघात । मनो॑ । निकसं । निकसै । सर्घनं ॥ ८९ ॥
लगें । संगि । छती । फुट्टै । पुठि । मली । कहारं । कठैं । मुक्की । तित । उठंत । । छिकं ।
रकतं । फिरें । फिरै । भट । वकतं ॥ ९० ॥ नच्चै । रसैं । मुष । सुपरजत । असि ॥ ९१ ॥ फंन्द ।
असि । कटि । संनाह । परि । चष । भुझि । परवत्त । रावत्त । नाहर । संवेरं ॥ ९२ ॥
५७ पाठान्तर-परबत । आय । हकिक्य । बट्टे । बढे । जांनि । हनुमांन । रक । घन घाय ।
इक । बथन । पक्कारीय । पक्कारिय । सम रूप । संचारिय । संवारीय । मानिकं । मानिक्क ।
गज्या । परबत्त । पिछि । कै । सिधू । बजन । बजया ॥
सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३४६
संभारि बीर चालुक्क भूप । उपज्यौ ब्रह्म कुंडह अनूप
अतताइ तुरंग तेरह सुपंड । षिजि रह्यौ रोपि रन रोद्धि झुंड ॥
॥ कूं० ॥ १०० ॥
तिन ठाम आइ नाहर सुघरि । वाहंत हथ्थ जनु करिय केरि ॥
॥ छं० ॥ १०१ ॥ रू० ॥ ५८ ॥
इधर पृथ्वीराज इधर नाहरराय का सन्मुख युद्ध ॥
कवित्त ॥ उत प्रथिराज नरिंद । इत सुपरिचार प्रबख रन ॥
दुअन सेन असि कढ्ढि । करन कऋषंत समय जनु ॥
दुअन अङ्ग संनाह दुअन नष चष उघारें ॥
दुअन इष्ट आरंभ । दुअनि दुअ हथ्थ दुधारें ॥
दुअ सुम्भि अङ्ग दुअ देव जनु* । दुअन धार दुअ तुक बढ़िय ॥
संनाह कहि कही सुनूह । तस उपम चन्दह कहिय ॥
छं० ॥ १०२ ॥ रु० ॥ ५९ ॥
कवित्त ॥ दुअन हथ्थ दुअ भूप । रूप अदभूत रेष बढ़ि ॥
इन्द्र सिलह प्रथिराज । चंद्र परिचार तेज गढि ॥
दुअ अभंग संनाह । दुअन देवन आधारन ॥
दुअन तेज तन अंस । हंस दुअ हंस समाधन ॥
अवतार भूत दुअ देव सम । दुअन चिन्ह उत्तम करिय ॥
परभास षेत परब्रह्म दुति† । भृगु लंङ्कन जनु धरि धरिय ॥
छं० ॥ १०३ ॥ रू० ॥ ६० ॥
५८ पाठान्तर-* ये ९४ । ९५ और आधा ९६ छंद सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥
प्रथीराज । तांम । वांम । दुल्लह । पुत ॥ ९४ ॥ ज्यौं । थांन । पुलेन । सज्यों ॥ ९५ ॥ मतौ ।
बजी । लाग । निसांन । दिसांन ॥ ९६ ॥ वजिग । गजैं सुराज हय हठ हौंस । गिरनारि । दूट ।
गर्जे । घट घट ॥ ९७ ॥ बैरष । बढे ॥ ९८ ॥ हहकार । भट । सबांन । आजानवाह । स्वामित
॥ ९९ ॥ चालूक्र । ऊपज्यो । तुरंग । रोहि ॥ रिन रोपि ॥ १०० ॥ ठांम । हथ ॥ १०१ ॥
५९ पाठान्तर-प्रथीराज । कढी । सनाह । चप । हथ । दुधारें । सुभि । कटि । कटी । *उपम ॥
६० पाठान्तर-हथ । प्रथीराज । रहि । उत्तिम । द्युति । भृगु । लकिन ॥
* एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअन इष्ट आरंभ" से "दुय देष जनु" तक नहीं हैं। परंतु सं. १६४७ की में हैं
† एशियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में "दुअ देव सम" से "ब्रह्म दुति" तक नही है। परंतु सं. १६४७ की में हैं ॥
३५० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २२
उसमें पृथ्वीराज का नाहरराय के घोड़े को
मार डालना ॥
दूहा ॥ फुनि पृथिराज कुमार नैं, हय हन्यौ परिहार ॥
कंध दुअं कटि वग सहित, झुक्यौ धरनि असिधार ॥
छं० ॥ १०४ ॥ रू० ॥ ६१ ॥
दूहा ॥ झुकत धरनि नाहर तुरिय, झपक्यौ बंध कर्नंक ॥
तेक तोकि तक्यौ तुरी, बचि असि कंध छनंक ॥
छं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ ६२ ॥
दूहा ॥ दुअ कोटल दुअ नृपति के, किन्नें घाजुर आनि ॥
दुअन बीच दुअ सुभट घट, अठ भएं चट्टानि ॥
छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ६३ ॥
रनबीर का सन्मुख हो पृथ्वीराज से जुद्ध करना ॥
कवित्त ॥ बर पावस रनबीर । दुतिय पावस सम सज्जौ ॥
धूम जोति अरु सलिल । मरुत प्राकारनं बज्जौ ॥
सज्जि सेन चतुरंग । बरन बह्ल रंग धारिय ॥
स्याम सेत अरु पीत । रत्त धज मत्त विचारिय ॥
उन्नयौ धार धारग्धनी । खरन तिरच्छौ बुट्ठिबर ॥
बिज्जुुलि झमंकि पग पंत्तिकर । पिवौ सेन अरिजुध्य पर ॥
छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ६४ ॥
मोहन परिहार और पवार का सम्मुख हो लड़ना ॥
दूहा ॥ उत मोहन परिहार रन । मेर समान अमान ॥
द्वै द्वै असि कटि बिकट बनि । द्वै धनु द्वै द्वै बान ॥
छं ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ६५ ॥
६१ पाठान्तर-प्रथीराज । कुम्मारनैं । है । हंत्यो । कन्ह कट्टि हुअ ॥
६२ पाठान्तर-तुरी । तोकि ॥
६३ पाठान्तर-दुतीय । सज्यौ । मूरत । प्रककारन । सजि । बहूर । धारीय । स्याम । रत विचारोय । उनयौ । तिरछौ । कुट्टि पर । बुष्टि । बिजुलि । झमंक जुथ ॥
६५ पाठान्तर-दोहरा । समांन अमांन । द्वैद्वै धनु द्वैवांन ॥
६. शहाबुद्दीन गोरी आक्रमण, शब्दभेदी बाण व उपसंहार
सातवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३५१
कवित्त ॥ दंत लोचन परिछार । इत सुअवल इंदाह, इय ॥
दिष्ट दिष्ट अंकुरिय । संझ जुग सात दिष्ट घर ॥
लोचन कोपि दारार । सीस पांवार लुझारिय ॥
टोप कहि फटि मुंड । झपटि पांवार निझारिय ॥
फटि सुंड तुंड धर कहि झाटि । लह विफार अफार झट ॥ *
ढार वत्त तत्त बिदार क्रि तुरत । जनुकि कशारिय पटुपट ॥
छं० ॥ १०८ ॥ रु० ॥ ६६ ॥
चामंड का युद्ध ॥
कवित्त ॥ चंड रूप चामंड । दनत बलवन्त प्रतापन ॥
हन्यौ संग दुअ अंग । निकसि दुअ अंगुल सापन ॥
उभै संग चलि धाए । मध्य गहि हत्थ दु हुय्यन ॥
उडि भेजी सुअकास । कुहि पिचकार दद्धिकन ॥
परताप भग्गि परि प्रथ्वि पर । लोक तीन कीरति कथिय ॥
द्रव्यान पान निकसी सुरवि । जोति जाइ जोतिन मिलिय ॥
छं० ॥ ११० ॥ रु० ॥ ६७ ॥
कवित्त ॥ मिले पौंन सौं पौंन । मिले पानी सौं पानी ॥
मिले तेज सौं तेज । मिले सूनै सूनानी ॥
मिलै प्रथी सौं प्रथी । मिले चरि लौं चरि बेत्ता ॥
मिले हुतासन होत । होम होमै जो होता ॥
जल छत जोत जल भिरत हरि । पय सें जिम पय मिलि सुपय ॥
मिमि मरत दुरत जेइं झरत रनि । सुमिलिय प्रताप सु आप स्वय ॥
छं० ॥ १११ ॥ रु० ॥ ६८ ॥
६६ पाठान्तर-पांवार । झारीय । फटि । तिझारीय । “ * फटि मुंड तुंड दुअ पंड हुअ ।
अधर फट्टिय बर पग झट ।” सं० १६४७ की में यह पाठ है । वत । तत । बिहार कि । कशा-
रीय । पटु ॥
६७ पाठान्तर-आय । मथ । हथ । दुह्यन । दधि । प्रताप । पर । पृथ्वी । लोकं तन ।
द्रव्यांन । पांन । जाय ॥
६८ पाठान्तर-पोंन । सो । पोंन । पानी । सो पानी । सुने सुनांनी । पृथी । सो । पृथी । छता ।
होमे । मिलत हर । हुरत । जेहूँ । रिन ॥
४३
३५२ 'पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २४
कवित्त ॥ संस छड्डु रद गूढ़ । अंत बर बाज गज्ज नर ॥
भय भूअत्त असत्त । चढिय जुग्गिन तिन उप्पर ॥
डूक्क दंत गज गिद्धि । उतरि लै अंत अलुफ्भिय ॥
डूक्क कोद जुगिनीय । करन चैंचत सौं झुक्किय ॥
तिद्दि दिष्षचंद कविराज तत । अति उल्हास ओपम बढ़ि ॥
उडवत्त चंग सुचंग अँग । राज कुमारि अहानि चढ़ि ॥
छं० ॥ ११२ ॥ छ० ॥ ६६ ॥
दूहा ॥ धषलंगी धवली दिसा धवल तन चहुवान ॥
धवल दीछ संमुछ खख्यौ । जस धवल तन आनि ॥
छं० ॥ ११३ ॥ रू० ॥ ७० ॥
स्वामि रक्त रत्ते समुद्द । रत्ते नैन कहर ॥
रन रत्ते द्वव दाह सम । गुंजत गल्ह गहर ॥
छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ७१ ॥
नाहर ? से नाहरराय का लड़ना ॥
कुंडलिया ॥ नाहर सौं संमुछ खस्यौ । नाहर राहू नरिंद ॥
मंडोवर मारू बली । धनुवर भूपति दंद ॥
धनुवर भूपति दंद । सेन चहुआन ढंढोरी ॥
सुर असुरन करि मेर । मथन दरिया हिल्लोरी ॥
हथ हथ्थिन घन झंकि । धीर झुझ्यौ छकि छाचर ॥
मरदन सौं मिलि मरद । मरद बुल्ह्यौ मुख नाहर ॥
छं० ॥ ११५ ॥ रू० ॥ ७२ ॥
६६ पाठान्तर—वाजि । गज । भृत । असत । जुगिना । उपर । डक्क । उतर । अलुभिय ।
इक्क । जोगिनीय । चैंचत । सों । झुकिय । तिहिं । दिषि । तित । उपम । उडवत । चांग ।
कुंमारि । अट्टानि ॥
७० पाठान्तर—तन । तंन । चहुवांन । आंनि ॥
७१ पाठान्तर—स्वामिरत । रते । रत्ते । नैन । दते ॥
७२ · पाठान्तर—सों । नाहरराय । धनिवर । चहुआन । ठंढोरी । ठठोरी । टंटोरी ।
असुरनु । दरीया । हिलोरो । हथिन । सों ॥
सातवां समय ९५ ] पृथ्वीराजरासो । ३५३
बलराय का खेत में मँडना ॥
कवित्त ॥ हथ रच्यौ थिर सुथिर । षेत संज्यौ वलरायं ॥
सार सार अप्पार । धार लग्गा धर चायं ॥
उठिय अग्ग पगधार । धपी द्रुगा धर लोइय ॥
धक्क छक्क उच्चार । सार अप्पं दन्न मोइय ॥
निध्धात घात भरकर करचि । नभ निसान तिन सह भरि ॥
सब सूर सुरंगीय कंठ वल । सुसर कढि असि वर पसरि ॥
छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ७३ ॥
घोर युद्ध वर्णन ॥
इंदू विराज ॥ कढी * तेग तत्तं । मनौ मल्ल घत्तं ॥
लगे लोह लग्गं । पगं पग्ग वग्गं ॥ छं० ॥ ११७ ॥
दुअं वाह वाहं । गजै गज्ज ढाहं ॥
जुटे इत्त उत्तं । मनौ संस चित्तं ॥ छं० ॥ ११८ ॥
धुकेँ धींग धक्कैँ । छकै सार छक्कैँ ॥
भिरैं भूमि रुंडं । वकँ बैन मुंडं ॥ छं० ॥ ११९ ॥
तुरैं तूट वाहँ । दतैं दंत माहैँ ॥
डूकं पाइ कूदैं । टिकैं तेक रुंदे ॥ छं० ॥ १२० ॥
चहैं बाधुआनं । तडित्तं कमानं ॥
रसं बीर रस्से । बदै लोह घस्से ॥ छं० ॥ १२१ ॥
गजैं गैन देवी । अभूतं सुएवी ॥
नचै भूति भूमी । जकैं देषि झूमी ॥ छं० १२२ ॥
षिजै खेत पाखं । विहंडै कपाखं ॥
रचै रुंड माखं । स्रवै सोन लाखं ॥ छं० ॥ १२३ ॥
चवट्टी चिकारै । फिकीयं फिकारै ॥
७३ पाठान्तर-थह । अपार । लगा । दृगा । धक हक । उचार । अयं । निघात भह ।
निसान । शब्द । सुरंगीय । कढि ॥
३५४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २६
गमं गिद्ध गह्रैं । पखं पूचि चहैं ॥ छं० ॥ १२४ ॥
भिरैं भंति भारी । अभूतं सुरारी ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रु० ॥ ७४ ॥
दूहा ॥ परत भिरत तुह्त सुकर । दरत निवत्त सुछद्य ।
अप्पानौ बल छय्यनह । कां संगे बल तथ्य ॥
छं० ॥ १२६ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
नाचर कर नंन्हा सुपय । भय भारथ्य उपाउ ।
जासु जहां जो जबरै । तिहि बल रोच सदाउ ॥
छं० ॥ १२७ ॥ रु० ॥ ७६ ॥
गाथा ॥ कायर सुप्प प्रमानं । बर कंमोदयं मोदयं सुप्पं ।
सत सित पच प्रमानं । उधारियं बीर वृंदायं ॥
छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
छंद निसंगी ॥ झुंकारे सूरं, वज्जत तूरं, नच्चत हूरं, सुर सुरयं ।
दय छंदिय राजं, तेजय पाजं, खरे सुसाजं, झुर सुरयं ॥
चलि चालं बंधी, तारा संधी, छसै सुनंदी, है तारी ।
तुरसी रस अंजरि, तव नव पंजरि, तन घन पंजरि, वैमारुं ॥ १२९ ॥
घन केसर रंगं, अंबनि चांगं, नच्चत जंगं, अचि क्वालं ।
जंपे चरि गंगं, गुन अनभंगं, चरमन अंगं, असि झारे ॥
दूह्नां बबक्कारै, दुनां न चारैं, छोच करारै, गुन भारे ।
केसरि रंग रोारं, असिवर छोरं, औ तन कोरं, घटि क्वालं ॥ १३०॥
सिर तुष्टि भ्रमाजं उमया जानं, छूअ समानं, सुर दाळं ॥
७४ पाठान्तर--नेग । तते । मनों । दुहुं । गजे । गज । इत उत्त । मने । चित्ते । धुकें । धगि ।
धके । हकें । छके । वैन । तुटैं । लुटें । छूटि बाहैं । दंतैं । साहैं । पाय । रुद्धैं । चाहुवानं ।
रसे । बहैं । हसे । गैन । भूमि भूमी । जकैं । रचै । रुड । अव्रै । चवटी । चवट्टी । फ़कारी ।
फिकियं । फिकारैं । गोमं । गिहुं । गह्रैं । चुट्टै । चिदैं । सारी । अभूंतं ॥ * सं० १६४७ की लिखी
पुस्तक में इस छंद का शुद्ध नाम विराज है और इतर में रसावला है । यह दो लघुगु और रसा-
वला दो गुलगु का होता है ।
७५ पाठान्तर-चुटत । हथ । अप्पंनी हथ । मगौ । मगै । तथ ॥
७६ पाठान्तर-भारथ । तिहिं ॥
७७ पाठान्तर-मुप । प्रमांनं । कमोद । कंमोद । रुषं । प्रमांनं । उधारियं । वृंदारूं ॥
सातवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो । ३५५
छिल्लोरे पग्गं, अरि घट जग्गं, करिन अनभग्गं, जुधमोरं ।
परिच्छार सु आपं, अरि डर ढापं, रुपि रन धापं, पग छोरं ॥
चानुकक्क सुभानं, जुद्ध समानं, अरि हरि मानं, गुमांनं । कुं० ॥१३१॥
पर मध्य पबारं, असि बहु झारं, अच्छरि तारं, सो रानं ॥
कूरभ पग जग्गी, दस काम भग्गी, फिर रन लग्गी, परिच्छारं ॥
दाछिम पग पुल्लं, बीर सु वुल्लं, नच मन डुल्लं, भर सारं ॥
कन्द कुंमारं, रन परि भारं, सार सुमारं, नच छल्लँ ॥ कुं० ॥१३२॥
आवध नच फुट्टै, गुरजनि छुट्ठै, सीसय फुट्टै, कर चल्लं ॥
रन जैन सरीसं, तुष्टिय सीसं, लगि घन रीसं, परि वध्यं ॥
रन लुथ्यि अलुथ्यं, गुन कवि कथ्यं, अचरिज सथ्यं, रवि रथ्यं ॥
कुं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
छंद भुजंगी ॥ पक्कायौ जुसूरं विराजंत बीरं । स्वयं कंठ आभूषनं छंद नीरं ॥
पया खेस मत्ता चवं पंच अच्छी । कितौ छंद नामं बिराजै सु लच्छी छंद ॥१३४॥
नवं नेह नारी लछी देह दूनौ । करी सूर नांची विराजंत सूनौ ॥
इयं कूंडि राजं लरे सूर तेजं । मनौं जुद्ध आकूत भारत्थ एजं ॥ कुं० ॥ १३५ ॥
चत्तै चाल बंधे तनं मंड आसं । कहै चंद कच्ची तिनं जुद्ध भासं ॥
कुं० ॥ १३६ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
गाथा ॥ हंकारे विप सेनं । बजे बज्जाईं पंच सद्दायं ॥
सद्दे नव रँडा रंगं । भगं कन्ह चितयं बलयं ॥ कुं० ॥ १३७ ॥ रु० ॥ ८० ॥
७८ पाठान्तर—हकारे । घजस । नंचत ॥ १२६ ॥ केसरि । नचल । गंग । सिरमन । खबकारै ॥ १३० ॥ त्रुटि । प्रमानं । हिल्लोरे । पगं । जगं । करि अनभग्गं । चालुक । गुमान । गुमांनं ॥ १३१ ॥ अच्छरि । सोनारनं । कूरंभ । कूरभं । क्रूरं । भगी । फिरि । लगी । पुलं । वुलं । डुलं । झाल भारं सिरं । कुमारं । हलं ॥ १३२ ॥ फुट्दै । विछुट्दै । फुट्टै । चलं । शीसं । वध । लुथ उ लुथ । कथं । सथं । रथं ॥ १३३ ॥
७९ पाठान्तर—सौ सु । पटं । अछी । किनौ । नांमं । लछी ॥ १३४ ॥ लरैं । मनौ । भारथ ॥ १३५ ॥ कहैं । कवी ॥ १३६ ॥
८० पाठान्तर—हकारे । बीय । बजाइ । सद्दाई । सदे । रंगं रंगं । रंग रंग । अगं ॥
३५६ पृथ्वीराजरासो। [ सातवां समय २८
दूहा ॥ उत मंडोवर वीर कौं, इत संभरि वै राव ॥
दुअ लग्गा अस रार जुध, सुकवि चंद करि कावं ॥
छं० ॥ १३८ ॥ रू० ॥ ८१ ॥
छंद भुजंगी ॥ सलुथ्यं सलुथ्यं अलुथ्यं तिलुथ्यं । इयानं उषानं समानं पलत्थं ॥
हयगं रथंगं धरं धार तुहैं । धरं धार धीरं मघा वीर लुहै ॥
छं० ॥ १३६ ॥
छबकै रुधिंगा प्रवाहं सिरज्जं । धरं घाम चापं रनं केन रज्जं ।
भनकंतं भेरी चिक्कारैं सुछथ्यी । नचैं रंग भैरूं ततय्ये ततय्यी ॥
छं० ॥ १४० ॥
प्रचारं सुदंती सुअंती अलुभकं । अलुझैं सुदंती उड़ैं किंक झुलकं ॥
मनं झारते जान हेभं हयनं । परज्वाल तुहैं तनंजा विननं ॥
छं ॥ १४१ ॥ रू० ॥ ८२ ॥
लोहाना आजानु बाहु के युद्ध का वर्णन ॥
कवित्त ॥ लोहानौ आजानं । बांह लंबी पसारै ॥
लंबी बांच पसारि । तेग खंबी उब्भारै ॥
उब्भारै विब्भार । बीर बाधै बद्धाली ॥
अद्धाली अर बद्धि । कंध सोहैं सुद्धाली ॥
सुद्धाल कंध विव षंड धुअ । विधि ओपम कवि चंद कहि ॥
आउत्त घत्त आजान भुअ । मनु कजल कोटक विज लहि ॥
छं० ॥ १४२ ॥ रू० ॥ ८३ ॥
८१ पाठान्तर-कौं । दोउन के असराल युद्ध । सो चंद करीय सु काब ॥
८२ पाठान्तर--अलुथं सलुथं । सलुथं सलोथं । अलुथं तिलुथं । उयानं । पलथं । हयं
गंरथं । तुहैं । लुहैं ॥ १३६ ॥ पलकैं । रुधिजा । प्रबाहं । कंन । भनकंत । चिकारे । सुहथी ।
नचै । भैरौं । ततथे । ततथी ॥ १४० ॥ अलुभं । अरुझैं सुदंती । अलुझंत । उड्डे । झुकं । हयनं ।
गयनं । परै । तुटें ॥ १४ ॥
८३ पाठान्तर-आजान । वाह । पसारे । उभारै । उभारै । विभार । बढाली । वढाली ।
अरिकट्टि । सोहैहैं । सुढाली । सुढालि । पंघ किक्कि षंड हुअ । उपम । आवत । छत आजानु ।
मनौं । मनौ ॥