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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 470 में से

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पृष्ठ 358

३४८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २०
पर्वत के मारे जाने पर नाहरराय का स्वयं टूट पड़ना ॥
कवित्त ॥ परत धरनि परबत्त । आइ हुंकिक्य नाहर रन ॥
बलवड्ढे सह मेर । जानि ह्नुमान लंक बन ॥
इक्क गिरत घन थाप । इक्क बथ्थनि पक्कारिय ॥
बब्बर रूप सम भूप । रूप अनभूत संचारिय ॥
मानिक्क बंस आयौ उतह । दूत नाहर गल गज्जैा ॥
परबत्त पर्यौ पडु पिछिकै । सिंधू बञ्जनं बज्जया ॥
छं ॥ ९३ ॥ रु० ॥ ५७ ॥
पृथिराज का भी चढ़ चलना ।
छंद पद्धरी ॥ चढ चल्यौ राज पृथिराज ताम । साधन सुसेन वर वरन वाम ॥
दुल्लहै भयो खोमेस पुत्त । वनिता विवाह मन कंक वृत्त ॥ ९४ ॥ *
बज्जिचि निसान दस दिस गुरान । आषाढ अग्ग ज्यौं मेघ थान ॥
रथ वाजि करी पयदत्त पुल्लेन । सज्यौ नरिंद चतुरंग षेन ॥ ९५ ॥*
मुक्की सुभुम्मि अजमेर राज । यंतौ सुजान् पहन समाज ॥
धज्जी सुहागि सिंधू निसान । भयभीत भेष भय दस दिसान ॥९६॥
बज्जिय सुभैरि भय शंकरीस । गज गजे गाच घय छठ छींस ॥
गिरनार देस अरु सिंधु बह । गज्जै सुगाज सजि थह यह ॥ ९७॥
ढलकंत ढाल बैरष रंग । सोभंत विपन रिति राज संग ॥
मिलि आय पंथ नाहर नरिंद । वीराधि बीर बड्ढे सुदंद ॥ ९८ ॥
छह्वारि भह षेना सवान । सामंत सूर करि लोह्र पांन ॥
कन्दा नरिंद आजान बाह्र । संगरी राव स्वामित्त राह्र ॥ छं० ॥ ९९ ॥
भूठि । निकसैं । बुद्धी । हुच्चै । उगं । डंगं ॥ ८८ ॥ लगें । गुर्ज । गुरंज । शीसं । कहै । पछां-
रंत । तुंबां । मनो॑ । वहैं अश्व निर्घात । वहै । विघात । मनो॑ । निकसं । निकसै । सर्घनं ॥ ८९ ॥
लगें । संगि । छती । फुट्टै । पुठि । मली । कहारं । कठैं । मुक्की । तित । उठंत । । छिकं ।
रकतं । फिरें । फिरै । भट । वकतं ॥ ९० ॥ नच्चै । रसैं । मुष । सुपरजत । असि ॥ ९१ ॥ फंन्द ।
असि । कटि । संनाह । परि । चष । भुझि । परवत्त । रावत्त । नाहर । संवेरं ॥ ९२ ॥
५७ पाठान्तर-परबत । आय । हकिक्य । बट्टे । बढे । जांनि । हनुमांन । रक । घन घाय ।
इक । बथन । पक्कारीय । पक्कारिय । सम रूप । संचारिय । संवारीय । मानिकं । मानिक्क ।
गज्या । परबत्त । पिछि । कै । सिधू । बजन । बजया ॥