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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

सातवां समय ९५ ] पृथ्वीराजरासो । ३५३
बलराय का खेत में मँडना ॥
कवित्त ॥ हथ रच्यौ थिर सुथिर । षेत संज्यौ वलरायं ॥
सार सार अप्पार । धार लग्गा धर चायं ॥
उठिय अग्ग पगधार । धपी द्रुगा धर लोइय ॥
धक्क छक्क उच्चार । सार अप्पं दन्न मोइय ॥
निध्धात घात भरकर करचि । नभ निसान तिन सह भरि ॥
सब सूर सुरंगीय कंठ वल । सुसर कढि असि वर पसरि ॥
छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ७३ ॥
घोर युद्ध वर्णन ॥
इंदू विराज ॥ कढी * तेग तत्तं । मनौ मल्ल घत्तं ॥
लगे लोह लग्गं । पगं पग्ग वग्गं ॥ छं० ॥ ११७ ॥
दुअं वाह वाहं । गजै गज्ज ढाहं ॥
जुटे इत्त उत्तं । मनौ संस चित्तं ॥ छं० ॥ ११८ ॥
धुकेँ धींग धक्कैँ । छकै सार छक्कैँ ॥
भिरैं भूमि रुंडं । वकँ बैन मुंडं ॥ छं० ॥ ११९ ॥
तुरैं तूट वाहँ । दतैं दंत माहैँ ॥
डूकं पाइ कूदैं । टिकैं तेक रुंदे ॥ छं० ॥ १२० ॥
चहैं बाधुआनं । तडित्तं कमानं ॥
रसं बीर रस्से । बदै लोह घस्से ॥ छं० ॥ १२१ ॥
गजैं गैन देवी । अभूतं सुएवी ॥
नचै भूति भूमी । जकैं देषि झूमी ॥ छं० १२२ ॥
षिजै खेत पाखं । विहंडै कपाखं ॥
रचै रुंड माखं । स्रवै सोन लाखं ॥ छं० ॥ १२३ ॥
चवट्टी चिकारै । फिकीयं फिकारै ॥
७३ पाठान्तर-थह । अपार । लगा । दृगा । धक हक । उचार । अयं । निघात भह ।
निसान । शब्द । सुरंगीय । कढि ॥