पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १६
करिघर अनेक कैंवर गहिय । ए अग्गैं कैा धाइया ॥
तिह ठाम चुक चिंत्यो हुतौ । पै नाहर राइ न पाइया ॥
छं० ॥ ७१ ॥ रु० ॥ ४४ ॥
सबेरे नाहरराय के अग जाने पर सांझ को पृथ्वीराज
का पहुँचाना और उसकी खोज करना ॥
गयौ प्रात परिचार । संझ चहुआन सपनौ ॥
बरज्यौ जीवन राइ । षोज क्रम क्रम करिणिजौ ॥
पंथवान पुच्छ्यौ । नदी उत्तरि तिन अषिय ॥
तातें पूर नरिंद । बाज नत्तौ करि नषिय ॥
आनंद सिलह सज्जिय नृपति । पंषी पारिव मोचं जिम ॥
ज्यौं गिद्द अंध पच्छो करै । चित्त दिगंबर कियौ तिम ॥
छं० ॥ ७२ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
चालुक के प्रधान ( दीवान ) के घर नाहरराय
का पता मिलना और सामन्त सहित
पृथ्वीराज का नदी उतरना ॥
कुंडलिया ॥ नदी उतरि सामंत सह । डीस संपते जाई ।
चालुक्कां परधान गृह । पहन नाहर राई ॥
पहन नाहर राइ । सेन सज्जै सथ षंच्यौ ॥
चय हजार असवार । वीर संधान जुसंच्यौ ॥
प्रात कूच उप्परै । आज मुकांम जुदुस्तर ॥
झुकि प्रथिराज नरिंद । सिलह सजी नदि उत्तरि ॥
छं० ॥ ७३ ॥ रु० ॥ ४६ ॥
४४ पाठान्तर—तवै । तवै । यौवनराय । चहुआनं । चहुवानं । अद्रु । अडु । परबत । गुजर । मानं । लोहांनी । अजानं । पालुकी । नाहरराय । भुहू । रहिय । के आगें उधाइया । तिहि । ठांम । यैं । नाहरराव ॥
४५ पाठान्तर—चहुआन । संपना । यौवनराव । लीना । पंथवांल । पुछ्यौ । नदि । उतरि । अषीय । अषीय । नंडिय । सज्जिय । पारेव । परेव । ज्यो । गट्ट । गंद । पक्खो । चित । डिगंवर । कीया ॥
४६ पाठान्तर—नदि । उतरी । उत्तरि । सामंत सब । संपत्त । जाय । चालुकां । परधांन । राय । सेन जैन । सजे ऊपरै । मुकांम । सुदुक्दूर । प्रथीराज । सजी । उतरि ॥