पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३३०
सूर दूर तिन तेज । मध्य अँधियन यौं बाजे ॥
प्रात ओस जिम बूंद । जबह अयछ अनु लाजै ॥
संगन अनेक जंपत करन । नान वरज्यौ पुन फिरि ॥
मंजाव साह सिसु बत्त सुनि । करहि जुद्ध भुम्मिय सु जुरि ॥
छं० ॥ ३१ ॥ रु० ॥ २९ ॥
सरदारों का पत्त्र सुनकर क्रोध करना ॥
कवित्त ॥ सुनिय बत्त सामंत । बँचे कग्गद परिचारौ ॥
सीस लग्गि असमान । पिथ्यौ खंगा बंजारौ ॥
सिंघाने करि हन्यौ । केन जबू कंवर पड्डौ ॥
केन छीन सनि राह । जुद्ध तारा ससि वध्यौ ॥
वर कन्ह वीर सोमेस पहु । चाहुवान वक्कारियै ॥
बाहंत वीर अरि नीर विच । दत्त चौहाना तारियै ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ ३० ॥
कवित्त ॥ मुक्कै दूत सुद्दूत । रत्त गुन अरिन विरत्ता ॥
चिंत ननौ सिर भार । सार काग्ज सो रत्ता ॥
वर अपन जानही । प्रमान न्मान लुग्धै ॥
द्विग राजान प्रमान । देस विद्देस परष्षै ॥
ते दूत सपत मंडौवरह । चर चरिच अनुसरि परे ॥
भय प्रात राज दरबार गय । दिष्पि धार घर घर डरे ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥
२९ पाठान्तर-आवाज । धूम । मधि । अंधिन । राजे । उस । बुंद । अयन । मंजाह
माह । भूमीय ॥ * यह शब्द अर्थात् "आवाजि और अवाज" आदिपर्व्व के रूपक १८१ तथा
१८२ पृष्ठ ७६ में भी आया है । उस पर की टिप्पण देखो । संस्कृत “वाज” और “वाद” शब्द
Sound, Sounding, discourse, speech, and prayer आदि के अर्थों में प्रयोग होते हैं उन से यह
हिन्दी अपभ्रष्ट शब्द बने दीखते हैं ॥
३० पाठान्तर-सुनीय । सांमंत । बंचे । बचे । कगद । असमांन । लगा । कर । पद्धै ।
छीनं । वधौ । कन्ह । चाहुत्रांन । चाहुवांन । वकारीयै । बाहत । विचि । चौहांनां । तारीयै ॥
३१ पाठान्तर-मूके । कारिज । जांन हि । प्रमांन । न्मिमांन । प्रमांन । राजन । विदेस ।
परषै । संपंत । चर चरित्र । दिषि ॥