पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय १८
दूहा ॥ तीन पनच धुनचीं करन, बडे कटन तंडीर ॥
सगुन बिना पग ना धरै, विकट बंन झंडीर ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥५२॥
पर्वतराय कैसे घाटी रोक कर बैठा है ॥
कवित्त ॥ मडोवर धर बाज । राज रषन परिचारन ॥
स्वामित सकं वज्रंग । जंग जिन अंग न हारन ॥
देत सेवासनि भेजि । मारि घर पर पसु खावै ॥
देषत कै राजांन । बिरदवा नैन चलावै ॥
बैठे सु ओट रुंषन उपल । करि तरकस उंधे धरनि ॥
देषंत बघ चहुवांन की । भरै जांनि बिसहर बरनि ॥
छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ५३ ॥
घाटी रुकने का समाचार पृथ्वीराज को मिलना ॥
दूहा ॥ छढी षबर प्रथिराज तिन । मीनां सरह अमान ॥
पकरि लोह पब्बय गह्यो । सबै को अगौ जान ॥
छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
क्रोध करके पृथ्वीराज का पर्वतराय से लड़ने को
कान्ह चौहान को भेजना ॥
कवित्त ॥ सुनि कुप्पिय प्रथिराज । जानि पुच्छिय सुअप्प मन्त्रि ॥
मनु मृगराज मृगीन । जोर क्रुद्धिय दिषिय बत्रि ॥
आछ ग्रछन जनु जीव । देषि तुद्दिय सुमीन कछ ॥
समर समुद्द जल पियन । जांनि घट जन्म क्रोध मछ ॥
षिजि कछी कान्ह चहुवांन सहु । रंक आइ अड्डे फिरे ॥
सिर नाइ धावू नरनाह तब । प्रब्बत सम प्रब्बत भिरे ॥
छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ५५ ॥
५२ पाठान्तर-धुनहीं । षट्ठे । कठन ॥
५३ पाठान्तर-बजरंग । जंग किन अगन हारन । दैत । मैवासन । मेवासन । के । राजांन ।
बिरदवां नेन । रुंष ऊटन । औंधे । चहुवांन ! भरे । जांनि ॥
५४ पाठान्तर-पवरि । प्रथीराज । मीनां । अमांन । गृह्यौ । आगैं । अगै । जांन ॥
५५ पाठान्तर-प्रथीराज । जांनि । पुंछिय । मनोँ । क्रुधिय कि दिषि बल । जांनि ।
चहुआन । आंनि । परबत । भिरै ॥