पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० पृथ्वीराजरासो । [सातवां समय १२
पिता की आज्ञा लेकर अष्टमी को पृथ्वीराज का लड़ाई
के लिये यात्रा करना ॥
कवित्त ॥ दिन अष्टमि रवि वार । राज सुभ मँडि प्रस्थानं ॥
अष्ट दिसा जोगनी । भई साचाय सुध्यानं ॥
अष्ट च्यारि अय भान । राजदै अर्ध बघाइय ॥
इन सें भौम अनिष्ट । चंद चौथे ग्रह आइय ॥
चले नरिंद धायि दूत तब । मन आनंद सु चंद हुअ ॥
प्रथिराज तात अग्या सगुन । चरन बंदि चलि वज्र भुअ ॥
कूं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥ *तात मात अग्या परमानहि । ता समान नह भ्रंम प्रमानहि ॥
गुरु द्रोही पति द्रोही जानं । सो निच्चै नर नर कहि थानं ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३५ ॥
नाहर राय के दूतों का पृथ्वीराज की चढ़ई और सेना
बल का समाचार नाहर राय को देना ॥
छंद पद्धरी ॥ नाहर नरिंदं जे दूत आइ । समाचार सबै कहिते सुनाइ ॥
दिसि जीत सत्त चहुवान सूर । लषियै चरिच मन मन्झ काफ़र छं० ॥ ५५ ॥
इक सहस स्वान सँग नाम धार । देसान देस बल पंग अपार ॥
तिन संझ पंच सै पवन पात । पित मात असल्ल लाधौर जात ॥ छं०॥५६॥
पांभरी अंग जिन पसम होत । दिषि दीप जोति तिन नैन होत ॥
रातब्ब मंस घृत दुग्ध पान । आजान बाह दिषियै बलान ॥ छं० ॥ ५७ ॥
रेसमी डोरि पट्टी नरमं । रहै सीत क्रांच दुषित गरंम ॥
तिन सथ्य पंच सै और डोरि । ते रषिक बिन को सकै छोरि ॥छं०॥५८॥
३४ पाठान्तर-शुभ । मंडि । भांन । मै । भोम । अरिष्ट । चौथैं । गृह । नरिंद्र । धसि । प्रथौराज । आग्या ॥
३५ पाठान्तर-आग्या । परमानाय । परमांनहि । समान । ध्रुम्म । प्रमांन्नाय । जांनं । निश्चै । नरकन । यांनं ॥ * सं० १६४९ की पुस्तक में इसे अरिल्ल करके लिखा है ॥
३६ पाठान्तर-समचार । सब । जित्त । सत । चहुवांन । मनमैं । स्वान । ॥ ५५ ॥ संग । नांमधार । देसान । मल्ल । से । असिल ॥ ५६ ॥ नयन । रातब । पांन । आजानंबाह । बलांन ॥ ५७ ॥ नरमं । शीत । दुखित । सय । होर । ति । रक्षिक । बिना ॥ ५८ ॥