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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 470 में से

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पृष्ठ 355

सातवां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो । ३४५
सुभट सहित सेना में पृथ्वीराज कैसा शोभता है ॥
कवित्त ॥ सुभट सिलह घट जोति । भयौ घट सिलह सुभट्टन ॥
कै * दीप मध्य सूडैन । कै * भान बदल्ली सुभट्टन ॥
कै * मुकुर मध्य प्रति बिंब । कै * संभु विभूत अधारै ॥
कै आरसि सें सार । हथ्य करतार सुधारै ॥
पाचार भार ठिल्लै कमनि । कै * उदधि मडि लंका दहै ॥
चिय वसिन द्रव्य अरु मोच वसि । नजि जुगिंद वानै ग्रहै ॥
छं० ॥ ७४ ॥ रु० ॥ ४७ ॥
पृथ्वीराज के ग्रास पहुंचने का समाचार नाहरराय
का सुनना और सेना इकट्ठी करना ।
दूहा ० ॥ भई खबरि परिछार कौं, चढि आयौ पृथिराज ॥
लग्यौ सेन एकत करन । दंड बजाने बाज ॥ छं० ॥ ७५ ॥ रु० ॥ ४८ ॥
घाटी पर पर्वतराव को रास्ता रोकने के लिये भेजना ॥
दूहा ॥ जहँ पव्वत घाटौ हुतौ, मीना मेर मवास ।
प्रब्बत सौं प्रब्बत मँड्यौ, अनमीजौ धन त्रास ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
दूहा ॥ हुकुम कीन परिछार तिन, प्रब्बत मीना मेर ।
इततें तू रुकि एक टक्क, जितनें आवत वेर ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ५० ॥
पर्वतराव का घाटी रोकना ॥
दूहा ॥ सुनि प्रवत धायौ तुरत, घाटौ रोक्यौ जाइ ।
च्यारि सहस मीना प्रबळ, बैठे आइ वलाइ ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४७ पाठान्तर-ज्योति । * अधिक पाठ हैं । मधि । भांन । बदली । सुघटन । मुकर । सिंमु ।
विभूत । आरसि सार में । हथ । सुधारें । मधि । दहें । वसि । बांनै ॥
४८ पाठान्तर-भई । कां । प्रथीराज ॥
४९ पाठान्तर-जहां । जह । घांटौ । हुतो । तहां मीनां । मीनां । परबत । सां परबत ।
प्रबत । ज्यां । प्रबत । मंडभौ । जो ॥
५० पाठान्तर-परबत । इतने । इतनैं । चु । जितनै ॥
५१ पाठान्तर-पब्बत । घांटों । रोकिय । बैठे । आंनि ॥