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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

३१८ पृथ्वीराजरासो। [छठां समय २०
दूहा ॥ जीभ एक कविचंद कै, कित्ति कही क्यौं जाइ ।
जीव बुद्धि पिथ्थह निमित, रह सो मत्ति सुभाइ ॥
छं० ॥ १२४ ॥ रु० ॥ ४७ ॥
सब लोगों को अपने अपने घर विदा करना ॥
रच्यौ रंग बहुुरे अ्रचन, करिय विदा सनमान ।
निसा सुष मंडै सुषन, जागे उगत भान ॥
छं० ॥ १२५ ॥ रु० ४८ ॥
वीरों के मिलने के समाचार से पृथ्वीराज का प्रसन्न होना ॥
प्रथीराज आनंद मन, सुनि वीरन बर वत्त ।
फूखत तन तरु नीर लभि, इम आतम उलसत्त ॥
छं० ॥ १२६ ॥ रु० ॥ ४९ ॥
श्लोक ॥ शुभं दिवसे शुभं वार्त्ता । अशुभेच्च अशुभानि च ॥
शुभाशुभं यथा युक्तं । भवंति दिवसानि च ॥
छं० ॥ १२७ ॥ रु० ॥ ५० ॥
पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ प्रथियराज चहुआन । बान पारथ बलिबंडह ॥
प्रथीराज चहुआन । दंड दंडैति अदंडह ॥
प्रथीराज चहुवान । सरिस जुध कोउ न मंडै ॥
प्रथीराज चहुवान । सचु चिनु रह गच्चि खंडै ॥
प्रथीराज चहुवान पछु । कली करन अवतारकच्चि ॥
सोमेस सूर पूरडू सुभग । उद्धर पिथ्थ अवतार उच्चि ॥
छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ५१ ॥
४७ पाठांतर:-जाय । बुध्दि । पिंथह । मति ॥
४८ पाठान्तर:-सन्मान । सुष । मंहे । उगत । भांन ॥
४९ पाठान्तर:-बत्त । लहि । इम नृप आतम उलसत ॥
५० पाठान्तर-शुभं । सुभं । वार्त्ता । अशुभे । अशुभानि । सुभाशुभं । यथायुक्तं ॥
५१ पाठान्तर-पृथीराज । चहुआन। चहुवान । बान। चंडह । पृथ्वीराज । अडंडह । जुद्ध ।
जिनु । कलि । पिथ ॥

छठां समय २१] पृथ्थीराजरासो । ३१६
दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥
दूहा ॥ प्रात राज जग्गे प्रथम, गो दुज दरसन कीन ।
देहकत्ति पुनि होइ सुचि, पावन पानि सुडीन ॥
छं० ॥ १२९ ॥ रू० ॥ ५२ ॥
करि पावन पवित्र वर, मोचन सुरभि सुतेल ।
मर्दनीक मर्दन करै, बढै धात तन बेल ॥
छं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ ५३ ॥
नहाकर दस गोदान, दस तोला सोना और बहुत सा
अन्न दान देना ॥
करि सनान गंगोदकछ, दिय सुगाइ दस दान ।
दस तोला तुलि हेम दिय, अंन दान अमान ॥
छं० ॥ १३१ ॥ रू० ॥ ५४ ॥
महल में पृथ्वीराज का बिराजना और सरदारों का आना ॥
इन्द् पद्धरी ॥ करि स्नान दान सुचि रूचि कुंचार। होइ देवरूप साक्षात चार ॥
कीनौ सु मङ्गल बज्जै निसान । आनन्द सकल सामन्त मान ॥ १३२ ॥
आये सुमचल सामंत सूर । पूरंन तेज वीरत्त पूर ॥
अनभङ्ग अङ्ग अनभूल बांन। जिन दिट्ठ अरिय पावै न जान ॥ १३३ ॥
कैमास आइ कीनौ जुहार । विद्या सु चतुर्दस मत्ति सार ॥
गोयन्दराज गहिलौत आइ । बैठो सुकुंचर कमलं नवाइ ॥ १३४ ॥
चहुवान कान्ह आयौ अभङ्ग । भारत्य कथ्य भीषम प्रसङ्ग ॥
अनि अनी सुभर बैठे सुआइ । अन मित्त मत्ति बल अप्रमाइ ॥१३५॥
५२ पाठान्तर—गो । देह कंतिं । पुन: । शुचि । पांन । पांनि ॥
५३ पाठान्तर—पावन । सुरंभ । सुरभ । मर्द्दनीक । मर्द्दन ॥
५४ पाठान्तर—सुस्नान । गंगोदकहि । दांन । अन । दांन । अप्रमांन ।
६

३२० पृथ्वीराजरासो । [छठां समय २२
राजन कुँआर मधि सूर साज। देवतन मद्धि जनु देवराज ॥
गिरिराज मद्धि सब गिरन रज्जं। देखन्त सभा सुभ इन्द्र लज्ज ॥
कं० ॥ १३६ ॥ रू० ॥ ५५ ॥
बीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट
फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥
दूहा ॥ बैठि सभा पृथिराज रचि, आय सुरति निज चित्त ॥
वत्त बीर बरदान की, अति उमंग उलसित्त ॥
कं० ॥ १३७ ॥ रू० ५६ ॥
रचै न आनँद कुँअर हिय, उगमत कण्ठ प्रमान ।
कहै न कासों बत्त बर, मानों दुद्ध उफान ॥ कं० ॥ १३८ ॥ रु० ॥ ५७ ॥
कैमास का हाथ जोड़कर पूछना कि आपके मुख पर कुछ उत्साह
दिखाई देता है पर आप खुलकर कहते क्यों नहीं ?
अरिल्ल ॥ पानि जोरि कयमास । बदै तब राज प्रति ॥
उर अवलोकित उलसत । सामन्त राज अति ॥
को कारन मुख चारु । न कथ्यिहि बत्त संति ॥
सुभर सूर सामन्त जु । विनवत्त राज प्रति ॥ कं० ॥ १४० ॥ रु० ॥ ५८ ॥
पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का
समाचार कहना ॥
५५ पाठान्तर-क्षांन । दान् । कुआंर । कुआर । होय । वजे । निसांन । मांन ॥ १३२ ॥
पूरन । तैज । वीरत । अभूल । बांन । दिट्ठि । जांन ॥ १३३ ॥ आय । चतुर्हूस । मंति । गोइंद ।
आय । आई । कुमर । कमल । नवाय ॥ १३४ ॥ चहुआन । भारथ । कथ । अंनि अंनी । आय ।
आई । मित । अप्रमाय ॥ १३५ ॥ कुंगार । कुआर । देवतनु । मधि । मधि । रज । शुभ ।
लज ॥ १३६ ॥
५६ पाठान्तर-पृथीराज । वरदांन । अल्हसित्त ॥
५७ पाठान्तर-आनंद । कुंगर । कुंमर । प्रमांन । मनों । दूध । । उफांन ॥
५८ पाठान्तर-चंद्नायना । पांनि । उल्हसत । सांमंत ॥ १३६ ॥ चारु । कथि । बत ।
विनवत ॥ १४० ॥

छठां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ३२१
दूहा ॥ तब कहैं कुँअर सामन्त सब, काल्हि आखेटक रंग ।
भयौ सुर सुभैं एक भय, आलस ही सें गंग ॥
छं० ॥ १४१ ॥ रु० ॥ ५८ ॥
कवित्त ॥ अपरंजे आखेट । चन्द भुल्यौ सुवह वन ॥
जंगम इक तापस । मिल्यौ वरदाइ सुद्ध मन ॥
प्रसन भयौ कविचन्द । वीर मन्त्रह दीनौ वर ॥
अजमायौ कविचन्द । वीर बावन दरस चिर ॥
तिन देखि अमित चरितह सुनत । बरनै कवि बरदाइ अति ॥
अनेक रूप अनेक गुन । अनँत गति अनतह सुमति ॥
छं० ॥ १४२ ॥ रु० ६० ॥
सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब
आरत हैं इन की बात सत्य नहीं माननी चाहिए ॥
अरिल्ल ॥ प्रसन सूर सामन्त सकल वर । हासे अप्प परस्पर सुब्भर ॥
भट नट चारन जू आरत्तह । इनकी गति न मनियै सत्तह ॥
छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ६० ॥
कैमास ने कहा कि चन्द को देवी ने वरदान दिया है वह
सचमुच कोई अवतार है ॥
गाथा ॥ कथिय वर कैमासं । देवी वरदाय चन्द भटायं ॥
अस तिन चवै असेसं । सत्यं रूप सत्य अवतारं ॥
छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ६१ ॥
कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर
उसने यह बात प्रसन्न करने के लिये गढ़ी है ।
५८ पाठान्तर-कुमर । कुंअर । काल्हि ॥
६० पाठान्तर-अपरजेन भयौ । कविचंद । भूल्यो । बट । तापस । मिल्यौ । चंद ।
बरने । बरदाय । अनेक । अनत ॥
६० पाठान्तर-प्रसंन । सुभर । भट्ट । नट्ट । चारंन । जु । आरतह । मनिये ॥
६१ पाठान्तर-कथिय । भटायं ॥

३२२ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २४
अरिल्ल ॥ कहै कन्ह हम मानी सब्बह । भुल्यौ भह मग्गा वन तब्बद्द ॥
उसन केलि डर जोरिय बत्तं । इह अचिञ्ज मन्नै न बिसत्तं ॥
छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ६२ ॥
पृथ्वीराज के मन में सन्देह हो जाना ॥
दूहा ॥ किचि मंनी अमनी सुकिचि, चिविधि जानि संसार ॥
सुनत राज विभ्रम भयौ, पच्यौ सुचित्त बिचार ॥
छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६३ ॥
इतने में चन्द का आकर आसीस देना ॥
इहि विचार करवह मनंह, आयौ चंद सुतन्त्र ।
दिय असीस कर उंच करि, वेद नीत वर कब्ब ॥
छं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ६४ ॥
पृथ्वीराज का चन्द को पास बुलाकर वीरों की बात छेड़ना ।
राजद्द सूर हकार जिय, दिय सादर सनमान ।
वीर बिरद बरदाय प्रति, लग्गे बत्त पुछान ॥
छं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ६५ ॥
पृथ्वीराज का चन्द की बड़ाई करके कहना कि हम लोगों की
बड़ी अभिलाषा है सो आज वीरों का दर्शन करवाओ ॥
कवित्त ॥ कहै चंद कविराज । बत्त पूरब जो बित्तिय ॥
कथिय कुँअर प्रथिराज । चंद चरची सो सत्तिय ॥
हमहि बहुत अभिलाष । देव वीरनि दरस कज ॥
पावहिं तो परसाद । सूर सामंत मंत अज ॥
६२ पाठान्तर-कहँ । मांनी । भुल्यौ । मग । तबह । जोरीय । सुभ हित डबर गाम सपत्तं । अचिर्जं ॥
६३ पाठान्तर-किहिं । स । किहिं । चिधा । जांनि । चित ॥
६४ पाठांतर-इह । घिवारि । तंब । दीय ।
६५ पाठान्तर-राज । हक्कार । सनमांन । वरद । वरदार । लगे । पूछानं ॥

छठां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो : ३२३
तो सम न और तिहु लोक में । नह सह नाटिकक नर ॥
संसार पार वोद्दिय समर । तोहि सात देवी सुबर ॥
छंदं ॥ १४८ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥
दूहा ॥ सुनि आनंद्यौ चंद चित । कीन संत्त आरंभ ॥
जप्प जाप छवि होम सब । लग्ग्यौ कज्ज असंम ॥
छंदं ॥ १४९ ॥ रू० ॥ ६७ ॥
वीरों का प्रगट होना ॥
गाथा ॥ किय जप जाप सुछोमं । आए वीर धीर आतुरयं ॥
गज्जै गयन गभीरं । भय भै भीत सोर आघातं ॥
छंदं ॥ १५० ॥ रू० ॥ ६८ ॥
छंद भुजंगी ॥ धसंकी धरा धंम धंम्मै धरक्की । कठं पिठ कंमठ्ठ कठ्ठे करक्की ॥
डिग्गै अड्डिगं सो दिगंपाल दस्सं । तरक्कै चकै मुनि जंनं तपस्सं ॥१५१॥
अरक्कै सुवाजं सु वाजं विछुट्ठै । तरक्कैक एकं उलट्टै सुलट्टै ॥
इसो आगमं भै सुबावन्न वीरं । कंपे काइरं धीर रयौ सुधीरं ॥
छंदं ॥ १५२ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम इन को बुलाना ठीक नहीं हुआ ।
दूहा ॥ सुनिअ घात डर वीर कौ, चमकै चित सामन्त
इन आकर्षै कज्ज बिन, किनौं अप्प अमन्त ॥ छंदं ॥ १५३ ॥ रू० ॥ ७० ॥
६६ पाठान्तर-कहै । कुंवर । प्रथीराज । चरचा । चरचि । सतिय । दमहिं । घोरनि ।
धोरानं । कजि । पाबहि । सामंत । तिहुं । मैं । नट । भट । नाटिक्र ॥
६७ पाठान्तर-आनंद्यो । मंत्र । जप । सम । लगे । कज ॥
६८ पाठान्तर-गाहा । स । गजे ॥
६६ पाठान्तर-धम्मकी । धम । धम्मै । धम्मे । धम्मैं । धरकी । कमठ । कठे । फरकी ।
डिगै । डिगे । अडिगं । द्विगंपालं । दसं । तरके । तरकैं । चक्रे । मुनि । मुनि । जनं । तपसं ॥
१५१ ॥ भरके । बिखुटे । तरंकैक । उलटे । सुलटे । इसो । धीरं । कंपे । कंपैं । कायरं स ॥ १५२ ॥
७० पाठान्तर-सु आघात । चमके । कज । किनौं ॥

३२४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २६
दो मत्त हाथी दर्बार के बाहर बाँधे थे वह बीरों का
भयानक शब्द सुनकर चौंके ॥
दूहा ॥ गज घुमन्त गजराज बर, दो हथ्थी दरबार ॥
दूरि दूरि बन्धे रचैं । काल समान करार ॥ छं० ॥ १५४ ॥ रु० ॥ ७१ ॥
कवित्त ॥ अति बलवन्त अनन्त । गरुअ मानहु गिरवर से ॥
गगन जेम गाजन्त । बंध बंधन ते सरसे ॥
च्यार पटे कुहे * कंकालं । मह नद्दच सुअह्यो निसि ॥ ,
पवन पाइ पुरवाइ । काल रूपी कंकाल रिस ॥
सिर दिघ्घ दिघ्घ दन्तह सुभग । जरजराइ बंमरि जरिय ॥
लष लष दाम पावहि पटै । कनक साजचाज सु करिय ॥
छं० ॥ १५५ ॥ रु० ॥ ७२ ॥
दोनो हाथियों का तुड़ाकर लड़जाना और दर्बार में
खलबली मचना ॥
दूहा ॥ बीर खोर आघात सुनि, गज छुटि बन्धन तोरि ॥
भिरे उभय भय भीत होइ, परि दरबारह रौरि ॥
छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ७३ ॥
छंद मोतीदाम ॥ भिरे गजराज भयानक रूप । उमै मदमत्त मचा जम झूप ॥
भए काङ्काल कराल अछूट । लगै जनु क्रोध सु कज्जल कूट ॥ १५७ ॥
जुरे जुग जानि गुरु गजराज । किधौं कउ दानव रूप दुराज ॥
जगे प्रलकाल भयानक भूत । इसे दुहू दन्ति भिरे अद्भुत ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७४ ॥
७१ पाठान्तर-गुमांन । हथ्थी । रहे । समांन ॥
७२ पाठान्तर-गरुय । मांनहु । तैं । च्यारि । पट । * अधिक पाठ । मद । ह्व । हद्व ।
अह्रनिसि । पाय । पुरवाय । कंक्राल । दिघ दिघ । गरदराइ । वंगरी । लष २ । दांम । पावहिं ।
पटे । साजसु ॥
७३ पाठान्तर-छुट्टि । भिरै । भै । दरबारहिं । रोरि ॥
७४ पाठान्तर-भिरैं । भयानक । मदमत । कोऊ । चाहठ । लगे । कजल । कूट ॥ १५७ ॥
जांनि । गिरराज । कोऊ । दानव । लगे । जगै । प्रलै । भिरैं ॥ १५८ ॥

छठां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो ३२५
सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों
का वश में न आना ॥
दूहा ॥ दौरि सकल सामन्त मिलि, करे अनन्त उपाहू ॥
रोस लगे छुटै नहीं, भई सुहायो चाहू ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
चिहूं ओर हरषी छुटै, परै अगड सुमार ॥
गोना लगे गिलोल्ल गुरु, छुटै न तो इसरार ॥
छं० ॥ १६० ॥ रु० ॥ ७६ ॥
गाथा ॥ वर वावंन सु वीरं । कौतिग लषन्त सूर सामन्तं ॥
करे अनन्त कळापं । नह छुटन्त गज गरुं च्यारू ॥
छं० ॥ १६१ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
चन्द का बावन बीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन
हाथियों को छुड़ाकर बाँध दीजिए ॥
दूहा ॥ तब कर जोरिय चन्द कवि, अग्गे वांवन वीर ॥
तुम सु छुडावहु मन्त कछु, बहुरि जरहु जञ्जीर ॥
छं० ॥ १६२ ॥ रु० ॥ ७८ ॥
भैरव की आज्ञा से बीरों का हाथियों को ज़ंजीर से बाँध देना ॥
अरिल्ल ॥ तब भैरव भूवाल वीर वर । कीन हुकम कालीय ऊंच कर ॥
छोरावहु गजराज पांनि गछि । बहुरि जरौ जञ्जोर थान कहि ॥
छं० ॥ १६३ ॥ रु० ॥ ७९ ॥
दूहा ॥ तब काली दोखौ तलपि । गज्ज कुराइ समत्थ ॥
उभै पांनि सौं रद उभै । गहै उभै वरहत्थ ॥
छं० ॥ १६४ ॥ रु० ॥ ८० ॥
७५ पाठान्तर-दोरि । सामंत । करै । उपाय । लगैं । छुटै । नही । स ॥
७६ पाठान्तर-चिहुं । उर । परे सुगड पर मार । लगें । गुरु । छुटै । तो । अस ॥
७७ पाठान्तर-बांधन । । सामंतं । करै । गुरुयादं । गरुआई ॥
७८ पाठान्तर-बावन । बांबंन । स ॥
७९ पाठान्तर-भुवाल । किंन । उंच । छोरावौ । पांनि । जरौ । यांनि । कहिं ।
८० पाठान्तर-गज । छोराय । समय । पांनि । सो । सं । हथ ॥

३२६ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २८
यह कौतुक देखकर सरदारों का आश्चर्य में होना और
सब का दर्बार में आकर बैठना ॥
गाथा ॥. बंधन दीन सु पाइं । कौतिगं दिष्ययं सब्ब सूरं ॥
मंनिय मन आचिज्जं । बैठे फेरि आइ दिवानं ॥
छं० ॥ १६५ ॥ रु० ॥ ८१ ॥
पृथ्वीराज का सब बीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम
लेकर सब बीरों को पहिचनवाना ॥
परसे बीर सु सब्बं । करी प्रथिराज पांइं परिनामं ॥
प्रथक चन्द कथि नामं । पच्चिचांने बीर बीरायं ॥
छं० ॥ १६६ ॥ रु० ॥ ८२ ॥
चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को
बुलाया है इस से इन की बलि दो पृथ्वीराज का
बावन घड़ा मदिरा बावन बकरे मँगाकर बलि
देना और भैरव आदि की पूजा करना ।
छंद पद्धरी ॥ पहिचांनि राज प्रथिराज बीर । भयौ उदित मन आनंद धीर ॥
कविचंद कथिय प्रथिराज राज । इन देहु सुबल व्याकुल समाज ॥ १६७ ॥
विन कज्ज अप्प आराध कीन । नवि विछत कुसज्ज खब्भो सुईन ॥
बावन घट वारुनि मँगाइ । बावन बीर प्रति घट पाइ ॥ १६८ ॥
बावन अजासुत भष आंनि । दीने सु आदि भैरव निदांन ॥
सिंदूर तेल पुहपनि अरचि । सन्तोष पोषि सब तन चरचि ॥
छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ ८३ ॥
८१ पाठान्तर-दीय । सु पायं । पाई । सब्ब देषीयं । दिषय सब । मनियं । आचिजं ।
फिरि । आय । दीवांनं ४
८२ पाठान्तर-कर । करि । पाय । पृथुक । करि ॥ -
८३ पाठान्तर-पहिचानि । प्रथीराज । भयो । श्रीर । कहीय । प्रथीराज । स । बाकुल ॥
१६७ ॥, कज । कुशल । लभौं । बावन । घट । मंगाई । घट । पान ॥ १६८ ॥ भष । आंनि ।
निदान । ओरचि । चरचि ॥ १६९ ॥

छठां समय = ६] पृथ्‍वीराजरासौ । ३२७
वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर माँगों सो
हम दें और अब हमको विदा करो ॥
दूहा ॥ भये त्रिपत वीराधिवर, पूरन डक्क डकार ॥
अनि आनन्दत उल्हसंत, बोले वयन वकार ॥
छं० ॥ १७० ॥ रु० ॥ ८४ ॥
मङ्गि मङ्गि महिपत्ति तुअ । सोइ समर्प्पै आज ॥
दै सुविहा न विलम्ब करि । जु बाकु चित्त तुअ काज ॥
छं० ॥ १७१ ॥ रु० ॥ ८५ ॥
पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय
हमारी सहायता कीजिएगा ॥
गाथा ! जंपे वर बरदाई । तुम वरं वीरं देव देवाधिं ॥
औ प्रथिराज सहाई । जुद्धं जय राज जुहाईं ॥
छं० ॥ १७२ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा
समय आवै तब हम को याद करना ॥
गाथा ॥ तब वर भैरव वीरं । उच्चारीगं संसुप्पं चन्दं ॥
जं तुंम वंकट ठारं । तं सँभारं विचित्त अम्हाएं ॥
छं० ॥ १७३ ॥ रु० ॥ ८७ ॥
गाथा ॥ परतिषि अम्ह सुपुह्वं । करयं जुद्धं तव्व साहस्सं ॥
जथ्यं चडिउन चन्दं । तथ्यं करै न हम आगमं ॥
छं० ॥ १७४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥
८४ पाठान्तर-नृपति । डंक । डक । आनन्द तन । बैन ॥
८५ पाठान्तर-महिपति । समर्प्यै । दैह । तूं कछु चिंतत काज ॥
८६ पाठान्तर-जंपै । वर । बीर । देवधि । वीर देवाधि । जुटाई ॥
८७ पाठान्तर-उच्चारिग चंद संमुषं । तुंम । वंकठ । ठौरैं । संभारै । संभारे । विचित्र ।
अम्हाई ॥
८८ पाठान्तर-अंम्ह । जुहु । तब । साहसं । जयं । तथं । हंम्म । आगमं ॥
९०

३२८ पृथ्वीराजरासो । [छठां समय ३०
बचन देकर बीरों का बिदा होना, सरदारों का चन्द की
बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज का चन्द
पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥
दूहा ॥ दइय वाच सब बीर नै, बहुराए कवि चन्द ॥
सब सामंत अनन्द भौ । दरसत नट्ठे दन्द ॥
छं० ॥ १७५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥
सत्य करै मान्यौ सकल । हरषित भय प्रथिराज ॥
प्रेम बढ्यौ अति चन्द सौं । साचस रीत समाज ॥
छं० ॥ १७६ ॥ रु० ॥ ६० ॥
पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र
बतला दो, चन्द का सब को मन्त्र बतलाना ॥
गाथा ॥ तब कूंअर कहि चन्दं । देहुं मन्त्रं सव्वं सामन्तं ॥
तब कहि मन्त्रं चन्दं । कीन अप्प अप्पं सहायं ॥
छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ ६१ ॥*
चन्द को बीस गाँव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥
दूहा ॥ बीस गांव कविचन्द प्रति, करी कुँअर बगसीस ॥
एक बाजि साजति सजहि । दियौ सु सम्भरि ईस ॥
छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ६२ ॥
इति श्रीकविचन्द विरचिते प्रथिराजरासके आखेटक
बीरबरदान वर्णनं नाम षष्ठ प्रस्ताव
सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
८६ पाठान्तर-बीरनैं । सामंत । नठै ॥
६० पाठान्तर-सति । करे । मंन्यौ । हरषत । प्रथौराजं । समाजं ॥
६१ पाठान्तर-देहु । मंत्र । सब । अप्प । अप ॥ * यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में
नहीं है ॥
६२ पाठान्तर-गांम । कुअर । कुंअर । सजि । दीयौ ॥

अथ नाहर राय कथा वर्णनं लिख्यते ॥
—❖—
( सातवां समय )
सोमेस्वर देव का शिवरात्रि का व्रत जागरण करके सोने की
तुला दान करना और उसे बांट देना ॥
दूहा ॥ ग्यारह सौ गुन तीस वदि, फागुन चवदसि सोम ॥
सिवरत्ती सोमेस नृप, निसा मण्डि जप होम ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
पञ्च गव्व अस्नान करि, सीस सहस घट मण्डि ॥
दीपदान घृत सहस शिव, कुसुमंजलि सिर व्हंडि ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
शिव उपास सोमेस वर, पञ्च उपासि सुराज ॥
सदा मोह भक्ती सुगुर, करिय कित्ति कविराज् ॥
छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
श्लोक ॥ शिवशिवा उपास्य राजन्, वीर्य देवन कामयम् ॥
कविचन्द महावाणी, प्रगट रूपेण विस्मितम् ॥
छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥
दूहा ॥ चतुर जाम जग्गिय नृपति, कनक तुला तहँ कीन ॥
प्रात समै वर दुजन कहुँ, बंटि अप्प कर दीन ॥
छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥
१ पाठान्तर—दोहा । सैं । सैं । सुनि । चवदिसि । सिवरती । नृप ॥ इस रूपक में
संवत् ११२६ अनन्द साक वा पृथ्वीराज का तृतीय साक है । इस का वर्णन कवि ने आदि पर्व्व के
रूपक ३५५ । ३५६, पृष्ठ १३८ में किया है । तदनुसार इसमें अन्तर के ९० । ९१ वर्ष जोड़ने से
११२६ + ६० । ९१=१२१६ । १२२० वर्त्तमान विक्रमी होगा ॥
२ पाठान्तर—पचगव्य । अस्नानं । सहस्र । दान । सहस्र । कुसुमांजलि । शिर ॥
३ पाठान्तर—शिव । स राज । स गुर ॥
४ पाठान्तर—शिवसिवा । राजं । राज्यं । धीर्यं । कामयं । वांनी । रूपेन । विस्मितं. ॥
५ पाठान्तर—जाम । तहां । समे । कहौं ॥

३३० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय २
अन्न अमार अपार उठि, जिन्हि लीनौ दिय ताहि ॥
करस भोग भोजन भले, रची न मनसा काहि ॥
छं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥
उभय ईस अग सोम पुनि, अस्तुति मंडिड समुष्ष ॥
तब चिनेन तन ताप हर, संचन सेवक सुष्ष ॥
छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥
शिव जी की स्तुति करना ॥
कवित्त ॥ विदित सरन अति चपल । विमल मति कञ्ज निचक्खिनि ॥
गीत राग रस रटित । सती लंपट विस भच्छिन ॥
भुगति दैन जन विभव । भूर भूक्षित तन सोभित ॥
त्रिपुर दहन कविचन्द । केन कारन कृत लोक्कित ॥
श्रीविश्वनाथ संमित गवन । गरल त्रिलोचन रस कुसल ॥
मुष अमल कमल परिमल बहुत । भुगति चारु चर्मेन असन ॥
छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥
छन्द पद्धरी ॥ जत गरल कंठ दीसद्दति वोय । जिम चित प्रगट संसार नीय ॥
सारङ्ग उल्ह तृन पान पानि । दिव तुङ्ग जाल जब जवनि मानि ॥ ९ ॥*
जट मुकुट गंग दीसद्दि उतङ्ग । सोभन्त चन्द लिल्लाट रङ्ग ॥
सारङ्ग सूल सादूल चर्म । सेवक सहाय अघ हरत कर्म ॥ १० ॥
कटि विकट निकट नटवत चिभङ्ग । गनभूत लेय विभूत अङ्ग ॥
बुन्द जा काम जा आप झूल । जैजै सुईस माया अभूल ॥
छं० ॥ ११ ॥ रु० ॥ ९ ॥
साटक ॥ कल्याणी कपञ्चाल बाहु गह्यौ, गिरज्जाइ सारङ्गनौ ॥
बीभच्छौ रस तव्य नित्य रतयौ, मुब्वौ सदा तुङ्गयौ ॥
६ पाठान्तर-अमरअच । उठि । जिहिं । नहीं ॥
७ पाठान्तर-मंडिय मुष । म stir समुष्ष ॥
८ पाठान्तर-विन्नछन । विन्नच्छिनि । वियमक्षिन । विभौ । कृत । गवन । कुषल । चांद । चर्म्मन । भसल ॥
९ पाठान्तर-जुत । दीसहिति । जम । पांनि पांनि । * "दिव तुंग जाल दिव दिव न मांन" संवत १६४७ की पुस्तक में पाठ है ॥ ९ ॥ लिलाट । सादूल । चर्म । कर्म । विभूत । अभूल ॥

सातवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ३३१
रुद्दो रुद्ररि पाय नग्नि उरतो, हास्यं हसं सुक्खरं ॥
जामतं गिरिज्ञानिनं विरचयौ, कर्नोय कालं चयं ॥
छं० ॥ १२ ॥ रु० ॥ १० ॥
साटक ॥ वासं गौरि श्रृंगार हास्य नगनं, कर्नोय कामं चयं ॥
रौद्रं रौद्ररि पाय मार दमनं, वीरं चिनेचं ज्वलं ॥
भै भीतं द्विषि अङ्ग भङ्ग अद्दितं, वीभच्छ नहव्वतं ॥
सान्तं संमित जोग दीन अदभू, नौ रस्त रस्सं शिवं ॥
छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ ११ ॥
शिवजी की स्तुति करके सोमेश्वर देव का अपने कुमार
के विवाह के लिये नाहर राय के पास दूत भेजना ॥
दूहा ॥ सा देवह करि अस्तुतो, वर सोमेस कुमार ॥
नाहरराइ नरिंदं कौं, दूत संपते वार ॥
छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १२ ॥
सामदामादि में निपुण दूत का पत्र दरखाना ॥
गाथा ॥ सामं दामं भेवं । वेदं गुनं विग्यं अंगाई ॥
जानं पनं सलीहं । ते पत्तं दूत दरसायं ॥
छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १३ ॥*
कवि का सनीचरी दृष्टि के योग घर से भविष्य में बैर दोष
होने का कथन करना ॥
साटक ॥ दिट्ठी दिष्ट सनीचरो वसथिनो, इंनोपि दुज्जं घरं ।
पावारं परिचार बैर गुरयं, जहोस्र चैक्षानयं ॥
१० पाठान्तर-कप्पाल । यहयो । गिरिजाई । गिरजाई । नो । बीभछो । तप । रतयो ।
मुखीं । तुंगयो । उरयो । गिरिजां । कहनाय । काम ॥
११ पाठान्तर-श्रृंगार । कहनाय । काम । त्रियं । त्रिनेत्र । भय । बीभछ । नटवर्त्तनं ।
नटवत्तनं । अदभूत । अदभुत । नौ रस । नौ रस्स । रसितं ॥
१२ पाठान्तर-अस्तुति । नाहरराय । के । कें । संपत्ते ॥
१३ पाठान्तर-दानय । गुन । विग्य ॥ * यह रूपक सं० १६४७ और १८४८ की लिखी
पुस्तकों में नहीं है ॥

३३२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ४
भोगिनांरि समस्त संजुत कन्ना, भारय्यनो द्रिष्टयं ।
सावाजा बर वैर ग्रेच त्रिगुना, के के नगे राजयं ॥
कं० ॥ १६ ॥ छ० ॥ १४ ॥
कवि का कहना कि स्त्री के कारण से बैर दोष आगे रामादि
बड़े बड़ों को हो चुका है ॥
कवित्त ॥ गयौ चन्द तारिका । पुच लज्जा बिन आन्यौ ॥
घेच वीर्य सम्भवै । वीर्य लब्भवै न पान्यौ ॥
बैर दोष श्रीराम । बैर दोषहू दुर्याधं ॥
बैर दोष नघुराई । बैर दोषह मुचकन्यं ॥
सा बैर दोष पण्डव बलिय । मात बचन ग्रह दोष सचि ॥
कूक दिनह समय सुन्दरि सचिय । संझ समय इह चरित जद्धि ॥
कं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १५ ॥
कामधेनु का चरित्र ॥
कवित्त ॥ कामधेन पच्छै प्रचण्ड । त्रिषभयं चह अधिकारिय ॥
एक एक उत्तरै । एक चढ्दै रस भारिय ॥
हसी सची दिषि निजर । दीन सराप सुधेनह ॥
हैां पसु तुअ सुमनुच्छ । होइ पञ्चाल ग्रेह मह ॥
लम्भी सुपच्छ जननी बचन । बंटि लई क्रम क्रम सुसुर ॥
तिह ग्रेह और जो सम्भवै । तौ बनहिं डेबर सबर ॥
कं० ॥ १८ ॥ ६० ॥ १६ ॥
प्रात समय जगते ही दूत का पत्र पढ़ना ॥
१४ पाठान्तर-हननोपि । दुजन । दुज्जन । घनं । परिहारं । पाथार । घेर । जदोह । चहुवांन । गिरनारि । भारथ ॥
१५ पाठान्तर-वीरज । लभवै । श्रीराम । दुर्जाधं । नघुराय । मचकत्यं । दिन । सुन्दर । रूह ॥
१६ पाठान्तर-कांधेनु । पक्कै । पक्खें । प्रछण्ड । वृषभ । चधिकारीय । उतरै' । चढै भारीय । साराय । हां । तूं । मनुष्य । भनुक्त । लभी । सुपक्क । बटि । जौर । हीबढै ॥

सातवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ३३३
दूहा ॥ भयौ प्रात जगात द्वितिय, वंचि सुकग्गह पानि ।
आबू रा सळषान लिखि, बर गिर नारी बानि ॥
छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १७ ॥
उक्त पत्र में बीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से
पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहरराय के बल
प्रताप का वर्णन ॥
कवित्त ॥ पूना कर पर वत्तह । कोरि दृह नीज सवायौ ॥
बीर रूप इक रुद्र । थांन हिंगुलाज बनायौ ॥
देवल एक अचम्भ । हेम जुत्तत्ति इक मंडी ॥
धूप दीप साषा* सूरङ्ग । धजा पत्ताकह ठण्डी ॥
दिषन सुथांन आचम्म वर । ज्यौ कवि मंची होइ कज ॥
कवि कहै चन्द वरदाइ बर । जौ चहुआन सुहोइ बज ॥
छं० ॥ २० ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ बर गिरनारि नरेस । सिंधु वही सुर तानं ॥
तेज तुज्झ तप तेज । बैर भंजै अरि पानं ॥
वर गुज्जर बैसाचि । जगत अड्डौ सुस्त्र बज ॥
तिन मुक्कत्ति दिय दूत । राज सम्भरिय षित्ति षल ॥
परिहार नाथ नाहर नृपति । दुह बळ्यो इक इक अग ॥
जानें कि जरा जुब्बन दुवन । सामन्तां संतोष भग ॥
छं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ दूत सामन्तन नाथ । बाथ बडवानल घल्लै ॥
सण्डल घल्लै नाथ । सार अग्गी षल जल्लै ॥
अकह कहांनी करन । सरन रषन असरन बज ॥
सुथिर अस्थिर करि थपन । अंग जग जन दारुन दज ॥
१७ पाठान्तर—पांनि । पांन । बांनि ॥
१८ पाठान्तर—परवत्तह । प्रबतह । घांन । घांनि । हिंगुंलाज । फुत्तरि । पुतलि । * अधिक
पाठ है । सुरङ्गु । पताकह । दिपिन । सु यांन । ज्यो । कहैं । जो । चहुवांन । चहुआंन ॥
१८ पाठान्तर—बटी । पांनं । गुजर । अडौ । मुकलि । पित्त । पल । जाने । जुबन । सांमन्तां ॥

३३४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ६
भुन्न लोक सोक चर सुक्षित तन । पन अप्पन सोमेस सुच्च ॥
छत्त धने कलिमल मलन । तिहिन ओर पिक्खिय सुदुच्च ॥
छंदं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २० ॥
कवित्त ॥ चल्लत पंखि पिखि बाज । पिक्षि मृगराज मृगनि गन ॥
गोधन धरत गुवाल । हुंकि वै चल्लत वननि बन ॥
महु तजि चल्लत सुछाल । अन्य तरु साष लगन कहुँ ॥
बहल बिसद बिसाल । चलत र्वसि पवन गगन महुँ ॥
तिम नाहर राइ नरिन्द पिखि । समर सचिन सक्कहि सकज ॥
गिरि लङ्क सङ्घ सम गढ़ गरुअ । गिरद पारि किज्जै अजक ॥
छंदं० ॥ २३ ॥ रू० ॥ २१ ॥
पट्टन में चौलुक्य भीमदेव, आक पर जैत (सलख ?) पंवार,
मेवाड में समरसिंह, दिल्ली में अनङ्गपाल जैसे
बलवानों में मण्डोवर में नाहरराय के
राज्य करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ उत पह्न भीमंग । ब्रह्म चालुक्क जोध जुच्च ॥
अब्बू जैत पवार । लोए लरि जांनि अचल धुच्च ॥
समर सिंघ मेवार । दण्ड देवार अजर जर ॥
दीली पत्ति अनंग । चरन अड्डौ सुलोच लरि ॥
परिहार नाह नाहर नृपति । इतन बीच अप बल रहै ॥
मण्डोवराइ मारू मरद । बर विरह बंकै बहै ॥
छंदं० ॥ २४ ॥ रू० ॥ २२ ॥
पृथ्वीराज का आठ वर्ष की अवस्था में दिल्ली ननिहाल में
आना, दिल्लीश अनंगपाल के आधीन राजओं का वर्णन ॥
२० पाठान्तर-छलन । जलन । कहांनी । रषन । अगं । जगंन । जगं । कलिमल कलि मलन । पिषिय । सुच्चय ॥
२१ पाठान्तर-पंख । वाज । पिषि । मृगनी । बनन बन । महुवाल । शाष । कहों । कहु । महु । नाहरराय । सकहि ॥
२२ पाठान्तर-चालुक । अबू । जांनि । दिल्लीषति । अड्ढो । बींच । बिरद । बहें ॥

सातवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ३३५
कवित्त ॥ वरष अठ्ठ प्रथिराज । गयौ मुसान दिल्लीं ग्रह ॥
राज करै अनँगेस । सेव मरुधरा करै सह ॥
मंडोवर नागौर । सिंधु जलवट सुपट्टै ॥
पेसौरां लाहोर । धरा कंगुर लगि कंठै ॥
कासी प्रयाग गढ देवगिर । इते सेव अग्या धरै ॥
सीमाडवियां संकै सुपछु । श्रित अनंग सेवा करै ॥
छं० ॥ २५ ॥ रू० ॥ २३ ॥
मंडोवर के नाहर राय का दिल्लीश्वर की भेंट को दिल्ली
आना, पृथ्वीराज का रूप देखकर प्रसन्न होना और
माला पहिरा कर कहना कि जब पृथ्वीराज
सोलह वर्ष का होगा तब मैं अपनी
कन्या इसको विवाह दूंगा ॥
कवित्त ॥ आयौ नाहर राइ । सेव आदरिय दिलेसर ।
दिष्पि कुँवर प्रथिराज । नूर अदभूत नरेसर ॥
अंबर माला इक्क । अंक पहिराइ कह्यौ इह ॥
मैं दिह्मी रूपसंगि । सबै उछाह कियौ ग्रह ॥
आनंद तेज राजा अनँग । प्रथीराज आयौ घरह ॥
दुइ अठ्ठ वरस जब बीति गय । व्याहूँ कह्यो देव गिरह ॥
छं० ॥ २६ ॥ रू० ॥ २४ ॥
नाहर राय का मत पलट जाना अर्थात् कन्या
देना अस्वीकार करना ॥
२३ पाठान्तर—प्रथीराज । मूर । संध । बट । पुट्ठै । पैसोरा । कंठै । इतै । पह । क्षत ॥
२४ पाठान्तर—नाहरराय । आदरी । दिल्लेस्र । देखि । कुंअर । प्रथीराज । अदभुत्त । एक ।
पहिराय । दीधी । सवै । उछाह । कीयौ । सह । अभंग । अनंग । प्रथिराज । आयो । अठ ।
बीतिगा । ब्याहयुं । व्याहयु । देवगिर ॥
११

३३६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ८
दूहा ॥ बालपनै प्रथिराज नें, दिय कंचन वैमान ॥
मतौ फिरि दिन्नौ अक्रम, नाहर राइ विसान ॥
छं० ॥ २७ ॥ रु० ॥ २५ ॥
नाहर राय का उत्तर लिखना कि तुम्हारा कुल
आदि हमारे योग्य नहीं है ॥
कवित्त ॥ लिखि कग्गद परिमांन । यांन अजमेर पठाइय ॥
दूत पंथ अविखंब । पास संभरि वै आइय ॥
चिंति सत्त आरंभ । सेन पारंभ विचारिय ॥
बाल वीर प्रथिराज । देइ नांची परिचारिय ॥
सग पन सुआदि सम वर नृपति । समर जुद्ध साधै समर
कुल ढुंढ नाम दिज्जै नहीं । इह कलंक लग्गै सुघर ॥
छं० ॥ २८ ॥ रु० ॥ २६ ॥
अरिल्ल ॥ खेतरपाल कौं पूजैं कौंनं । जो परहरि गौ विंदह मौनं ।
परहरि सिव उमया गुन तचं । को मंडै चंडालो संचं ॥
छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ २७ ॥
दूत का यह पत्र लाकर पृथ्वीराज के हाथ में देना ॥
दूहा ॥ लिखि कग्गद परिचार पर, विवरि विवर करि दूत ॥
लै दीनौ प्रथिराज कर, समी संझ सपहूंत्त ॥
छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ २८ ॥
पृथ्वीराज का क्रोध करना, सोमेश्वरदेव का समझाना ॥
कवित्त ॥ बढि अवाज* अजमेर । बंचि कग्गद चौरासिम ॥
परिचारह सब सेन । धर्म परिहरि बढ्यौ भ्रम ॥
२५ पाठान्तर-बालपनैं । पृथ्वीराजनैं । फिर । कीनौ । नाहर राय ॥
२६ पाठान्तर-परिमांन । यांन । चित्तिं । मतः । विचारैय । पृथ्वीराज । देत । नांही ।
परिहारीय । नृपति । जुध । साधैं । नांम । दिजै । नही । लगैं ॥
२७ पाठान्तर-क्षेत्रपालकूं । पूजै । गे। । मोंन ॥
२८ पाठान्तर-पृथ्वीराज । पहूत ॥

सातवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३३०
सूर दूर तिन तेज । मध्य अँधियन यौं बाजे ॥
प्रात ओस जिम बूंद । जबह अयछ अनु लाजै ॥
संगन अनेक जंपत करन । नान वरज्यौ पुन फिरि ॥
मंजाव साह सिसु बत्त सुनि । करहि जुद्ध भुम्मिय सु जुरि ॥
छं० ॥ ३१ ॥ रु० ॥ २९ ॥
सरदारों का पत्त्र सुनकर क्रोध करना ॥
कवित्त ॥ सुनिय बत्त सामंत । बँचे कग्गद परिचारौ ॥
सीस लग्गि असमान । पिथ्यौ खंगा बंजारौ ॥
सिंघाने करि हन्यौ । केन जबू कंवर पड्डौ ॥
केन छीन सनि राह । जुद्ध तारा ससि वध्यौ ॥
वर कन्ह वीर सोमेस पहु । चाहुवान वक्कारियै ॥
बाहंत वीर अरि नीर विच । दत्त चौहाना तारियै ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ ३० ॥
कवित्त ॥ मुक्कै दूत सुद्दूत । रत्त गुन अरिन विरत्ता ॥
चिंत ननौ सिर भार । सार काग्ज सो रत्ता ॥
वर अपन जानही । प्रमान न्मान लुग्धै ॥
द्विग राजान प्रमान । देस विद्देस परष्षै ॥
ते दूत सपत मंडौवरह । चर चरिच अनुसरि परे ॥
भय प्रात राज दरबार गय । दिष्पि धार घर घर डरे ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ ३१ ॥
पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥
२९ पाठान्तर-आवाज । धूम । मधि । अंधिन । राजे । उस । बुंद । अयन । मंजाह
माह । भूमीय ॥ * यह शब्द अर्थात् "आवाजि और अवाज" आदिपर्व्व के रूपक १८१ तथा
१८२ पृष्ठ ७६ में भी आया है । उस पर की टिप्पण देखो । संस्कृत “वाज” और “वाद” शब्द
Sound, Sounding, discourse, speech, and prayer आदि के अर्थों में प्रयोग होते हैं उन से यह
हिन्दी अपभ्रष्ट शब्द बने दीखते हैं ॥
३० पाठान्तर-सुनीय । सांमंत । बंचे । बचे । कगद । असमांन । लगा । कर । पद्धै ।
छीनं । वधौ । कन्ह । चाहुत्रांन । चाहुवांन । वकारीयै । बाहत । विचि । चौहांनां । तारीयै ॥
३१ पाठान्तर-मूके । कारिज । जांन हि । प्रमांन । न्मिमांन । प्रमांन । राजन । विदेस ।
परषै । संपंत । चर चरित्र । दिषि ॥