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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 470 में से

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पृष्ठ 334

३२४ पृथ्वीराजरासो । [ छठां समय २६
दो मत्त हाथी दर्बार के बाहर बाँधे थे वह बीरों का
भयानक शब्द सुनकर चौंके ॥
दूहा ॥ गज घुमन्त गजराज बर, दो हथ्थी दरबार ॥
दूरि दूरि बन्धे रचैं । काल समान करार ॥ छं० ॥ १५४ ॥ रु० ॥ ७१ ॥
कवित्त ॥ अति बलवन्त अनन्त । गरुअ मानहु गिरवर से ॥
गगन जेम गाजन्त । बंध बंधन ते सरसे ॥
च्यार पटे कुहे * कंकालं । मह नद्दच सुअह्यो निसि ॥ ,
पवन पाइ पुरवाइ । काल रूपी कंकाल रिस ॥
सिर दिघ्घ दिघ्घ दन्तह सुभग । जरजराइ बंमरि जरिय ॥
लष लष दाम पावहि पटै । कनक साजचाज सु करिय ॥
छं० ॥ १५५ ॥ रु० ॥ ७२ ॥
दोनो हाथियों का तुड़ाकर लड़जाना और दर्बार में
खलबली मचना ॥
दूहा ॥ बीर खोर आघात सुनि, गज छुटि बन्धन तोरि ॥
भिरे उभय भय भीत होइ, परि दरबारह रौरि ॥
छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ७३ ॥
छंद मोतीदाम ॥ भिरे गजराज भयानक रूप । उमै मदमत्त मचा जम झूप ॥
भए काङ्काल कराल अछूट । लगै जनु क्रोध सु कज्जल कूट ॥ १५७ ॥
जुरे जुग जानि गुरु गजराज । किधौं कउ दानव रूप दुराज ॥
जगे प्रलकाल भयानक भूत । इसे दुहू दन्ति भिरे अद्भुत ॥
छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ७४ ॥
७१ पाठान्तर-गुमांन । हथ्थी । रहे । समांन ॥
७२ पाठान्तर-गरुय । मांनहु । तैं । च्यारि । पट । * अधिक पाठ । मद । ह्व । हद्व ।
अह्रनिसि । पाय । पुरवाय । कंक्राल । दिघ दिघ । गरदराइ । वंगरी । लष २ । दांम । पावहिं ।
पटे । साजसु ॥
७३ पाठान्तर-छुट्टि । भिरै । भै । दरबारहिं । रोरि ॥
७४ पाठान्तर-भिरैं । भयानक । मदमत । कोऊ । चाहठ । लगे । कजल । कूट ॥ १५७ ॥
जांनि । गिरराज । कोऊ । दानव । लगे । जगै । प्रलै । भिरैं ॥ १५८ ॥